खुदको कभी तू देख ले
मेरी निगाहों से सखी
दिख जाएगी ऐसी छवी,
जो खुद तुझे भी न हो दिखी
कर ले जिकर खुदका कभी
मेरे लबों से भी सखी
देंगे सुनाई तारीफों के सुर,
न अब तक सुन सकी || मुखडा ||
मैं कैद लब्जों में करू
तेरी सुहानी खूबियाँ
वो छोटी-छोटी आदतें,
मासूम अल्हड हरकतें
मेरी गज़ल में, नज़्म में
खुदको कभी पढ ले सखी
मीठे लगेंगे बोल इतने,
जैसे मिसरी हो चखी || अंतरा-१ ||
इक रोज मेरी नींद से
सपनें चुराकर देख ले
उनमें करे जादूगरी जो,
तू ही तो है वो परी
सौ बातों के भीतर छुपी
वो बात भी तू जान ले
फिर प्रीत समझेगी तुझे,
अब तक जुबाँ पर है रुकी || अंतरा-२ ||
- कल्पेश पाटील
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