जरा मैं, तू जरा मिलके
करे हम इक नयी शुरुआत
ख्वाबों के नगर में इक सुहाना घर बनाएंगे
उमंगो की तरंगों से
भरेंगे रंग फिजा में यूँ
भरी पतझड में भी गुलजार सा मंजर बनाएंगे
जरा मैं, तू जरा मिलके सुहाना घर बनाएंगे || मुखडा ||
लबों से कुछ न कहना तू
जरा बस मुस्कुरा देना
सभी बातें तेरे दिल की बखूबी जान लूंगा मैं
निगाहों के झरोखों से
खुशी तेरी पढूंगा मैं
गमों की छींट भी तुझपे कभी गिरने न दूंगा मैं
बिखर जाऊ कभी मैं राह में, तू ही सहारा हो
तू ही मंजधार में मेरे सफीने का किनारा हो
न कुछ मेरा, न तेरा हो
मिले जो भी, हमारा हो
चलेंगे हर कदम संग, जिंदगी सुंदर बनाएंगे
कयामत तक हमारा साथ हो,
तो क्या नही मुमकिन ?
की रेगिस्तान को भी प्रीत का सागर बनाएंगे
जरा मैं, तू जरा मिलके सुहाना घर बनाएंगे || अंतरा ||
- अनामिक
(१३/०८/२०२१ - २२/०६/२०२२)
22 जून 2022
जरा मैं, तू जरा मिलके
Labels:
हिंदी - गीत,
Collection - Paheli,
Collection-Paheli
20 जून 2022
मेरी निगाहों से
ऐ सखी.. ऐ सखी..
खुदको कभी तू देख ले
खुदको कभी तू देख ले
मेरी निगाहों से सखी
दिख जाएगी ऐसी छवी,
जो खुद तुझे भी न हो दिखी
कर ले जिकर खुदका कभी
मेरे लबों से भी सखी
देंगे सुनाई तारीफों के सुर,
न अब तक सुन सकी || मुखडा ||
मैं कैद लब्जों में करू
तेरी सुहानी खूबियाँ
वो छोटी-छोटी आदतें,
मासूम अल्हड हरकतें
मेरी गज़ल में, नज़्म में
खुदको कभी पढ ले सखी
मीठे लगेंगे बोल इतने,
जैसे मिसरी हो चखी || अंतरा-१ ||
इक रोज मेरी नींद से
सपनें चुराकर देख ले
उनमें करे जादूगरी जो,
तू ही तो है वो परी
सौ बातों के भीतर छुपी
वो बात भी तू जान ले
फिर प्रीत समझेगी तुझे,
अब तक जुबाँ पर है रुकी || अंतरा-२ ||
- कल्पेश पाटील
15 जून 2022
भगदौड काफी हो गयी
भगदौड काफी हो गयी.. दिल कह रहा अब, बस हुआ
जो धुंद सुहानी थी फिजा में, बन गयी है अब धुआ
चलकर हजारों मील भी आगे दोराहे हैं नये
दौलत समय की खर्च दी बस एक सपनें के लिए
करती रही लहरें समय की वार, दिल ने सब सहा
बरसों सबर का बांध था मजबूत, पर अब ढह रहा
दिखता रहा आगे जजीरा, नाव बहती ही रही
इतने समंदर तर लिए.. की अब छोर की ख्वाइश नही
मैं इस जनम तक क्या, कयामत तक भी कर लू इंतजार
पर बेकदर इन महफिलों में ठहरने का दिल नही
अब सोचता हूँ, छोड दू तकदीर पे ही फैसलें
वरना न हासिल कर सकू, ऐसी कोई मंजिल नही
- अनामिक
(११-१५/०६/२०२२)
10 जून 2022
चाँद आखिर चाँद है
है साफ.. पानी सा,
दुआओं सा, इबादत सा
न जिसके रूप में कोई मिलावट
चाँद आखिर चाँद है !
पूरा कभी, आधा कभी
होंगे, न होंगे दाग भी
फिर भी है बेहद खूबसूरत
चाँद आखिर चाँद है !
साज की, श्रृंगार की,
बाहरी दिखावे की नही है चाँद को कोई जरूरत
चाँद आखिर चाँद है !
माना, कठिन बिलकुल नही, बनना सितारों सा, मगर..
बनना जरूरी भी तो नही, अपना अलगपन छोडकर
गर चाँद भी झिलमिल सितारों की नदी में बह गया
तो चाँद में और बाकियों में फर्क ही क्या रह गया ?
है ये गुजारिश चाँद से,
"बदलाव की जद्दोजहद में
खो न दे अपनी नजाकत"
चाँद आखिर चाँद है !
भीनी सी शीतल चाँदनी ही चाँद की पहचान है
है चाँद तो सबसे जुदा.. उसमें ही उसकी शान है
क्यों की..
चाँद आखिर चाँद है !
- अनामिक
(०७/०५/२०१९ - १०/०६/२०२२)
दुआओं सा, इबादत सा
न जिसके रूप में कोई मिलावट
चाँद आखिर चाँद है !
पूरा कभी, आधा कभी
होंगे, न होंगे दाग भी
फिर भी है बेहद खूबसूरत
चाँद आखिर चाँद है !
साज की, श्रृंगार की,
बाहरी दिखावे की नही है चाँद को कोई जरूरत
चाँद आखिर चाँद है !
माना, कठिन बिलकुल नही, बनना सितारों सा, मगर..
बनना जरूरी भी तो नही, अपना अलगपन छोडकर
गर चाँद भी झिलमिल सितारों की नदी में बह गया
तो चाँद में और बाकियों में फर्क ही क्या रह गया ?
है ये गुजारिश चाँद से,
"बदलाव की जद्दोजहद में
खो न दे अपनी नजाकत"
चाँद आखिर चाँद है !
भीनी सी शीतल चाँदनी ही चाँद की पहचान है
है चाँद तो सबसे जुदा.. उसमें ही उसकी शान है
क्यों की..
चाँद आखिर चाँद है !
- अनामिक
(०७/०५/२०१९ - १०/०६/२०२२)
01 जून 2022
पुन्हा गाठ व्हावी
उन्हाच्या मनी सावलीचे ठसे
सावलीच्या मनीही उन्हाचे कवडसे
तरी मौन हळवे हवेतून वाहे
कुणा ना कळे, व्यक्त व्हावे कसे
उन्हाने पुन्हा सावलीला स्मरावे
पुन्हा सावलीने उन्हा साद द्यावी
नभाने करावी निळीशार किमया
उन्हा-सावलीची पुन्हा गाठ व्हावी || धृ ||
किती त्या झळा तप्त भाळी उन्हाच्या
किती गारठा सावलीच्या तळाशी
किती एकटे ते परीघात अपुल्या
अता मात्र जवळीक व्हावी जराशी
सावलीच्या मनीही उन्हाचे कवडसे
तरी मौन हळवे हवेतून वाहे
कुणा ना कळे, व्यक्त व्हावे कसे
उन्हाने पुन्हा सावलीला स्मरावे
पुन्हा सावलीने उन्हा साद द्यावी
नभाने करावी निळीशार किमया
उन्हा-सावलीची पुन्हा गाठ व्हावी || धृ ||
किती त्या झळा तप्त भाळी उन्हाच्या
किती गारठा सावलीच्या तळाशी
किती एकटे ते परीघात अपुल्या
अता मात्र जवळीक व्हावी जराशी
जुनी रात्र सरुनी नवी पहाट व्हावी
उन्हा-सावलीची पुन्हा गाठ व्हावी || १ ||
किती लोटले ते हिवाळे, उन्हाळे
किती दाटले भावनांचे उमाळे
किती आर्त गाणी दडवली ऋतूंनी
किती साठले ते नभी मेघ काळे
सुरांना, सरींना खुली वाट व्हावी
उन्हा-सावलीची पुन्हा गाठ व्हावी || २ ||
उन्हा-सावलीची पुन्हा गाठ व्हावी || १ ||
किती लोटले ते हिवाळे, उन्हाळे
किती दाटले भावनांचे उमाळे
किती आर्त गाणी दडवली ऋतूंनी
किती साठले ते नभी मेघ काळे
सुरांना, सरींना खुली वाट व्हावी
उन्हा-सावलीची पुन्हा गाठ व्हावी || २ ||
- अनामिक
(३१/०३/२०२२ - ०१/०६/२०२२)
(३१/०३/२०२२ - ०१/०६/२०२२)
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