कितनी दफा हम दोनों को ये ला रही है रूबरू
संजोग है ? या है इशारा आसमानी मेल का ?
चाहे न चाहे हम, मगर दास्तान होनी है शुरू || मुखडा ||
नटखट समय की साजिशों में बात है कुछ अनकही
वरना हमारे रासतें बेवक्त टकराते नही
मक्सद बिना, मतलब बिना इक फूल भी खिलता नही
यूँ ही नही नजरें हमारी आते-जाते मिल रही
होगा करिश्मा.. सोचकर कब तक करेंगे इंतजार ?
यूँ कायनाती सिलसिलें चलते नही हैं बार बार
अब तो पहल करनी पडेगी.. तुम करो, या मैं करू ?
चाहे न चाहे हम, मगर आते रहेंगे रूबरू || अंतरा ||
- कल्पेश पाटील
(२९/०४/२०२४ - ०७/०५/२०२४)