सर्द खामोशियाँ सुरमयी बह रही
रैन को तो है बस चाँद का इंतजार
आसमाँ में हजारों सितारें सही
रैन बेचैन है.. चाँद निकला नही || मुखडा ||
नींद की गोद में खो गया है शहर
रैन की पीड से है शहर बेखबर
रैन गाती रहे लोरियों की लडी
चाँद की दासताँ है रखी अनकही
रैन बेचैन है.. चाँद निकला नही || अंतरा-१ ||
बावरा इक दिया है कही जल रहा
उस उजाले में इक ख्वाब है पल रहा
जुगनुओं की तरह ख्वाब उडता फिरे
पर न मंजिल मिले, लौट आए यही
रह न जाए अधूरा तरसता कही
रैन बेचैन है.. चाँद निकला नही || अंतरा-२ ||
- कल्पेश पाटील
(०५-१५/०४/२०२४)
(०५-१५/०४/२०२४)