कभी आसू, कभी मुस्कान बनकर याद आते हो
कभी सपना, कभी अरमान बनकर याद आते हो
कभी शबनम की बूँदों सी, कभी रिमझिम फुहारों सी
कभी जज़बात का तूफान बनकर याद आते हो
भले दो-चार पल ही तुम रुके दहलीज पे दिल के
मगर अब उम्र के मेहमान बनकर याद आते हो
हमारे दर्मियाँ क्या राबता था ? था भरम, या सच ?
कभी अपना, कभी अंजान बनकर याद आते हो
किताबें जिंदगी की एक पन्ने पे ही अटकी है
अधूरी अनकही दास्तान बनकर याद आते हो
कभी रूठी हुई मुस्कान बनकर याद आते हो
कभी बिछडा हुआ अरमान बनकर याद आते हो
- अनामिक
(०१-०६/०४/२०२३)