नींद की गोद में खो गया है शहर
रैन गाती रहे लोरियों की लडी
चाँद की दासताँ है रखी अनकही
जुगनुओं की तरह ख्वाब उडता फिरे
रैन बेचैन है.. चाँद निकला नही || अंतरा-२ ||
(०५-१५/०४/२०२४)
बस यही तक था सफर, था बस यही तक रासता
बस यही तक साथ था अपना, यही तक वासता
रब ने लिखी थी खुद कभी..
तकदीर ने फिर भी मिटा दी खामखा
जनमों-जनम की खूबसूरत दासताँ
दो दूर के पहियें कभी लाए थे संग संजोग ने
चलेगी सवारी उम्रभर ये, राह को भी था पता
कुछ भी न थे शिकवें-गिलें, फिर भी बिछ गए फासलें
लगती न अपनों की नजर, तो खूब खिलता राबता
जो इस जनम ना फूल बन पायी मोहब्बत की कली
अगले जनम मिलकर सजाएंगे दिलों का गुलसिताँ
आवाज पहुचेगी न अब, जितनी भी दू दिल से सदा
तो अब निकलता हूँ सखी, लेकर अधूरा अलविदा
- अनामिक
(०६-१५/१०/२०२२)
साबुन के बुलबुलों के जैसे ख्वाब फुलाकर उडा रहा हूँ
इस पल है महफूज, न जाने कल का मंजर क्या होगा !..
बदमाश वक्त की हवा किस दिशा, किस रफ्तार बहेगी कल ?!..
इन अल्हड मेरे ख्वाबों का अंजान मुकद्दर क्या होगा ?!..
वो बस दिखने में नाजुक हैं, पर लड लेंगे पर्बत से भी
वो शोख हवा पे सवार होकर उड भी लेंगे अंबर तक
वो चकमा देंगे तूफानों को, पार करेंगे सागर तक
पर किस्मत जब बनकर आए खूँखार बवंडर, क्या होगा ?!..
इन अल्हड मेरे ख्वाबों का अंजान मुकद्दर क्या होगा ?!..
- अनामिक
(१९/०३/२०२२ - ०९/१०/२०२२)
नादान हुआ करते थे जो.. बेफिक्र जिया करते थे जो
अफसानों के आसमान में खुलकर उडान भरते थे जो
पर जिंदगी के गुरू से कैसा पाठ न जाने सुन बैठे
वो अल्हड, चंचल सपनें मेरे समझदार क्यों बन बैठे ?!..
बेवक्त आँख के दरवाजे पे अब वो दस्तक देते नही
बेवजह रात की गलियारों में नींदों को छेडते नही
वो उडते उडते शायद गलती से वास्तव के नगर गए
और देख नजारा सच्चाई का सहम गए, फिर बदल गए
वो उस दिन से खामोश हुए यूँ, गीत न इक भी गा पाए
अरमानों के गुलशन में नया न इक भी बीज लगा पाए
कमजोर नही थे बिलकुल भी वो, आखिर तक वो डटे रहे
पर कौन बच सका है किस्मत से ? सपनें सारे बिखर गए
- अनामिक
(१८-२३/०९/२०२२)
ऐ चाँद.. रुक जा और थोडी देर तू
ना छोडकर जा रोशनी की डोर तू
बेरंग अंधेरे आसमाँ का नूर तू
ऐ चाँद.. रुक जा और थोडी देर तू
ज्यादा नही, थोडा सही
बस और चंद पल तो ठहर
जब तक बुलाए ना सहर
तेरी चाँदनी के नूर से सवार लू दिल का नगर
या फिर ठहर कुछ और वक्त
कुछ दिन, महीनें, या बरस
या इक बडी लंबी सदी
या उम्र, सारी जिंदगी
तुझ संग लगेगा इक जनम भी जैसे इक प्यारी घडी
तू वक्त जितना भी रुके, कम ही लगे.. काफी नही
ऐ चाँद.. रुक भी जा हमेशा के लिए.. मत जा कही
रह जा यही
- अनामिक
(२२/०३/२०२२ - १४/०७/२०२२)
जरा मैं, तू जरा मिलके
करे हम इक नयी शुरुआत
ख्वाबों के नगर में इक सुहाना घर बनाएंगे
उमंगो की तरंगों से
भरेंगे रंग फिजा में यूँ
भरी पतझड में भी गुलजार सा मंजर बनाएंगे
जरा मैं, तू जरा मिलके सुहाना घर बनाएंगे || मुखडा ||
लबों से कुछ न कहना तू
जरा बस मुस्कुरा देना
सभी बातें तेरे दिल की बखूबी जान लूंगा मैं
निगाहों के झरोखों से
खुशी तेरी पढूंगा मैं
गमों की छींट भी तुझपे कभी गिरने न दूंगा मैं
बिखर जाऊ कभी मैं राह में, तू ही सहारा हो
तू ही मंजधार में मेरे सफीने का किनारा हो
न कुछ मेरा, न तेरा हो
मिले जो भी, हमारा हो
चलेंगे हर कदम संग, जिंदगी सुंदर बनाएंगे
कयामत तक हमारा साथ हो,
तो क्या नही मुमकिन ?
की रेगिस्तान को भी प्रीत का सागर बनाएंगे
जरा मैं, तू जरा मिलके सुहाना घर बनाएंगे || अंतरा ||
- अनामिक
(१३/०८/२०२१ - २२/०६/२०२२)
भगदौड काफी हो गयी.. दिल कह रहा अब, बस हुआ
जो धुंद सुहानी थी फिजा में, बन गयी है अब धुआ
चलकर हजारों मील भी आगे दोराहे हैं नये
दौलत समय की खर्च दी बस एक सपनें के लिए
करती रही लहरें समय की वार, दिल ने सब सहा
बरसों सबर का बांध था मजबूत, पर अब ढह रहा
दिखता रहा आगे जजीरा, नाव बहती ही रही
इतने समंदर तर लिए.. की अब छोर की ख्वाइश नही
मैं इस जनम तक क्या, कयामत तक भी कर लू इंतजार
पर बेकदर इन महफिलों में ठहरने का दिल नही
अब सोचता हूँ, छोड दू तकदीर पे ही फैसलें
वरना न हासिल कर सकू, ऐसी कोई मंजिल नही
- अनामिक
(११-१५/०६/२०२२)
जो साथ तेरे है शुरू
दो-चार लम्हों का सफर
ना खत्म हो, चलता रहे यूँ उम्रभर
जो बात तुझसे है छिडी
दो लब्ज, या इक दासताँ
वो गीत सी घुलती रहे शामो-सहर || मुखडा ||
तू बिन कहे भी मैं सुनू
खामोशियों की भी जुबाँ
तेरी उदासी, या खुशी
बेचैनियाँ, या ख्वाइशें
जिनसे खिले गुमसुम लबों पे
मुस्कुराहट की कली
ना इल्म भी जिनका तुझे
मैं सब करू वो कोशिशें
तेरे नयन के ख्वाबों में
मैं हौसलों के रंग भरू
मंजिल चुने तू, और बनू मैं रहगुजर
ना खत्म हो, चलता रहे यूँ ही सफर || अंतरा ||
- अनामिक
(०४/०८/२०१९)