06 अप्रैल 2023
याद आते हो
15 अक्टूबर 2022
अलविदा
बस यही तक था सफर, था बस यही तक रासता
बस यही तक साथ था अपना, यही तक वासता
रब ने लिखी थी खुद कभी..
तकदीर ने फिर भी मिटा दी खामखा
जनमों-जनम की खूबसूरत दासताँ
दो दूर के पहियें कभी लाए थे संग संजोग ने
चलेगी सवारी उम्रभर ये, राह को भी था पता
कुछ भी न थे शिकवें-गिलें, फिर भी बिछ गए फासलें
लगती न अपनों की नजर, तो खूब खिलता राबता
जो इस जनम ना फूल बन पायी मोहब्बत की कली
अगले जनम मिलकर सजाएंगे दिलों का गुलसिताँ
आवाज पहुचेगी न अब, जितनी भी दू दिल से सदा
तो अब निकलता हूँ सखी, लेकर अधूरा अलविदा
- अनामिक
(०६-१५/१०/२०२२)
09 अक्टूबर 2022
ख्वाबों के बुलबुलें
साबुन के बुलबुलों के जैसे ख्वाब फुलाकर उडा रहा हूँ
इस पल है महफूज, न जाने कल का मंजर क्या होगा !..
बदमाश वक्त की हवा किस दिशा, किस रफ्तार बहेगी कल ?!..
इन अल्हड मेरे ख्वाबों का अंजान मुकद्दर क्या होगा ?!..
वो बस दिखने में नाजुक हैं, पर लड लेंगे पर्बत से भी
वो शोख हवा पे सवार होकर उड भी लेंगे अंबर तक
वो चकमा देंगे तूफानों को, पार करेंगे सागर तक
पर किस्मत जब बनकर आए खूँखार बवंडर, क्या होगा ?!..
इन अल्हड मेरे ख्वाबों का अंजान मुकद्दर क्या होगा ?!..
- अनामिक
(१९/०३/२०२२ - ०९/१०/२०२२)
22 सितंबर 2022
समझदार सपनें
नादान हुआ करते थे जो.. बेफिक्र जिया करते थे जो
अफसानों के आसमान में खुलकर उडान भरते थे जो
पर जिंदगी के गुरू से कैसा पाठ न जाने सुन बैठे
वो अल्हड, चंचल सपनें मेरे समझदार क्यों बन बैठे ?!..
बेवक्त आँख के दरवाजे पे अब वो दस्तक देते नही
बेवजह रात की गलियारों में नींदों को छेडते नही
वो उडते उडते शायद गलती से वास्तव के नगर गए
और देख नजारा सच्चाई का सहम गए, फिर बदल गए
वो उस दिन से खामोश हुए यूँ, गीत न इक भी गा पाए
अरमानों के गुलशन में नया न इक भी बीज लगा पाए
कमजोर नही थे बिलकुल भी वो, आखिर तक वो डटे रहे
पर कौन बच सका है किस्मत से ? सपनें सारे बिखर गए
- अनामिक
(१८-२३/०९/२०२२)
14 जुलाई 2022
ऐ चाँद.. रुक जा
ऐ चाँद.. रुक जा और थोडी देर तू
ना छोडकर जा रोशनी की डोर तू
बेरंग अंधेरे आसमाँ का नूर तू
ऐ चाँद.. रुक जा और थोडी देर तू
ज्यादा नही, थोडा सही
बस और चंद पल तो ठहर
जब तक बुलाए ना सहर
तेरी चाँदनी के नूर से सवार लू दिल का नगर
या फिर ठहर कुछ और वक्त
कुछ दिन, महीनें, या बरस
या इक बडी लंबी सदी
या उम्र, सारी जिंदगी
तुझ संग लगेगा इक जनम भी जैसे इक प्यारी घडी
तू वक्त जितना भी रुके, कम ही लगे.. काफी नही
ऐ चाँद.. रुक भी जा हमेशा के लिए.. मत जा कही
रह जा यही
- अनामिक
(२२/०३/२०२२ - १४/०७/२०२२)
22 जून 2022
जरा मैं, तू जरा मिलके
जरा मैं, तू जरा मिलके
करे हम इक नयी शुरुआत
ख्वाबों के नगर में इक सुहाना घर बनाएंगे
उमंगो की तरंगों से
भरेंगे रंग फिजा में यूँ
भरी पतझड में भी गुलजार सा मंजर बनाएंगे
जरा मैं, तू जरा मिलके सुहाना घर बनाएंगे || मुखडा ||
लबों से कुछ न कहना तू
जरा बस मुस्कुरा देना
सभी बातें तेरे दिल की बखूबी जान लूंगा मैं
निगाहों के झरोखों से
खुशी तेरी पढूंगा मैं
गमों की छींट भी तुझपे कभी गिरने न दूंगा मैं
बिखर जाऊ कभी मैं राह में, तू ही सहारा हो
तू ही मंजधार में मेरे सफीने का किनारा हो
न कुछ मेरा, न तेरा हो
मिले जो भी, हमारा हो
चलेंगे हर कदम संग, जिंदगी सुंदर बनाएंगे
कयामत तक हमारा साथ हो,
तो क्या नही मुमकिन ?
की रेगिस्तान को भी प्रीत का सागर बनाएंगे
जरा मैं, तू जरा मिलके सुहाना घर बनाएंगे || अंतरा ||
- अनामिक
(१३/०८/२०२१ - २२/०६/२०२२)
15 जून 2022
भगदौड काफी हो गयी
भगदौड काफी हो गयी.. दिल कह रहा अब, बस हुआ
जो धुंद सुहानी थी फिजा में, बन गयी है अब धुआ
चलकर हजारों मील भी आगे दोराहे हैं नये
दौलत समय की खर्च दी बस एक सपनें के लिए
करती रही लहरें समय की वार, दिल ने सब सहा
बरसों सबर का बांध था मजबूत, पर अब ढह रहा
दिखता रहा आगे जजीरा, नाव बहती ही रही
इतने समंदर तर लिए.. की अब छोर की ख्वाइश नही
मैं इस जनम तक क्या, कयामत तक भी कर लू इंतजार
पर बेकदर इन महफिलों में ठहरने का दिल नही
अब सोचता हूँ, छोड दू तकदीर पे ही फैसलें
वरना न हासिल कर सकू, ऐसी कोई मंजिल नही
- अनामिक
(११-१५/०६/२०२२)
10 जून 2022
चाँद आखिर चाँद है
दुआओं सा, इबादत सा
न जिसके रूप में कोई मिलावट
चाँद आखिर चाँद है !
पूरा कभी, आधा कभी
होंगे, न होंगे दाग भी
फिर भी है बेहद खूबसूरत
चाँद आखिर चाँद है !
साज की, श्रृंगार की,
बाहरी दिखावे की नही है चाँद को कोई जरूरत
चाँद आखिर चाँद है !
माना, कठिन बिलकुल नही, बनना सितारों सा, मगर..
बनना जरूरी भी तो नही, अपना अलगपन छोडकर
गर चाँद भी झिलमिल सितारों की नदी में बह गया
तो चाँद में और बाकियों में फर्क ही क्या रह गया ?
है ये गुजारिश चाँद से,
"बदलाव की जद्दोजहद में
खो न दे अपनी नजाकत"
चाँद आखिर चाँद है !
भीनी सी शीतल चाँदनी ही चाँद की पहचान है
है चाँद तो सबसे जुदा.. उसमें ही उसकी शान है
क्यों की..
चाँद आखिर चाँद है !
- अनामिक
(०७/०५/२०१९ - १०/०६/२०२२)
01 जून 2022
पुन्हा गाठ व्हावी
सावलीच्या मनीही उन्हाचे कवडसे
तरी मौन हळवे हवेतून वाहे
कुणा ना कळे, व्यक्त व्हावे कसे
उन्हाने पुन्हा सावलीला स्मरावे
पुन्हा सावलीने उन्हा साद द्यावी
नभाने करावी निळीशार किमया
उन्हा-सावलीची पुन्हा गाठ व्हावी || धृ ||
किती त्या झळा तप्त भाळी उन्हाच्या
किती गारठा सावलीच्या तळाशी
किती एकटे ते परीघात अपुल्या
अता मात्र जवळीक व्हावी जराशी
उन्हा-सावलीची पुन्हा गाठ व्हावी || १ ||
किती लोटले ते हिवाळे, उन्हाळे
किती दाटले भावनांचे उमाळे
किती आर्त गाणी दडवली ऋतूंनी
किती साठले ते नभी मेघ काळे
सुरांना, सरींना खुली वाट व्हावी
उन्हा-सावलीची पुन्हा गाठ व्हावी || २ ||
(३१/०३/२०२२ - ०१/०६/२०२२)
24 मई 2022
है याद वो दिन आज भी
29 अप्रैल 2022
ये वक्त है, या है नदी ?!
किस ओर बहती जा रही ?..
रफ्तार इसकी तेज़ इतनी, है समझ के भी परे
जाने कहाँ ले जा रही ?..
क्या कुछ बहा ले जा रही
कैसे उभर पाए भला, इक बार जो इसमें गिरे ?
ये वक्त है, या है नदी ?! || धृ ||
चंचल पलों की रेत
मुठ्ठी से फिसलती जा रही
पलखें झपकते ही यहाँ
सदियाँ बदलती जा रही
ये वक्त क्यों माने न मद्धम जिंदगी के दायरें ?
ये वक्त है, या है नदी ?! || १ ||
तैरे भला तो किस दिशा ?
ढूँढे जज़ीरा कौनसा ?
इस पार, या उस पार का, थामे किनारा कौनसा ?
सीखे कहाँ मंझधार में से लौटने के पैंतरें ?
ये वक्त है, या है नदी ?! || २ ||
चलते रहे बरसों मुसाफिर जिंदगी की रहगुज़र
पर खींच ले भीतर उन्हें जब वक्त का गहरा भवर
सीधे सयाने शख्स भी बन जाते हैं तब बावरे
ये वक्त है, या है नदी ?! || ३ ||
- अनामिक
(२३/०३/२०२२ - २९/०४/२०२२)
17 अप्रैल 2022
शुरुआत
कब, कैसे आए लौटकर.. संजोग की ही बात है
15 अप्रैल 2022
आसान ही क्या है भला ?!
जो चैन से सोने दे, वो अरमान ही क्या है भला ?!
क्यों फिक्र है, की कोशिशों का फायदा कुछ हो, न हो ?!
इक बार करके देख ले.. नुकसान ही क्या है भला ?!
जन्नत तलक जो ले चले, वो राह मुश्किल है बडी
पर जिंदगी की दौड में आसान ही क्या है भला ?!
यूँ ही न किस्मत से खुलेंगी आसमाँ की खिडकियाँ
घायल न कर दे पंख जो, वो उडान ही क्या है भला ?!
जब गम चखो, तो ही खुशी का स्वाद चलता है पता
अश्कों बिना खिल जाए, वो मुस्कान ही क्या है भला ?!
लहरों से माने हार, वो इन्सान ही क्या है भला ?!
पूरी करे 'वो' सब मुरादें, पहले शिद्दत तो दिखा
बस मन्नतों से माने, वो भगवान ही क्या है भला ?!
- अनामिक
10 मार्च 2022
सादगी
बेसमय के अश्क
गर दर्द छलका है नयन से टीस गहरी है कही
"बस यूँ ही" कहकर टाल दे तू, ना बता, क्या है कमी
पर देखकर रिमझिम नयन मेरी फिकर है लाजमी
ये बेसमय के अश्क तेरे || मुखडा ||
गुमसुम रहे, कुछ ना कहे बेचैन या तनहा रहे
पढकर नजर पहचान लू तू जो चुभन भीतर सहे
जब अश्क की इक बूँद भी तेरी निगाहों से बहे
इन मोतियों के मोल का कुछ इल्म ही तुझको नही
ज़ाया न हो ये, इस लिए कर दू न्योछावर जर-जमीं
ये बेसमय के अश्क तेरे || अंतरा-१ ||
ये दो नयन, हैं दो सितारें पहचान इनकी रोशनी
तू ढूँढ ले खुदकी सहर अंधियारा हो, या चाँदनी
ये ही दुआ मांगू खुदा से खुश रहे तू हर घडी
खिलती रहे मुस्कान की तेरे लबों पे पंखुडी
तू जिस डगर रख दे कदम हो जीत ही आगे खडी
तू हौसलों की डोर से सौ ख्वाब बुन ले रेशमी
ये बेसमय के अश्क तेरे || अंतरा-२ ||
- कल्पेश पाटील
(०१/०५/१९ - १०/०३/२२)
07 सितंबर 2021
जो ख्वाब नैनों में बसा है
मैं हौसले से ख्वाइशों को मंजिलों से जोड दू
आँधी मिले, या जलजलें
ना ही रुकेंगे काफिलें
मैं वक्त पर होकर सवार तकदीर का रुख मोड दू
जो ख्वाब नैनों में बसा है, कैसे उसको छोड दू ?! || मुखडा ||
डर क्या अंधेरे का उसे ?!
जिसकी नजर में रोशनी
उडने गगन भी कम उसे
जिसने बुलंदी हो चुनी
गर ठान लू, पग में बंधी सब बेडियों को तोड दू
जो ख्वाब नैनों में बसा है, कैसे उसको छोड दू ?! || अंतरा-१ ||
इन्सान हूँ.. थककर कभी,
रुककर कभी, झुककर कभी
दो-चार लम्हें बैठ जाऊ
इसका मतलब ये नही की
हार माने टूट जाऊ
जो ख्वाब नैनों में बसा है, कैसे उसको छोड दू ?! || अंतरा-२ ||
- अनामिक
(१४/०९/२०१९ - ०७/०९/२०२१)
01 सितंबर 2021
ये नैना क्या कुछ बोल रहे हैं
ये जता रहे हैं काफी कुछ
ये खामोशी का चिलमन ओढे बता रहे हैं काफी कुछ
03 अगस्त 2021
हरियाली का दौर नही
31 जुलाई 2021
हम मिले तुम मिले
खुल गयी बंदिशें मिट गए फासलें
हम मिले तुम मिले
चाँदनी की लहर यूँ भिगाकर गयी
धुल गये दर्मियाँ थे जो शिकवें-गिलें
हम मिले तुम मिले || मुखडा ||
रूबरू हम हुए जैसे सागर-नदी
आइने में दिखी जैसे खुद की छवी
मिल गए हाथ यूँ जिंदगी की कडी
धडकनों की लडी दिल से दिल तक जुडी
जब नजर से नजर की हुई गुफ्तगू
मन के आँगन छनकने लगी पायलें
हम मिले तुम मिले || अंतरा-१ ||
लब्ज खामोश थे गा रहे थे नयन
प्रीत की धुन पे हम-तुम हुए थे मगन
छू गये रूह को सुर हुए यूँ बुलंद
हो रहा हो जमीं-आसमाँ का मिलन
रात की ओंस में घुल गयी साँस यूँ
जुगनुओं के नगर ख्वाब उडने चले
हम मिले तुम मिले || अंतरा-२ ||
- कल्पेश पाटील
(०८/०५/२०२१ - ३१/०७/२०२१)
24 जुलाई 2021
फिर से
15 जून 2021
सपनें तो सपनें होते हैं
अल्हड और भोले होते हैं
मनुष्य ये कहलाएंगे..
सपनें थोडी रह पाएंगे ?!
01 जून 2021
सब कह दिया
नजरों से नजरों ने सब कह दिया
गालों की सुर्खी ने मुस्काते चेहरे ने
बिन बोले अधरों ने सब कह दिया
दर्या की महफिल में ख़्वाबीदा साहिल से
जज़बाती लहरों ने सब कह दिया
खुशबू की बोली में धरती के कानों में
बरखा बौछारों ने सब कह दिया
|| मुखडा ||
दिन था वो, या था कोई अफसाना
जिस दिन किस्मत से ही मिल पाए थे हम
दो कदमों का, पर दो जनमों जितना
रस्ता दो पल में संग चल पाए थे हम
नैनों से छलकी खुशियों की भीनी
रिमझिम ने सब कह दिया
दिल की तारों ने धडकन में छेडी
सरगम ने सब कह दिया
आहिस्ता, होले से छूकर एहसासों को
हाथों के रेशम ने सब कह दिया
दो दिल की गलियों में खिलते गुलमोहरों से
ख्वाबों के मौसम ने सब कह दिया
|| अंतरा-१ ||
फिर कब हो मिलना मुश्किल था कहना
काश यूँ ही सदियों चलती अपनी बातें
बोझल थी साँसें पर हसते हसते
निकले हम लेकर यादों के गुलदस्तें
आगे बढकर भी पीछे ही मुडते
कदमों ने सब कह दिया
सपनों में हर दिन मिलते रहने की
कसमों ने सब कह दिया
|| अंतरा-२ ||
- अनामिक
(१३/०६/२०२० - ०१/०६/२०२१)
25 अप्रैल 2020
कह दे ना
दिल में ना रहने दे
अधरों से लब्जों की
लडियाँ अब बहने दे
गुमसुम तू, गुपचुप मैं
खामोश है ये घडियाँ
जजबातों की ठहरी
बहने दे अब नदियाँ
कह दे ना.. कह दे ना..
दिल में जो है, कह दे.. || मुखडा ||
तरसा हूँ अल्हड से सुर तेरे सुनने
पलखों पे झलके हैं तेरे ही सपनें
अखियन के आँगन में आए ना निंदिया
पल पल भी लगता है तुझ बिन यूँ सदियाँ
जलता मन, सावन की
बसरा भी दे झडियाँ
जजबातों की ठहरी
बहने भी दे नदियाँ
कह दे ना.. कह दे ना..
दिल में ना रहने दे
कह दे ना.. कह दे ना..
दिल में जो है, कह दे.. || अंतरा ||
- कल्पेश पाटील
(१०-२५/०४/२०२०)
14 जनवरी 2020
तू जो मिला
मंजिल बिना मेरा सफर
तू जो मिला संजोग से
वीरान तनहा राह पर
चलने लगे फिर सिलसिलें
मिलने लगी गलियाँ नयी
खिलने लगी कलियाँ गुलाबी
जिंदगी की डाल पर
रूठी हुई तकदीर को
रब का इशारा मिल गया
तू जो मिला, यूँ चाँद को
झिलमिल सितारा मिल गया
सोचा न था, बन जाएगा
तू ही जरूरी इस कदर
तेरे सिवा दूजा न अब
दिल को गवारा हमसफर || मुखडा ||
सहमे हुए थे सुर सभी
तुझ संग तराने बन गए
बेनूर थे मंजर सभी
दिलकश नजारे खिल गए
पतझड भरे गलियारों को
रिमझिम फुहारें मिल गयी
बरसों बिछे अंधियारों में
सूरज हजारों खिल गए
ये जिंदगी थी बेदिशा
मक्सद दुबारा मिल गया
तू जो मिला, गुमराह कश्ती को
किनारा मिल गया || अंतरा ||
- अनामिक
(१३/१२/२०१९ - १४/०१/२०२०)
05 जनवरी 2020
ना ही झुकेगा फैसला
ना ही थकेगा हौसला
ना ही रुकेगा ख्वाइशों के पंछियों का काफिला
ना दुश्मनों की है फिकर
ना साजिशों का है असर
भयभीत होकर छल-कपट से ना खतम होगा सफर
हो राह शोलों से भरी
ना लडखडाएंगे कदम
पुख्ता इरादें हो अगर
क्या ही डराएंगे जखम
मैं आँधियों से हार जानेवालों में से हूँ नही
मैं जलजलों से मात खानेवालों में से हूँ नही
- अनामिक
(२८/१२/२०१९, ०५/०१/२०२०)
इक अजब सी बेकरारी
क्या पता, क्या खल रहा ? है खामखा बेचैन मन
जैसे हवा में घुल गया हो साँस में चुभता धुआ
जैसे गगन में बादलों ने सूर्य पे कब्जा किया
जैसे समंदर ने दबाई हो लहरों की आँधियाँ
जैसे क्षितिज पे चीखती हो सांज की खामोशियाँ
जैसे लबों में घुट रहा हो राज कोई अनकहा
जैसे भटकता ख्वाब नैनों में दफन है हो रहा
जैसे कलम में सूख गयी हो इक अधूरी दासताँ
जैसे दुआएँ खो गयी हो मंदिरों का रासता
है इक अजब सी बेकरारी..
- अनामिक
(२२/०५/२०१९, ०५/०१/२०२०)
28 अगस्त 2019
मैं सूरज की परछाई
मैं अंबर की ऊँचाई भी
मैं किरणों की अपार ऊर्जा
मैं सूरज की परछाई
मैं संध्या की मोहकता भी
मैं साहिल की विनम्रता भी
मैं लहरों की चंचलता भी
मैं बिजली की शहनाई
मैं धरती की विशालता भी
मैं पानी की शीतलता भी
मैं बादल की नरमाई भी
मैं पत्थर की कठिनाई
मेरे कदम रोककर दिखाओ
या हौसला तोडकर दिखाओ
नन्ही समझ न धोखा खाओ
मैं सूरज की परछाई
- अनामिक
(२६,२८/०८/२०१९)
04 अगस्त 2019
चलता रहे यूँ ही सफर
जो साथ तेरे है शुरू
दो-चार लम्हों का सफर
ना खत्म हो, चलता रहे यूँ उम्रभर
जो बात तुझसे है छिडी
दो लब्ज, या इक दासताँ
वो गीत सी घुलती रहे शामो-सहर || मुखडा ||
तू बिन कहे भी मैं सुनू
खामोशियों की भी जुबाँ
तेरी उदासी, या खुशी
बेचैनियाँ, या ख्वाइशें
जिनसे खिले गुमसुम लबों पे
मुस्कुराहट की कली
ना इल्म भी जिनका तुझे
मैं सब करू वो कोशिशें
तेरे नयन के ख्वाबों में
मैं हौसलों के रंग भरू
मंजिल चुने तू, और बनू मैं रहगुजर
ना खत्म हो, चलता रहे यूँ ही सफर || अंतरा ||
- अनामिक
(०४/०८/२०१९)
31 जुलाई 2019
खामोशियाँ
अंगार सी बुझती रहे, जलती रहे खामोशियाँ
क्यों बात होकर भी बहोत बढती रहे खामोशियाँ
क्यों साथ होकर दर्मियाँ चलती रहे खामोशियाँ
क्यों बेरुखी के रूप में बहती रहे खामोशियाँ
क्यों कुछ न कहकर भी बहोत कहती रहे खामोशियाँ
क्यों सांज की दहलीज पर मिलती रहे खामोशियाँ
क्यों रात की चादर तले छलती रहे खामोशियाँ
खामोशियाँ.. खामोशियाँ.. खलती रहे खामोशियाँ
चुभते धुएँ सी साँस में घुलती रहे खामोशियाँ
- अनामिक
(३०,३१/०७/२०१९)
25 जुलाई 2019
एक पहेली
पर जितनी भी पहेलियाँ हो, चाहे तरह तरह की, न्यारी
सौ पहेलियाँ सुलझाने में मुझे न कुछ दिलचस्पी है
सुलझा लू वो एक पहेली, बस इतना ही काफी है
एक पहेली..
अंतरिक्ष के तारों की नक्काशी जैसी
जितनी दिलकश, उतनी गहरी
जिसका कोई छोर नही
भीतर कोलाहल या संगीत
बाहर बिलकुल शोर नही
एक पहेली..
मोरपंख पे रची हुई रंगोली जैसी
लुभावनी, पर जटिल बडी ही
नाजुक, पर कमजोर नही
जितनी मोहक, उतनी मुश्किल
एक पहेली.. जो सुलझाने
उम्र खर्च दू, तो भी कम है
मिल जाए हल, ना मिल पाए
उलझा रहू उम्रभर यूँ ही
ना भी सुलझी, ना गम है
- अनामिक
(२९/०५/२०१९ - २५/०७/२०१९)
27 मई 2019
पहेलियाँ
शख्सों की, शख्सियतों की
चेहरों के परदों के पीछे छुपी हुई असलियतों की
चलती-फिरती पहेलियाँ हैं इन्सानों के लिबास में
उलझ न जाओ खुद ही इनको सुलझाने के प्रयास में
किसको जानो ? कितना जानो ?
जिसको भी, जितना भी जानो..
जितनी भी नापो गहराई, उससे भी गहरा पानी है
जितनी भी मानो सच्चाई, बिलकुल अलग कहानी है
एक पहेली बूझो तो, झटसे दूजी भी हाजिर है
जिसको जितना समझो भोला, वो उतना ही शातिर है
प्याज की घनी परतों जैसे
सारे परदें खुल जाए जब
मन में थी जो छवी बनी,
उससे कुछ ना मिल-जुल पाए जब
जितनी भी दो मन को तसल्ली
सुद-बुद से समझी और परखी जितनी भी झुठला दो बातें
सच तो सच ही आखिर है
यहा पहेली बनकर जीने में हर कोई माहिर है
- अनामिक
(२६,२७/०५/२०१९)