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01 अक्टूबर 2023

खिला है आसमाँ में चाँद

बडी लंबी अमावस थी 
मगर रब ने सुनी फ़रियाद 
खिला है मुद्दतों के बाद फिरसे आसमाँ में चाँद 
खिला है आज फिरसे चाँद                   || मुखडा || 

फिजाओं में, निगाहों में 
सदी भर के अंधेरे थे 
नजारें चाँद बिन सूने 
भले लाखों सितारें थे 
अंधेरी कैद से आखिर हुई इक रोशनी आजाद 
खिला है आसमाँ में चाँद                  || अंतरा-१ || 

गुज़ारिश चॉंद से अब है 
करे जल्दी न जाने‌ की 
करू दीदार जी भरके 
रहे हसरत‌ न कुछ बाकी 
यूॅं बरसा चॉंदनी की बारिशें, रख लू उमरभर याद 
खिला है आसमाँ में चाँद                  || अंतरा-२ || 

यहा लाखों है दीवाने 
तुम्हारे रूप में ही दंग 
मगर मुझको लुभाता है 
तुम्हारी सादगी का रंग 
लिखू मैं नज़्म तुम पे और सुनाऊ, तुम कहो "इरशाद" 
खिला है आसमाँ में चाँद                  || अंतरा-३ || 

- कल्पेश पाटील 
(२२,३०/०९/२०२३, ०१/१०/२०२३) 

15 अप्रैल 2022

आसान ही क्या है भला ?!

मक्सद बिना जिंदा रहे, वो जान ही क्या है भला ?!
जो चैन से सोने दे, वो अरमान ही क्या है भला ?!

क्यों फिक्र है, की कोशिशों का फायदा कुछ हो, न हो ?!
इक बार करके देख ले.. नुकसान ही क्या है भला ?!

जन्नत तलक जो ले चले, वो राह मुश्किल है बडी
पर जिंदगी की दौड में आसान ही क्या है भला ?!

यूँ ही न किस्मत से खुलेंगी आसमाँ की खिडकियाँ
घायल न कर दे पंख जो, वो उडान ही क्या है भला ?!

जब गम चखो, तो ही खुशी का स्वाद चलता है पता
अश्कों बिना खिल जाए, वो मुस्कान ही क्या है भला ?!

तूफान आते हैं टटोलने कश्तियों का हौसला
लहरों से माने हार, वो इन्सान ही क्या है भला ?!

पूरी करे 'वो' सब मुरादें, पहले शिद्दत तो दिखा
बस मन्नतों से माने, वो भगवान ही क्या है भला ?!

- अनामिक

12 मई 2019

पाहिले तुज ज्या क्षणी

थक्क झालो, दंग झालो
स्तब्ध झालो, गुंग झालो
मग्न झालो, मुग्ध झालो
तृप्त झालो, लुब्ध झालो

तप्त ग्रीष्माच्या दुपारी
सर बरसली श्रावणी
अप्सरेसम रुप तुझे ते
पाहिले मी ज्या क्षणी || धृ ||

                        भरजरी लावण्य लेवुन
                        तू अशी येता समोरी
                        उमटले प्रतिबिंब गहिरे
                        भारलेल्या अंतरी

                        स्वर्गलोकातून अवतरली
                        परी जणु अंगणी
                        थक्क झालो, दंग झालो
                        पाहिले तुज ज्या क्षणी || १ ||

चांदण्या पडल्या फिक्या
लखलख तुझ्या तेजामुळे
चंद्रमा ठरलीस तू
सगळेच उरले ठोकळे 

पूर आला नक्षत्रांचा
काळोख्या तारांगणी
थक्क झालो, दंग झालो
पाहिले तुज ज्या क्षणी || २ ||

                        श्वास अडला चार घटका
                        थांबला हृदयात ठोका
                        राहिले उघडेच डोळे
                        जणु विजेचा सौम्य झटका 

                        मी कसे शुद्धीत यावे ?
                        काढे ना चिमटा कुणी
                        थक्क झालो, दंग झालो
                        पाहिले तुज ज्या क्षणी || ३ ||

- अनामिक
(११-२२/०३/२०१९, १२/०५/२०१९)

09 फ़रवरी 2019

मिठास

शक्कर के दानों सी तेरी छोटीसी, पर मीठी बातें
नाजुक होंठों पर मिश्री की डलियों जैसी मुस्कुराहटें
लब्जों से चाशनी छलकती, नजरों में शरबत की नदिया
गुलाबजामुन से गालों पर शहद सी शर्म-हया की छींटें

इतनी ज्यादा मिठास तेरी
जितनी भी पीकर जी भरकर भर लू इन नैनों के प्यालें
इस दिल को ना मिले राहतें

जितनी कर लू बातें तुझसे
जितनी जी लू सोहबत तेरी
जितनी पी लू खूबसूरती
और बढे ये अजब प्यास है
मिठास ही ये मर्ज है दिल का
इलाज भी ये मिठास है

- अनामिक
(१७,१८/०१/२०१९, ०९/०२/२०१९)

04 फ़रवरी 2019

सदाफुली

फुलपाखरासारखी चंचल 
झुळझुळ झऱ्यासारखी अवखळ 
इवल्या मुलासारखी अल्लड 
अन् कारंज्यागत उत्श्रृंखल

                            श्रावण-सरींसारखी लहरी 
                            हवेसारखी निखळ, खेळकर 
                            नदीसारखी स्वच्छंदी, अन् 
                            लाटांगत बेधुंद, बेफिकिर

चिऊसारखी अथक बोलकी 
मधासारखी गोड, लाजरी 
सदाफुलीसारखी सदैव 
टवटवीत, स्वानंदी, हसरी

                            गुलाबासारखी मनमोहक 
                            मोरपिसागत मखमल, कोमल 
                            विजेसारखी प्रखर, तळपती 
                            अन् तारकांसारखी तेजल

चैतन्याचा पाउस रिमझिम 
प्रसन्नतेचा पूर निरंतर 
उत्साहाची उदंड भरती 
अमर्याद ऊर्जेचा सागर

                            किती रंग उपमांचे भरले 
                            अपूर्ण तरिही वाटे चित्रण 
                            शक्य नसे शब्दांनी करणे 
                            तिच्या व्यक्तिमत्वाचे वर्णन 

- अनामिक 
(२४/०१/२०१९ - ०४/०२/२०१९) 

30 जनवरी 2018

शब्द आले, शब्द गेले

शब्द आले, शब्द गेले, शब्द बोलत राहिले 
शब्द पडले, शब्द उठले, शब्द डोलत राहिले 

शब्द मिटले, शब्द फुलले, शब्द बहरत राहिले 
शब्द झडले, शब्द रुजले, शब्द उमलत राहिले 

शब्द सुकले, शब्द भिजले, शब्द बरसत राहिले 
शब्द स्वप्नांच्या सरींचे वार झेलत राहिले 

शब्द खचले, शब्द विरले 
शब्द लढले, शब्द हरले 
शब्द बुडले, शब्द तरले, शब्द उसळत राहिले 
वेदनांची रत्नमाला शब्द माळत राहिले 

शब्द झुरले, शब्द रुसले 
शब्द रडले, शब्द हसले 
शब्द भुलले, शब्द फसले, शब्द भाळत राहिले 
शब्द दगडी देवतांवर व्यर्थ उधळत राहिले 

शब्द थकले, शब्द विटले 
शब्द सजले, शब्द नटले 
कालगंगेतून अविरत शब्द वाहत राहिले 
मार्ग सारे खुंटले, पण शब्द चालत राहिले 

- अनामिक 
(१२-३०/०१/२०१८) 

21 दिसंबर 2017

ख्वाब का पुल

हर रात निंदिया की नदी पर 
ख्वाब का पुल बांधकर 
भरकर सितारें जेब में 
मिलने निकलता हूँ तुम्हे 

तुम रात का काजल लगाकर 
चाँद बालों में सजाकर 
ताज फूलों का पहनकर 
राह में नजरें बिछाकर 

मेरी प्रतीक्षा में नदी के 
पार रहती हो खडी 
दो नैन बेचैनी भरे 
सौ बार तकते हैं घडी 

छुपते हुए पुल लांघकर मैं चाँदनी की छाँव से 
पीछे तुम्हारे आ खडा रहता हूँ हलके पाँव से 
होले से हाथों से तुम्हारे नैन ढक देता हूँ मैं 
और सब सितारें जेब से सर पर छिडक देता हूँ मैं 

वो स्पर्श मेरा जानकर 
वो धडकनें पहचानकर 
नाजुक लबों पर चैन की भीनी हसी खिलती हुई 
तरसी निगाहों में सितारों की चमक घुलती हुई 
होकर खुशी में चूर गालों पर हया चढती हुई 
बेताब साँसों में सुरीली रागिनी छिडती हुई 

उस इक झलक के, उस हसी के, 
उस हया के वासते 
मैं इक नदी, इक पुल भला क्या 
आँधियाँ क्या, जलजला क्या 
लाख पुल भी बांधकर 
हर जलजले को लांघकर 
मैं रोज ही मिलने तुम्हे 
आऊ किसी भी रासते 

बस रोज यूँ ही राह तकना 
उस नदी के पार तुम 
बेसब्र पलखों में सजाकर 
इश्क का गुलजार तुम 

- अनामिक 
(०९/०४/२०१७ - २१/१२/२०१७) 

30 नवंबर 2017

सौदा

क्यों बिन फायदे का रिश्ता जोडे ?
चल इक सौदा करते हैं 
जो पास खजाना है दोनों के, 
आधा-आधा करते हैं 

                              तू धूप सुनहरी ले आना 
                              मैं बरसातें ले आऊंगा 
                              कुछ नजरानों के बदले में 
                              कुछ सौगातें ले आऊंगा 

मैं तेरी पतझड ले लूंगा 
तू मेरी बहारें रख लेना 
मैं तेरे अंधेरें पी लूंगा 
तू मेरे सितारें रख लेना 

                              हर दर्द उठा लूंगा तेरा 
                              मेरी मुस्कानें रख लेना 
                              गा लूंगा तेरी चुप्पी भी 
                              तू मेरे तरानें रख लेना 

मैं तेरी आँधियाँ झेलूंगा 
तू मेरी हवाएँ रख लेना 
मैं तेरी बलाएँ ले लूंगा 
तू मेरी दुआएँ रख लेना 

                              तनहाई अपनी दे देना 
                              पर मेरी सोहबत रख लेना 
                              नफरत भी देना, फिकर नही 
                              पर मेरी मोहब्बत रख लेना 

तू जो बोले दिल, दे देना 
तू जो बोले दिल, रख लेना 
मंजूर मुझे है सौदा, बस.. 
दिल के बदले दिल रख लेना 

- अनामिक 
(२५-३०/११/२०१७) 

07 नवंबर 2017

रूबरू

हैं वक्त की बदमाशियाँ,
फिर लौट आयी वो घडी
जिस मोड से मैं थी मुडी,
उस मोड पे फिर हूँ खडी
रंगीन ख्वाबों के सफर में अतीत फिर है रूबरू
इक हादसे में खो दिया, वो मीत फिर है रूबरू          ॥ मुखडा ॥ 

बीते समय की पटरियों पे ट्रेन यादों की चले
दो बोगियाँ होकर जुदा भी ना मिली थी मंजिलें
कितनी भी खोलू खिडकियाँ,
गुजरा नजारा ना दिखे
जो रह गया पीछे कही
स्टेशन दुबारा ना दिखे
खिलकर लबों पे चुप हुआ, वो गीत फिर है रूबरू
इक हादसे में खो दिया, वो मीत फिर है रूबरू          ॥ अंतरा-१ ॥ 

वो गैर संग खुशहाल है, ये बात अब क्यों खल रही ?
खुद ही बुझाई थी कभी, वो आग फिर क्यों जल रही ?
कुछ गलतियाँ, नादानियाँ,
कुछ जिद-घमंड, शिकवें-गिलें
जड से जला देती अगर
होते न पैदा फासलें
वो हार मेरी, गैर की बन जीत फिर है रूबरू 
इक हादसे में खो दिया, वो मीत फिर है रूबरू          ॥ अंतरा-२ ॥ 

- अनामिक
(०१-०७/११/२०१७)

31 अगस्त 2017

अखेरचे हे गीत सखे

हे गीत कदाचित अखेरचे
यानंतर तुझे न शब्द सखे 
जे द्वार तुझ्यास्तव सताड उघडे 
करेन म्हणतो बंद सखे 

                       उतरेल जरी पानावर शाई 
                       तुझे न येइल नाव सखे 
                       चालेल अक्षरांचा प्रवास, पण 
                       तुझे न येइल गाव सखे 

उठतील कल्पनांच्या लाटा 
पण नसेल तुझा तरंग सखे 
फिरतील कुंचले स्वप्नांचे 
नसतील तुझे पण रंग सखे 

                       डुंबेन विचारांच्या डोही 
                       पण तुझे नसेल प्रतिबिंब सखे 
                       झरतील सरीही कवितांच्या 
                       नसतील तुझे पण थेंब सखे 

मोगरा सुरांचा दरवळेल 
पण नसेल तुझा सुगंध सखे 
घुमतील बासरीचे स्वरही 
पण नसेल तुझा निनाद सखे 

                       ते स्वप्न भरजरी होते, पण 
                       वास्तवास नव्हता वाव सखे 
                       थांबवतो अता खुंटलेला हा 
                       बुद्धिबळाचा डाव सखे 

- अनामिक 
(२५-३१/०८/२०१७) 

27 अगस्त 2017

सखे

मी करेन म्हणतो कैद तुला, शब्दांचे घेउन रंग सखे 
पण नजर तुला भिडताच तुझ्या रंगातच होतो गुंग सखे 
तू समोर असता, सांग सखे, मी भान स्वतःचे कसे जपू ? 
आरस्पानी अस्तित्व तुझे मी कवितेमधुनी कसे टिपू ?   ॥ धृ ॥ 

ही वीज तुझ्या डोळ्यांमधली 
ही जुई तुझ्या ओठांवरली 
ही सांजेची लाली गाली 
हा सूर्याचा ठिपका भाळी 
हा मोरपिसासम स्पर्श फुलवतो मनी सहस्त्र तरंग सखे 
मी भान स्वतःचे कसे जपू, तू समोर असता ? सांग सखे ॥ १ ॥ 

हा वादळवारा केसांचा 
हा धुंद मोगरा श्वासांचा 
हा देह चिमुकला चिमणीचा 
पण डौल जणू फुलराणीचा 
मी काय लिहू, अन्‌ काय नको ? उपमांची मोठी रांग सखे 
मी भान स्वतःचे कसे जपू, तू समोर असता ? सांग सखे ॥ २ ॥ 

हे गूढ इशारे नजरांचे 
हे गहन भाव चेहऱ्यावरले 
हे गुपित मंद स्मितहास्याचे 
हे लक्ष शब्द मौनामधले 
मी खोल उतरतो तुझ्या अंतरी, तरी न लागे थांग सखे 
मी भान स्वतःचे कसे जपू, तू समोर असता ? सांग सखे ॥ ३ ॥ 

- अनामिक 
(१५-२७/०८/२०१७) 

13 अगस्त 2017

कभी ना हो खतम

ये दिन खतम ना हो कभी, ये रात भी ना हो खतम
ये बेसमय चलती हमारी बात भी ना हो खतम 

ये तितलियों के काफिलें, ये जुगनुओं की महफिलें
ये चाँदनी की मदभरी बरसात भी ना हो खतम 

ये रंग हया का शरबती, लब पे हसी की चाशनी
दिल से छलकते शबनमी जजबात भी ना हो खतम 

तरकीब कुछ हम खोज ले, सुइयाँ घडी की रोक ले
पर ख्वाब सी ये जादुई मुलाकात भी ना हो खतम 

ये दो कदम का रासता, ये सौ जनम का वायदा
ये उम्रभर के साथ की शुरुआत भी ना हो खतम 

- अनामिक 
(०६-१३/०८/२०१७) 

16 जुलाई 2017

बारिशें

ये बादलों की सिलवटें
सागर-लहर की करवटें
हैं बिजलियों की आहटें
ये तेरी लहराती लटें

                            ये मौसमों की साजिशें
                            ये मोतियों की बारिशें
                            भीगा जहाँ, हम दो यहा
                            क्या और हो फर्माइशें ? 

इन उंगलियों को छेडता
ये हाथ तेरा रेशमी
जैसे क्षितिज पे मिल रही
बेताब अंबर से जमीं 

                            कितना नशा इस रैन में
                            और जाम तेरे नैन में
                            प्याला जिगर का भर लिया
                            फिर भी बडा बेचैन मैं 

तेरी मोहब्बत की झडी
यूँ ही बरसती जो रही
मेरे संभलने की भला
फिर कोई गुंजाइश नही 

- अनामिक
(१५/०७/२०१७) 

01 मई 2017

राधिका

कृष्ण छेडे बासरी 
आर्त यमुनेच्या तिरी 
राधिका येई न अजुनी 
गोपिका जमल्या तरी 

"का असा रुसवा गडे ?" 
प्रश्न कृष्णाला पडे 
साद व्याकुळ बासरीची 
उंच जाई अंबरी                                   ॥ धृ ॥ 

बासरीचे सूर भिरभिरती खुळे वाऱ्यासवे 
राधिकेचा ठाव घेण्या त्यास करती आर्जवे 
सांगती, "संदेश आतुर दे तिच्या जाउन घरी" 
कृष्ण छेडे बासरी                                 ॥ १ ॥ 

राग लटका दोन घटका, पण चिरंतर प्रीत आहे 
भाबड्या ओठांत कृष्णाचाच जप अन् गीत आहे 
वास कृष्णाचाच आहे राधिकेच्या अंतरी 
कृष्ण छेडे बासरी                                 ॥ २ ॥ 

- अनामिक
(२९/०४/२०१७, ०१/०५/२०१७)

28 अप्रैल 2017

पुष्कळ झाली फुले अबोली

पुष्कळ झाली फुले अबोली, गुलाबास चल देऊ संधी
संवादाचा फोडू पाझर, अन् मौनावर घालू बंदी        ॥ धृ ॥ 

नको नदी, अन् नकोच सागर.. स्वस्थ बसू इथल्या बाकावर 
झटकुन टाकू रुसवा-फुगवा, राग साचलेला नाकावर 
पुसून टाकू गतकाळाच्या समज-गैरसमजांच्या नोंदी ॥ १ ॥ 

गरम चहाने सुरू करूया थंडावलेल्या अपुल्या गप्पा 
घोटागणिक चहाच्या उघडू अलगद बंद मनाचा कप्पा 
इवलासा संवाद आजचा नव्या उद्याची ठरेल नांदी   ॥ २ ॥ 

गंधासोबत ऊब चहाची हळू भिनू दे मनी खोलवर 
विसरुन जाऊ कटुत्व सारे, जशी विरघळे चहात साखर 
तुझ्या गोड स्मितहास्याने वाटेल चहाही जणु बासुंदी ॥ ३ ॥ 

- अनामिक 
(२५-२८/०४/२०१७) 

27 मार्च 2017

पहचान

मैं चाँद झिलमिल, तुम छलकती चाँदनी 
मैं मेघ रिमझिम, तुम चमकती दामिनी 
मैं गीत दिलकश, तुम सुरीली रागिनी 
मैं दीप जगमग, तुम सुनहरी रोशनी 

अधूरी सी तुम्हारे जिक्र बिन पहचान है मेरी 
तुम्हारी ही कहानी में ढली दास्तान है मेरी  ॥ धृ ॥ 

बेताब साहिल मैं, लहर सी चुलबुली हो तुम 
मैं बावरा जुगनू, तितली मनचली हो तुम 
उम्मीद हो तुम, मैं तुम्हारा हौसला 
पंछी निडर तुम, मखमली मैं घोंसला 

तुम्हारे नर्म पंखों से बुलंद उडान है मेरी 
अधूरी सी तुम्हारे जिक्र बिन पहचान है मेरी ॥ १ ॥ 

तकदीर में मेरी लिखी हो तुम लकीरों सी 
मेरी मुसाफिर कश्तियों को तुम जजीरों सी 
तुम हो सियाही कल्पना की, मैं कलम 
इक-दूसरे संग ही मुकम्मल है जनम 

तुम्हारी ही खुशी के संग जुडी मुस्कान है मेरी 
अधूरी सी तुम्हारे जिक्र बिन पहचान है मेरी ॥ २ ॥ 

- अनामिक 
(०९/०८/२०१५ - २७/०३/२०१७) 

18 मार्च 2017

आज भी

धूल रिश्तों पे जमी जो, मैं हटा पाता नही 
काँच सी बिखरी पडी यादें जुटा पाता नही 

फिक्र तो है आज भी, जितनी हुआ करती थी कल 
फर्क है बस, पहले जैसे अब जता पाता नही 

आज भी सुनने सुनाने बाकी हैं बातें कई 
पूछ पर पाता नही कुछ, कुछ बता पाता नही 

फासलें ये दो जहाँ के, दो कदम ही तो नही ? 
बढ न जाए और, इस डर से घटा पाता नही 

बंद है दर.. दस्तकों से खुल भी जाए, क्या पता ? 
ना खुला तो ? सोचकर दर खटखटा पाता नही 

- अनामिक 
(१८/०३/२०१७)

07 फ़रवरी 2017

पुन्हा मी वाचले सारे

पुन्हा मी वाचले सारे तुझ्या डोळ्यात दडलेले
पुन्हा मी ऐकले गाणे तुझ्या ओठात अडलेले     ॥ धृ ॥

मला बघताच हास्याची कळी हलकेच फुलणारी
जरा नजरानजर होता खळी गालात खुलणारी
पुन्हा टिपले मी ​चेहऱ्यावर गुलाबी रंग चढलेले
पुन्हा मी वाचले सारे..                           ॥ १ ॥

भिडे या अंतरी जर सूर त्या हळुवार स्पंदांचा
कळे जर अर्थ मौनाचा, कशाला भार शब्दांचा ?
खुणावे पापण्यांना द्वार स्वप्नांचे उघडलेले
पुन्हा मी वाचले सारे..                           ॥ २ ॥

- अनामिक
(०६/०१/२०१७ - ०७/०२/२०१७)

06 जनवरी 2017

सौगात जाया हो गयी

उस सांझ छेडी अनकही वो बात जाया हो गयी 
मन में सजी ख्वाबों की वो बारात जाया हो गयी 

वो साफ दिल से पेश की सौगात जाया हो गयी 
उसको सजाने में जगी वो रात जाया हो गयी 

वो बंद मुठ्ठी में छुपी कायनात जाया हो गयी 
दिल से लिखी दास्तान की शुरुवात जाया हो गयी 

वो कोशिशें, शिद्दत, जतन, जजबात जाया हो गये 
उस रात आँखों से गिरी बरसात जाया हो गयी 

- अनामिक 
(०४-०६/०१/२०१७) 

05 जनवरी 2017

बचपना

यूँ सूझा है आज बचपना, दर्या किनारे आया हूँ
बचपन के सब खेल सलोने यादों के संग लाया हूँ

देखो मेरा रेत का महल, सजा रही हैं शंख-सीपियाँ
लहरों की गोदी में तैर रही है वो कागज की नैया

वहा हवा संग गपशप करते उंगली से बांधे गुब्बारें
कैद बुलबुलों में साबुन के उडे जा रहे सपनें न्यारे

वहा गगन में मेघों के संग लडा रही है पेंच पतंग
नाम लिखे हैं साहिल पे जो, चूम रही है शोख तरंग

बचपन की उन यादों को बचपन में ही क्यों कैद रखे ?
क्यों न बडे होकर भी उनका नये सिरे से स्वाद चखे ?

- अनामिक
(१०/१२/२०१६ - ०५/०१/२०१७)

22 दिसंबर 2016

तोहफा

दूर शहर से लाए उस तोहफे का मुझसे सवाल है 
"लाए हो जिनके लिए, उन्हे कब देने का खयाल है ? 

दराज में ही रखना था, तो इतनी याद से लाए ही क्यों ? 
उनके पास पहुँचने अब बेसब्री से बुरा हाल है" 

मैंने बोला, "तू तो क्या, मैं चाँद तोडकर भी ला दू 
पर एक चाँद को चाँद दूसरा देने में क्या कमाल है ? 

सब्र रख, तुझे सही वक्त पे नजराने सा पेश करू 
उनको भी तो लगे, की देनेवाला भी बेमिसाल है" 

- अनामिक 
(०८,२१,२२/१२/२०१६) 

04 दिसंबर 2016

ठीक है

रचता गया मैं तारिफों के फूल उसकी राह में
उसने कहा बस, "ठीक है"
लिखता गया कितने सुहाने गीत उसकी चाह में
उसने कहा बस, "ठीक है"

उसके लबों मुस्कान लाने की सदा की कोशिशें
मांगे बिना करता रहा पूरी सभी फर्माइशें
जो बन सका, सब कुछ किया उसकी फिकर, पर्वाह में
ना लब्ज कम पडने दिए उसकी स्तुती, वाह-वाह में
उसने कहा बस, "ठीक है"

उसकी हथेली में सजा दू चाँद-तारें भी अगर
रुख मौसमों का मोडकर ला दू बहारें भी अगर
वो बस कहेगी, "ठीक है"
मैं तितलियों से रंग चुराकर जिंदगी उसकी भरू
मैं बिजलियों को तोड उसके पैर की पायल करू
वो बस कहेगी, "ठीक है"

वो है अगर यूँ बेकदर, सब जानकर भी बेखबर
मैं सोचता हूँ, बस हुआ.. अब मोड लू अपनी डगर
मैं भी कहू अब, "ठीक है"

- अनामिक
(३०/११/२०१६ - ०४/१२/२०१६)

12 नवंबर 2016

आशियाना

गुमराह पत्ते की तरह था उड रहा सपना पुराना
अब ठिकाना मिल गया
दिल चाहता था उस जगह, छोटा सही, पर इक सुहाना
आशियाना मिल गया                                  ॥ धृ ॥

अटके पडे थे सुर सभी गुमसुम लबों की कैद में
सोए हुए थे गीत भी सूखी कलम की गोद में
इक बांसुरी गूँजी अचानक,
बेजुबाँ इस जिंदगी को इक तराना मिल गया
आशियाना मिल गया                                  ॥ १ ॥

कुछ बीज धरती में दफन थे, बारिशों की प्यास में
बेताब थे अंकुर दबे, संजीवनी की आस में
बरसी घटा, कलियाँ खिली,
बंजर जमीं को आज फूलों का खजाना मिल गया
आशियाना मिल गया                                  ॥ २ ॥

मेहनत, लगन की, हौसले की जंग थी तकदीर से
पंछी इरादों के बंधे थे वक्त की जंजीर से
किस्मत हुई जो मेहरबाँ,
तोहफा मिला कुछ खास यूँ, मानो जमाना मिल गया
आशियाना मिल गया                                  ॥ ३ ॥

- अनामिक
(१०-१२/११/२०१६)

28 अक्टूबर 2016

अचानक ही नही होता

गज़ल का जनम कागज़ पर अचानक ही नही होता 
भला इन्सान यूँ शायर अचानक ही नही होता 

गिरे जब एक चिंगारी, कई पत्तें सुलगते हैं 
धुआँ खामोश जंगल भर अचानक ही नही होता 

न जाने मुश्किलें कितनी नदी है पार कर आती 
खुशी से चूर तब सागर अचानक ही नही होता 

सितारें जल रहे हैं चाँद की ख्वाइश में सदियों से 
उजागर रात में अंबर अचानक ही नही होता 

मोहब्बत है नशा ज़ालिम, ज़रा धीमे ही चढती है 
असर इसका भले दिल पर अचानक ही नही होता 

- अनामिक 
(२३/०९/२०१६ - २८/१०/२०१६)

13 अक्टूबर 2016

मखमली भास

अघटित आज घडले, दिवस खास होता
जिथे थांबला दोन क्षण श्वास होता 
मला पाहिले आज वळुनी तिनेही 
अहा, मखमली तो किती भास होता ॥ धृ ॥ 

कटाक्षात होता गुलाबी इशारा 
कसा रोमरोमात उठला शहारा 
मनी नाचला मोर, फुलला पिसारा 
नजर ती जणू रेशमी फास होता 
अहा, मखमली तो किती भास होता ॥ १ ॥ 

दिसे तेच स्वप्नी, वसे या मनी जे 
खरे मानले, भासले त्या क्षणी जे 
निळेशार मृगजळ सुन्या अंगणी जे 
अता तेच मिळवायचा ध्यास होता 
अहा, मखमली तो किती भास होता ॥ २ ॥ 

निथळलो मधुर गैरसमजात थोडा 
दिला कल्पनांचा पिटाळून घोडा 
तसा सुज्ञ, झालो जरा आज वेडा 
उद्या वास्तवाचाच सहवास होता 
अहा, मखमली तो किती भास होता ॥ ३ ॥ 

- अनामिक 
(१३/०९/२०१६ - १३/१०/२०१६) 

23 सितंबर 2016

अंतर

विरून जाऊ दे अता अंतर तुझ्या-माझ्यातले
मिळून करुया दूर चल अडसर तुझ्या-माझ्यातले

येते मनी भरती तुझ्या हसण्यामुळे, रुसण्यामुळे
दबवू उसळणारे कसे सागर तुझ्या-माझ्यातले

घुसमट किती ही वाढली लटक्या अबोल्याने तुझ्या
चल शिंपडू गप्पांतुनी अत्तर तुझ्या-माझ्यातले

झटकून टाकू जळमटे किंतू-परंतूंची जुन्या
मिटवू अता संदिग्धता, जर-तर तुझ्या-माझ्यातले

त्या रेशमी प्रश्नास दडवावे किती हृदयामधे
ओठात येऊ दे खरे उत्तर तुझ्या-माझ्यातले

- अनामिक
(१६-२२/०९/२०१६)

30 अगस्त 2016

घडणार आहे शेवटी

अडवा किती, जे व्हायचे, घडणार आहे शेवटी
तोडून पिंजरा पाखरू उडणार आहे शेवटी

चुकतात रस्ता सर्व जण.. थांबेल जो, हरवेल तो
हुडकेल त्याला मार्ग सापडणार आहे शेवटी

संयम-विवेकाच्या किती बेड्यांमधे जखडाल मन ?
मोहात ते कुठल्यातरी पडणार आहे शेवटी

फुलपाखराचा गंध-रंगांचा सुटावा छंद का ?
त्याचा कळीवर जीव तर जडणार आहे शेवटी

ठरवून जुळती बंध का ? झटकून तुटती पाश का ?
टाळाल ज्याला, तोच आवडणार आहे शेवटी

लपवा कितीही भावना, ओठी न आणा शब्दही
रहस्य डोळ्यांतून उलगडणार आहे शेवटी

कान्हा फिरू दे गोपिकांसंगेच मुरली वाजवत
तो सूर राधेलाच पण भिडणार आहे शेवटी

- अनामिक
(२७-३०/०८/२०१६)

09 अगस्त 2016

विकार

चिंब धुंद वर्षेचा झालो शिकार आहे
जिवास जडला नवा हवासा विकार आहे

नकळत झाला काळजावरी घाव मखमली
कुणी खुपसली मधाळलेली कट्यार आहे

सुप्त अंतरी सप्त-सूर झंकारुन गेले
कुणी छेडली आर्त मनाची सतार आहे

कुणी शिंपली उमेद हिरमुसल्या स्वप्नांवर
पुन्हा नव्याने जगावयाचा विचार आहे

किती भासला क्षुल्लक, पण रुतल्यावर कळले
नजरेचा तो तीर किती धारदार आहे

चलाख आहे गनीम, की मग मीच वेंधळा
धरण्यापूर्वीच ढाल वार आरपार आहे

इतका मोहक, लोभस आहे समोर शत्रू
हसत हसत मी हरायलाही तयार आहे

- अनामिक
(०७-०९/०८/२०१६)

22 जुलाई 2016

पाउस वेडा

पाउस वेडा.. खट्याळ थोडा..
उगाच दंगा करतो पाउस
मेघांनाही लावुन नादी
पिसाटल्यागत झरतो पाउस
पाउस वेडा..           ॥ धृ ॥

उनाड पाउस.. टवाळ पाउस..
पाउस चंचल.. लबाड पाउस..
एकदा का कोसळू लागला,
समजवण्याच्या पल्याड पाउस
कधी पसरलेली ओंजळही
भरण्याआधीच विरतो पाउस
पाउस वेडा..           ॥ १ ॥

तुफान पाउस.. भयाण पाउस..
आनंदाला उधाण पाउस..
पाउस धोधो.. पाउस रिमझिम..
पाउस बोचक.. पाउस रेशिम..
सोंगाड्या हा.. किती मुखवटे,
किती रुपे पांघरतो पाउस
पाउस वेडा..           ॥ २ ॥

या शहरातुन.. त्या रानातुन..
वेलीतुन.. झाडा-पानातुन..
याच्या-त्याच्या खोड्या काढत
लहानग्यागत फिरतो पाउस
दमल्यावर मग भूमातेच्या
कुशीत गुपचुप शिरतो पाउस
पाउस वेडा..           ॥ ३ ॥

जरी कितीही बरसुन गेला
मनात शिल्लक उरतो पाउस
कातरवेळी साधुन संधी
डोळ्यातुन पाझरतो पाउस
पाउस वेडा..           ॥ ४ ॥

- अनामिक
(१९-२१/०७/२०१६)

28 जनवरी 2016

चाय की प्याली

सांझ अकेली, इंतजार की, साथ चाय की प्याली थी
अफसोस.. सामने वाली कुर्सी मगर आज भी खाली थी

गरम चाय की भाप लपेटे
तैर रहे थे बीते लम्हें
जाने उनकी राह ताकते
गुजरी कितनी रातें-सुबहें
दिल की शीशी में इत्तर सी उनकी याद संभाली थी
अफसोस.. सामने वाली कुर्सी मगर आज भी खाली थी

उनसे बस इक मुलाकात की
पगली सी उम्मीद लिए
बेगानों संग आया था
मीलों की दूरी पार किए
गुलशन में पर वो ना थी, ना ही वो आनेवाली थी
अफसोस.. सामने वाली कुर्सी मगर आज भी खाली थी

घंटो बैठा रहा वही पे,
भटक भटक के थक गयी नजर
ढूँढ रही थी आहट उनकी,
कभी इस गली, कभी उस डगर
गीली आँखों में ढलते सूरज की उतरी लाली थी
अफसोस.. सामने वाली कुर्सी मगर आज भी खाली थी

- अनामिक
(१७-२७/०१/२०१६)




21 मई 2015

बंध नवे

बंध नवे, संबंध नवे हे
प्रेमफुलांचे गंध नवे
नाजुक हळव्या हृदयामधुनी
मोहरणारे स्पंद नवे

भिरभिरणा-या खुळ्या जिवाला
जडले कुठले छंद नवे
आयुष्याच्या वेलीवरती
फुलले क्षण बेधुंद नवे           ॥ धृ ॥

पाउस अवचित उधळत येतो
इंद्रधनूतुन रंग नवे
थेंब बरसता चिंब मनावर
उठती लाख तरंग नवे
भाव उमलती, अन्‌ अंकुरती
ओठांवरती शब्द नवे            ॥ १ ॥

वेळ-अवेळी कानामधुनी
घुमती मंजुळ नाद नवे
कातरवेळी करीत बसतो
स्वतःशीच संवाद नवे
स्वप्नांच्या मग उंबरठ्यावर
दीप उजळती मंद नवे           ॥ २ ॥

- अनामिक
(०३/०४/२०१५ - २१/०५/२०१५)

31 मार्च 2015

हमें भी आज जीने दो

कदम​ ​तो डगमगाएंगे, नशे में चल रहे जो हम
निगाहें​ लडखडाएंगी, जवाँ मदहोश है आलम
जिएंगे कब तलक​ घुटकर, मचलकर आज जीने दो
रहेंगे​ कब तलक प्यासे, छलकते जाम पीने दो
हमें भी आज जीने दो, हमें भी आज पीने दो​ ॥ धृ ॥

"​कहेंगे लोग क्या?" ये सोच डर डर कर जिए हम तो
​उसूलों में, रिवाजों में जकडकर रह गए हम तो
​मगर इन बेडियों का बोझ अब से ना सहेंगे हम
मनमौजी हवा बनकर जहा मर्जी बहेंगे हम
बगावत की सुई से सब अधूरे ख्वाब सीने दो
रहेंगे​ कब तलक प्यासे, छलकते जाम पीने दो
हमें भी आज जीने दो, हमें भी आज पीने दो​ ॥ १ ॥

शराफत​ की लकीरों में यूँ उलझे, ना सुलझ पाए​
​सुनी​ इसकी, सुनी उसकी, न खुदकी ही समझ पाए
मगर अब से दबे दिल की पुकारें ही सुनेंगे हम
​करेंगे खूब नादानी, अजब राहें चुनेंगे हम
रंगीली शरबती बरसात हर-दिन, हर-महीने दो​
रहेंगे​ कब तलक प्यासे, छलकते जाम पीने दो
हमें भी आज जीने दो, हमें भी आज पीने दो​ ॥ २ ॥

- अनामिक

15 फ़रवरी 2015

नाँव

धूप में, या छाँव में
बहाव में, ठहराव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में
प्रीत की नदिया बहे
दो दिलों के गाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ धृ ॥

फूल हो, अंगार हो
मंजिलें दुश्वार हो
हर कदम मिलकर चले तो, जलजलें भी पार हो
काँटें भी तुझ संग लगे
गुदगुदी से पाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ १ ॥

रोक ले ऊँची लहर
या उठे चाहे भँवर
हाथ बस तुम थाम लो, फिर तय करे मुश्किल सफर
तुम बनो मरहम मेरा
दर्द में, हर घाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ २ ॥

- अनामिक
(०८/०९/२०१४ - १४/०२/२०१५)