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12 मई 2019

पाहिले तुज ज्या क्षणी

थक्क झालो, दंग झालो
स्तब्ध झालो, गुंग झालो
मग्न झालो, मुग्ध झालो
तृप्त झालो, लुब्ध झालो

तप्त ग्रीष्माच्या दुपारी
सर बरसली श्रावणी
अप्सरेसम रुप तुझे ते
पाहिले मी ज्या क्षणी || धृ ||

                        भरजरी लावण्य लेवुन
                        तू अशी येता समोरी
                        उमटले प्रतिबिंब गहिरे
                        भारलेल्या अंतरी

                        स्वर्गलोकातून अवतरली
                        परी जणु अंगणी
                        थक्क झालो, दंग झालो
                        पाहिले तुज ज्या क्षणी || १ ||

चांदण्या पडल्या फिक्या
लखलख तुझ्या तेजामुळे
चंद्रमा ठरलीस तू
सगळेच उरले ठोकळे 

पूर आला नक्षत्रांचा
काळोख्या तारांगणी
थक्क झालो, दंग झालो
पाहिले तुज ज्या क्षणी || २ ||

                        श्वास अडला चार घटका
                        थांबला हृदयात ठोका
                        राहिले उघडेच डोळे
                        जणु विजेचा सौम्य झटका 

                        मी कसे शुद्धीत यावे ?
                        काढे ना चिमटा कुणी
                        थक्क झालो, दंग झालो
                        पाहिले तुज ज्या क्षणी || ३ ||

- अनामिक
(११-२२/०३/२०१९, १२/०५/२०१९)

31 मार्च 2019

तुझे हासणे

नितळ, निरामय, निखळ, निरागस
दिलखुलास, निर्भेळ, निखालस
धुंद, मुक्त, निर्मळ अन् गोंडस
लहानग्यागत तुझे हासणे

                              गडगडणाऱ्या नभासारखे
                              कोसळत्या धबधब्यासारखे
                              झुळझुळत्या निर्झरासारखे
                              उसळत्या कारंज्यासारखे
                              सळसळत्या वादळासारखे
                              खळखळत्या सागरासारखे
                              स्वच्छंदी पाखरासारखे

रुणझुणत्या पैंजणांसारखे
गुणगुणत्या कोकिळेसारखे
चिमणीच्या चिवचिवीसारखे
कर्णमधुर भैरवीसारखे
लाटांच्या संगितासारखे
रिमझिमणाऱ्या सरींसारखे
कृष्णाच्या बासरीसारखे

                              किती मधुर अन् किती रसाळ
                              काजूकतली, खिरीसारखे
                              बासुंदी अन् पुरीसारखे
                              मोतीचूर लाडवासारखे
                              आंब्याच्या गोडव्यासारखे
                              रसरसल्या पोळ्यातुन टपटप
                              ओघळणाऱ्या मधासारखे
                              जखमेवर औषधासारखे

कोमेजलेल्या कळीला पुन्हा
फुलण्याच्या प्रेरणेसारखे
मरगळलेल्या आयुष्याला
जणू नव्या चेतनेसारखे

                              असेच नेहमी चमकत राहो
                              बरसत राहो तुझे हासणे
                              पुनवेच्या चांदण्यासारखे
                              हिरव्यागार श्रावणासारखे

- अनामिक
(२१/०२/२०१९, ३०/०३/२०१९)

10 फ़रवरी 2019

ती

अल्लड, अवखळ अन् उत्श्रृंखल
निखळ, खोडकर, नटखट, चंचल

दिलखुलास, लहरी, स्वानंदी
बेधुंद, बेफिकिर, स्वच्छंदी
निडर, धीट, बिनधास्त, बेधडक
कधी विचारी, हळवी, भावुक

गोजिरवाणी, गोड, लाजरी
अन् लडिवाळ, लाघवी, हसरी
नाजुक, मोहक, मखमल, कोमल
दीप्त, प्रखर, तेजस्वी, उज्ज्वल

चैतन्याचा, उत्साहाचा
अन् ऊर्जेचा अखंड श्रावण

अनंत छटा व्यक्तिमत्वाच्या
असंख्य पैलू अस्तित्वाचे
पुरे न पडती विशेषणांचे रंग
तिचे करताना चित्रण

- अनामिक
(२४-३१/०१/२०१९, १०/०२/२०१९)

04 फ़रवरी 2019

सदाफुली

फुलपाखरासारखी चंचल 
झुळझुळ झऱ्यासारखी अवखळ 
इवल्या मुलासारखी अल्लड 
अन् कारंज्यागत उत्श्रृंखल

                            श्रावण-सरींसारखी लहरी 
                            हवेसारखी निखळ, खेळकर 
                            नदीसारखी स्वच्छंदी, अन् 
                            लाटांगत बेधुंद, बेफिकिर

चिऊसारखी अथक बोलकी 
मधासारखी गोड, लाजरी 
सदाफुलीसारखी सदैव 
टवटवीत, स्वानंदी, हसरी

                            गुलाबासारखी मनमोहक 
                            मोरपिसागत मखमल, कोमल 
                            विजेसारखी प्रखर, तळपती 
                            अन् तारकांसारखी तेजल

चैतन्याचा पाउस रिमझिम 
प्रसन्नतेचा पूर निरंतर 
उत्साहाची उदंड भरती 
अमर्याद ऊर्जेचा सागर

                            किती रंग उपमांचे भरले 
                            अपूर्ण तरिही वाटे चित्रण 
                            शक्य नसे शब्दांनी करणे 
                            तिच्या व्यक्तिमत्वाचे वर्णन 

- अनामिक 
(२४/०१/२०१९ - ०४/०२/२०१९) 

30 जनवरी 2018

शब्द आले, शब्द गेले

शब्द आले, शब्द गेले, शब्द बोलत राहिले 
शब्द पडले, शब्द उठले, शब्द डोलत राहिले 

शब्द मिटले, शब्द फुलले, शब्द बहरत राहिले 
शब्द झडले, शब्द रुजले, शब्द उमलत राहिले 

शब्द सुकले, शब्द भिजले, शब्द बरसत राहिले 
शब्द स्वप्नांच्या सरींचे वार झेलत राहिले 

शब्द खचले, शब्द विरले 
शब्द लढले, शब्द हरले 
शब्द बुडले, शब्द तरले, शब्द उसळत राहिले 
वेदनांची रत्नमाला शब्द माळत राहिले 

शब्द झुरले, शब्द रुसले 
शब्द रडले, शब्द हसले 
शब्द भुलले, शब्द फसले, शब्द भाळत राहिले 
शब्द दगडी देवतांवर व्यर्थ उधळत राहिले 

शब्द थकले, शब्द विटले 
शब्द सजले, शब्द नटले 
कालगंगेतून अविरत शब्द वाहत राहिले 
मार्ग सारे खुंटले, पण शब्द चालत राहिले 

- अनामिक 
(१२-३०/०१/२०१८) 

29 अक्टूबर 2017

काळोखाच्या किती छटा

रात्र नेसुनी जशी उजळते शुभ्र चंद्रकोर अंबरी 
तसा शोभतो काळोखाचा रंग भरजरी तुझ्यावरी 

केसांमधल्या काळ्या लाटा 
डोळ्यांचे काळोखे डोह 
पापण्यांतली काळी नक्षी 
कसा आवरू त्यांचा मोह 

त्यात तुझा मखमाली काळाशार राजबिंडा पेहराव 
वाढवतो नजरेची तृष्णा, मुग्ध मनाचा घेतो ठाव 

त्यावर इवल्या चमचम टिकल्या, 
नक्षत्रांचा जणू बहर 
किती पाहिले वेष तुझे, 
ना एकालाही याची सर 

पंखांशिवाय, छडीविनाही भासतेस तू यात परी 
काळोखाच्या किती छटा त्या खुलून दिसती तुझ्यावरी 

- अनामिक 
(२४-२९/१०/२०१७) 

30 सितंबर 2017

कोडी

चंद्र होता रात्रवेडा, रात्र होती सूर्यवेडी
सूर्य होता सांजवेडा, सांज होती चंद्रवेडी 
ओढ कोणाला कुणाची, आणि तिटकारा कुणाचा 
अंतरिक्षाला स्वतःलाही न सुटली गूढ कोडी               ॥ धृ ॥ 

वेध धूसर धूमकेतूचे खुळ्या पृथ्वीस होते 
कैक शतकांची प्रतीक्षा, मीलनाचे स्वप्न खोटे 
एकदा फिरकून तो काढून गेला फक्त खोडी               ॥ १ ॥ 

मोह धरणीला उन्हाचा, चांदण्याचीही तृषा 
कैफ थंडीचा गुलाबी, पावसाचीही नशा 
भोग इतके चाखले की, राहिली न कशात गोडी           ॥ २ ॥ 

आजन्म सूर्याभोवती पिंगा ग्रहांनी घातला 
पण सूर्य अंधारात अज्ञातास धुंडत राहिला 
जिथल्या तिथे सगळेच, पण जमली कुणाचीही न जोडी  ॥ ३ ॥ 

- अनामिक 
(१६-३०/०९/२०१७)

31 अगस्त 2017

अखेरचे हे गीत सखे

हे गीत कदाचित अखेरचे
यानंतर तुझे न शब्द सखे 
जे द्वार तुझ्यास्तव सताड उघडे 
करेन म्हणतो बंद सखे 

                       उतरेल जरी पानावर शाई 
                       तुझे न येइल नाव सखे 
                       चालेल अक्षरांचा प्रवास, पण 
                       तुझे न येइल गाव सखे 

उठतील कल्पनांच्या लाटा 
पण नसेल तुझा तरंग सखे 
फिरतील कुंचले स्वप्नांचे 
नसतील तुझे पण रंग सखे 

                       डुंबेन विचारांच्या डोही 
                       पण तुझे नसेल प्रतिबिंब सखे 
                       झरतील सरीही कवितांच्या 
                       नसतील तुझे पण थेंब सखे 

मोगरा सुरांचा दरवळेल 
पण नसेल तुझा सुगंध सखे 
घुमतील बासरीचे स्वरही 
पण नसेल तुझा निनाद सखे 

                       ते स्वप्न भरजरी होते, पण 
                       वास्तवास नव्हता वाव सखे 
                       थांबवतो अता खुंटलेला हा 
                       बुद्धिबळाचा डाव सखे 

- अनामिक 
(२५-३१/०८/२०१७) 

27 अगस्त 2017

सखे

मी करेन म्हणतो कैद तुला, शब्दांचे घेउन रंग सखे 
पण नजर तुला भिडताच तुझ्या रंगातच होतो गुंग सखे 
तू समोर असता, सांग सखे, मी भान स्वतःचे कसे जपू ? 
आरस्पानी अस्तित्व तुझे मी कवितेमधुनी कसे टिपू ?   ॥ धृ ॥ 

ही वीज तुझ्या डोळ्यांमधली 
ही जुई तुझ्या ओठांवरली 
ही सांजेची लाली गाली 
हा सूर्याचा ठिपका भाळी 
हा मोरपिसासम स्पर्श फुलवतो मनी सहस्त्र तरंग सखे 
मी भान स्वतःचे कसे जपू, तू समोर असता ? सांग सखे ॥ १ ॥ 

हा वादळवारा केसांचा 
हा धुंद मोगरा श्वासांचा 
हा देह चिमुकला चिमणीचा 
पण डौल जणू फुलराणीचा 
मी काय लिहू, अन्‌ काय नको ? उपमांची मोठी रांग सखे 
मी भान स्वतःचे कसे जपू, तू समोर असता ? सांग सखे ॥ २ ॥ 

हे गूढ इशारे नजरांचे 
हे गहन भाव चेहऱ्यावरले 
हे गुपित मंद स्मितहास्याचे 
हे लक्ष शब्द मौनामधले 
मी खोल उतरतो तुझ्या अंतरी, तरी न लागे थांग सखे 
मी भान स्वतःचे कसे जपू, तू समोर असता ? सांग सखे ॥ ३ ॥ 

- अनामिक 
(१५-२७/०८/२०१७) 

28 अप्रैल 2017

पुष्कळ झाली फुले अबोली

पुष्कळ झाली फुले अबोली, गुलाबास चल देऊ संधी
संवादाचा फोडू पाझर, अन् मौनावर घालू बंदी        ॥ धृ ॥ 

नको नदी, अन् नकोच सागर.. स्वस्थ बसू इथल्या बाकावर 
झटकुन टाकू रुसवा-फुगवा, राग साचलेला नाकावर 
पुसून टाकू गतकाळाच्या समज-गैरसमजांच्या नोंदी ॥ १ ॥ 

गरम चहाने सुरू करूया थंडावलेल्या अपुल्या गप्पा 
घोटागणिक चहाच्या उघडू अलगद बंद मनाचा कप्पा 
इवलासा संवाद आजचा नव्या उद्याची ठरेल नांदी   ॥ २ ॥ 

गंधासोबत ऊब चहाची हळू भिनू दे मनी खोलवर 
विसरुन जाऊ कटुत्व सारे, जशी विरघळे चहात साखर 
तुझ्या गोड स्मितहास्याने वाटेल चहाही जणु बासुंदी ॥ ३ ॥ 

- अनामिक 
(२५-२८/०४/२०१७) 

15 जनवरी 2017

संक्रांत

घुसमट सारी आज संपवू, किती रहावे शांत अता ? 
मिटवूया चल अपुल्यातल्या अबोल्याची संक्रांत अता ॥ धृ ॥ 

गुळाएवढा गोड नको, पण 
तिळाएवढा शब्द तरी 
नकोत गप्पा दिलखुलास, पण 
तुटकासा संवाद तरी 
पुष्कळ झाले रुसवे-फुगवे, नको बघूया अंत अता     ॥ १ ॥ 

पतंग माझ्या खुळ्या मनाचा 
तुझ्याच गगनी भिरभिरतो 
मांजा तुटला तरी वाट हा 
तुझ्या अंगणाची धरतो 
पुन्हा जोडुनी तुटके धागे करू नवी सुरुवात अता     ॥ २ ॥ 

- अनामिक 
(१४,१५/०१/२०१७)

21 नवंबर 2016

प्रतीक्षा

शांत आहे आज सागर
सुन्न आहे सांजवारा
लाट चंचल स्तब्ध आहे
मौन पांघरुनी किनारा
ये सखे परतून लवकर, अंत बघते ही प्रतीक्षा
बघ कसे अस्वस्थ सारे फक्त नसण्याने तुझ्या ॥ धृ ॥

रोजची ती पाखरांची धुंद किलबिल बंद आहे
पौर्णिमेच्या चांदव्याचे चांदणेही मंद आहे
आठवण येता तुझी होतो मनी नुसता पसारा
ये अता, चैतन्य पसरव गोड हसण्याने तुझ्या ॥ १ ॥

चार दिवसांचा दुरावा, युग उलटल्यासारखा
वाट बघुनी क्षीण झाल्या अंबरातिल तारका
बेचैन भिरभिरते नजर, पण सापडत नाही निवारा
तृप्त कर व्याकुळ मना अवचित बरसण्याने तुझ्या ॥ २ ॥

- अनामिक
(१३-२१/११/२०१६)

13 अक्टूबर 2016

मखमली भास

अघटित आज घडले, दिवस खास होता
जिथे थांबला दोन क्षण श्वास होता 
मला पाहिले आज वळुनी तिनेही 
अहा, मखमली तो किती भास होता ॥ धृ ॥ 

कटाक्षात होता गुलाबी इशारा 
कसा रोमरोमात उठला शहारा 
मनी नाचला मोर, फुलला पिसारा 
नजर ती जणू रेशमी फास होता 
अहा, मखमली तो किती भास होता ॥ १ ॥ 

दिसे तेच स्वप्नी, वसे या मनी जे 
खरे मानले, भासले त्या क्षणी जे 
निळेशार मृगजळ सुन्या अंगणी जे 
अता तेच मिळवायचा ध्यास होता 
अहा, मखमली तो किती भास होता ॥ २ ॥ 

निथळलो मधुर गैरसमजात थोडा 
दिला कल्पनांचा पिटाळून घोडा 
तसा सुज्ञ, झालो जरा आज वेडा 
उद्या वास्तवाचाच सहवास होता 
अहा, मखमली तो किती भास होता ॥ ३ ॥ 

- अनामिक 
(१३/०९/२०१६ - १३/१०/२०१६) 

22 जुलाई 2016

पाउस वेडा

पाउस वेडा.. खट्याळ थोडा..
उगाच दंगा करतो पाउस
मेघांनाही लावुन नादी
पिसाटल्यागत झरतो पाउस
पाउस वेडा..           ॥ धृ ॥

उनाड पाउस.. टवाळ पाउस..
पाउस चंचल.. लबाड पाउस..
एकदा का कोसळू लागला,
समजवण्याच्या पल्याड पाउस
कधी पसरलेली ओंजळही
भरण्याआधीच विरतो पाउस
पाउस वेडा..           ॥ १ ॥

तुफान पाउस.. भयाण पाउस..
आनंदाला उधाण पाउस..
पाउस धोधो.. पाउस रिमझिम..
पाउस बोचक.. पाउस रेशिम..
सोंगाड्या हा.. किती मुखवटे,
किती रुपे पांघरतो पाउस
पाउस वेडा..           ॥ २ ॥

या शहरातुन.. त्या रानातुन..
वेलीतुन.. झाडा-पानातुन..
याच्या-त्याच्या खोड्या काढत
लहानग्यागत फिरतो पाउस
दमल्यावर मग भूमातेच्या
कुशीत गुपचुप शिरतो पाउस
पाउस वेडा..           ॥ ३ ॥

जरी कितीही बरसुन गेला
मनात शिल्लक उरतो पाउस
कातरवेळी साधुन संधी
डोळ्यातुन पाझरतो पाउस
पाउस वेडा..           ॥ ४ ॥

- अनामिक
(१९-२१/०७/२०१६)

08 जून 2013

पर्वणी

रुक्ष आयुष्यास या अवचित मिळाली पर्वणी
आज वळणावर जुन्या नजरेत अडखळले कुणी
एक चेहरा गोजिरा नयनांत भिरभिरला क्षणी
​धस्स झाले मन्मनी, लवते न लवते पापणी

गतस्मृतींची पाखरे झेपावली तारांगणी
माळ तुटुनी सांडले हळव्या क्षणांचे तन्मणी
बांध फुटला अंतरी, छेदे फुगा जणु टाचणी
मुक्त झाल्या भावना, जणु वारुळातुन नागिणी

मेघ झरले दाटलेले आर्त व्याकुळ अंगणी
चहुकडे ग्रीष्मातही हिरवळ पसरली श्रावणी
चंद्र पुनवेचा जणू बघुनी सुखावे चांदणी
जणु हरीच्या बासरीने मुग्ध व्हाव्या गवळणी

सत्य की स्वप्नात मी, कोठे करावी चाचणी
​अनुभुतीची या कशी शब्दात व्हावी मांडणी
दर्शनातच तृप्त मी, उरली न दुसरी मागणी
'भेट' ही​ अनमोल​, झालो आज नशिबाचा ऋणी

- अनामिक
(१३/१२/२०१० - १९/१२/२०१० आणि ३०/०५/२०१३ - ०५/०६/२०१३)

23 मार्च 2005

हे असंच चालत राहील काय ?

तुझं स्वप्न बघण्यातच माझं जीवन संपून जाईल काय ?
प्रश्न सतवतो, शेवटपर्यंत हे असंच चालत राहील काय ? ॥ धॄ ॥

रोज सकाळी लवकर येतो
कॉलेजपाशी उभा राहतो
आता येशिल, नंतर येशिल
खुळ्यासारखा वाट पाहतो
उशीर होतोय, जाणवतं, पण जागीच खिळतात पाय ॥ १ ॥

कॉलेजमध्ये शिरल्यापासून
नजर सारखी भटकत असते
इथल्या वळणा-वळणावरती
तुझाच चेहरा शोधत बसते
तुला भेटण्याचा कुठलाही नाही सुचत उपाय ॥ २ ॥

कधी अचानक समोर आलीस
मी बोलायचा प्रयत्न करतो
तू तर लक्षही देतच नाहीस
माझा स्वर कंठातच विरतो
हळवे डोळे दाटून येतात, होतो मी असहाय ॥ ३ ॥

- अनामिक
(२३/०३/२००५)

14 फ़रवरी 2005

काय तुझ्या मनात

किती काळ माझ्या आशेचा झुलवशील झोका ?
काय तुझ्या लपलंय मनामधे, जरा सांगशिल का ? ॥ धॄ ॥

कधी दुरून मी दिसलो की नजरेस नजर मिळते
कधी मला बघता, बाजूला मान तुझी वळते
कटाक्ष तिरपा तुझा, चुकवतो हृदयाचा ठोका ॥ १ ॥

कधी मला पाहून तुझ्या गालात हास्य फुटते
मी हसताच तुझ्या ओठांची कळी घट्ट मिटते
तुझ्या अशा वर्तनामुळे होतो माझा विचका ॥ २ ॥

कधी दोन गप्पा माझ्याशी दिलखुलास करतेस
कधी शब्दही बोलत नाही, चक्क मौन धरतेस
उमजत नाही, तुला अचानक का येतो झटका ॥ ३ ॥

मैत्रिणींमधे कुजबुज होते मी आल्यावरती
खाणाखुणा - इशा-यांना त्यांच्या येते भरती
मीच निघुन जातो शरमेने, समजताच धोका ॥ ४ ॥

तुला वाटतो खेळच सारा, झुरतो मीच बिचारा
नाजुक माझे काळिज, त्यावर फिरवू नको निखारा
रहस्य हे उलगडून आता कर माझी सुटका ॥ ५ ॥

- अनामिक
(१४/०२/२००५)

31 जनवरी 2005

एक दिवशी

एक दिवशी अशी भेट अपुली घडावी
रास वाटेत फुलत्या कळ्यांची पडावी
आसमंतामधे गंध त्यांचा भरावा
धुंदल्या त्या क्षणी प्रीत अपुली जडावी

एक दिवशी सरी श्रावणाच्या पडाव्या
भावनांच्या रुपे काळजाला भिडाव्या
प्रेमवाटेवरी चिंब दोघे भिजावे
पाहुनी सोहळा हा विजा कडकडाव्या

एक दिवशी स्वरांनी तुझ्या संग गावे
प्रेमगीतात त्या रागही दंग व्हावे
इंद्रधनुषाकडे मागुनी रंग घ्यावे
स्वप्न डोळ्यांमधे मी तुझे रंगवावे

एक दिवशी तुझा हात हाती धरावा
स्पर्श हॄदयास नजरेतुनी तू करावा
एकमेकांत दोघे असे गुंग व्हावे
दोन जीवांमधे ना उरावा दुरावा

- अनामिक
(२९, ३०, ३१/०१/२००५)

23 जनवरी 2005

भिती

गंध तुझ्या हळव्या प्रेमाचा मनात माझ्या दरवळतो
भाव मनातिल तुला सांगण्या मात्र जरा मी अडखळतो
नित्य तुझा सहवास मिळावा, मनात अभिलाषा धरतो
का निष्कारण भिती वाटते, दडपणात मी वावरतो

तू दिसतेस मला जेव्हाही, क्षणात पुरता बावरतो
नजरेलाही नजर भिडवण्या खुळ्यापरी मी घाबरतो
काय म्हणू, अन्‌ काय नको, हा प्रश्न मस्तकी घुटमळतो
घाम कपाळावर फुटलेला गालावरती ओघळतो

बोलावेसे वाटे पुष्कळ, विषय एकही ना मिळतो
शब्द जिभेवर उमटतात, पण स्वर कंठातच विरघळतो
अजब भितीने थरथरणारे ओठ घट्ट मी आवळतो
फक्त जरा स्मितहास्य मुखावर दाखवतो, अन्‌ मी पळतो

ध्यानी येतो मूर्खपणा, अन्‌ नकळत मी मागे वळतो
उशीर झाला एव्हाना, हे जाणवता मी हळहळतो
पुन्हा एकदा पराभूत मी, जीव अंतरी तळमळतो
किती मनाला आवरतो, पण एक तरी अश्रू गळतो

- अनामिक
(१७, २१, २३/०१/२००५)

14 जनवरी 2005

फूल

रंगबिरंगी कळ्या-फुलांनी फुलली होती बाग
पानांतुन डोकावत होता गोंडस एक गुलाब

फूल गोजिरे मनात भरण्याइतके होते छान
किती पाहिले तरी शमेना नजरेतली तहान

भुरळ अशी पडली की नकळत तिथेच खिळले पाय
जीव जडावा असे न जाणे फुलात होते काय ?

कुरवाळीन जरा प्रेमाने, विचार सुचला असा
स्पर्श मखमली, गालावर, अन मनी उठावा ठसा

श्वासामध्ये भरून घेइन त्याचा मोहक सुवास
क्षणात केला खुळ्या मनाने स्वप्नायुगाचा प्रवास

"फूल तोडण्या सक्त मनाई", दाखविणा-या धाक
फलकावरल्या सूचनेकडे केली डोळेझाक

मोह अनावर इतका झाला, पुढे सरकला हात
फूल कोठले ? निराळेच लिहिले होते नशिबात

पानांमागे दडलेल्या काट्याने केला घात
खुपला बोटाला, पण झाली जखम खोल हृदयात

धुंदीतुन शुद्धीवर आलो, तिथे उमगली चूक
धार दिसत होती रक्ताची, फूल मात्र अंधूक

स्वप्ने रंगवल्याची शिक्षा, की नशिबाचा रोष
फुलास देऊ, काट्याला, की स्वतःस देऊ दोष ?

- अनामिक
(१४/०१/२००५)

(कविता तशी जुनी आहे. वैयक्तिक आवडत्या कवितांपैकी एक..)

09 अगस्त 2001

फुलराणी

रिमझिम रिमझिम बरसत होत्या हळव्या श्रावणधारा
पाखरांसवे धुंदगतीने खेळत होता वारा
पाने होती गात सुराने चैतन्याची गाणी
कुठून चाहुल गोड लागली, दिसली मज फुलराणी

सोनपावलांच्या नादाने तिचे आगमन झाले
वर्षाजलात इंद्रधनूचे रंग मिसळले ओले
गंध मृदेचा द्विगुणित केला तिच्या पदोस्पर्शाने
आसमंतही भरून आला सळसळत्या हर्षाने

शुभ्र विजांची मैफल जमली गगनी फेर धराया
मेघांचाही पूर लोटला फुलराणीस पहाया
सौंदर्याने तिच्या मिळाला नूर नवा गगनाला
पहा चंद्रही कसा लाजला तिच्या गौरवर्णाला

हृदय धडकले पाषाणांचे मंजुळ तिच्या स्वराने
तिच्या मुखीचे गीत ऐकण्या वळली पाने-पाने
करस्पर्शाने तिच्या बहरला प्रेमफुलांचा वाफा
तिच्या निरागस लीलांवरती खुदकन हसला चाफा

जळी, स्थळी, काष्ठी, पाषाणी तिने फुलवला श्वास
रंगबिरंगी नवस्वप्नांची जगी विखुरली रास
आगमनाने फुलराणीच्या रचली एक कहाणी
चराचराने अस्तित्वाची तिच्या गायली गाणी

- अनामिक
(०९/०८/२००१)

23 जून 2001

हाक

का रुसलीस प्रिये, तुटली का क्षणात प्रीती सारी ?
चाललीस का दूर दूर मग सोडुन साथ अधूरी ?

आनंदाच्या पावसात तू, दुःखाच्या दुष्काळी
साथ दिलीस मला विरलेल्या भकास सांज-सकाळी
कधी यशाच्या मुकुटामध्ये चमचमणारा मोती
पराभवाच्या तिमिरामध्ये तूच उजळल्या ज्योती

हास्याचा क्षण जगतानाही फुलवलेस तू ओठ
दिलीस हिम्मत रिचवायाला तू अश्रूंचा घोट
काट्यांनी भरलेला रस्ता, कधी फुलांची वाट
पार कराया दिलास हाती तू प्रेमाचा हात

कोण तुझ्यावाचून भावना समजुन घेइल माझ्या
स्पर्शावाचुन तुझ्या, मनाच्या जखमा उरतिल ताज्या
आर्त वेदना तळमळेल मग काळजात जळणा-या
तुझ्या फुंकरीविना कधी या ठिणग्या विझतिल सा-या

साद घालतो, ये माघारी, शतदा पडतो पाया
तुझ्याविना हे जीवन म्हणजे प्राणांवाचुन काया
क्षमा मागतो गुन्हा कोणता घडला असला त्याची
किती याचना करू, ऐक ना हाक तुझ्या वेड्याची

- अनामिक
(२१,२२,२३/०६/०१)


(संदर्भ - ही कविता ’कविते’ला, म्हणजेच  काव्याला उद्देशून लिहिलेली आहे. या कवितेतील सखी म्हणजे ’कविता’ आहे.)

31 मई 2001

क्षितिज

रंग उधळले कुणि आकाशी
क्षितिजावर ओघळली लाली
ओठांच्या दाबून पाकळ्या
जणु युवती गालात लाजली

सांजवात सुटला वेगाने
क्षितिजाला बिलगाया आतुर
जणु सूर्याने आभाळातुन
हळुच घातली शीतल फुंकर

लालबुंद तेजाचा गोळा
दिनकर अवतरला क्षितिजावर
जणु प्रेमाने मोहरलेल्या
स्वप्नप्रियेला भेटे प्रियकर

बुडू लागला सूर्य सागरी
अंधाराने विणले जाळे
जणु क्षितिजाने वस्त्र नेसले
चमचमत्या ता-यांचे काळे

- अनामिक
(मे २००१)

24 अप्रैल 2001

कविता

कविता असते मनी उमलत्या भावनांचा फुलोरा
श्रावणातल्या रिमझिमणा-या ओल्या विचारधारा

कविता असते रंगबिरंगी आकांक्षांची थाळी
डोळ्यामध्ये अंकुरलेल्या स्वप्नांची रांगोळी

कविता असते आनंदाच्या धुंदीचा हुंकार
आत कोंडलेल्या अश्रूंना पाझरणारे द्वार

कविता असते रेशिम झालर सौख्याच्या वस्त्राला
दुःखाचीही सुरेख गुंफण करणारी फुलमाला

कविता असते सरस्वतीचे तेजस्वी वरदान
मनामधे जपलेले हिरवे नाजुक पिंपळपान

- अनामिक
(२४/०४/२००१)

14 मार्च 2001

श्रीमंत - गरीब

श्रीमंतांचे इथे चोचले
कोण पुसे गरिबाच्या इच्छा
धनिकावर वर्षाव सुखाचा
दुःख करी गरिबाचा पिच्छा ॥ धॄ ॥

वस्त्र भरजरी लेउन अंगी
धनिक करी श्रृंगार नाटकी
शरिर लपवण्या पुरी न पडती
गरिबाची लक्तरे फाटकी ॥ १ ॥

टोलेजंग महालांभवती
सोनेरी जाळ्यांचे कठडे
ऊन-पावसा इथे थरथरे
जुने मोडके अधू झोपडे ॥ २ ॥

मिष्ठान्नाचे ताट गिळुनिया
कुणि देतो तृप्तीचा ढेकर
रित्या मुखाला नशिबी नाही
एक वेळची भाजी भाकर ॥ ३ ॥

समृद्धीची नदी वाहते
धनवानाच्या खुल्या अंगणी
निर्धनास अपुल्या न आवरे
नयनी ओघळणारे पाणी ॥ ४ ॥

- अनामिक
(१४/०३/२००१)

15 फ़रवरी 2001

शोध

येईल कुणी मजसाठी
हृदयात घेउनी प्रीती
या खुळ्या भावनेपायी
शून्यात शोधतो नाती

सतरंगी इंद्रधनूच्या
शोधतो कुणाचा चेहरा
डोळ्यात रंग प्रेमाचा
जलधीहुन ज्याच्या गहिरा

वाळूतिल रेषांवरती
शोधतो कुणाचे नाव
स्पर्शाने कळतिल ज्याला
चित्तातिल कोमल भाव

बेधुंद चांदण्या रात्री
पाहतो कुणाची स्वप्ने
स्वर मिसळुन स्वरात माझ्या
कुणि गाइल मधुर तराणे

श्रावणसरीत रिमझिमत्या
पाहतो कुणाची वाट
भिजवेल चिंब हृदयाला
बांधेल रेशमी गाठ

- अनामिक
(१४, १५ /०२/२००१)

12 जनवरी 2001

शुभेच्छा

गंध फुलांचा घेउन मोहक तुझा जन्मदिन आला
तुजसाठी नवचैतन्याचा वसंत ऋतू बहरला
आयुष्याने तुला चढवला नव्या वयाचा साज
असंख्य देतो तुला शुभेच्छा मनापासुनी आज


मनी फुलव तू नवीन स्वप्ने, नव्या नव्या आकांक्षा
आयुष्यात यशस्वी हो तू सगळ्या कठिण परिक्षा
सफल होउ दे तुझ्या मनीषा, तुझे ध्येय, अन् आशा
असेल याहुन दुसरी तिसरी माझी काय अपेक्षा


दुख, निराशा स्वप्नालाही तुझ्या कधी ना येवो
हास्य तुझ्या या चेह-यावरचे सदैव चमकत राहो
आनंदाची नित्य तुझ्यावर होऊ दे बरसात
सुख, समृद्धी आणि यशाची तुला मिळू दे साथ


दीर्घायुष तू होशिल, करतो प्रार्थना ईश्वरास
नाव स्वताचे उज्वल करशिल, आहे मज विश्वास
वाटेवरती चालताना यशाच्या तू, तुजसाठी
माझ्या नित्य सदिच्छा असतिल वळणा-वळणावरती


- अनामिक
(१२/०१/२००१)

05 दिसंबर 2000

आठवणी

कालपाखरू जाते उडुनी, मागे उरती आठवणी
अश्रूंचा महापूर उमलतो नयनांमध्ये क्षणोक्षणी

अनेक व्यक्ती, असंख्य छाया जीवनात येती जाती
त्यांनी उजळविल्या दीपांच्या राहतात जळक्या वाती

कुणी खास मनवाटिकेमधे फुलवुन जाते गोड फुले
आता उरल्या कुस्करलेल्या पाकळ्यांसवे जीव झुले

तृप्तीच्या सागरात कोणी न्हाउ घालते दशोदिशा
सागर सुकतो, उरती वाळूवरल्या त्या फसव्या रेषा

स्मॄतींच्या काट्यांत अडकुनी फाटुन जाते अंग पुरे
रक्ताचा मग पाट वाहतो, आत खोलवर जखम उरे

- अनामिक
(०५/१२/२०००)