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06 जून 2024

गम नही

ऐसा दिखा दो शख्स कोई, आँख जिसकी नम नही 
पर जिंदगी की बाग में उम्मीद के गुल कम नही 

इक दिन भरेंगे सब जखम.. फीके पडेंगे दर्द, गम 
बस सब्र रख लो.. वक्त से बढिया कोई मरहम नही 

कल था ढला वो दौर भी.. ये भी ढलेगा दौर कल 
सुइयाँ घडी की भी घडी भर इक जगह कायम नही 

ऐसे लडो तकदीर से, खुद को ही खुद पे नाज हो 
गर जी गए, कर लो जशन.. मिट भी गए तो गम नही 

- कल्पेश पाटील 
(२५/०१/२०१८ - ०६/०६/२०२४)

17 अप्रैल 2022

शुरुआत

ये वक्त के हैं फासलें.. 
या फासलों का वक्त है ?! 
पर फासलों से क्या कभी हो जाते कम जज़बात हैं ?! 

जब मुस्कुराती थी सहर 
खिलती चहकती सांझ थी 
उन यादों में गुम आज भी इक चाँदनी की रात है 

आए गए सावन कई 
बैसाख भी तो कम नही 
इक धूप की राहों में मुद्दत से रुकी बरसात है 

तकदीर के ही पैंतरें 
तकदीर के ही फैसलें 
कठपुतलियों के खेल में क्या जीत, और क्या मात है ?! 

इस ओर से निकली सदा 
उस छोर पहुँचेगी जरूर
कब, कैसे आए लौटकर.. संजोग की ही बात है 

उस मोड आकर थम गयी थी 
इक सुरीली दासताँ 
जिस मोड पर ऐसा लगा था, हाँ यही शुरुआत है 

- अनामिक 
(९-१४/०२/२०२२, १७/०४/२०२२) 

15 अप्रैल 2022

आसान ही क्या है भला ?!

मक्सद बिना जिंदा रहे, वो जान ही क्या है भला ?!
जो चैन से सोने दे, वो अरमान ही क्या है भला ?!

क्यों फिक्र है, की कोशिशों का फायदा कुछ हो, न हो ?!
इक बार करके देख ले.. नुकसान ही क्या है भला ?!

जन्नत तलक जो ले चले, वो राह मुश्किल है बडी
पर जिंदगी की दौड में आसान ही क्या है भला ?!

यूँ ही न किस्मत से खुलेंगी आसमाँ की खिडकियाँ
घायल न कर दे पंख जो, वो उडान ही क्या है भला ?!

जब गम चखो, तो ही खुशी का स्वाद चलता है पता
अश्कों बिना खिल जाए, वो मुस्कान ही क्या है भला ?!

तूफान आते हैं टटोलने कश्तियों का हौसला
लहरों से माने हार, वो इन्सान ही क्या है भला ?!

पूरी करे 'वो' सब मुरादें, पहले शिद्दत तो दिखा
बस मन्नतों से माने, वो भगवान ही क्या है भला ?!

- अनामिक

03 अगस्त 2021

हरियाली का दौर नही

​​धुआँधार है बरखा.. फिर भी हरियाली का ​दौर नही  
पतझड मिटा सके बन से, बरखा इतनी भी घनघोर नही 

वैसे तो कुछ कमी नही सावन की बौछारों में, पर.. 
मन का तहखाना भिगा सके, उनमें अब तक वो जोर नही 

बादल-बिजली बजा रहे हैं ढोल-नगाडें जोश में, पर.. 
सोते सपनों को जगा सके, इतना भी उनका शोर नही 

​रिमझिम बरसे.. टिप-टिप बरसे.. जमकर बरसे बरसातें, पर.. 
पंख पसारे नाच दिखाने राजी इक भी मोर नही 

​​​अंबर से धरती को छूती​ लाख लकीरें दिखती हैं जो​ 
​​बूँदें है बस.. जोड सके दोनों को ऐसी डोर नही 

कब बरसेगा ? कब सूखेगा ? कहा रुकेगा ? कहा बहेगा ? 
जीवन है बारिश का पानी.. जिसका कोई ठोर नही 

- अनामिक​ 
​(१७/०६/२०२१ - ०३/०८/२०२१,​ १५/०६/२०२४) 

04 दिसंबर 2017

गिलें

गलतफहमियों के अंबर में सूझ-बूझ के बादल आए 
एक कदम था अंतर, करने पार जहाँ हम चल आए 

वैसे तो कुछ वजह नही थी बेमतलब की अनबन की 
करने गए सुलह, तो सदी पुराने गिलें निकल आए 

आ न रहा था समझ, भला कैसे शिकस्त दे दुश्मन को 
थूक दिया गुस्सा, तो दिमाग में दोस्ती के हल आए 

निकले थे हम दुनिया को अपनी नसीहतों से रंगने 
दिखा आइना चलते चलते, खुद को ही फिर बदल आए 

- अनामिक 
(०२-०४/१२/२०१७) 

31 अक्टूबर 2017

चोट

गुमसुम पडी थी मुद्दतों से, शाख दिल की हिल गयी 
जो लाख टाली थी नजर, वो फिर नजर से मिल गयी 

सौ कोशिशों, सौ मरहमों से जख्म था भरने लगा 
इक जिक्र क्या उनका हुआ, वो चोट फिर से छिल गयी 

जकडे रखी थी नैन में इक ख्वाब की तितली हसीं 
भवरा भरम का क्या दिखा, पर फडफडाकर खुल गयी 

बेताब थे सब लोग सुनने, जब तलक लब थे सिले 
दुखडा जरा क्या गा दिया, उठकर भरी महफिल गयी 

वो इक सुहाना हादसा.. घटकर सदी भी हो चुकी 
पर आज भी उस सांझ की वो याद फिर से छल गयी 

- अनामिक 
(०६-३१/१०/२०१७)

28 अक्टूबर 2016

अचानक ही नही होता

गज़ल का जनम कागज़ पर अचानक ही नही होता 
भला इन्सान यूँ शायर अचानक ही नही होता 

गिरे जब एक चिंगारी, कई पत्तें सुलगते हैं 
धुआँ खामोश जंगल भर अचानक ही नही होता 

न जाने मुश्किलें कितनी नदी है पार कर आती 
खुशी से चूर तब सागर अचानक ही नही होता 

सितारें जल रहे हैं चाँद की ख्वाइश में सदियों से 
उजागर रात में अंबर अचानक ही नही होता 

मोहब्बत है नशा ज़ालिम, ज़रा धीमे ही चढती है 
असर इसका भले दिल पर अचानक ही नही होता 

- अनामिक 
(२३/०९/२०१६ - २८/१०/२०१६)

07 सितंबर 2016

कभी न सोचा था

फिजूल थे जो लम्हें, उनकी अब खल रही कमी है क्यों ?
जाल लगे थे जो धागें, अब लग रहे रेशमी हैं क्यों ?

कभी न सोचा था, जो किस्सें कभी याद भी आएंगे
आज उन्ही बातों की दिल में इतनी भीड जमी है क्यों ?

अपनी धुन में मस्त मगन सी बेफिकर चल रही थी जो
आज किसी अंजान मोड पे यूँ जिंदगी थमी है क्यों ?

कुछ न मायने रखते थे जो, गैरों में जिनकी गिनती थी
आज बेसबब ही पलखों पे उनके लिए नमी है क्यों ?

- अनामिक
(२६/०८/२०१६ - ०२/०९/२०१६)

29 फ़रवरी 2016

जिंदगी की बात

कर लिये गप्पें बहोत, ढलने लगी है रात भी
चल सखी कर ले जरासी जिंदगी की बात भी

चुटकुलें, किस्सें, संदेसें बहोत भेजे, पढ लिये
चल जरा पढ ले निगाहों में लिखे जज़बात भी

इत्र, गुलदस्तें, खिलौनें.. दे चुके तोहफें कई
पेश करके देख ले दिल की हसीं सौगात भी

चल चुके चालें कई इस इश्क की शतरंज में
जीतने अब दाँव खा ले मुस्कुराकर मात भी

हमराह बनने की पहल कब तक इशारों में करे ?
चल बढाए अब कदम, कर ले नयी शुरुआत भी

- अनामिक
(२४-२९/०२/२०१६)

03 जून 2014

जंजीर

​मिलता न लडकर जंग भी जो दुश्मनों के तीर से
वो जख्म रांझे को मिला है दिल लगाकर हीर से

है रूबरू, पर बीच है दीवार सी खामोशियाँ
जब दिल करे, तो​ बात भी करनी पडे तसवीर से

इक नाम हाथों की लकीरों में लिखा है ही नही
ये जानकर भी खामखा लडता रहू तकदीर से

ये बंद गलियाँ छोड कबका ढूँढता मंजिल नयी
जकडा हुआ है दिल मगर उम्मीद की जंजीर से

- अनामिक
(२९/०५/२०१४ - ०३/०६/२०१४)

20 दिसंबर 2010

ख्वाइशें जलती रही (गजल)

उठती रही चिंगारियाँ, दिल में अगन पलती रही
कुछ खाक सपने हो गए, कुछ ख्वाइशें जलती रही

करने उजागर जिंदगी, मैं ढूँढने सूरज चला
इक बार भी न हुई सुबह, शामें मगर ढलती रही

मुश्किल सफर, सौ रासते, धुंदले सभी, जाता कहाँ
गुमराह करके, दूर मुझसे मंजिले चलती रही

अंजान सी इस भीड में ना दोस्त, ना अपने मिले
बहला सकी ना महफिलें, तनहाइयाँ छलती रही

पौधे गुलाबों के लगाए, खुशबुओं की चाह में
बरसे न बादल, बाग काटों से सदा खिलती रही

शतरंज में संसार की सीखे न टेढे पैंतरे
चलता गया हर चाल सीधी, मात ही मिलती रही

- अनामिक
(१५/१२/२०१० - १९/१२/२०१०)

20 मई 2008

ख्वाइश है क्यों (गजल)

हार से मिलकर गले अब जीत की ख्वाइश है क्यों
फूल सब मुरझा गए, दिल चाहता बारिश है क्यों

सामने थी मंजिले, मैं सहमकर धीमे चला
अब बिछे हैं फासले, भगदौड की कोशिश है क्यों

झिलमिलाती रात में भी चाँद को छू ना सका
अब अमावस है घनी, दिल ढूँढता गर्दिश है क्यों

गूँजते थे महफिलों में गीत जब, मैं चुप रहा
अब विरानों में लबों पे एक फर्माइश है क्यों

तेज जीवन का जुआ था, तब न खेली बाजियाँ
अब पडे फाँसे गलत, तकदीर से रंजिश है क्यों

- अनामिक
(१८-२०/०५/२००८)​