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25 नवंबर 2023

सुनी मीठी गज़ल मैंने

सुनी मीठी गज़ल मैंने तेरे खामोश अधरों में 
पढी दिल की खबर मैंने तेरी मदहोश नजरों में 
|| मुखडा || 

मुझे बस देखकर तेरा गुलाबों सा महक जाना 
नजर को जब नजर छू ले, हया से नैन झुक जाना 
मचलना धडकनों का दिल में, जैसे नाव लहरों में 
|| अंतरा-१ || 

संदेसें खास भेजेंगे निगाहों के झरोखों से 
जरूरत हो न लब्जों की, करेंगी गुफ्तगू साँसें 
चलेंगे हम हकीकत के परे, ख्वाबों के शहरों में 
|| अंतरा-२ || 

- कल्पेश पाटील 
(२३/०९/२०२३ - २५/११/२०२३) 

12 अक्टूबर 2018

उड चला इक ख्वाब

इक ख्वाब पलखों से फिसलकर उड चला.. 

इक ख्वाब पलखों से फिसलकर उड चला दूजे नगर 
इक ख्वाब आँखों से उछलकर चल पडा अपनी डगर 

इक ख्वाब दिल की बंदिशों को तोडकर है उड चला 
इक ख्वाब ठहरी ख्वाइशों को छोडकर है उड चला 

वो गुदगुदी था, या चुभन ? 
था सर्द ठंडक, या जलन ? 

सच था, भरम, या झूठ था ? 
तेजाब का वो घूँट था ? 

रिमझिम खुशी की बारिशें ? 
या दर्द का सैलाब था ? 

जैसा भी था.. नायाब था 
सबसे सलोना ख्वाब था 

- अनामिक 
(०५/०६/२०१८ - १२/१०/२०१८) 

09 मई 2018

याद बाकी है कही

जो ढह गया पुल, बांधने की ख्वाइशें बिलकुल नही 
बस इक पुराने जलजले की याद बाकी है कही 

सब जख्म कब के भर चुके.. सब दर्द फीके पड गए 
बस उनके गहरे दाग अर्सों बाद बाकी हैं कही 

कब का हजम भी कर लिया उस दौर का जालिम जहर 
कुछ नीम से कडवे पलों का स्वाद बाकी है कही 

मजबूत ख्वाबों का महल.. गिर भी गया, अब गम नही 
कमजोर, मलबे में दबी बुनियाद बाकी है कही 

ना है खुदा से कुछ गिला.. जो ना दिया, अच्छा किया 
बस अनसुनी, खारिज हुई फर्याद बाकी है कही 

- अनामिक 
(२६/१२/२०१७ - ०९/०५/२०१८) 

30 जनवरी 2018

शब्द आले, शब्द गेले

शब्द आले, शब्द गेले, शब्द बोलत राहिले 
शब्द पडले, शब्द उठले, शब्द डोलत राहिले 

शब्द मिटले, शब्द फुलले, शब्द बहरत राहिले 
शब्द झडले, शब्द रुजले, शब्द उमलत राहिले 

शब्द सुकले, शब्द भिजले, शब्द बरसत राहिले 
शब्द स्वप्नांच्या सरींचे वार झेलत राहिले 

शब्द खचले, शब्द विरले 
शब्द लढले, शब्द हरले 
शब्द बुडले, शब्द तरले, शब्द उसळत राहिले 
वेदनांची रत्नमाला शब्द माळत राहिले 

शब्द झुरले, शब्द रुसले 
शब्द रडले, शब्द हसले 
शब्द भुलले, शब्द फसले, शब्द भाळत राहिले 
शब्द दगडी देवतांवर व्यर्थ उधळत राहिले 

शब्द थकले, शब्द विटले 
शब्द सजले, शब्द नटले 
कालगंगेतून अविरत शब्द वाहत राहिले 
मार्ग सारे खुंटले, पण शब्द चालत राहिले 

- अनामिक 
(१२-३०/०१/२०१८) 

25 जनवरी 2018

काँच की दीवार

ये काँच की दीवार है मेरे-तुम्हारे दर्मियाँ 
यूँ तो लगे नाजुक, मगर फौलाद से कुछ कम नही 
इस को गिराने का खुदा की जादू में भी दम नही 

इस छोर का, उस पार का सब कुछ दिखाई दे, मगर.. 
हैं बंदिशें दोनो तरफ आवाज के हर रूप पर 
बातें, पुकारें, शोर, सुर, सिसकी, हसी, सरगम नही 

इक दौर था, जब दो पलों की गुफ्तगू ही थी खुशी 
अब तो महीनों की घनी खामोशी का भी गम नही 

अब सच कहू, तो काँच की दीवार ही ये है सही 
बंद खिडकियाँ खुलने की अब उम्मीद कम से कम नही 
शायद पुकारोगे कभी, गलती से ही.. ये भ्रम नही 
हाँ, वक्त से बढिया किसी भी जख्म पर मरहम नही 

- अनामिक 
(२३-२५/०१/२०१८) 

31 दिसंबर 2017

कुछ रह गया, कुछ ढह गया

कुछ गुम गया, कुछ बच गया
कुछ गिर गया, कुछ रह गया 
इस वक्त के सैलाब में 
क्या कुछ न जाने ढह गया 

                      कुछ कागजों की कश्तियाँ 
                      कुछ काँच की नक्काशियाँ 
                      इक सीपियों का ताजमहल 
                      इक रेत का पुल बह गया 

लिखता रहा, गाता रहा मैं 
लब्ज ना पहुँचे कही 
खामोश रहकर भी मगर 
सन्नाटा क्या कुछ कह गया 

                      बदमाशियों से बाज ना आयी 
                      सितमगर जिंदगी 
                      मैं भी तो कम जिद्दी नही 
                      सब मुस्कुराकर सह गया 

- अनामिक 
(२९-३१/१२/२०१७) 

22 दिसंबर 2017

तोहफा

सोच रहा हूँ, क्या दू तुमको ? तोहफा क्या लाजवाब दू ? 
झिलमिल झुमकें, छनछन पायल, या नाजुक सा गुलाब दू ? 

देने को तो खरीदकर दू मैं तो पूरी दुकान भी 
तोहफें रखने कम पड जाए तुमको अपना मकान भी 

शायर हूँ पर.. सोचता हूँ, लब्जों में रंगी स्याही दू 
तुम पर लिखी तमाम नज्मों से बढकर तोहफा क्या ही दू ? 

स्वीकार करो या ठुकराओ.. तुम करना जो भी लगे सही 
ये गीत मगर गूँजेंगे ही.. ये रसीद के मोहताज नही 

- अनामिक 
(२३/१२/२०१६ - २२/१२/२०१७)

21 दिसंबर 2017

ख्वाब का पुल

हर रात निंदिया की नदी पर 
ख्वाब का पुल बांधकर 
भरकर सितारें जेब में 
मिलने निकलता हूँ तुम्हे 

तुम रात का काजल लगाकर 
चाँद बालों में सजाकर 
ताज फूलों का पहनकर 
राह में नजरें बिछाकर 

मेरी प्रतीक्षा में नदी के 
पार रहती हो खडी 
दो नैन बेचैनी भरे 
सौ बार तकते हैं घडी 

छुपते हुए पुल लांघकर मैं चाँदनी की छाँव से 
पीछे तुम्हारे आ खडा रहता हूँ हलके पाँव से 
होले से हाथों से तुम्हारे नैन ढक देता हूँ मैं 
और सब सितारें जेब से सर पर छिडक देता हूँ मैं 

वो स्पर्श मेरा जानकर 
वो धडकनें पहचानकर 
नाजुक लबों पर चैन की भीनी हसी खिलती हुई 
तरसी निगाहों में सितारों की चमक घुलती हुई 
होकर खुशी में चूर गालों पर हया चढती हुई 
बेताब साँसों में सुरीली रागिनी छिडती हुई 

उस इक झलक के, उस हसी के, 
उस हया के वासते 
मैं इक नदी, इक पुल भला क्या 
आँधियाँ क्या, जलजला क्या 
लाख पुल भी बांधकर 
हर जलजले को लांघकर 
मैं रोज ही मिलने तुम्हे 
आऊ किसी भी रासते 

बस रोज यूँ ही राह तकना 
उस नदी के पार तुम 
बेसब्र पलखों में सजाकर 
इश्क का गुलजार तुम 

- अनामिक 
(०९/०४/२०१७ - २१/१२/२०१७) 

20 दिसंबर 2017

हादसा

हाँ, हो चुका था हादसा इक, जाने-अनजाने सही
पर जो हुआ, वैसा ही करने का इरादा था नही 

कुछ वक्त की बदमाशियाँ, कुछ चाल थी हालात की 
कुछ खेल था संजोग का, कुछ थी खता जजबात की 

मैं बस समय की उस नदी में नाव सा बहता गया 
बहाव के सब पत्थरों के घाव फिर सहता गया 

ना जख्म का गम, बस खुदा से है गिला इस बात का 
अपनी सफाई का मुझे मौका न इक भी दे सका 

पर आज भी वो हादसा खुद की नजर में माफ है 
दिल साफ था उस रोज भी, और आज भी दिल साफ है 

- अनामिक 
(१३,२०/१२/२०१७) 

07 दिसंबर 2017

नजरें

अल्हड नजरें, चंचल नजरें.. जजबातों से बोझल नजरें 
चुपके से दीदार पिया का करने हर पल बेकल नजरें 

इन नजरों से मिल जाने बेचैन भटकने वाली नजरें 
भटक-भटक इन नजरों के ही पास अटकने वाली नजरें 

टकराए जब, शरमाकर खुद को ही झुकाने वाली नजरें 
नर्म अधखुली पलखों से फिर धीमे मुस्काने वाली नजरें 

जान-बूझकर टकराकर भी, सोच-समझकर भिडकर भी 
गलती से ही टकराने का आभास जताने वाली नजरें 
लाख छुपाकर भी सब कुछ ही साफ बताने वाली नजरें 

इन नैनों के रस्ते दिल के पार उतरने वाली नजरें 
कटार जैसी धार से अपनी घायल करने वाली नजरें 

कभी रूठकर, कभी सताने खामखा मुडने वाली नजरें 
ज्यादा दूरी सही न जाकर फिर से जुडने वाली नजरें 

दो नैनों से सौ तरहा के रूप दिखानेवाली नजरें 
लब्जों बिन मीठी बोली से प्रीत सिखाने वाली नजरें 

- अनामिक 
(२५/११/२०१७ - ०७/१२/२०१७)

30 नवंबर 2017

सौदा

क्यों बिन फायदे का रिश्ता जोडे ?
चल इक सौदा करते हैं 
जो पास खजाना है दोनों के, 
आधा-आधा करते हैं 

                              तू धूप सुनहरी ले आना 
                              मैं बरसातें ले आऊंगा 
                              कुछ नजरानों के बदले में 
                              कुछ सौगातें ले आऊंगा 

मैं तेरी पतझड ले लूंगा 
तू मेरी बहारें रख लेना 
मैं तेरे अंधेरें पी लूंगा 
तू मेरे सितारें रख लेना 

                              हर दर्द उठा लूंगा तेरा 
                              मेरी मुस्कानें रख लेना 
                              गा लूंगा तेरी चुप्पी भी 
                              तू मेरे तरानें रख लेना 

मैं तेरी आँधियाँ झेलूंगा 
तू मेरी हवाएँ रख लेना 
मैं तेरी बलाएँ ले लूंगा 
तू मेरी दुआएँ रख लेना 

                              तनहाई अपनी दे देना 
                              पर मेरी सोहबत रख लेना 
                              नफरत भी देना, फिकर नही 
                              पर मेरी मोहब्बत रख लेना 

तू जो बोले दिल, दे देना 
तू जो बोले दिल, रख लेना 
मंजूर मुझे है सौदा, बस.. 
दिल के बदले दिल रख लेना 

- अनामिक 
(२५-३०/११/२०१७) 

23 नवंबर 2017

चुन लिया, बस चुन लिया

यूँ तो न रेशम और मखमल की कमी बाजार में
इक ख्वाब धागों से रुई के बुन लिया, बस बुन लिया 

यूँ तो न अंबर में पडा है चाँद-तारों का अकाल 
पर इक दफा, ग्रह ही सही, जो चुन लिया, बस चुन लिया 

वैसे न मानी बात औरों की, न खुद की भी कभी 
इक बार पर जो हुक्म दिल का सुन लिया, बस सुन लिया 

हर गैर से रिश्ता बनाने की मेरी फितरत नही 
इक बार अपनों में किसी को गिन लिया, बस गिन लिया 

- अनामिक 
(०६/०६/२०१७, २३/११/२०१७) 

31 अक्टूबर 2017

चोट

गुमसुम पडी थी मुद्दतों से, शाख दिल की हिल गयी 
जो लाख टाली थी नजर, वो फिर नजर से मिल गयी 

सौ कोशिशों, सौ मरहमों से जख्म था भरने लगा 
इक जिक्र क्या उनका हुआ, वो चोट फिर से छिल गयी 

जकडे रखी थी नैन में इक ख्वाब की तितली हसीं 
भवरा भरम का क्या दिखा, पर फडफडाकर खुल गयी 

बेताब थे सब लोग सुनने, जब तलक लब थे सिले 
दुखडा जरा क्या गा दिया, उठकर भरी महफिल गयी 

वो इक सुहाना हादसा.. घटकर सदी भी हो चुकी 
पर आज भी उस सांझ की वो याद फिर से छल गयी 

- अनामिक 
(०६-३१/१०/२०१७)

29 अक्टूबर 2017

काळोखाच्या किती छटा

रात्र नेसुनी जशी उजळते शुभ्र चंद्रकोर अंबरी 
तसा शोभतो काळोखाचा रंग भरजरी तुझ्यावरी 

केसांमधल्या काळ्या लाटा 
डोळ्यांचे काळोखे डोह 
पापण्यांतली काळी नक्षी 
कसा आवरू त्यांचा मोह 

त्यात तुझा मखमाली काळाशार राजबिंडा पेहराव 
वाढवतो नजरेची तृष्णा, मुग्ध मनाचा घेतो ठाव 

त्यावर इवल्या चमचम टिकल्या, 
नक्षत्रांचा जणू बहर 
किती पाहिले वेष तुझे, 
ना एकालाही याची सर 

पंखांशिवाय, छडीविनाही भासतेस तू यात परी 
काळोखाच्या किती छटा त्या खुलून दिसती तुझ्यावरी 

- अनामिक 
(२४-२९/१०/२०१७) 

30 सितंबर 2017

कोडी

चंद्र होता रात्रवेडा, रात्र होती सूर्यवेडी
सूर्य होता सांजवेडा, सांज होती चंद्रवेडी 
ओढ कोणाला कुणाची, आणि तिटकारा कुणाचा 
अंतरिक्षाला स्वतःलाही न सुटली गूढ कोडी               ॥ धृ ॥ 

वेध धूसर धूमकेतूचे खुळ्या पृथ्वीस होते 
कैक शतकांची प्रतीक्षा, मीलनाचे स्वप्न खोटे 
एकदा फिरकून तो काढून गेला फक्त खोडी               ॥ १ ॥ 

मोह धरणीला उन्हाचा, चांदण्याचीही तृषा 
कैफ थंडीचा गुलाबी, पावसाचीही नशा 
भोग इतके चाखले की, राहिली न कशात गोडी           ॥ २ ॥ 

आजन्म सूर्याभोवती पिंगा ग्रहांनी घातला 
पण सूर्य अंधारात अज्ञातास धुंडत राहिला 
जिथल्या तिथे सगळेच, पण जमली कुणाचीही न जोडी  ॥ ३ ॥ 

- अनामिक 
(१६-३०/०९/२०१७)

11 सितंबर 2017

तालाब

हाँ, दोष है तालाब का, जो खुद ही मचला था कभी 
अब तक न स्थिर जो हो सका, आए गए मौसम सभी 

वो खुद-ब-खुद ही शांत हो जाता, न होता, क्या पता ? 
पर चंद कंकड फेकने की तो किसी की थी खता 

साबित न कुछ करना, न अब देनी दलीलें अनकही 
जिसने शरारत की, उसे एहसास है, काफी यही 

मालूम है तालाब को अपनी हदें, ना हो फिकर 
उडने न देगा छींट भी तट पर खडे नादान पर 

- अनामिक 
(०७-११/०९/२०१७) 

04 सितंबर 2017

ये रात है.. ये राह है..

ये रात है.. ये राह है.. ये साथ है.. ये चाह है.. 
इस चाह की इस राह पर हम तुम सनम गुमराह हैं 

ये बादलों की बोतलों में बिजलियों के जाम हैं 
पी ले इन्हे, ये दिल बहकने का रसीला माह है 

ना है जमाने की फिकर, ना हैं समय की बंदिशें 
कसकर मुझे लिपटी हुई नाजुक तुम्हारी बाह है 

हम बेसबब चलते रहे, मंजिल मिले, ना भी मिले 
खो भी गए इक-दूसरे में, क्या हमें परवाह है ? 

थककर कभी रुक भी गए, भरना मुझे आगोश में 
उस मखमली आगोश सी दूजी न कोई पनाह है 

- अनामिक 
(०६/०८/२०१७ - ०४/०९/२०१७) 

31 अगस्त 2017

अखेरचे हे गीत सखे

हे गीत कदाचित अखेरचे
यानंतर तुझे न शब्द सखे 
जे द्वार तुझ्यास्तव सताड उघडे 
करेन म्हणतो बंद सखे 

                       उतरेल जरी पानावर शाई 
                       तुझे न येइल नाव सखे 
                       चालेल अक्षरांचा प्रवास, पण 
                       तुझे न येइल गाव सखे 

उठतील कल्पनांच्या लाटा 
पण नसेल तुझा तरंग सखे 
फिरतील कुंचले स्वप्नांचे 
नसतील तुझे पण रंग सखे 

                       डुंबेन विचारांच्या डोही 
                       पण तुझे नसेल प्रतिबिंब सखे 
                       झरतील सरीही कवितांच्या 
                       नसतील तुझे पण थेंब सखे 

मोगरा सुरांचा दरवळेल 
पण नसेल तुझा सुगंध सखे 
घुमतील बासरीचे स्वरही 
पण नसेल तुझा निनाद सखे 

                       ते स्वप्न भरजरी होते, पण 
                       वास्तवास नव्हता वाव सखे 
                       थांबवतो अता खुंटलेला हा 
                       बुद्धिबळाचा डाव सखे 

- अनामिक 
(२५-३१/०८/२०१७) 

27 अगस्त 2017

सखे

मी करेन म्हणतो कैद तुला, शब्दांचे घेउन रंग सखे 
पण नजर तुला भिडताच तुझ्या रंगातच होतो गुंग सखे 
तू समोर असता, सांग सखे, मी भान स्वतःचे कसे जपू ? 
आरस्पानी अस्तित्व तुझे मी कवितेमधुनी कसे टिपू ?   ॥ धृ ॥ 

ही वीज तुझ्या डोळ्यांमधली 
ही जुई तुझ्या ओठांवरली 
ही सांजेची लाली गाली 
हा सूर्याचा ठिपका भाळी 
हा मोरपिसासम स्पर्श फुलवतो मनी सहस्त्र तरंग सखे 
मी भान स्वतःचे कसे जपू, तू समोर असता ? सांग सखे ॥ १ ॥ 

हा वादळवारा केसांचा 
हा धुंद मोगरा श्वासांचा 
हा देह चिमुकला चिमणीचा 
पण डौल जणू फुलराणीचा 
मी काय लिहू, अन्‌ काय नको ? उपमांची मोठी रांग सखे 
मी भान स्वतःचे कसे जपू, तू समोर असता ? सांग सखे ॥ २ ॥ 

हे गूढ इशारे नजरांचे 
हे गहन भाव चेहऱ्यावरले 
हे गुपित मंद स्मितहास्याचे 
हे लक्ष शब्द मौनामधले 
मी खोल उतरतो तुझ्या अंतरी, तरी न लागे थांग सखे 
मी भान स्वतःचे कसे जपू, तू समोर असता ? सांग सखे ॥ ३ ॥ 

- अनामिक 
(१५-२७/०८/२०१७) 

23 अगस्त 2017

दिल फिसलने की घडी

मदहोश बादल, धुत समा, बेताब बूँदों की झडी 
ऐसे समय तुम रूबरू बारिश लपेटे हो खडी 
तुम ओंस में भीगी हुई जैसे कमल की पंखुडी 
रोकू, संभालू, जो करू.. है दिल फिसलने की घडी 

भीगी लटों से हैं टपकती मोतियों की ये लडी 
ये ठंड से कांपता बदन, पर है नजर में फुलझडी 
पलखें झपकती ही नही, तुम पर निगाहें जो जडी 
रोकू, संभालू, जो करू.. है दिल फिसलने की घडी 

गुस्ताखियाँ गर हो गयी, तो दोष ये किसका कहे ? 
मेरा? तुम्हारा? इश्क? या बदमाश बारिश का कहे ? 
ऐसे न उतरेगी, मुझे जो रूप की मदिरा चढी 
रोकू, संभालू, जो करू.. है दिल फिसलने की घडी 

- अनामिक 
(२७/०७/२०१७, २१-२३/०८/२०१८)

13 अगस्त 2017

कभी ना हो खतम

ये दिन खतम ना हो कभी, ये रात भी ना हो खतम
ये बेसमय चलती हमारी बात भी ना हो खतम 

ये तितलियों के काफिलें, ये जुगनुओं की महफिलें
ये चाँदनी की मदभरी बरसात भी ना हो खतम 

ये रंग हया का शरबती, लब पे हसी की चाशनी
दिल से छलकते शबनमी जजबात भी ना हो खतम 

तरकीब कुछ हम खोज ले, सुइयाँ घडी की रोक ले
पर ख्वाब सी ये जादुई मुलाकात भी ना हो खतम 

ये दो कदम का रासता, ये सौ जनम का वायदा
ये उम्रभर के साथ की शुरुआत भी ना हो खतम 

- अनामिक 
(०६-१३/०८/२०१७) 

23 जुलाई 2017

आर या पार

बहोत हो चुकी लुक्का-छुप्पी, कुछ तो तय इस बार करो 
करना है तो प्यार करो.. वरना सीधा वार करो 

मन के फिजूल खेल न खेलो, नये पैंतरे तो सोचो 
घिसीपिटी सब तरकीबों से दिल का फिर न शिकार करो 

टुकडे टुकडे हो जाए दिल, ऐसा तेज प्रहार करो 
मिर्च रगड दो सब जख्मों पर, दर्दों से बेजार करो 

या फिर छू लो होले से दिल, नर्म हाथ से दस्तक दो 
प्रीत की रिमझिम बारिश से दिल की जमीन गुलजार करो 

चूहे-बिल्ली वाले खेल में मुझे न अब दिलचस्पी है 
मान से दिल में पनाह दू, पर शान से चौखट पार करो 

प्यार करो या वार करो.. पर जो है, आर या पार करो 

- अनामिक 
(१०-२३/०७/२०१७) 

16 जुलाई 2017

बारिशें

ये बादलों की सिलवटें
सागर-लहर की करवटें
हैं बिजलियों की आहटें
ये तेरी लहराती लटें

                            ये मौसमों की साजिशें
                            ये मोतियों की बारिशें
                            भीगा जहाँ, हम दो यहा
                            क्या और हो फर्माइशें ? 

इन उंगलियों को छेडता
ये हाथ तेरा रेशमी
जैसे क्षितिज पे मिल रही
बेताब अंबर से जमीं 

                            कितना नशा इस रैन में
                            और जाम तेरे नैन में
                            प्याला जिगर का भर लिया
                            फिर भी बडा बेचैन मैं 

तेरी मोहब्बत की झडी
यूँ ही बरसती जो रही
मेरे संभलने की भला
फिर कोई गुंजाइश नही 

- अनामिक
(१५/०७/२०१७) 

13 जुलाई 2017

जवाब

करने को तो जंग भी कर लू, ईट का जवाब पत्थर से दू
सब तानों का, अपमानों का हिसाब तीखे अक्षर से दू
मगर क्या करू ? शायर जो हूँ, शायर का ये धरम नही
काँटें भी दे मारे कोई, गुलाब महके इत्तर से दू

कलम हाथ में है नाजुक सी, नोकीली तलवार नही
इश्क छलकता है इससे, इसमें रंजिश की धार नही
हर किस्सा इक नज्म बनेगी, जंग कर लो, या समझौता
दिल जीतेगी दुश्मन का भी, इसकी किस्मत हार नही

- अनामिक
(२६/०४/२०१६, १२,१३/०७/२०१७)

01 मई 2017

राधिका

कृष्ण छेडे बासरी 
आर्त यमुनेच्या तिरी 
राधिका येई न अजुनी 
गोपिका जमल्या तरी 

"का असा रुसवा गडे ?" 
प्रश्न कृष्णाला पडे 
साद व्याकुळ बासरीची 
उंच जाई अंबरी                                   ॥ धृ ॥ 

बासरीचे सूर भिरभिरती खुळे वाऱ्यासवे 
राधिकेचा ठाव घेण्या त्यास करती आर्जवे 
सांगती, "संदेश आतुर दे तिच्या जाउन घरी" 
कृष्ण छेडे बासरी                                 ॥ १ ॥ 

राग लटका दोन घटका, पण चिरंतर प्रीत आहे 
भाबड्या ओठांत कृष्णाचाच जप अन् गीत आहे 
वास कृष्णाचाच आहे राधिकेच्या अंतरी 
कृष्ण छेडे बासरी                                 ॥ २ ॥ 

- अनामिक
(२९/०४/२०१७, ०१/०५/२०१७)

28 अप्रैल 2017

पुष्कळ झाली फुले अबोली

पुष्कळ झाली फुले अबोली, गुलाबास चल देऊ संधी
संवादाचा फोडू पाझर, अन् मौनावर घालू बंदी        ॥ धृ ॥ 

नको नदी, अन् नकोच सागर.. स्वस्थ बसू इथल्या बाकावर 
झटकुन टाकू रुसवा-फुगवा, राग साचलेला नाकावर 
पुसून टाकू गतकाळाच्या समज-गैरसमजांच्या नोंदी ॥ १ ॥ 

गरम चहाने सुरू करूया थंडावलेल्या अपुल्या गप्पा 
घोटागणिक चहाच्या उघडू अलगद बंद मनाचा कप्पा 
इवलासा संवाद आजचा नव्या उद्याची ठरेल नांदी   ॥ २ ॥ 

गंधासोबत ऊब चहाची हळू भिनू दे मनी खोलवर 
विसरुन जाऊ कटुत्व सारे, जशी विरघळे चहात साखर 
तुझ्या गोड स्मितहास्याने वाटेल चहाही जणु बासुंदी ॥ ३ ॥ 

- अनामिक 
(२५-२८/०४/२०१७) 

20 अप्रैल 2017

डगर

सांझ शीतल, छाँव की चुनरी लपेटे है डगर 
चल पडे हैं बेसबब हम दो, जहाँ से बेखबर 

बुलंद पेडों का सजा है शामियाना स्वागत करने 
डालियों की खिडकियों से छू रही हैं नर्म किरनें 

रासतेभर सुर्ख पत्तों का बिछा कालीन है 
सावली परछाइयाँ भी दिख रही रंगीन हैं 

तितलियों के भेस में कुछ ख्वाब नाजुक उड रहे हैं 
सुर मधुर चंचल पवन की बांसुरी से छिड रहे हैं 

हाथ थामा है तुम्हारा, यूँ लगे रेशम छुआ है 
तेज पहिया वक्त का तुम संग लगे मद्धम हुआ है 

खत्म भी हो, या न हो अब ये डगर, ना है फिकर 
यूँ ही रहो तुम हमकदम, चलते रहेंगे उम्रभर 

- अनामिक 
(१०/०१/२०१७ - २०/०४/२०१७) 

13 अप्रैल 2017

मोल

हर शहर की ही तरह इस शहर से भी खामखा
एक तोहफा ले लिया है फिर तुम्हारे नाम का

ये जानकर भी की तुम्हे इसकी कदर तो है नही
पर क्या करू ? आदत कहो, खुद की तसल्ली ही सही

संदूक में ही बंद रखू, तुम तक न पहुँचाऊ अभी
घर-वापसी की तो न नौबत आएगी उसपर कभी

छोड भी दो मेरे, तोहफे के मगर जजबात हैं
उनका समझना मोल ना बस की तुम्हारे बात है

- अनामिक
(११-१३/०४/२०१७)

03 अप्रैल 2017

बस एक कदम

जल कितना भी हो अंबर में, बिन बादल कैसे बारिश हो ?
मैं लाख जतन भी कर लू, पर.. तुमसे भी तो कुछ कोशिश हो 

तुम एक कदम बस चल आओ, मैं तै सैंकडों मकाम करू 
तुम एक घडी दो फुरसत की, दिन-रैन तुम्हारे नाम करू 

तुम एक संदेसा भेजो बस, मैं बाढ चिठ्ठियों की लाऊ 
तुम एक पुकार लगाओ बस, मैं पार जलजलें कर आऊ 

तुम एक लब्ज ही कह दो बस, मैं नज्मों की बरसात करू 
तुम एक दफा बस मुस्काओ, मैं खुद होकर शुरुआत करू 

पर कम से कम वो एक कदम अब तुम्हे ही उठाना होगा 
मैं खोलूंगा दर झटके में, पर तुम्हे खटखटाना होगा 

मैं मीलों चल आया हूँ अब तक, थमना अभी जरूरी है 
पग में जमीर की बेडी है, जिसकी न मुझे मंजूरी है 

- अनामिक 
(२८/०३/२०१७ - ०३/०४/२०१७) 

21 मार्च 2017

आओ अब कुछ बात करे ?

चुप्पी-चुप्पी खेल-खेलकर अगर भर गया होगा जी तो
आओ अब कुछ बात करे ?
अजनबियों के जैसे रहकर अगर तसल्ली मिल गयी हो तो
फिर से इक शुरुआत करे ?         ॥ धृ ॥

कुछ शिकवें मैं रखू जेब में
कुछ शिकायतें तुम दफना दो
कुछ कसूर हम माफ करे
        मुस्कुराहटों की मखमल से
        चेहरों से नाराजगी भरी
        धूल झटककर साफ करे
अंजाने में खडी हुई इन खामोशी की दीवारों पर
लब्जों का आघात करे ?
आओ अब कुछ बात करे ?         ॥ १ ॥

फाड फेंक दे बिगडे किस्सें
गलतफहमियों के सब पन्नें
अतीत की उस किताब से
        अनबन के नुकसान-फायदें
        कडवाहट की फिजूलखर्ची
        चलो मिटा दे हिसाब से
रंजिश की रूखी धरती पर अपनेपन की चंद बूँदों की
हलकी सी बरसात करे ?
आओ अब कुछ बात करे ?         ॥ २ ॥

- अनामिक
(२०/०२/२०१७ - २१/०३/२०१७)

18 मार्च 2017

आज भी

धूल रिश्तों पे जमी जो, मैं हटा पाता नही 
काँच सी बिखरी पडी यादें जुटा पाता नही 

फिक्र तो है आज भी, जितनी हुआ करती थी कल 
फर्क है बस, पहले जैसे अब जता पाता नही 

आज भी सुनने सुनाने बाकी हैं बातें कई 
पूछ पर पाता नही कुछ, कुछ बता पाता नही 

फासलें ये दो जहाँ के, दो कदम ही तो नही ? 
बढ न जाए और, इस डर से घटा पाता नही 

बंद है दर.. दस्तकों से खुल भी जाए, क्या पता ? 
ना खुला तो ? सोचकर दर खटखटा पाता नही 

- अनामिक 
(१८/०३/२०१७)

07 फ़रवरी 2017

पुन्हा मी वाचले सारे

पुन्हा मी वाचले सारे तुझ्या डोळ्यात दडलेले
पुन्हा मी ऐकले गाणे तुझ्या ओठात अडलेले     ॥ धृ ॥

मला बघताच हास्याची कळी हलकेच फुलणारी
जरा नजरानजर होता खळी गालात खुलणारी
पुन्हा टिपले मी ​चेहऱ्यावर गुलाबी रंग चढलेले
पुन्हा मी वाचले सारे..                           ॥ १ ॥

भिडे या अंतरी जर सूर त्या हळुवार स्पंदांचा
कळे जर अर्थ मौनाचा, कशाला भार शब्दांचा ?
खुणावे पापण्यांना द्वार स्वप्नांचे उघडलेले
पुन्हा मी वाचले सारे..                           ॥ २ ॥

- अनामिक
(०६/०१/२०१७ - ०७/०२/२०१७)

15 जनवरी 2017

संक्रांत

घुसमट सारी आज संपवू, किती रहावे शांत अता ? 
मिटवूया चल अपुल्यातल्या अबोल्याची संक्रांत अता ॥ धृ ॥ 

गुळाएवढा गोड नको, पण 
तिळाएवढा शब्द तरी 
नकोत गप्पा दिलखुलास, पण 
तुटकासा संवाद तरी 
पुष्कळ झाले रुसवे-फुगवे, नको बघूया अंत अता     ॥ १ ॥ 

पतंग माझ्या खुळ्या मनाचा 
तुझ्याच गगनी भिरभिरतो 
मांजा तुटला तरी वाट हा 
तुझ्या अंगणाची धरतो 
पुन्हा जोडुनी तुटके धागे करू नवी सुरुवात अता     ॥ २ ॥ 

- अनामिक 
(१४,१५/०१/२०१७)

13 जनवरी 2017

राही

चले तेज इस कदर जिंदगी, थमने की न इजाजत है 
बिता सकू इक मकाम ज्यादा समय, न इतनी फुरसत है 

नयी मंजिलें, नये नजारों की नजरों को दावत है 
चलू अकेला, बने काफिला.. जो भी आए, स्वागत है 

जिसको जुडना है, जुड जाए.. जिसको मुडना है, मुड जाए 
मैं तो अपनी राह चलूंगा, कदम जिस दिशा बढ जाए 

हाँ, रुक जाता हूँ उसकी खातिर, जिसे हमसफर बना सकू 
इक बार रुकू, दो बार.. मगर नामुमकिन है सौ बार रुकू 

- अनामिक 
(२९/१२/२०१६ - १३/०१/२०१७)

06 जनवरी 2017

सौगात जाया हो गयी

उस सांझ छेडी अनकही वो बात जाया हो गयी 
मन में सजी ख्वाबों की वो बारात जाया हो गयी 

वो साफ दिल से पेश की सौगात जाया हो गयी 
उसको सजाने में जगी वो रात जाया हो गयी 

वो बंद मुठ्ठी में छुपी कायनात जाया हो गयी 
दिल से लिखी दास्तान की शुरुवात जाया हो गयी 

वो कोशिशें, शिद्दत, जतन, जजबात जाया हो गये 
उस रात आँखों से गिरी बरसात जाया हो गयी 

- अनामिक 
(०४-०६/०१/२०१७) 

04 जनवरी 2017

कधीतरी वाटेलच की

हास्याचे उसने कारंजे कधीतरी आटेलच की
धीर संयमाचा मुखवटा कधीतरी फाटेलच की

गोष्ट संपली अर्ध्यातच, समजून अचानक मिटलेले
पुस्तक ते उघडून पहावे, कधीतरी वाटेलच की

किती नद्या अडवून ठेवल्या डोळ्यांच्या धरणांनी, पण
तळे पापण्यांच्या काठावर कधीतरी साठेलच की

किती पळावे सशासारखे शर्यतीत नवस्वप्नांच्या
आठवणींचे हळवे कासव कधीतरी गाठेलच की

सहज मिसळतो, रमतो हल्ली अनोळख्यांच्याही गर्दीत
घोळक्यातही त्या एकाकी कधीतरी वाटेलच की

पुन्हा नव्याने खुल्या गळ्याने जीवनगाणे गाइनही
चुकून येता सूर जुने ओठात कंठ दाटेलच की

- अनामिक
(०२-०४/०१/२०१७)

31 दिसंबर 2016

ऐ गुजरते साल

ऐ गुजरते साल, तुमने बिन कहे क्या कुछ दिया 
लब्ज भी कम पड रहे करने तुम्हारा शुक्रिया 

कुछ पुराने दोस्त छूटे, कुछ नये साथी मिले 
कुछ सुहाने ख्वाब रूठे, कुछ हसीं सपनें खिले 

बेजान कविता, शायरी को मिल गयी संजीवनी 
दिलकश धुनें खामोश मन को फिर लगी हैं सूझनी 

घूमने के शौक ने भी मंजिलें ढूँढी नयी 
और भीतर के मुसाफिर ने मकाम पाए कई 

हाँ ठीक है, जाते हुए तुमने भिगाए नैन है 
पर लबों की ये हसी भी तो तुम्हारी देन है 

- अनामिक 
(३०,३१/१२/२०१६) 

22 दिसंबर 2016

तोहफा

दूर शहर से लाए उस तोहफे का मुझसे सवाल है 
"लाए हो जिनके लिए, उन्हे कब देने का खयाल है ? 

दराज में ही रखना था, तो इतनी याद से लाए ही क्यों ? 
उनके पास पहुँचने अब बेसब्री से बुरा हाल है" 

मैंने बोला, "तू तो क्या, मैं चाँद तोडकर भी ला दू 
पर एक चाँद को चाँद दूसरा देने में क्या कमाल है ? 

सब्र रख, तुझे सही वक्त पे नजराने सा पेश करू 
उनको भी तो लगे, की देनेवाला भी बेमिसाल है" 

- अनामिक 
(०८,२१,२२/१२/२०१६) 

19 दिसंबर 2016

इंतजार नही

हाँ, आज भी खुले हैं दिल के खिडकी दरवाजें तेरे लिए 
पर अब आँखों की चौखट को तेरा कोई इंतजार नही 

तू आए तो बाहें खोले जिंदगी करेगी स्वागत ही 
पर ना भी आए, तो भी कोई गम, शिकवा, तकरार नही 

हाँ, कभी कभी तेरे खयाल की तितली उडती हैं मन में 
पर जजबातों के फूलों में अब बचा महकता प्यार नही 

गलती से छिडता है गिटार पे तुझपे रचा हुआ नगमा 
पर गिटार की तारों में अब वो पहले की झनकार नही 

माना पत्थर पे तराशे हुए नाम मिटाना मुश्किल हैं 
पर वक्त की दवा से न ठीक हो, ऐसा कोई वार नही 

- अनामिक 
(१८,१९/१२/२०१६) 

08 दिसंबर 2016

महूरत

इक बात भी करने कभी यूँ तो न फुरसत है तुम्हे 
कैसे मिला फिर आज आने का महूरत है तुम्हे ? 

अब आ गए संजोग से, तो चार पल संग बैठ लो 
कुछ खैर मेरी पूछ लो, कुछ हाल अपना बाँट लो 

मैं मन ही मन में रोज तुम से अनगिनत गप्पें करू 
पर सूझ कुछ भी ना रहा, जब आज हो तुम रूबरू 

बस काम की और काज की ही बात कब से चल रही 
पर क्या करू ? तुमको अलग कुछ जिक्र ही भाता नही 

जो बस चले मेरा अगर, दिन भर यही बैठे रहे 
ना हो जुबाँ से बात भी, सब कुछ निगाहों से कहे 

पर दो मिनट में तुम कहोगे, "देर काफी हो गयी" 
तुम टोकने से पहले ही मैं खुद कहू, "निकले अभी" 

अब उठ गए, तो सूझती हैं सैंकडों बातें भली 
अफसोस, अब बस दो कदम पर है जुदा अपनी गली 

मदहोश रह लू आज, ख्वाबों का खिला जो गुलसिताँ 
आए न आए फिर कभी ऐसा महूरत, क्या पता ? 

- अनामिक 
(०२-०८/१२/२०१६) 

04 दिसंबर 2016

ठीक है

रचता गया मैं तारिफों के फूल उसकी राह में
उसने कहा बस, "ठीक है"
लिखता गया कितने सुहाने गीत उसकी चाह में
उसने कहा बस, "ठीक है"

उसके लबों मुस्कान लाने की सदा की कोशिशें
मांगे बिना करता रहा पूरी सभी फर्माइशें
जो बन सका, सब कुछ किया उसकी फिकर, पर्वाह में
ना लब्ज कम पडने दिए उसकी स्तुती, वाह-वाह में
उसने कहा बस, "ठीक है"

उसकी हथेली में सजा दू चाँद-तारें भी अगर
रुख मौसमों का मोडकर ला दू बहारें भी अगर
वो बस कहेगी, "ठीक है"
मैं तितलियों से रंग चुराकर जिंदगी उसकी भरू
मैं बिजलियों को तोड उसके पैर की पायल करू
वो बस कहेगी, "ठीक है"

वो है अगर यूँ बेकदर, सब जानकर भी बेखबर
मैं सोचता हूँ, बस हुआ.. अब मोड लू अपनी डगर
मैं भी कहू अब, "ठीक है"

- अनामिक
(३०/११/२०१६ - ०४/१२/२०१६)

21 नवंबर 2016

प्रतीक्षा

शांत आहे आज सागर
सुन्न आहे सांजवारा
लाट चंचल स्तब्ध आहे
मौन पांघरुनी किनारा
ये सखे परतून लवकर, अंत बघते ही प्रतीक्षा
बघ कसे अस्वस्थ सारे फक्त नसण्याने तुझ्या ॥ धृ ॥

रोजची ती पाखरांची धुंद किलबिल बंद आहे
पौर्णिमेच्या चांदव्याचे चांदणेही मंद आहे
आठवण येता तुझी होतो मनी नुसता पसारा
ये अता, चैतन्य पसरव गोड हसण्याने तुझ्या ॥ १ ॥

चार दिवसांचा दुरावा, युग उलटल्यासारखा
वाट बघुनी क्षीण झाल्या अंबरातिल तारका
बेचैन भिरभिरते नजर, पण सापडत नाही निवारा
तृप्त कर व्याकुळ मना अवचित बरसण्याने तुझ्या ॥ २ ॥

- अनामिक
(१३-२१/११/२०१६)

19 नवंबर 2016

क्या पसंद आए

खुदा ही तय करे, किसको किसी में क्या पसंद आए
किसे रंग-रूप, किसको मखमली काया पसंद आए

किसे तीखी निगाहें, शरबती आँखें लुभाती हैं
किसे लहराती जुल्फों का घना दर्या पसंद आए

किसी को गाल की लाली, किसे काजल सुहाता है
किसे नाजुक लबों की सुर्ख पंखुडियाँ पसंद आए

किसे नखरें पसंद, कोई अदाओं का है दीवाना
किसे सिंगार, झुमकें, चूडियाँ, बिंदिया पसंद आए

ये सब कुछ हो न हो तुझ में, मुझे ना फर्क पडता है
मुझे बस सादगी तेरी, शर्मो-हया पसंद आए

- अनामिक
(२८/१०/२०१६, १८,१९/१२/२०१६)

28 अक्टूबर 2016

अचानक ही नही होता

गज़ल का जनम कागज़ पर अचानक ही नही होता 
भला इन्सान यूँ शायर अचानक ही नही होता 

गिरे जब एक चिंगारी, कई पत्तें सुलगते हैं 
धुआँ खामोश जंगल भर अचानक ही नही होता 

न जाने मुश्किलें कितनी नदी है पार कर आती 
खुशी से चूर तब सागर अचानक ही नही होता 

सितारें जल रहे हैं चाँद की ख्वाइश में सदियों से 
उजागर रात में अंबर अचानक ही नही होता 

मोहब्बत है नशा ज़ालिम, ज़रा धीमे ही चढती है 
असर इसका भले दिल पर अचानक ही नही होता 

- अनामिक 
(२३/०९/२०१६ - २८/१०/२०१६)

22 अक्टूबर 2016

ख्वाब ख्वाब

अभी आँख लगने वाली थी,
की तेरे ख्वाबों के पंछी
आ भी गए सताने को
      तुझे भी कहा नींद है वहा
      इसी लिए भेजा है इनको
      दिल का हाल जताने को

ये भी कोई समय है भला ?
नींद सुकूँ की छोड-छाडकर
ख्वाब ख्वाब हम खेल रहे हैं
      तू इक सपना भेज नजर से
      इधर पकड लू मैं पलखों में
      ख्वाब हर तरफ फैल रहे हैं

ख्वाब रसीला.. ख्वाब शबनमी..
नटखट.. चंचल.. ख्वाब रेशमी..
ख्वाब नासमझ.. ख्वाब बावरा..
      ख्वाब गुदगुदाता.. शरारती..
      ख्वाब मुस्कुराता.. जज़बाती..
      ख्वाब महकता.. ख्वाब सुनहरा..

इतने सारे ख्वाब निराले
भला कहा से लाती है तू ?
इन्हे भेजना अब बस भी कर
      कल के लिए बचाकर रख कुछ
      बाढ आ गयी है ख्वाबों की
      ख्वाब ख्वाब ही हैं अब घर भर

- अनामिक
(२२/१०/२०१६)

19 अक्टूबर 2016

मैं गौर भी करता नही

यूँ ही किसी के गाँव की मैं सैर भी करता नही
पर ठान लू, मंजिल वही, तो देर भी करता नही 

मैं छेडता हूँ बात खुद तुझसे, समझ खुशकिस्मती
वरना किसी भी गैर पे मैं गौर भी करता नही 

हसके नजरअंदाज तेरी सब करू गुस्ताखियाँ
वरना किसी की गलतियों की खैर भी करता नही 

फुरसत मिले तो पढ कभी तुझ पे रची नज्में सभी
यूँ ही किसी पे पेश मैं इक शेर भी करता नही 

कुछ बात है दिल में, तभी पैगाम दोस्ती का लिखा
वरना किसी अंजान से मैं बैर भी करता नही 

- अनामिक
(१९/१०/२०१६) 

18 अक्टूबर 2016

कत्ल

वो भी क्या दिन था.. बडा अजब.. यादगार था 
हुआ छुरी-बंदूक बिना ही दिल पे वार था 

समझ न आया, घायल किस हथियार ने किया 
शायद इक सूरत, हसी, अदा का शिकार था 

बचाव में मैं ढाल उठाने से पहले ही 
तीर नजर का इन आँखों के आरपार था 

मुझे इल्म था, कत्ल मेरा होनेवाला है 
मगर पसंद के हाथों मरने का खुमार था 

उसे देख जी भर सुकून से मर भी जाता 
धडकन अटकी थी, पर तब कातिल फरार था 

हक्काबक्का रह गयी भरी महफिल सुनके 
मरके भी वही नाम लब पे बारबार था 

सोचा, आखिर अब तो बंद कर ही लू आँखें 
पर उसका ही सपना पलखों पे सवार था 

- अनामिक 
(१५-१७/१०/२०१६) 

13 अक्टूबर 2016

मखमली भास

अघटित आज घडले, दिवस खास होता
जिथे थांबला दोन क्षण श्वास होता 
मला पाहिले आज वळुनी तिनेही 
अहा, मखमली तो किती भास होता ॥ धृ ॥ 

कटाक्षात होता गुलाबी इशारा 
कसा रोमरोमात उठला शहारा 
मनी नाचला मोर, फुलला पिसारा 
नजर ती जणू रेशमी फास होता 
अहा, मखमली तो किती भास होता ॥ १ ॥ 

दिसे तेच स्वप्नी, वसे या मनी जे 
खरे मानले, भासले त्या क्षणी जे 
निळेशार मृगजळ सुन्या अंगणी जे 
अता तेच मिळवायचा ध्यास होता 
अहा, मखमली तो किती भास होता ॥ २ ॥ 

निथळलो मधुर गैरसमजात थोडा 
दिला कल्पनांचा पिटाळून घोडा 
तसा सुज्ञ, झालो जरा आज वेडा 
उद्या वास्तवाचाच सहवास होता 
अहा, मखमली तो किती भास होता ॥ ३ ॥ 

- अनामिक 
(१३/०९/२०१६ - १३/१०/२०१६) 

12 अक्टूबर 2016

हश्र क्या होगा

यूँ अपनी सादगी से ही वो दिल पे घाव करते हैं
उतर आए अगर सिंगार पे, तो हश्र क्या होगा ?

करे जब बात वो, खुशबू हवाओं में बिखरती है
तो सोचो, साँस में उनकी महकता इत्र क्या होगा ?

बँधी जुल्फों की लहरों से ही दिल में बाढ आती है
अगर सैलाब उनका खुल गया, तो कहर क्या होगा ?

दुआ में माँगता हूँ सिर्फ उनका चंद पलों का साथ
मिले जो उम्र की सोहबत, खुदा का शुक्र क्या होगा ?

गजब वो दिख रहे हैं आज, दिल की बात कहने दो
रुका हूँ मुद्दतों से, और मुझसे सब्र क्या होगा ?

- अनामिक
(०७,०८/१०/२०१६)

01 अक्टूबर 2016

छोटी छोटी बातें

भले दिखे ना तू अप्सरा जितनी खूबसूरत
चमक-धमक, सिंगार की नही तुझे जरूरत
बडी खासियत, बहोत अनोखे गुण कोई ना होते भी
दिल को छू जाती हैं तेरी छोटी छोटी बातें भी 

किसी राज सी गहरी कंचों जैसी आँखें
पलखों पे वो भीनी सी काजल की रेखा
नाजुक उंगली में इक सबसे अलग अंगूठी
माथे पे वो हलका सा कुमकुम का टीका
क्लिप से कैद कर रखा वो जुल्फों का सैलाब
जूही की कलियों जैसे वो नन्हे से लब 

रहन-सहन में बसी सादगी 
लिबास से झलकती नजाकत
खोए रहने को खुद का जग
हर काम में लगन और शिद्दत
शांत शख्सियत है वैसे, पर
दोस्तों संग बहोत चहचहाहट 

और भला क्या क्या बातें दिल में धीमे से घर करती है
जैसे धरती में बारिश की इक-इक बूँद उतरती है
किसी बीज से अंकुर उगने काफी हैं चंद बरसाते भी
वैसे दिल छूती हैं तेरी छोटी छोटी बातें भी 

- अनामिक
(१६/०९/२०१६ - ०१/१०/२०१६) 

29 सितंबर 2016

नदी जिंदगी की

नदी जिंदगी की बही जा रही है
न जाने, गलत या सही जा रही है

भवर, आँधियाँ, बाढ, सूखा, बवंडर
सितम मौसमों के सही जा रही है

उछलकर, गरजकर, कभी शांत बहकर
बिना लब्ज सब कुछ कही जा रही है

पसंद की सभी मंजिलों को भुलाकर
न चाहा जहा, ये वही जा रही है

गलत ही सही, बस यही है तसल्ली
रुके बिन कही ना कही जा रही है

- अनामिक
(१४-२९/०९/२०१६)

23 सितंबर 2016

अंतर

विरून जाऊ दे अता अंतर तुझ्या-माझ्यातले
मिळून करुया दूर चल अडसर तुझ्या-माझ्यातले

येते मनी भरती तुझ्या हसण्यामुळे, रुसण्यामुळे
दबवू उसळणारे कसे सागर तुझ्या-माझ्यातले

घुसमट किती ही वाढली लटक्या अबोल्याने तुझ्या
चल शिंपडू गप्पांतुनी अत्तर तुझ्या-माझ्यातले

झटकून टाकू जळमटे किंतू-परंतूंची जुन्या
मिटवू अता संदिग्धता, जर-तर तुझ्या-माझ्यातले

त्या रेशमी प्रश्नास दडवावे किती हृदयामधे
ओठात येऊ दे खरे उत्तर तुझ्या-माझ्यातले

- अनामिक
(१६-२२/०९/२०१६)

07 सितंबर 2016

कभी न सोचा था

फिजूल थे जो लम्हें, उनकी अब खल रही कमी है क्यों ?
जाल लगे थे जो धागें, अब लग रहे रेशमी हैं क्यों ?

कभी न सोचा था, जो किस्सें कभी याद भी आएंगे
आज उन्ही बातों की दिल में इतनी भीड जमी है क्यों ?

अपनी धुन में मस्त मगन सी बेफिकर चल रही थी जो
आज किसी अंजान मोड पे यूँ जिंदगी थमी है क्यों ?

कुछ न मायने रखते थे जो, गैरों में जिनकी गिनती थी
आज बेसबब ही पलखों पे उनके लिए नमी है क्यों ?

- अनामिक
(२६/०८/२०१६ - ०२/०९/२०१६)

01 सितंबर 2016

दिल-दिमाग की जंग

दिल-दिमाग की जंग में आखिर होगी किसकी जीत ?
इसी कश्मकश में रहता हूँ, जबसे हुई है प्रीत                 ॥ धृ ॥

दिल नादानी की फिराक में, दिमाग वैसे शरीफ है
दिल गुम है सपनें बुनने में, दिमाग सच से वाकिफ है
दिमाग देने लगे नसीहत, पर दिल गाए गीत                 ॥ १ ॥

दिल बोले, "उसके आगे से गुजर, शुरू कर आँखमिचोली"
दिमाग बोले, "अनदेखा कर, कदम मोड ले, बदल ले गली"
दिल बोले, "उसे देखकर मुस्कुरा जरा, पल जाए बीत"        ॥ २ ॥

दिल बोले, "बातें कर उससे", दिमाग बोले, "चुप्पी धर"
दिल बोले, "कुछ भेज संदेसा", दिमाग बोले, "जरा सबर कर"
दिल पूछे, "इतना सोचा तो कैसे मिलेगा मीत ?"            ॥ ३ ॥

दिल जलता रहता है भीतर, दिमाग कसक बुझाता है
दिल फुसलाता, उकसाता है, दिमाग फिर समझाता है,
"जो करता है पहल, उसीकी मात.. यही है रीत"             ॥ ४ ॥

- अनामिक
(२५/०८/२०१६ - ०१/०९/२०१६)

30 अगस्त 2016

घडणार आहे शेवटी

अडवा किती, जे व्हायचे, घडणार आहे शेवटी
तोडून पिंजरा पाखरू उडणार आहे शेवटी

चुकतात रस्ता सर्व जण.. थांबेल जो, हरवेल तो
हुडकेल त्याला मार्ग सापडणार आहे शेवटी

संयम-विवेकाच्या किती बेड्यांमधे जखडाल मन ?
मोहात ते कुठल्यातरी पडणार आहे शेवटी

फुलपाखराचा गंध-रंगांचा सुटावा छंद का ?
त्याचा कळीवर जीव तर जडणार आहे शेवटी

ठरवून जुळती बंध का ? झटकून तुटती पाश का ?
टाळाल ज्याला, तोच आवडणार आहे शेवटी

लपवा कितीही भावना, ओठी न आणा शब्दही
रहस्य डोळ्यांतून उलगडणार आहे शेवटी

कान्हा फिरू दे गोपिकांसंगेच मुरली वाजवत
तो सूर राधेलाच पण भिडणार आहे शेवटी

- अनामिक
(२७-३०/०८/२०१६)

फिकीर नाही

कुणी असावे, कुणी नसावे, फिकीर नाही
दुर्लक्षावे, कुणी पुसावे, फिकीर नाही

ना मोहाच्या बेड्या, ना भवपाश कुणाचे
कुणी हसावे, कुणी रुसावे, फिकीर नाही

दार मनाचे सताड उघडे, खुलेच अंगण
कुणी निघावे, कुणी बसावे, फिकीर नाही

कुणी पाठ फिरवावी, द्यावा कुणी परिचय
कुणी लपावे, कुणी दिसावे, फिकीर नाही

निबर जाहलो नात्यांचे रिचवून हलाहल
गोंजारावे, कुणी डसावे, फिकीर नाही

- अनामिक
(०८-३०/०८/२०१६)

09 अगस्त 2016

विकार

चिंब धुंद वर्षेचा झालो शिकार आहे
जिवास जडला नवा हवासा विकार आहे

नकळत झाला काळजावरी घाव मखमली
कुणी खुपसली मधाळलेली कट्यार आहे

सुप्त अंतरी सप्त-सूर झंकारुन गेले
कुणी छेडली आर्त मनाची सतार आहे

कुणी शिंपली उमेद हिरमुसल्या स्वप्नांवर
पुन्हा नव्याने जगावयाचा विचार आहे

किती भासला क्षुल्लक, पण रुतल्यावर कळले
नजरेचा तो तीर किती धारदार आहे

चलाख आहे गनीम, की मग मीच वेंधळा
धरण्यापूर्वीच ढाल वार आरपार आहे

इतका मोहक, लोभस आहे समोर शत्रू
हसत हसत मी हरायलाही तयार आहे

- अनामिक
(०७-०९/०८/२०१६)

29 जुलाई 2016

बरसात

नशीली है अदा बरसात की, रुत है बहकने की
जरूरत है मगर यारों जरा बचने, संभलने की
इशारा है मिला, जमकर गिरेंगी इश्क की बूँदें
बडी संभावना है अब अचानक दिल फिसलने की ॥ धृ ॥

जमेंगे बादलों के झुंड, चलाने बाण बिजुरी के
भिगा देंगे तुम्हें, जितना छिपो फिर आड छत्री के
बचेगी फिर न कुछ उम्मीद दिल का मर्ज टलने की
बडी संभावना है..                                 ॥ १ ॥

सजेगी बाग दुलहन सी, पहन साडी गुलाबों की
तुम्हें छूने उडेंगी तितलियाँ रंगीन ख्वाबों की
रखो दिल सख्त जितना भी, है गुंजाइश पिघलने की
बडी संभावना है..                                 ॥ २ ॥

- अनामिक
(१३/०६/२०१६ - २९/०७/२०१६)