पहेलियाँ ही पहेलियाँ हैं
शख्सों की, शख्सियतों की
चेहरों के परदों के पीछे छुपी हुई असलियतों की
चलती-फिरती पहेलियाँ हैं इन्सानों के लिबास में
उलझ न जाओ खुद ही इनको सुलझाने के प्रयास में
किसको जानो ? कितना जानो ?
जिसको भी, जितना भी जानो..
जितनी भी नापो गहराई, उससे भी गहरा पानी है
जितनी भी मानो सच्चाई, बिलकुल अलग कहानी है
एक पहेली बूझो तो, झटसे दूजी भी हाजिर है
जिसको जितना समझो भोला, वो उतना ही शातिर है
प्याज की घनी परतों जैसे
सारे परदें खुल जाए जब
मन में थी जो छवी बनी,
उससे कुछ ना मिल-जुल पाए जब
जितनी भी दो मन को तसल्ली
सुद-बुद से समझी और परखी जितनी भी झुठला दो बातें
सच तो सच ही आखिर है
यहा पहेली बनकर जीने में हर कोई माहिर है
- अनामिक
(२६,२७/०५/२०१९)
27 मई 2019
पहेलियाँ
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हिंदी - गीत,
Collection - Paheli,
Collection-Paheli
17 मई 2019
लिखेंगे और ज्यादा
रहे स्याही-कलम जब तक.. लिखेंगे और ज्यादा
न हो सपनें खतम जब तक.. लिखेंगे और ज्यादा
खिले खुशियाँ, या बरसे गम.. लिखेंगे और ज्यादा
रहे हम कल, रहे ना हम.. लिखेंगे और ज्यादा
किसी मुस्कान की सरगम.. किसीके नैन की शबनम
किसीकी जुल्फ का रेशम.. लिखेंगे और ज्यादा
कोई पढकर सराहे.. तो लिखेंगे और ज्यादा
या पढना भी न चाहे.. तो लिखेंगे और ज्यादा
जले दिल की शमा जब तक.. लिखेंगे और ज्यादा
न छू ले आसमाँ जब तक.. लिखेंगे और ज्यादा
- अनामिक
(१६/०५/२०१९)
न हो सपनें खतम जब तक.. लिखेंगे और ज्यादा
खिले खुशियाँ, या बरसे गम.. लिखेंगे और ज्यादा
रहे हम कल, रहे ना हम.. लिखेंगे और ज्यादा
किसी मुस्कान की सरगम.. किसीके नैन की शबनम
किसीकी जुल्फ का रेशम.. लिखेंगे और ज्यादा
कोई पढकर सराहे.. तो लिखेंगे और ज्यादा
या पढना भी न चाहे.. तो लिखेंगे और ज्यादा
जले दिल की शमा जब तक.. लिखेंगे और ज्यादा
न छू ले आसमाँ जब तक.. लिखेंगे और ज्यादा
- अनामिक
(१६/०५/२०१९)
Labels:
हिंदी - कविता
14 मई 2019
शर्त
मैं नींद अपनी हार दू.. सुख, चैन, राहत हार दू
तेरी गुलाबी मुस्कुराहट पे मैं जन्नत हार दू
दिल हार दू तुझपे सखी मैं.. होश, सुद-बुद हार दू
तेरी छवी के सामने खुदका वजूद हार दू
दौलत लगा दू दाव पे.. पूँजी, कमाई हार दू
तुझसे छिडी छोटी-बडी हर जंग-लडाई हार दू
दिन क्या ? महीनें क्या ? उमर भी गुजार दू तेरे लिए
मैं मुस्कुराकर जिंदगी भी हार दू तेरे लिए
क्या कुछ न न्योछावर करू मैं ?! फिर सखी तू ही बता..
तुझसे लगी इक "शर्त" भी क्या जीतने की चीज है ?!
कुछ जीतना ही है सखी, दिल में जगह मैं जीत लू
तेरी खुशी की, मुस्कुराहट की वजह मैं जीत लू
जजबात तेरे जीत लू मैं.. साथ तेरा जीत लू
बनने जनम का हमसफर मैं हाथ तेरा जीत लू
छू लू तेरे अरमान.. ख्वाबों का जहाँ मैं जीत लू
फिर पूछ लू वो इक सवाल.. जवाब "हाँ" मैं जीत लू
क्या कुछ नही है हारने को, जीतने को ?! फिर बता..
इक "शर्त" मामूली भला क्या जीतने की चीज है ?!
तू जीते, या मैं जीत लू.. ये दोनो इक ही बात है
तेरी खुशी ही, जीत ही मेरी मुकम्मल जीत है
- अनामिक
(१५/०२/२०१९ - ०४/०३/२०१९, १४/०५/२०१९)
12 मई 2019
पाहिले तुज ज्या क्षणी
थक्क झालो, दंग झालो
स्तब्ध झालो, गुंग झालो
मग्न झालो, मुग्ध झालो
तृप्त झालो, लुब्ध झालो
तप्त ग्रीष्माच्या दुपारी
सर बरसली श्रावणी
अप्सरेसम रुप तुझे ते
पाहिले मी ज्या क्षणी || धृ ||
भरजरी लावण्य लेवुन
तू अशी येता समोरी
उमटले प्रतिबिंब गहिरे
भारलेल्या अंतरी
स्वर्गलोकातून अवतरली
परी जणु अंगणी
थक्क झालो, दंग झालो
पाहिले तुज ज्या क्षणी || १ ||
चांदण्या पडल्या फिक्या
लखलख तुझ्या तेजामुळे
चंद्रमा ठरलीस तू
सगळेच उरले ठोकळे
पूर आला नक्षत्रांचा
काळोख्या तारांगणी
थक्क झालो, दंग झालो
पाहिले तुज ज्या क्षणी || २ ||
श्वास अडला चार घटका
थांबला हृदयात ठोका
राहिले उघडेच डोळे
जणु विजेचा सौम्य झटका
मी कसे शुद्धीत यावे ?
काढे ना चिमटा कुणी
थक्क झालो, दंग झालो
पाहिले तुज ज्या क्षणी || ३ ||
- अनामिक
(११-२२/०३/२०१९, १२/०५/२०१९)
स्तब्ध झालो, गुंग झालो
मग्न झालो, मुग्ध झालो
तृप्त झालो, लुब्ध झालो
तप्त ग्रीष्माच्या दुपारी
सर बरसली श्रावणी
अप्सरेसम रुप तुझे ते
पाहिले मी ज्या क्षणी || धृ ||
भरजरी लावण्य लेवुन
तू अशी येता समोरी
उमटले प्रतिबिंब गहिरे
भारलेल्या अंतरी
स्वर्गलोकातून अवतरली
परी जणु अंगणी
थक्क झालो, दंग झालो
पाहिले तुज ज्या क्षणी || १ ||
चांदण्या पडल्या फिक्या
लखलख तुझ्या तेजामुळे
चंद्रमा ठरलीस तू
सगळेच उरले ठोकळे
पूर आला नक्षत्रांचा
काळोख्या तारांगणी
थक्क झालो, दंग झालो
पाहिले तुज ज्या क्षणी || २ ||
श्वास अडला चार घटका
थांबला हृदयात ठोका
राहिले उघडेच डोळे
जणु विजेचा सौम्य झटका
मी कसे शुद्धीत यावे ?
काढे ना चिमटा कुणी
थक्क झालो, दंग झालो
पाहिले तुज ज्या क्षणी || ३ ||
- अनामिक
(११-२२/०३/२०१९, १२/०५/२०१९)
04 मई 2019
ऐ चाँद.. तू ही है पसंद
कल था महूरत खास कुछ
लंबी अमावस बाद फिर
जो छुप गया था बादलों में
कल मिला था चाँद फिर
गप्पें किए फिर खूब उसने
फिर मजाक-मजाक में
उसने ही छेडी बात खुद
की "कौन है तुमको पसंद ?"
मैं मन ही मन में हस दिया
फिर कश्मकश में पड गया
अब चाँद को कैसे कहू ?
"ऐ चाँद.. तू ही है पसंद
दिल के, नजर के दायरों में
शायरी के अक्षरों में
बासुरी के सब सुरों में
सिर्फ तू ही है बुलंद"
पर क्या करू ? मजबूर था
होकर जुबाँ पर नाम उसका मैं बता पाया नही
क्या ही पता ? सच जानकर,
होकर खफा अंबर में वो खिलना न बंद कर दे कही
मैं इसलिए बस मुस्कुराया
और बोला, "है कोई.."
खुद जान न पाए,
चाँद इतना नासमझ भी तो नही
- अनामिक
(०३,०४/०५/२०१९)
लंबी अमावस बाद फिर
जो छुप गया था बादलों में
कल मिला था चाँद फिर
गप्पें किए फिर खूब उसने
फिर मजाक-मजाक में
उसने ही छेडी बात खुद
की "कौन है तुमको पसंद ?"
मैं मन ही मन में हस दिया
फिर कश्मकश में पड गया
अब चाँद को कैसे कहू ?
"ऐ चाँद.. तू ही है पसंद
दिल के, नजर के दायरों में
शायरी के अक्षरों में
बासुरी के सब सुरों में
सिर्फ तू ही है बुलंद"
पर क्या करू ? मजबूर था
होकर जुबाँ पर नाम उसका मैं बता पाया नही
क्या ही पता ? सच जानकर,
होकर खफा अंबर में वो खिलना न बंद कर दे कही
मैं इसलिए बस मुस्कुराया
और बोला, "है कोई.."
खुद जान न पाए,
चाँद इतना नासमझ भी तो नही
- अनामिक
(०३,०४/०५/२०१९)
31 मार्च 2019
तुझे हासणे
नितळ, निरामय, निखळ, निरागस
दिलखुलास, निर्भेळ, निखालस
धुंद, मुक्त, निर्मळ अन् गोंडस
लहानग्यागत तुझे हासणे
दिलखुलास, निर्भेळ, निखालस
धुंद, मुक्त, निर्मळ अन् गोंडस
लहानग्यागत तुझे हासणे
गडगडणाऱ्या नभासारखे
कोसळत्या धबधब्यासारखे
झुळझुळत्या निर्झरासारखे
उसळत्या कारंज्यासारखे
सळसळत्या वादळासारखे
खळखळत्या सागरासारखे
स्वच्छंदी पाखरासारखे
कोसळत्या धबधब्यासारखे
झुळझुळत्या निर्झरासारखे
उसळत्या कारंज्यासारखे
सळसळत्या वादळासारखे
खळखळत्या सागरासारखे
स्वच्छंदी पाखरासारखे
रुणझुणत्या पैंजणांसारखे
गुणगुणत्या कोकिळेसारखे
चिमणीच्या चिवचिवीसारखे
कर्णमधुर भैरवीसारखे
लाटांच्या संगितासारखे
रिमझिमणाऱ्या सरींसारखे
कृष्णाच्या बासरीसारखे
गुणगुणत्या कोकिळेसारखे
चिमणीच्या चिवचिवीसारखे
कर्णमधुर भैरवीसारखे
लाटांच्या संगितासारखे
रिमझिमणाऱ्या सरींसारखे
कृष्णाच्या बासरीसारखे
किती मधुर अन् किती रसाळ
काजूकतली, खिरीसारखे
बासुंदी अन् पुरीसारखे
मोतीचूर लाडवासारखे
आंब्याच्या गोडव्यासारखे
रसरसल्या पोळ्यातुन टपटप
ओघळणाऱ्या मधासारखे
जखमेवर औषधासारखे
काजूकतली, खिरीसारखे
बासुंदी अन् पुरीसारखे
मोतीचूर लाडवासारखे
आंब्याच्या गोडव्यासारखे
रसरसल्या पोळ्यातुन टपटप
ओघळणाऱ्या मधासारखे
जखमेवर औषधासारखे
कोमेजलेल्या कळीला पुन्हा
फुलण्याच्या प्रेरणेसारखे
मरगळलेल्या आयुष्याला
जणू नव्या चेतनेसारखे
फुलण्याच्या प्रेरणेसारखे
मरगळलेल्या आयुष्याला
जणू नव्या चेतनेसारखे
असेच नेहमी चमकत राहो
बरसत राहो तुझे हासणे
पुनवेच्या चांदण्यासारखे
हिरव्यागार श्रावणासारखे
बरसत राहो तुझे हासणे
पुनवेच्या चांदण्यासारखे
हिरव्यागार श्रावणासारखे
- अनामिक
(२१/०२/२०१९, ३०/०३/२०१९)
(२१/०२/२०१९, ३०/०३/२०१९)
10 फ़रवरी 2019
ती
अल्लड, अवखळ अन् उत्श्रृंखल
निखळ, खोडकर, नटखट, चंचल
दिलखुलास, लहरी, स्वानंदी
बेधुंद, बेफिकिर, स्वच्छंदी
निडर, धीट, बिनधास्त, बेधडक
कधी विचारी, हळवी, भावुक
गोजिरवाणी, गोड, लाजरी
अन् लडिवाळ, लाघवी, हसरी
नाजुक, मोहक, मखमल, कोमल
दीप्त, प्रखर, तेजस्वी, उज्ज्वल
चैतन्याचा, उत्साहाचा
अन् ऊर्जेचा अखंड श्रावण
अनंत छटा व्यक्तिमत्वाच्या
असंख्य पैलू अस्तित्वाचे
पुरे न पडती विशेषणांचे रंग
तिचे करताना चित्रण
- अनामिक
(२४-३१/०१/२०१९, १०/०२/२०१९)
निखळ, खोडकर, नटखट, चंचल
दिलखुलास, लहरी, स्वानंदी
बेधुंद, बेफिकिर, स्वच्छंदी
निडर, धीट, बिनधास्त, बेधडक
कधी विचारी, हळवी, भावुक
गोजिरवाणी, गोड, लाजरी
अन् लडिवाळ, लाघवी, हसरी
नाजुक, मोहक, मखमल, कोमल
दीप्त, प्रखर, तेजस्वी, उज्ज्वल
चैतन्याचा, उत्साहाचा
अन् ऊर्जेचा अखंड श्रावण
अनंत छटा व्यक्तिमत्वाच्या
असंख्य पैलू अस्तित्वाचे
पुरे न पडती विशेषणांचे रंग
तिचे करताना चित्रण
- अनामिक
(२४-३१/०१/२०१९, १०/०२/२०१९)
09 फ़रवरी 2019
मिठास
शक्कर के दानों सी तेरी छोटीसी, पर मीठी बातें
नाजुक होंठों पर मिश्री की डलियों जैसी मुस्कुराहटें
लब्जों से चाशनी छलकती, नजरों में शरबत की नदिया
गुलाबजामुन से गालों पर शहद सी शर्म-हया की छींटें
इतनी ज्यादा मिठास तेरी
जितनी भी पीकर जी भरकर भर लू इन नैनों के प्यालें
इस दिल को ना मिले राहतें
जितनी कर लू बातें तुझसे
जितनी जी लू सोहबत तेरी
जितनी पी लू खूबसूरती
और बढे ये अजब प्यास है
मिठास ही ये मर्ज है दिल का
इलाज भी ये मिठास है
- अनामिक
(१७,१८/०१/२०१९, ०९/०२/२०१९)
नाजुक होंठों पर मिश्री की डलियों जैसी मुस्कुराहटें
लब्जों से चाशनी छलकती, नजरों में शरबत की नदिया
गुलाबजामुन से गालों पर शहद सी शर्म-हया की छींटें
इतनी ज्यादा मिठास तेरी
जितनी भी पीकर जी भरकर भर लू इन नैनों के प्यालें
इस दिल को ना मिले राहतें
जितनी कर लू बातें तुझसे
जितनी जी लू सोहबत तेरी
जितनी पी लू खूबसूरती
और बढे ये अजब प्यास है
मिठास ही ये मर्ज है दिल का
इलाज भी ये मिठास है
- अनामिक
(१७,१८/०१/२०१९, ०९/०२/२०१९)
06 फ़रवरी 2019
चाबी
मैं लाख लगा लू पेहरें दिल पे, तालें डालू जुबान पे
मैं जजबातों के तीर रोक लू इन पलखों की कमान पे
पर..
तेरे कदमों की आहट मैं
तेरी नजरों की हरकत में
तेरी हसीं मुस्कुराहट में वो जादूई खूबी है
और तेरे पास वो दो बातों की मिठास की चाबी है,
जिससे..
हर इक ताला खुल जाए
और हर इक पेहरा ढल जाए
हर पत्थर सख्त पिघल जाए
संभले जजबात फिसल जाए
मैं मुश्किल से परहेज करू तुझसे, पर तू आसानी से..
सब व्रत मेरे तुडवाती है तू अपनी इक शैतानी से
- अनामिक
(२७/११/२०१८, ०६/०२/२०१९)
मैं जजबातों के तीर रोक लू इन पलखों की कमान पे
पर..
तेरे कदमों की आहट मैं
तेरी नजरों की हरकत में
तेरी हसीं मुस्कुराहट में वो जादूई खूबी है
और तेरे पास वो दो बातों की मिठास की चाबी है,
जिससे..
हर इक ताला खुल जाए
और हर इक पेहरा ढल जाए
हर पत्थर सख्त पिघल जाए
संभले जजबात फिसल जाए
मैं मुश्किल से परहेज करू तुझसे, पर तू आसानी से..
सब व्रत मेरे तुडवाती है तू अपनी इक शैतानी से
- अनामिक
(२७/११/२०१८, ०६/०२/२०१९)
04 फ़रवरी 2019
सदाफुली
फुलपाखरासारखी चंचल
झुळझुळ झऱ्यासारखी अवखळ
इवल्या मुलासारखी अल्लड
अन् कारंज्यागत उत्श्रृंखल
श्रावण-सरींसारखी लहरी
हवेसारखी निखळ, खेळकर
नदीसारखी स्वच्छंदी, अन्
लाटांगत बेधुंद, बेफिकिर
चिऊसारखी अथक बोलकी
मधासारखी गोड, लाजरी
सदाफुलीसारखी सदैव
टवटवीत, स्वानंदी, हसरी
गुलाबासारखी मनमोहक
मोरपिसागत मखमल, कोमल
विजेसारखी प्रखर, तळपती
अन् तारकांसारखी तेजल
चैतन्याचा पाउस रिमझिम
प्रसन्नतेचा पूर निरंतर
उत्साहाची उदंड भरती
अमर्याद ऊर्जेचा सागर
किती रंग उपमांचे भरले
अपूर्ण तरिही वाटे चित्रण
शक्य नसे शब्दांनी करणे
तिच्या व्यक्तिमत्वाचे वर्णन
- अनामिक
(२४/०१/२०१९ - ०४/०२/२०१९)
04 जनवरी 2019
आगे चला
वो जंग लगी सब बेडियाँ
मैं तोडकर आगे चला
बेदर्द फर्जी दोस्तियाँ
मैं छोडकर आगे चला
सब मतलबी चेहरों से मैं
मुह मोडकर आगे चला
नकली, फरेबी सब मुखौटें
फाडकर आगे चला
अंधा भरोसा आँख से
मैं झाडकर आगे चला
खोखले भरम के बुलबुलें
मैं फोडकर आगे चला
बेजान रिश्तों के सडे शव
गाडकर आगे चला
मक्कार धोखेबाज जग से
दौडकर आगे चला
- अनामिक
(०१/०५/२०१८ - ०४/०१/२०१९)
मैं तोडकर आगे चला
बेदर्द फर्जी दोस्तियाँ
मैं छोडकर आगे चला
सब मतलबी चेहरों से मैं
मुह मोडकर आगे चला
नकली, फरेबी सब मुखौटें
फाडकर आगे चला
अंधा भरोसा आँख से
मैं झाडकर आगे चला
खोखले भरम के बुलबुलें
मैं फोडकर आगे चला
बेजान रिश्तों के सडे शव
गाडकर आगे चला
मक्कार धोखेबाज जग से
दौडकर आगे चला
- अनामिक
(०१/०५/२०१८ - ०४/०१/२०१९)
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हिंदी - कविता
12 अक्टूबर 2018
उड चला इक ख्वाब
इक ख्वाब पलखों से फिसलकर उड चला..
इक ख्वाब पलखों से फिसलकर उड चला दूजे नगर
इक ख्वाब आँखों से उछलकर चल पडा अपनी डगर
इक ख्वाब दिल की बंदिशों को तोडकर है उड चला
इक ख्वाब ठहरी ख्वाइशों को छोडकर है उड चला
वो गुदगुदी था, या चुभन ?
था सर्द ठंडक, या जलन ?
सच था, भरम, या झूठ था ?
तेजाब का वो घूँट था ?
रिमझिम खुशी की बारिशें ?
या दर्द का सैलाब था ?
जैसा भी था.. नायाब था
सबसे सलोना ख्वाब था
- अनामिक
(०५/०६/२०१८ - १२/१०/२०१८)
09 मई 2018
याद बाकी है कही
जो ढह गया पुल, बांधने की ख्वाइशें बिलकुल नही
बस इक पुराने जलजले की याद बाकी है कही
सब जख्म कब के भर चुके.. सब दर्द फीके पड गए
बस उनके गहरे दाग अर्सों बाद बाकी हैं कही
कब का हजम भी कर लिया उस दौर का जालिम जहर
कुछ नीम से कडवे पलों का स्वाद बाकी है कही
मजबूत ख्वाबों का महल.. गिर भी गया, अब गम नही
कमजोर, मलबे में दबी बुनियाद बाकी है कही
ना है खुदा से कुछ गिला.. जो ना दिया, अच्छा किया
बस अनसुनी, खारिज हुई फर्याद बाकी है कही
- अनामिक
(२६/१२/२०१७ - ०९/०५/२०१८)
19 मार्च 2018
बेमौसम बारिश
ये तारों की कुछ साजिश है,
या कायनात की ख्वाइश है ?
कुछ तो कारण है, वरना क्यों
बेमौसम छलकी बारिश है ?
बिजली की झनकार छेडकर
बूँदों में पैगाम भेजकर
रूठी धरती को मनाने की
आसमान की कोशिश है
अपनी मिट्टी के इत्तर से
सभी दिशाएँ महकाने की
बेकरार उस आसमान की
धरती से फर्माइश है
धरती भी अब भूलकर गिलें
क्षितिज पे रुके आसमान के
मुस्कुराते लग जाए गले
कुदरत की यही सिफारिश है
- अनामिक
(१९/०३/२०१८)
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08 मार्च 2018
छोड दू
तुम रूठ जाओ, मैं मनाऊ.. खेल ये चलता रहे
रूठो न इतना भी, की मैं थककर मनाना छोड दू
नजरें चुरा लो कुछ दफा.. कर लू नजरअंदाज भी
पर यूँ न फेरो मुह, की मैं नजरें मिलाना छोड दू
मैं कुछ कहू, कुछ पूछ लू.. सुनकर भी कर दो अनसुना
इतनी भी चुप्पी मत रखो, मैं बात करना छोड दू
पीछे चलो, आगे चलो.. धीमे चलो, भागे चलो
पर यूँ न मोडो कदम, की मैं साथ चलना छोड दू
- अनामिक
(२०/०२/२०१८ - ०८/०३/२०१८)
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03 मार्च 2018
ऐ चाँद पूनम के, बता..
तू दूर है, या पास है ?
तू गैर है, या खास है ?
तू जाम है, या प्यास है ?
ऐ चाँद पूनम के, बता..
तू ख्वाब है, या आस है ?
या दर्द का एहसास है ?
तू सच है, या आभास है ?
ऐ चाँद पूनम के, बता..
ये शबनमी तेरी किरन
है छाँव शीतल, या जलन ?
है नर्म रेशम, या चुभन ?
ऐ चाँद पूनम के, बता..
होकर नजर के सामने
तू बादलों के पार है
क्यों दर्मियाँ दीवार है ?
ऐ चाँद पूनम के, बता..
- अनामिक
(०१-०३/०३/२०१८)
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30 जनवरी 2018
शब्द आले, शब्द गेले
शब्द आले, शब्द गेले, शब्द बोलत राहिले
शब्द पडले, शब्द उठले, शब्द डोलत राहिले
शब्द मिटले, शब्द फुलले, शब्द बहरत राहिले
शब्द झडले, शब्द रुजले, शब्द उमलत राहिले
शब्द सुकले, शब्द भिजले, शब्द बरसत राहिले
शब्द स्वप्नांच्या सरींचे वार झेलत राहिले
शब्द खचले, शब्द विरले
शब्द लढले, शब्द हरले
शब्द बुडले, शब्द तरले, शब्द उसळत राहिले
वेदनांची रत्नमाला शब्द माळत राहिले
शब्द झुरले, शब्द रुसले
शब्द रडले, शब्द हसले
शब्द भुलले, शब्द फसले, शब्द भाळत राहिले
शब्द दगडी देवतांवर व्यर्थ उधळत राहिले
शब्द थकले, शब्द विटले
शब्द सजले, शब्द नटले
कालगंगेतून अविरत शब्द वाहत राहिले
मार्ग सारे खुंटले, पण शब्द चालत राहिले
- अनामिक
(१२-३०/०१/२०१८)
25 जनवरी 2018
काँच की दीवार
ये काँच की दीवार है मेरे-तुम्हारे दर्मियाँ
यूँ तो लगे नाजुक, मगर फौलाद से कुछ कम नही
इस को गिराने का खुदा की जादू में भी दम नही
इस छोर का, उस पार का सब कुछ दिखाई दे, मगर..
हैं बंदिशें दोनो तरफ आवाज के हर रूप पर
बातें, पुकारें, शोर, सुर, सिसकी, हसी, सरगम नही
इक दौर था, जब दो पलों की गुफ्तगू ही थी खुशी
अब तो महीनों की घनी खामोशी का भी गम नही
अब सच कहू, तो काँच की दीवार ही ये है सही
बंद खिडकियाँ खुलने की अब उम्मीद कम से कम नही
शायद पुकारोगे कभी, गलती से ही.. ये भ्रम नही
हाँ, वक्त से बढिया किसी भी जख्म पर मरहम नही
- अनामिक
(२३-२५/०१/२०१८)
31 दिसंबर 2017
कुछ रह गया, कुछ ढह गया
कुछ गुम गया, कुछ बच गया
कुछ गिर गया, कुछ रह गया
इस वक्त के सैलाब में
क्या कुछ न जाने ढह गया
कुछ कागजों की कश्तियाँ
कुछ काँच की नक्काशियाँ
इक सीपियों का ताजमहल
इक रेत का पुल बह गया
लिखता रहा, गाता रहा मैं
लब्ज ना पहुँचे कही
खामोश रहकर भी मगर
सन्नाटा क्या कुछ कह गया
बदमाशियों से बाज ना आयी
सितमगर जिंदगी
मैं भी तो कम जिद्दी नही
सब मुस्कुराकर सह गया
- अनामिक
(२९-३१/१२/२०१७)
22 दिसंबर 2017
तोहफा
सोच रहा हूँ, क्या दू तुमको ? तोहफा क्या लाजवाब दू ?
झिलमिल झुमकें, छनछन पायल, या नाजुक सा गुलाब दू ?
देने को तो खरीदकर दू मैं तो पूरी दुकान भी
तोहफें रखने कम पड जाए तुमको अपना मकान भी
शायर हूँ पर.. सोचता हूँ, लब्जों में रंगी स्याही दू
तुम पर लिखी तमाम नज्मों से बढकर तोहफा क्या ही दू ?
स्वीकार करो या ठुकराओ.. तुम करना जो भी लगे सही
ये गीत मगर गूँजेंगे ही.. ये रसीद के मोहताज नही
- अनामिक
(२३/१२/२०१६ - २२/१२/२०१७)
21 दिसंबर 2017
ख्वाब का पुल
हर रात निंदिया की नदी पर
ख्वाब का पुल बांधकर
भरकर सितारें जेब में
मिलने निकलता हूँ तुम्हे
तुम रात का काजल लगाकर
चाँद बालों में सजाकर
ताज फूलों का पहनकर
राह में नजरें बिछाकर
मेरी प्रतीक्षा में नदी के
पार रहती हो खडी
दो नैन बेचैनी भरे
सौ बार तकते हैं घडी
छुपते हुए पुल लांघकर मैं चाँदनी की छाँव से
पीछे तुम्हारे आ खडा रहता हूँ हलके पाँव से
होले से हाथों से तुम्हारे नैन ढक देता हूँ मैं
और सब सितारें जेब से सर पर छिडक देता हूँ मैं
वो स्पर्श मेरा जानकर
वो धडकनें पहचानकर
नाजुक लबों पर चैन की भीनी हसी खिलती हुई
तरसी निगाहों में सितारों की चमक घुलती हुई
होकर खुशी में चूर गालों पर हया चढती हुई
बेताब साँसों में सुरीली रागिनी छिडती हुई
उस इक झलक के, उस हसी के,
उस हया के वासते
मैं इक नदी, इक पुल भला क्या
आँधियाँ क्या, जलजला क्या
लाख पुल भी बांधकर
हर जलजले को लांघकर
मैं रोज ही मिलने तुम्हे
आऊ किसी भी रासते
बस रोज यूँ ही राह तकना
उस नदी के पार तुम
बेसब्र पलखों में सजाकर
इश्क का गुलजार तुम
- अनामिक
(०९/०४/२०१७ - २१/१२/२०१७)
20 दिसंबर 2017
हादसा
हाँ, हो चुका था हादसा इक, जाने-अनजाने सही
पर जो हुआ, वैसा ही करने का इरादा था नही
कुछ वक्त की बदमाशियाँ, कुछ चाल थी हालात की
कुछ खेल था संजोग का, कुछ थी खता जजबात की
मैं बस समय की उस नदी में नाव सा बहता गया
बहाव के सब पत्थरों के घाव फिर सहता गया
ना जख्म का गम, बस खुदा से है गिला इस बात का
अपनी सफाई का मुझे मौका न इक भी दे सका
पर आज भी वो हादसा खुद की नजर में माफ है
दिल साफ था उस रोज भी, और आज भी दिल साफ है
- अनामिक
(१३,२०/१२/२०१७)
07 दिसंबर 2017
नजरें
अल्हड नजरें, चंचल नजरें.. जजबातों से बोझल नजरें
चुपके से दीदार पिया का करने हर पल बेकल नजरें
इन नजरों से मिल जाने बेचैन भटकने वाली नजरें
भटक-भटक इन नजरों के ही पास अटकने वाली नजरें
टकराए जब, शरमाकर खुद को ही झुकाने वाली नजरें
नर्म अधखुली पलखों से फिर धीमे मुस्काने वाली नजरें
जान-बूझकर टकराकर भी, सोच-समझकर भिडकर भी
गलती से ही टकराने का आभास जताने वाली नजरें
लाख छुपाकर भी सब कुछ ही साफ बताने वाली नजरें
इन नैनों के रस्ते दिल के पार उतरने वाली नजरें
कटार जैसी धार से अपनी घायल करने वाली नजरें
कभी रूठकर, कभी सताने खामखा मुडने वाली नजरें
ज्यादा दूरी सही न जाकर फिर से जुडने वाली नजरें
दो नैनों से सौ तरहा के रूप दिखानेवाली नजरें
लब्जों बिन मीठी बोली से प्रीत सिखाने वाली नजरें
- अनामिक
(२५/११/२०१७ - ०७/१२/२०१७)
04 दिसंबर 2017
मरम्मत
कब बिगडी, और कैसे बिगडी कुछ चीजें, ये अहम नही
अहम यही है, उनकी कब किस तरह मरम्मत की जाए
इसकी गलती, उसकी गलती.. किसकी गलती ? फिजूल है
कबूल करके गलती सुधारने की हिम्मत की जाए
कई गुत्थियाँ बस बातों से सुलझाई जा सकती है
जुबाँ की कैंची पे काबू पाने की जहमत की जाए
इक नन्हा सा अंकुर भी कल महावृक्ष बन सकता है
मगर लगन से हर आँधी से उसकी हिफाजत की जाए
अपनों के हुनर, गुणों की तो सभी सराहना करते हैं
पर उनके सब दोष, खामियों से भी मोहब्बत की जाए
- अनामिक
(०१,०२,०४/१२/२०१७)
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गिलें
गलतफहमियों के अंबर में सूझ-बूझ के बादल आए
एक कदम था अंतर, करने पार जहाँ हम चल आए
वैसे तो कुछ वजह नही थी बेमतलब की अनबन की
करने गए सुलह, तो सदी पुराने गिलें निकल आए
आ न रहा था समझ, भला कैसे शिकस्त दे दुश्मन को
थूक दिया गुस्सा, तो दिमाग में दोस्ती के हल आए
निकले थे हम दुनिया को अपनी नसीहतों से रंगने
दिखा आइना चलते चलते, खुद को ही फिर बदल आए
- अनामिक
(०२-०४/१२/२०१७)
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30 नवंबर 2017
सौदा
क्यों बिन फायदे का रिश्ता जोडे ?
चल इक सौदा करते हैं
जो पास खजाना है दोनों के,
आधा-आधा करते हैं
तू धूप सुनहरी ले आना
मैं बरसातें ले आऊंगा
कुछ नजरानों के बदले में
कुछ सौगातें ले आऊंगा
मैं तेरी पतझड ले लूंगा
तू मेरी बहारें रख लेना
मैं तेरे अंधेरें पी लूंगा
तू मेरे सितारें रख लेना
हर दर्द उठा लूंगा तेरा
मेरी मुस्कानें रख लेना
गा लूंगा तेरी चुप्पी भी
तू मेरे तरानें रख लेना
मैं तेरी आँधियाँ झेलूंगा
तू मेरी हवाएँ रख लेना
मैं तेरी बलाएँ ले लूंगा
तू मेरी दुआएँ रख लेना
तनहाई अपनी दे देना
पर मेरी सोहबत रख लेना
नफरत भी देना, फिकर नही
पर मेरी मोहब्बत रख लेना
तू जो बोले दिल, दे देना
तू जो बोले दिल, रख लेना
मंजूर मुझे है सौदा, बस..
दिल के बदले दिल रख लेना
- अनामिक
(२५-३०/११/२०१७)
29 नवंबर 2017
कुछ करतब हो तो बतलाओ
ये बात समझ के बाहर है
क्या हुनर भला शानदार है ?
खासियत कौनसी है तुम में ?
जो गुरूर सर पर सवार है
मैं जी भरकर तारीफ करू
मैं सर-आँखों पर भी रख लू
कुछ कला, कसब तो दिखलाओ
कुछ करतब हो तो बतलाओ
तुम हुस्नपरी हो, तो मानू
तुम जादूगरी हो, तो मानू
इक साधारण सी सूरत लेकर
चार किलो श्रुंगार चढाकर
दो कौडी की घमंड का
कुछ मतलब हो तो बतलाओ
इन्सान अगर हो, इन्सानों की
तरह जमीं पर चला करो
हर वक्त गगन में रहने वाले,
तुम रब हो तो बतलाओ
जो मान उचित है, बेशक दू
पर काबिलियत के नुसार ही
बस लडकी हो तो भाव चाहिए
ये दलील मंजूर नही
मैं दोस्त बनूंगा खुद होकर
गप्पें कर लूंगा जी भरकर
जब बेवजूद ये अकड, हेकडी
गायब हो तो बतलाओ
कुछ करतब हो तो बतलाओ
- अनामिक
(२८,२९/११/२०१७)
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23 नवंबर 2017
चुन लिया, बस चुन लिया
यूँ तो न रेशम और मखमल की कमी बाजार में
इक ख्वाब धागों से रुई के बुन लिया, बस बुन लिया
यूँ तो न अंबर में पडा है चाँद-तारों का अकाल
पर इक दफा, ग्रह ही सही, जो चुन लिया, बस चुन लिया
वैसे न मानी बात औरों की, न खुद की भी कभी
इक बार पर जो हुक्म दिल का सुन लिया, बस सुन लिया
हर गैर से रिश्ता बनाने की मेरी फितरत नही
इक बार अपनों में किसी को गिन लिया, बस गिन लिया
- अनामिक
(०६/०६/२०१७, २३/११/२०१७)
07 नवंबर 2017
रूबरू
हैं वक्त की बदमाशियाँ,
फिर लौट आयी वो घडी
जिस मोड से मैं थी मुडी,
उस मोड पे फिर हूँ खडी
रंगीन ख्वाबों के सफर में अतीत फिर है रूबरू
फिर लौट आयी वो घडी
जिस मोड से मैं थी मुडी,
उस मोड पे फिर हूँ खडी
रंगीन ख्वाबों के सफर में अतीत फिर है रूबरू
इक हादसे में खो दिया, वो मीत फिर है रूबरू ॥ मुखडा ॥
बीते समय की पटरियों पे ट्रेन यादों की चले
दो बोगियाँ होकर जुदा भी ना मिली थी मंजिलें
कितनी भी खोलू खिडकियाँ,
गुजरा नजारा ना दिखे
जो रह गया पीछे कही
स्टेशन दुबारा ना दिखे
खिलकर लबों पे चुप हुआ, वो गीत फिर है रूबरू
इक हादसे में खो दिया, वो मीत फिर है रूबरू ॥ अंतरा-१ ॥
दो बोगियाँ होकर जुदा भी ना मिली थी मंजिलें
कितनी भी खोलू खिडकियाँ,
गुजरा नजारा ना दिखे
जो रह गया पीछे कही
स्टेशन दुबारा ना दिखे
खिलकर लबों पे चुप हुआ, वो गीत फिर है रूबरू
इक हादसे में खो दिया, वो मीत फिर है रूबरू ॥ अंतरा-१ ॥
वो गैर संग खुशहाल है, ये बात अब क्यों खल रही ?
खुद ही बुझाई थी कभी, वो आग फिर क्यों जल रही ?
कुछ गलतियाँ, नादानियाँ,
कुछ जिद-घमंड, शिकवें-गिलें
जड से जला देती अगर
होते न पैदा फासलें
वो हार मेरी, गैर की बन जीत फिर है रूबरू
खुद ही बुझाई थी कभी, वो आग फिर क्यों जल रही ?
कुछ गलतियाँ, नादानियाँ,
कुछ जिद-घमंड, शिकवें-गिलें
जड से जला देती अगर
होते न पैदा फासलें
वो हार मेरी, गैर की बन जीत फिर है रूबरू
इक हादसे में खो दिया, वो मीत फिर है रूबरू ॥ अंतरा-२ ॥
- अनामिक
(०१-०७/११/२०१७)
(०१-०७/११/२०१७)
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31 अक्टूबर 2017
चोट
गुमसुम पडी थी मुद्दतों से, शाख दिल की हिल गयी
जो लाख टाली थी नजर, वो फिर नजर से मिल गयी
सौ कोशिशों, सौ मरहमों से जख्म था भरने लगा
इक जिक्र क्या उनका हुआ, वो चोट फिर से छिल गयी
जकडे रखी थी नैन में इक ख्वाब की तितली हसीं
भवरा भरम का क्या दिखा, पर फडफडाकर खुल गयी
बेताब थे सब लोग सुनने, जब तलक लब थे सिले
दुखडा जरा क्या गा दिया, उठकर भरी महफिल गयी
वो इक सुहाना हादसा.. घटकर सदी भी हो चुकी
पर आज भी उस सांझ की वो याद फिर से छल गयी
- अनामिक
(०६-३१/१०/२०१७)
29 अक्टूबर 2017
काळोखाच्या किती छटा
रात्र नेसुनी जशी उजळते शुभ्र चंद्रकोर अंबरी
तसा शोभतो काळोखाचा रंग भरजरी तुझ्यावरी
केसांमधल्या काळ्या लाटा
डोळ्यांचे काळोखे डोह
पापण्यांतली काळी नक्षी
कसा आवरू त्यांचा मोह
त्यात तुझा मखमाली काळाशार राजबिंडा पेहराव
वाढवतो नजरेची तृष्णा, मुग्ध मनाचा घेतो ठाव
त्यावर इवल्या चमचम टिकल्या,
नक्षत्रांचा जणू बहर
किती पाहिले वेष तुझे,
ना एकालाही याची सर
पंखांशिवाय, छडीविनाही भासतेस तू यात परी
काळोखाच्या किती छटा त्या खुलून दिसती तुझ्यावरी
- अनामिक
(२४-२९/१०/२०१७)
30 सितंबर 2017
कोडी
चंद्र होता रात्रवेडा, रात्र होती सूर्यवेडी
सूर्य होता सांजवेडा, सांज होती चंद्रवेडी
ओढ कोणाला कुणाची, आणि तिटकारा कुणाचा
अंतरिक्षाला स्वतःलाही न सुटली गूढ कोडी ॥ धृ ॥
वेध धूसर धूमकेतूचे खुळ्या पृथ्वीस होते
कैक शतकांची प्रतीक्षा, मीलनाचे स्वप्न खोटे
एकदा फिरकून तो काढून गेला फक्त खोडी ॥ १ ॥
मोह धरणीला उन्हाचा, चांदण्याचीही तृषा
कैफ थंडीचा गुलाबी, पावसाचीही नशा
भोग इतके चाखले की, राहिली न कशात गोडी ॥ २ ॥
आजन्म सूर्याभोवती पिंगा ग्रहांनी घातला
पण सूर्य अंधारात अज्ञातास धुंडत राहिला
जिथल्या तिथे सगळेच, पण जमली कुणाचीही न जोडी ॥ ३ ॥
- अनामिक
(१६-३०/०९/२०१७)
11 सितंबर 2017
तालाब
हाँ, दोष है तालाब का, जो खुद ही मचला था कभी
अब तक न स्थिर जो हो सका, आए गए मौसम सभी
वो खुद-ब-खुद ही शांत हो जाता, न होता, क्या पता ?
पर चंद कंकड फेकने की तो किसी की थी खता
साबित न कुछ करना, न अब देनी दलीलें अनकही
जिसने शरारत की, उसे एहसास है, काफी यही
मालूम है तालाब को अपनी हदें, ना हो फिकर
उडने न देगा छींट भी तट पर खडे नादान पर
- अनामिक
(०७-११/०९/२०१७)
04 सितंबर 2017
ये रात है.. ये राह है..
ये रात है.. ये राह है.. ये साथ है.. ये चाह है..
इस चाह की इस राह पर हम तुम सनम गुमराह हैं
ये बादलों की बोतलों में बिजलियों के जाम हैं
पी ले इन्हे, ये दिल बहकने का रसीला माह है
ना है जमाने की फिकर, ना हैं समय की बंदिशें
कसकर मुझे लिपटी हुई नाजुक तुम्हारी बाह है
हम बेसबब चलते रहे, मंजिल मिले, ना भी मिले
खो भी गए इक-दूसरे में, क्या हमें परवाह है ?
थककर कभी रुक भी गए, भरना मुझे आगोश में
उस मखमली आगोश सी दूजी न कोई पनाह है
- अनामिक
(०६/०८/२०१७ - ०४/०९/२०१७)
31 अगस्त 2017
अखेरचे हे गीत सखे
हे गीत कदाचित अखेरचे
यानंतर तुझे न शब्द सखे
जे द्वार तुझ्यास्तव सताड उघडे
करेन म्हणतो बंद सखे
उतरेल जरी पानावर शाई
तुझे न येइल नाव सखे
चालेल अक्षरांचा प्रवास, पण
तुझे न येइल गाव सखे
उठतील कल्पनांच्या लाटा
पण नसेल तुझा तरंग सखे
फिरतील कुंचले स्वप्नांचे
नसतील तुझे पण रंग सखे
डुंबेन विचारांच्या डोही
पण तुझे नसेल प्रतिबिंब सखे
झरतील सरीही कवितांच्या
नसतील तुझे पण थेंब सखे
मोगरा सुरांचा दरवळेल
पण नसेल तुझा सुगंध सखे
घुमतील बासरीचे स्वरही
पण नसेल तुझा निनाद सखे
ते स्वप्न भरजरी होते, पण
वास्तवास नव्हता वाव सखे
थांबवतो अता खुंटलेला हा
बुद्धिबळाचा डाव सखे
- अनामिक
(२५-३१/०८/२०१७)
27 अगस्त 2017
सखे
मी करेन म्हणतो कैद तुला, शब्दांचे घेउन रंग सखे
पण नजर तुला भिडताच तुझ्या रंगातच होतो गुंग सखे
तू समोर असता, सांग सखे, मी भान स्वतःचे कसे जपू ?
आरस्पानी अस्तित्व तुझे मी कवितेमधुनी कसे टिपू ? ॥ धृ ॥
ही वीज तुझ्या डोळ्यांमधली
ही जुई तुझ्या ओठांवरली
ही सांजेची लाली गाली
हा सूर्याचा ठिपका भाळी
हा मोरपिसासम स्पर्श फुलवतो मनी सहस्त्र तरंग सखे
मी भान स्वतःचे कसे जपू, तू समोर असता ? सांग सखे ॥ १ ॥
हा वादळवारा केसांचा
हा धुंद मोगरा श्वासांचा
हा देह चिमुकला चिमणीचा
पण डौल जणू फुलराणीचा
मी काय लिहू, अन् काय नको ? उपमांची मोठी रांग सखे
मी भान स्वतःचे कसे जपू, तू समोर असता ? सांग सखे ॥ २ ॥
हे गूढ इशारे नजरांचे
हे गहन भाव चेहऱ्यावरले
हे गुपित मंद स्मितहास्याचे
हे लक्ष शब्द मौनामधले
मी खोल उतरतो तुझ्या अंतरी, तरी न लागे थांग सखे
मी भान स्वतःचे कसे जपू, तू समोर असता ? सांग सखे ॥ ३ ॥
- अनामिक
(१५-२७/०८/२०१७)
23 अगस्त 2017
दिल फिसलने की घडी
मदहोश बादल, धुत समा, बेताब बूँदों की झडी
ऐसे समय तुम रूबरू बारिश लपेटे हो खडी
तुम ओंस में भीगी हुई जैसे कमल की पंखुडी
रोकू, संभालू, जो करू.. है दिल फिसलने की घडी
भीगी लटों से हैं टपकती मोतियों की ये लडी
ये ठंड से कांपता बदन, पर है नजर में फुलझडी
पलखें झपकती ही नही, तुम पर निगाहें जो जडी
रोकू, संभालू, जो करू.. है दिल फिसलने की घडी
गुस्ताखियाँ गर हो गयी, तो दोष ये किसका कहे ?
मेरा? तुम्हारा? इश्क? या बदमाश बारिश का कहे ?
ऐसे न उतरेगी, मुझे जो रूप की मदिरा चढी
रोकू, संभालू, जो करू.. है दिल फिसलने की घडी
- अनामिक
(२७/०७/२०१७, २१-२३/०८/२०१८)
13 अगस्त 2017
कभी ना हो खतम
ये दिन खतम ना हो कभी, ये रात भी ना हो खतम
ये बेसमय चलती हमारी बात भी ना हो खतम
ये बेसमय चलती हमारी बात भी ना हो खतम
ये तितलियों के काफिलें, ये जुगनुओं की महफिलें
ये चाँदनी की मदभरी बरसात भी ना हो खतम
ये चाँदनी की मदभरी बरसात भी ना हो खतम
ये रंग हया का शरबती, लब पे हसी की चाशनी
दिल से छलकते शबनमी जजबात भी ना हो खतम
दिल से छलकते शबनमी जजबात भी ना हो खतम
तरकीब कुछ हम खोज ले, सुइयाँ घडी की रोक ले
पर ख्वाब सी ये जादुई मुलाकात भी ना हो खतम
पर ख्वाब सी ये जादुई मुलाकात भी ना हो खतम
ये दो कदम का रासता, ये सौ जनम का वायदा
ये उम्रभर के साथ की शुरुआत भी ना हो खतम
ये उम्रभर के साथ की शुरुआत भी ना हो खतम
- अनामिक
(०६-१३/०८/२०१७)
23 जुलाई 2017
आर या पार
बहोत हो चुकी लुक्का-छुप्पी, कुछ तो तय इस बार करो
करना है तो प्यार करो.. वरना सीधा वार करो
मन के फिजूल खेल न खेलो, नये पैंतरे तो सोचो
घिसीपिटी सब तरकीबों से दिल का फिर न शिकार करो
टुकडे टुकडे हो जाए दिल, ऐसा तेज प्रहार करो
मिर्च रगड दो सब जख्मों पर, दर्दों से बेजार करो
या फिर छू लो होले से दिल, नर्म हाथ से दस्तक दो
प्रीत की रिमझिम बारिश से दिल की जमीन गुलजार करो
चूहे-बिल्ली वाले खेल में मुझे न अब दिलचस्पी है
मान से दिल में पनाह दू, पर शान से चौखट पार करो
प्यार करो या वार करो.. पर जो है, आर या पार करो
- अनामिक
(१०-२३/०७/२०१७)
16 जुलाई 2017
बारिशें
ये बादलों की सिलवटें
सागर-लहर की करवटें
हैं बिजलियों की आहटें
ये तेरी लहराती लटें
सागर-लहर की करवटें
हैं बिजलियों की आहटें
ये तेरी लहराती लटें
ये मौसमों की साजिशें
ये मोतियों की बारिशें
भीगा जहाँ, हम दो यहा
क्या और हो फर्माइशें ?
ये मोतियों की बारिशें
भीगा जहाँ, हम दो यहा
क्या और हो फर्माइशें ?
इन उंगलियों को छेडता
ये हाथ तेरा रेशमी
जैसे क्षितिज पे मिल रही
बेताब अंबर से जमीं
ये हाथ तेरा रेशमी
जैसे क्षितिज पे मिल रही
बेताब अंबर से जमीं
कितना नशा इस रैन में
और जाम तेरे नैन में
प्याला जिगर का भर लिया
फिर भी बडा बेचैन मैं
और जाम तेरे नैन में
प्याला जिगर का भर लिया
फिर भी बडा बेचैन मैं
तेरी मोहब्बत की झडी
यूँ ही बरसती जो रही
मेरे संभलने की भला
फिर कोई गुंजाइश नही
यूँ ही बरसती जो रही
मेरे संभलने की भला
फिर कोई गुंजाइश नही
- अनामिक
(१५/०७/२०१७)
(१५/०७/२०१७)
13 जुलाई 2017
जवाब
करने को तो जंग भी कर लू, ईट का जवाब पत्थर से दू
सब तानों का, अपमानों का हिसाब तीखे अक्षर से दू
मगर क्या करू ? शायर जो हूँ, शायर का ये धरम नही
काँटें भी दे मारे कोई, गुलाब महके इत्तर से दू
कलम हाथ में है नाजुक सी, नोकीली तलवार नही
इश्क छलकता है इससे, इसमें रंजिश की धार नही
हर किस्सा इक नज्म बनेगी, जंग कर लो, या समझौता
दिल जीतेगी दुश्मन का भी, इसकी किस्मत हार नही
- अनामिक
(२६/०४/२०१६, १२,१३/०७/२०१७)
सब तानों का, अपमानों का हिसाब तीखे अक्षर से दू
मगर क्या करू ? शायर जो हूँ, शायर का ये धरम नही
काँटें भी दे मारे कोई, गुलाब महके इत्तर से दू
कलम हाथ में है नाजुक सी, नोकीली तलवार नही
इश्क छलकता है इससे, इसमें रंजिश की धार नही
हर किस्सा इक नज्म बनेगी, जंग कर लो, या समझौता
दिल जीतेगी दुश्मन का भी, इसकी किस्मत हार नही
- अनामिक
(२६/०४/२०१६, १२,१३/०७/२०१७)
08 जुलाई 2017
ज़िंदगी को ब्रेक नही है
ज़िंदगी को ब्रेक नही है
दौडती ही जा रही है
रुकने का ये नाम ना ले
फुरसत से ये काम ना ले
ज़िंदगी..
महकती ज़िंदगी
चहकती ज़िंदगी
बहकती ज़िंदगी
ज़िंदगी ज़िंदगी.. ॥ मुखडा ॥
ख्वाइशों की कार लेकर
मुश्किलों के पार लेकर
ये न माने स्पीडब्रेकर
बस दबाए ऐक्सिलिरेटर
ज़िंदगी ज़िंदगी.. ॥ अंतरा-१ ॥
हर घडी अनोखा सफर है
टेढी-मेढी हर डगर है
जोश के संग होश हो तो
ऐक्सिडंट की क्या फिकर है
ज़िंदगी ज़िंदगी.. ॥ अंतरा-२ ॥
- अनामिक
(२४/१२/२०१५ - ०८/०७/२०१७)
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हिंदी - गीत
01 मई 2017
राधिका
कृष्ण छेडे बासरी
आर्त यमुनेच्या तिरी
राधिका येई न अजुनी
गोपिका जमल्या तरी
"का असा रुसवा गडे ?"
प्रश्न कृष्णाला पडे
साद व्याकुळ बासरीची
उंच जाई अंबरी ॥ धृ ॥
बासरीचे सूर भिरभिरती खुळे वाऱ्यासवे
राधिकेचा ठाव घेण्या त्यास करती आर्जवे
सांगती, "संदेश आतुर दे तिच्या जाउन घरी"
कृष्ण छेडे बासरी ॥ १ ॥
राग लटका दोन घटका, पण चिरंतर प्रीत आहे
भाबड्या ओठांत कृष्णाचाच जप अन् गीत आहे
वास कृष्णाचाच आहे राधिकेच्या अंतरी
कृष्ण छेडे बासरी ॥ २ ॥
- अनामिक
(२९/०४/२०१७, ०१/०५/२०१७)
(२९/०४/२०१७, ०१/०५/२०१७)
28 अप्रैल 2017
पुष्कळ झाली फुले अबोली
पुष्कळ झाली फुले अबोली, गुलाबास चल देऊ संधी
संवादाचा फोडू पाझर, अन् मौनावर घालू बंदी ॥ धृ ॥
नको नदी, अन् नकोच सागर.. स्वस्थ बसू इथल्या बाकावर
झटकुन टाकू रुसवा-फुगवा, राग साचलेला नाकावर
पुसून टाकू गतकाळाच्या समज-गैरसमजांच्या नोंदी ॥ १ ॥
गरम चहाने सुरू करूया थंडावलेल्या अपुल्या गप्पा
घोटागणिक चहाच्या उघडू अलगद बंद मनाचा कप्पा
इवलासा संवाद आजचा नव्या उद्याची ठरेल नांदी ॥ २ ॥
गंधासोबत ऊब चहाची हळू भिनू दे मनी खोलवर
विसरुन जाऊ कटुत्व सारे, जशी विरघळे चहात साखर
तुझ्या गोड स्मितहास्याने वाटेल चहाही जणु बासुंदी ॥ ३ ॥
- अनामिक
(२५-२८/०४/२०१७)
20 अप्रैल 2017
डगर
सांझ शीतल, छाँव की चुनरी लपेटे है डगर
चल पडे हैं बेसबब हम दो, जहाँ से बेखबर
बुलंद पेडों का सजा है शामियाना स्वागत करने
डालियों की खिडकियों से छू रही हैं नर्म किरनें
रासतेभर सुर्ख पत्तों का बिछा कालीन है
सावली परछाइयाँ भी दिख रही रंगीन हैं
तितलियों के भेस में कुछ ख्वाब नाजुक उड रहे हैं
सुर मधुर चंचल पवन की बांसुरी से छिड रहे हैं
हाथ थामा है तुम्हारा, यूँ लगे रेशम छुआ है
तेज पहिया वक्त का तुम संग लगे मद्धम हुआ है
खत्म भी हो, या न हो अब ये डगर, ना है फिकर
यूँ ही रहो तुम हमकदम, चलते रहेंगे उम्रभर
- अनामिक
(१०/०१/२०१७ - २०/०४/२०१७)
13 अप्रैल 2017
मोल
हर शहर की ही तरह इस शहर से भी खामखा
एक तोहफा ले लिया है फिर तुम्हारे नाम का
ये जानकर भी की तुम्हे इसकी कदर तो है नही
पर क्या करू ? आदत कहो, खुद की तसल्ली ही सही
संदूक में ही बंद रखू, तुम तक न पहुँचाऊ अभी
घर-वापसी की तो न नौबत आएगी उसपर कभी
छोड भी दो मेरे, तोहफे के मगर जजबात हैं
उनका समझना मोल ना बस की तुम्हारे बात है
- अनामिक
(११-१३/०४/२०१७)
एक तोहफा ले लिया है फिर तुम्हारे नाम का
ये जानकर भी की तुम्हे इसकी कदर तो है नही
पर क्या करू ? आदत कहो, खुद की तसल्ली ही सही
संदूक में ही बंद रखू, तुम तक न पहुँचाऊ अभी
घर-वापसी की तो न नौबत आएगी उसपर कभी
छोड भी दो मेरे, तोहफे के मगर जजबात हैं
उनका समझना मोल ना बस की तुम्हारे बात है
- अनामिक
(११-१३/०४/२०१७)
03 अप्रैल 2017
बस एक कदम
जल कितना भी हो अंबर में, बिन बादल कैसे बारिश हो ?
मैं लाख जतन भी कर लू, पर.. तुमसे भी तो कुछ कोशिश हो
तुम एक कदम बस चल आओ, मैं तै सैंकडों मकाम करू
तुम एक घडी दो फुरसत की, दिन-रैन तुम्हारे नाम करू
तुम एक संदेसा भेजो बस, मैं बाढ चिठ्ठियों की लाऊ
तुम एक पुकार लगाओ बस, मैं पार जलजलें कर आऊ
तुम एक लब्ज ही कह दो बस, मैं नज्मों की बरसात करू
तुम एक दफा बस मुस्काओ, मैं खुद होकर शुरुआत करू
पर कम से कम वो एक कदम अब तुम्हे ही उठाना होगा
मैं खोलूंगा दर झटके में, पर तुम्हे खटखटाना होगा
मैं मीलों चल आया हूँ अब तक, थमना अभी जरूरी है
पग में जमीर की बेडी है, जिसकी न मुझे मंजूरी है
- अनामिक
(२८/०३/२०१७ - ०३/०४/२०१७)
27 मार्च 2017
पहचान
मैं चाँद झिलमिल, तुम छलकती चाँदनी
मैं मेघ रिमझिम, तुम चमकती दामिनी
मैं गीत दिलकश, तुम सुरीली रागिनी
मैं दीप जगमग, तुम सुनहरी रोशनी
अधूरी सी तुम्हारे जिक्र बिन पहचान है मेरी
तुम्हारी ही कहानी में ढली दास्तान है मेरी ॥ धृ ॥
बेताब साहिल मैं, लहर सी चुलबुली हो तुम
मैं बावरा जुगनू, तितली मनचली हो तुम
उम्मीद हो तुम, मैं तुम्हारा हौसला
पंछी निडर तुम, मखमली मैं घोंसला
तुम्हारे नर्म पंखों से बुलंद उडान है मेरी
अधूरी सी तुम्हारे जिक्र बिन पहचान है मेरी ॥ १ ॥
तकदीर में मेरी लिखी हो तुम लकीरों सी
मेरी मुसाफिर कश्तियों को तुम जजीरों सी
तुम हो सियाही कल्पना की, मैं कलम
इक-दूसरे संग ही मुकम्मल है जनम
तुम्हारी ही खुशी के संग जुडी मुस्कान है मेरी
अधूरी सी तुम्हारे जिक्र बिन पहचान है मेरी ॥ २ ॥
- अनामिक
(०९/०८/२०१५ - २७/०३/२०१७)
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21 मार्च 2017
आओ अब कुछ बात करे ?
चुप्पी-चुप्पी खेल-खेलकर अगर भर गया होगा जी तो
आओ अब कुछ बात करे ?
अजनबियों के जैसे रहकर अगर तसल्ली मिल गयी हो तो
फिर से इक शुरुआत करे ? ॥ धृ ॥
कुछ शिकवें मैं रखू जेब में
कुछ शिकायतें तुम दफना दो
कुछ कसूर हम माफ करे
मुस्कुराहटों की मखमल से
चेहरों से नाराजगी भरी
धूल झटककर साफ करे
अंजाने में खडी हुई इन खामोशी की दीवारों पर
लब्जों का आघात करे ?
आओ अब कुछ बात करे ? ॥ १ ॥
फाड फेंक दे बिगडे किस्सें
गलतफहमियों के सब पन्नें
अतीत की उस किताब से
अनबन के नुकसान-फायदें
कडवाहट की फिजूलखर्ची
चलो मिटा दे हिसाब से
रंजिश की रूखी धरती पर अपनेपन की चंद बूँदों की
हलकी सी बरसात करे ?
आओ अब कुछ बात करे ? ॥ २ ॥
- अनामिक
(२०/०२/२०१७ - २१/०३/२०१७)
आओ अब कुछ बात करे ?
अजनबियों के जैसे रहकर अगर तसल्ली मिल गयी हो तो
फिर से इक शुरुआत करे ? ॥ धृ ॥
कुछ शिकवें मैं रखू जेब में
कुछ शिकायतें तुम दफना दो
कुछ कसूर हम माफ करे
मुस्कुराहटों की मखमल से
चेहरों से नाराजगी भरी
धूल झटककर साफ करे
अंजाने में खडी हुई इन खामोशी की दीवारों पर
लब्जों का आघात करे ?
आओ अब कुछ बात करे ? ॥ १ ॥
फाड फेंक दे बिगडे किस्सें
गलतफहमियों के सब पन्नें
अतीत की उस किताब से
अनबन के नुकसान-फायदें
कडवाहट की फिजूलखर्ची
चलो मिटा दे हिसाब से
रंजिश की रूखी धरती पर अपनेपन की चंद बूँदों की
हलकी सी बरसात करे ?
आओ अब कुछ बात करे ? ॥ २ ॥
- अनामिक
(२०/०२/२०१७ - २१/०३/२०१७)
18 मार्च 2017
आज भी
धूल रिश्तों पे जमी जो, मैं हटा पाता नही
काँच सी बिखरी पडी यादें जुटा पाता नही
फिक्र तो है आज भी, जितनी हुआ करती थी कल
फर्क है बस, पहले जैसे अब जता पाता नही
आज भी सुनने सुनाने बाकी हैं बातें कई
पूछ पर पाता नही कुछ, कुछ बता पाता नही
फासलें ये दो जहाँ के, दो कदम ही तो नही ?
बढ न जाए और, इस डर से घटा पाता नही
बंद है दर.. दस्तकों से खुल भी जाए, क्या पता ?
ना खुला तो ? सोचकर दर खटखटा पाता नही
- अनामिक
(१८/०३/२०१७)
07 फ़रवरी 2017
पुन्हा मी वाचले सारे
पुन्हा मी वाचले सारे तुझ्या डोळ्यात दडलेले
पुन्हा मी ऐकले गाणे तुझ्या ओठात अडलेले ॥ धृ ॥
मला बघताच हास्याची कळी हलकेच फुलणारी
जरा नजरानजर होता खळी गालात खुलणारी
पुन्हा टिपले मी चेहऱ्यावर गुलाबी रंग चढलेले
पुन्हा मी वाचले सारे.. ॥ १ ॥
भिडे या अंतरी जर सूर त्या हळुवार स्पंदांचा
कळे जर अर्थ मौनाचा, कशाला भार शब्दांचा ?
खुणावे पापण्यांना द्वार स्वप्नांचे उघडलेले
पुन्हा मी वाचले सारे.. ॥ २ ॥
- अनामिक
(०६/०१/२०१७ - ०७/०२/२०१७)
पुन्हा मी ऐकले गाणे तुझ्या ओठात अडलेले ॥ धृ ॥
मला बघताच हास्याची कळी हलकेच फुलणारी
जरा नजरानजर होता खळी गालात खुलणारी
पुन्हा टिपले मी चेहऱ्यावर गुलाबी रंग चढलेले
पुन्हा मी वाचले सारे.. ॥ १ ॥
भिडे या अंतरी जर सूर त्या हळुवार स्पंदांचा
कळे जर अर्थ मौनाचा, कशाला भार शब्दांचा ?
खुणावे पापण्यांना द्वार स्वप्नांचे उघडलेले
पुन्हा मी वाचले सारे.. ॥ २ ॥
- अनामिक
(०६/०१/२०१७ - ०७/०२/२०१७)
15 जनवरी 2017
संक्रांत
घुसमट सारी आज संपवू, किती रहावे शांत अता ?
मिटवूया चल अपुल्यातल्या अबोल्याची संक्रांत अता ॥ धृ ॥
गुळाएवढा गोड नको, पण
तिळाएवढा शब्द तरी
नकोत गप्पा दिलखुलास, पण
तुटकासा संवाद तरी
पुष्कळ झाले रुसवे-फुगवे, नको बघूया अंत अता ॥ १ ॥
पतंग माझ्या खुळ्या मनाचा
तुझ्याच गगनी भिरभिरतो
मांजा तुटला तरी वाट हा
तुझ्या अंगणाची धरतो
पुन्हा जोडुनी तुटके धागे करू नवी सुरुवात अता ॥ २ ॥
- अनामिक
(१४,१५/०१/२०१७)
13 जनवरी 2017
राही
चले तेज इस कदर जिंदगी, थमने की न इजाजत है
बिता सकू इक मकाम ज्यादा समय, न इतनी फुरसत है
नयी मंजिलें, नये नजारों की नजरों को दावत है
चलू अकेला, बने काफिला.. जो भी आए, स्वागत है
जिसको जुडना है, जुड जाए.. जिसको मुडना है, मुड जाए
मैं तो अपनी राह चलूंगा, कदम जिस दिशा बढ जाए
हाँ, रुक जाता हूँ उसकी खातिर, जिसे हमसफर बना सकू
इक बार रुकू, दो बार.. मगर नामुमकिन है सौ बार रुकू
- अनामिक
(२९/१२/२०१६ - १३/०१/२०१७)
06 जनवरी 2017
सौगात जाया हो गयी
उस सांझ छेडी अनकही वो बात जाया हो गयी
मन में सजी ख्वाबों की वो बारात जाया हो गयी
वो साफ दिल से पेश की सौगात जाया हो गयी
उसको सजाने में जगी वो रात जाया हो गयी
वो बंद मुठ्ठी में छुपी कायनात जाया हो गयी
दिल से लिखी दास्तान की शुरुवात जाया हो गयी
वो कोशिशें, शिद्दत, जतन, जजबात जाया हो गये
उस रात आँखों से गिरी बरसात जाया हो गयी
- अनामिक
(०४-०६/०१/२०१७)
05 जनवरी 2017
बचपना
यूँ सूझा है आज बचपना, दर्या किनारे आया हूँ
बचपन के सब खेल सलोने यादों के संग लाया हूँ
देखो मेरा रेत का महल, सजा रही हैं शंख-सीपियाँ
लहरों की गोदी में तैर रही है वो कागज की नैया
वहा हवा संग गपशप करते उंगली से बांधे गुब्बारें
कैद बुलबुलों में साबुन के उडे जा रहे सपनें न्यारे
वहा गगन में मेघों के संग लडा रही है पेंच पतंग
नाम लिखे हैं साहिल पे जो, चूम रही है शोख तरंग
बचपन की उन यादों को बचपन में ही क्यों कैद रखे ?
क्यों न बडे होकर भी उनका नये सिरे से स्वाद चखे ?
- अनामिक
(१०/१२/२०१६ - ०५/०१/२०१७)
बचपन के सब खेल सलोने यादों के संग लाया हूँ
देखो मेरा रेत का महल, सजा रही हैं शंख-सीपियाँ
लहरों की गोदी में तैर रही है वो कागज की नैया
वहा हवा संग गपशप करते उंगली से बांधे गुब्बारें
कैद बुलबुलों में साबुन के उडे जा रहे सपनें न्यारे
वहा गगन में मेघों के संग लडा रही है पेंच पतंग
नाम लिखे हैं साहिल पे जो, चूम रही है शोख तरंग
बचपन की उन यादों को बचपन में ही क्यों कैद रखे ?
क्यों न बडे होकर भी उनका नये सिरे से स्वाद चखे ?
- अनामिक
(१०/१२/२०१६ - ०५/०१/२०१७)
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04 जनवरी 2017
कधीतरी वाटेलच की
हास्याचे उसने कारंजे कधीतरी आटेलच की
धीर संयमाचा मुखवटा कधीतरी फाटेलच की
गोष्ट संपली अर्ध्यातच, समजून अचानक मिटलेले
पुस्तक ते उघडून पहावे, कधीतरी वाटेलच की
किती नद्या अडवून ठेवल्या डोळ्यांच्या धरणांनी, पण
तळे पापण्यांच्या काठावर कधीतरी साठेलच की
किती पळावे सशासारखे शर्यतीत नवस्वप्नांच्या
आठवणींचे हळवे कासव कधीतरी गाठेलच की
सहज मिसळतो, रमतो हल्ली अनोळख्यांच्याही गर्दीत
घोळक्यातही त्या एकाकी कधीतरी वाटेलच की
पुन्हा नव्याने खुल्या गळ्याने जीवनगाणे गाइनही
चुकून येता सूर जुने ओठात कंठ दाटेलच की
- अनामिक
(०२-०४/०१/२०१७)
धीर संयमाचा मुखवटा कधीतरी फाटेलच की
गोष्ट संपली अर्ध्यातच, समजून अचानक मिटलेले
पुस्तक ते उघडून पहावे, कधीतरी वाटेलच की
किती नद्या अडवून ठेवल्या डोळ्यांच्या धरणांनी, पण
तळे पापण्यांच्या काठावर कधीतरी साठेलच की
किती पळावे सशासारखे शर्यतीत नवस्वप्नांच्या
आठवणींचे हळवे कासव कधीतरी गाठेलच की
सहज मिसळतो, रमतो हल्ली अनोळख्यांच्याही गर्दीत
घोळक्यातही त्या एकाकी कधीतरी वाटेलच की
पुन्हा नव्याने खुल्या गळ्याने जीवनगाणे गाइनही
चुकून येता सूर जुने ओठात कंठ दाटेलच की
- अनामिक
(०२-०४/०१/२०१७)
31 दिसंबर 2016
ऐ गुजरते साल
ऐ गुजरते साल, तुमने बिन कहे क्या कुछ दिया
लब्ज भी कम पड रहे करने तुम्हारा शुक्रिया
कुछ पुराने दोस्त छूटे, कुछ नये साथी मिले
कुछ सुहाने ख्वाब रूठे, कुछ हसीं सपनें खिले
बेजान कविता, शायरी को मिल गयी संजीवनी
दिलकश धुनें खामोश मन को फिर लगी हैं सूझनी
घूमने के शौक ने भी मंजिलें ढूँढी नयी
और भीतर के मुसाफिर ने मकाम पाए कई
हाँ ठीक है, जाते हुए तुमने भिगाए नैन है
पर लबों की ये हसी भी तो तुम्हारी देन है
- अनामिक
(३०,३१/१२/२०१६)
22 दिसंबर 2016
तोहफा
दूर शहर से लाए उस तोहफे का मुझसे सवाल है
"लाए हो जिनके लिए, उन्हे कब देने का खयाल है ?
दराज में ही रखना था, तो इतनी याद से लाए ही क्यों ?
उनके पास पहुँचने अब बेसब्री से बुरा हाल है"
मैंने बोला, "तू तो क्या, मैं चाँद तोडकर भी ला दू
पर एक चाँद को चाँद दूसरा देने में क्या कमाल है ?
सब्र रख, तुझे सही वक्त पे नजराने सा पेश करू
उनको भी तो लगे, की देनेवाला भी बेमिसाल है"
- अनामिक
(०८,२१,२२/१२/२०१६)
19 दिसंबर 2016
इंतजार नही
हाँ, आज भी खुले हैं दिल के खिडकी दरवाजें तेरे लिए
पर अब आँखों की चौखट को तेरा कोई इंतजार नही
तू आए तो बाहें खोले जिंदगी करेगी स्वागत ही
पर ना भी आए, तो भी कोई गम, शिकवा, तकरार नही
हाँ, कभी कभी तेरे खयाल की तितली उडती हैं मन में
पर जजबातों के फूलों में अब बचा महकता प्यार नही
गलती से छिडता है गिटार पे तुझपे रचा हुआ नगमा
पर गिटार की तारों में अब वो पहले की झनकार नही
माना पत्थर पे तराशे हुए नाम मिटाना मुश्किल हैं
पर वक्त की दवा से न ठीक हो, ऐसा कोई वार नही
- अनामिक
(१८,१९/१२/२०१६)
14 दिसंबर 2016
सफर
कभी इस शहर, कभी उस नगर
कभी ये गली, कभी वो डगर
रुकने का ना नाम ले रहा
शुरू हुआ इक बार जो सफर ॥ धृ ॥
कभी ये गली, कभी वो डगर
रुकने का ना नाम ले रहा
शुरू हुआ इक बार जो सफर ॥ धृ ॥
कभी पर्बतों की ऊँचाई
कभी नदी की गहराई
कभी पत्थरों की सुंदरता
कभी किले की तनहाई
चख लेती है कितने मंजर
तितली बनकर शोख नजर ॥ १ ॥
कभी नदी की गहराई
कभी पत्थरों की सुंदरता
कभी किले की तनहाई
चख लेती है कितने मंजर
तितली बनकर शोख नजर ॥ १ ॥
हर हफ्ते है नया ठिकाना
नक्शे पर इक नया निशाना
हो ना हो जाने की मनशा
बन जाए खुद-ब-खुद बहाना
बंधा ही रखू अपना बस्ता
आए बुलावा, चलू बेफिकर ॥ २ ॥
हो ना हो जाने की मनशा
बन जाए खुद-ब-खुद बहाना
बंधा ही रखू अपना बस्ता
आए बुलावा, चलू बेफिकर ॥ २ ॥
- अनामिक
(११-१४/१२/२०१६)
(११-१४/१२/२०१६)
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हिंदी - कविता
08 दिसंबर 2016
महूरत
इक बात भी करने कभी यूँ तो न फुरसत है तुम्हे
कैसे मिला फिर आज आने का महूरत है तुम्हे ?
अब आ गए संजोग से, तो चार पल संग बैठ लो
कुछ खैर मेरी पूछ लो, कुछ हाल अपना बाँट लो
मैं मन ही मन में रोज तुम से अनगिनत गप्पें करू
पर सूझ कुछ भी ना रहा, जब आज हो तुम रूबरू
बस काम की और काज की ही बात कब से चल रही
पर क्या करू ? तुमको अलग कुछ जिक्र ही भाता नही
जो बस चले मेरा अगर, दिन भर यही बैठे रहे
ना हो जुबाँ से बात भी, सब कुछ निगाहों से कहे
पर दो मिनट में तुम कहोगे, "देर काफी हो गयी"
तुम टोकने से पहले ही मैं खुद कहू, "निकले अभी"
अब उठ गए, तो सूझती हैं सैंकडों बातें भली
अफसोस, अब बस दो कदम पर है जुदा अपनी गली
मदहोश रह लू आज, ख्वाबों का खिला जो गुलसिताँ
आए न आए फिर कभी ऐसा महूरत, क्या पता ?
- अनामिक
(०२-०८/१२/२०१६)
04 दिसंबर 2016
ठीक है
रचता गया मैं तारिफों के फूल उसकी राह में
उसने कहा बस, "ठीक है"
लिखता गया कितने सुहाने गीत उसकी चाह में
उसने कहा बस, "ठीक है"
उसके लबों मुस्कान लाने की सदा की कोशिशें
मांगे बिना करता रहा पूरी सभी फर्माइशें
जो बन सका, सब कुछ किया उसकी फिकर, पर्वाह में
ना लब्ज कम पडने दिए उसकी स्तुती, वाह-वाह में
उसने कहा बस, "ठीक है"
उसकी हथेली में सजा दू चाँद-तारें भी अगर
रुख मौसमों का मोडकर ला दू बहारें भी अगर
वो बस कहेगी, "ठीक है"
मैं तितलियों से रंग चुराकर जिंदगी उसकी भरू
मैं बिजलियों को तोड उसके पैर की पायल करू
वो बस कहेगी, "ठीक है"
वो है अगर यूँ बेकदर, सब जानकर भी बेखबर
मैं सोचता हूँ, बस हुआ.. अब मोड लू अपनी डगर
मैं भी कहू अब, "ठीक है"
उसने कहा बस, "ठीक है"
लिखता गया कितने सुहाने गीत उसकी चाह में
उसने कहा बस, "ठीक है"
उसके लबों मुस्कान लाने की सदा की कोशिशें
मांगे बिना करता रहा पूरी सभी फर्माइशें
जो बन सका, सब कुछ किया उसकी फिकर, पर्वाह में
ना लब्ज कम पडने दिए उसकी स्तुती, वाह-वाह में
उसने कहा बस, "ठीक है"
उसकी हथेली में सजा दू चाँद-तारें भी अगर
रुख मौसमों का मोडकर ला दू बहारें भी अगर
वो बस कहेगी, "ठीक है"
मैं तितलियों से रंग चुराकर जिंदगी उसकी भरू
मैं बिजलियों को तोड उसके पैर की पायल करू
वो बस कहेगी, "ठीक है"
वो है अगर यूँ बेकदर, सब जानकर भी बेखबर
मैं सोचता हूँ, बस हुआ.. अब मोड लू अपनी डगर
मैं भी कहू अब, "ठीक है"
- अनामिक
(३०/११/२०१६ - ०४/१२/२०१६)
(३०/११/२०१६ - ०४/१२/२०१६)
21 नवंबर 2016
प्रतीक्षा
शांत आहे आज सागर
सुन्न आहे सांजवारा
लाट चंचल स्तब्ध आहे
मौन पांघरुनी किनारा
ये सखे परतून लवकर, अंत बघते ही प्रतीक्षा
बघ कसे अस्वस्थ सारे फक्त नसण्याने तुझ्या ॥ धृ ॥
रोजची ती पाखरांची धुंद किलबिल बंद आहे
पौर्णिमेच्या चांदव्याचे चांदणेही मंद आहे
आठवण येता तुझी होतो मनी नुसता पसारा
ये अता, चैतन्य पसरव गोड हसण्याने तुझ्या ॥ १ ॥
चार दिवसांचा दुरावा, युग उलटल्यासारखा
वाट बघुनी क्षीण झाल्या अंबरातिल तारका
बेचैन भिरभिरते नजर, पण सापडत नाही निवारा
तृप्त कर व्याकुळ मना अवचित बरसण्याने तुझ्या ॥ २ ॥
- अनामिक
(१३-२१/११/२०१६)
19 नवंबर 2016
क्या पसंद आए
खुदा ही तय करे, किसको किसी में क्या पसंद आए
किसे रंग-रूप, किसको मखमली काया पसंद आए
किसे तीखी निगाहें, शरबती आँखें लुभाती हैं
किसे लहराती जुल्फों का घना दर्या पसंद आए
किसी को गाल की लाली, किसे काजल सुहाता है
किसे नाजुक लबों की सुर्ख पंखुडियाँ पसंद आए
किसे नखरें पसंद, कोई अदाओं का है दीवाना
किसे सिंगार, झुमकें, चूडियाँ, बिंदिया पसंद आए
ये सब कुछ हो न हो तुझ में, मुझे ना फर्क पडता है
मुझे बस सादगी तेरी, शर्मो-हया पसंद आए
- अनामिक
(२८/१०/२०१६, १८,१९/१२/२०१६)
12 नवंबर 2016
आशियाना
गुमराह पत्ते की तरह था उड रहा सपना पुराना
अब ठिकाना मिल गया
दिल चाहता था उस जगह, छोटा सही, पर इक सुहाना
आशियाना मिल गया ॥ धृ ॥
अब ठिकाना मिल गया
दिल चाहता था उस जगह, छोटा सही, पर इक सुहाना
आशियाना मिल गया ॥ धृ ॥
अटके पडे थे सुर सभी गुमसुम लबों की कैद में
सोए हुए थे गीत भी सूखी कलम की गोद में
इक बांसुरी गूँजी अचानक,
बेजुबाँ इस जिंदगी को इक तराना मिल गया
आशियाना मिल गया ॥ १ ॥
सोए हुए थे गीत भी सूखी कलम की गोद में
इक बांसुरी गूँजी अचानक,
बेजुबाँ इस जिंदगी को इक तराना मिल गया
आशियाना मिल गया ॥ १ ॥
कुछ बीज धरती में दफन थे, बारिशों की प्यास में
बेताब थे अंकुर दबे, संजीवनी की आस में
बरसी घटा, कलियाँ खिली,
बंजर जमीं को आज फूलों का खजाना मिल गया
आशियाना मिल गया ॥ २ ॥
बेताब थे अंकुर दबे, संजीवनी की आस में
बरसी घटा, कलियाँ खिली,
बंजर जमीं को आज फूलों का खजाना मिल गया
आशियाना मिल गया ॥ २ ॥
मेहनत, लगन की, हौसले की जंग थी तकदीर से
पंछी इरादों के बंधे थे वक्त की जंजीर से
किस्मत हुई जो मेहरबाँ,
तोहफा मिला कुछ खास यूँ, मानो जमाना मिल गया
आशियाना मिल गया ॥ ३ ॥
पंछी इरादों के बंधे थे वक्त की जंजीर से
किस्मत हुई जो मेहरबाँ,
तोहफा मिला कुछ खास यूँ, मानो जमाना मिल गया
आशियाना मिल गया ॥ ३ ॥
- अनामिक
(१०-१२/११/२०१६)
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28 अक्टूबर 2016
अचानक ही नही होता
गज़ल का जनम कागज़ पर अचानक ही नही होता
भला इन्सान यूँ शायर अचानक ही नही होता
गिरे जब एक चिंगारी, कई पत्तें सुलगते हैं
धुआँ खामोश जंगल भर अचानक ही नही होता
न जाने मुश्किलें कितनी नदी है पार कर आती
खुशी से चूर तब सागर अचानक ही नही होता
सितारें जल रहे हैं चाँद की ख्वाइश में सदियों से
उजागर रात में अंबर अचानक ही नही होता
मोहब्बत है नशा ज़ालिम, ज़रा धीमे ही चढती है
असर इसका भले दिल पर अचानक ही नही होता
- अनामिक
(२३/०९/२०१६ - २८/१०/२०१६)
22 अक्टूबर 2016
ख्वाब ख्वाब
अभी आँख लगने वाली थी,
की तेरे ख्वाबों के पंछी
आ भी गए सताने को
तुझे भी कहा नींद है वहा
इसी लिए भेजा है इनको
दिल का हाल जताने को
ये भी कोई समय है भला ?
नींद सुकूँ की छोड-छाडकर
ख्वाब ख्वाब हम खेल रहे हैं
तू इक सपना भेज नजर से
इधर पकड लू मैं पलखों में
ख्वाब हर तरफ फैल रहे हैं
ख्वाब रसीला.. ख्वाब शबनमी..
नटखट.. चंचल.. ख्वाब रेशमी..
ख्वाब नासमझ.. ख्वाब बावरा..
ख्वाब गुदगुदाता.. शरारती..
ख्वाब मुस्कुराता.. जज़बाती..
ख्वाब महकता.. ख्वाब सुनहरा..
इतने सारे ख्वाब निराले
भला कहा से लाती है तू ?
इन्हे भेजना अब बस भी कर
कल के लिए बचाकर रख कुछ
बाढ आ गयी है ख्वाबों की
ख्वाब ख्वाब ही हैं अब घर भर
- अनामिक
(२२/१०/२०१६)
की तेरे ख्वाबों के पंछी
आ भी गए सताने को
तुझे भी कहा नींद है वहा
इसी लिए भेजा है इनको
दिल का हाल जताने को
ये भी कोई समय है भला ?
नींद सुकूँ की छोड-छाडकर
ख्वाब ख्वाब हम खेल रहे हैं
तू इक सपना भेज नजर से
इधर पकड लू मैं पलखों में
ख्वाब हर तरफ फैल रहे हैं
ख्वाब रसीला.. ख्वाब शबनमी..
नटखट.. चंचल.. ख्वाब रेशमी..
ख्वाब नासमझ.. ख्वाब बावरा..
ख्वाब गुदगुदाता.. शरारती..
ख्वाब मुस्कुराता.. जज़बाती..
ख्वाब महकता.. ख्वाब सुनहरा..
इतने सारे ख्वाब निराले
भला कहा से लाती है तू ?
इन्हे भेजना अब बस भी कर
कल के लिए बचाकर रख कुछ
बाढ आ गयी है ख्वाबों की
ख्वाब ख्वाब ही हैं अब घर भर
- अनामिक
(२२/१०/२०१६)
19 अक्टूबर 2016
मैं गौर भी करता नही
यूँ ही किसी के गाँव की मैं सैर भी करता नही
पर ठान लू, मंजिल वही, तो देर भी करता नही
पर ठान लू, मंजिल वही, तो देर भी करता नही
मैं छेडता हूँ बात खुद तुझसे, समझ खुशकिस्मती
वरना किसी भी गैर पे मैं गौर भी करता नही
वरना किसी भी गैर पे मैं गौर भी करता नही
हसके नजरअंदाज तेरी सब करू गुस्ताखियाँ
वरना किसी की गलतियों की खैर भी करता नही
वरना किसी की गलतियों की खैर भी करता नही
फुरसत मिले तो पढ कभी तुझ पे रची नज्में सभी
यूँ ही किसी पे पेश मैं इक शेर भी करता नही
यूँ ही किसी पे पेश मैं इक शेर भी करता नही
कुछ बात है दिल में, तभी पैगाम दोस्ती का लिखा
वरना किसी अंजान से मैं बैर भी करता नही
वरना किसी अंजान से मैं बैर भी करता नही
- अनामिक
(१९/१०/२०१६)
(१९/१०/२०१६)
18 अक्टूबर 2016
कत्ल
वो भी क्या दिन था.. बडा अजब.. यादगार था
हुआ छुरी-बंदूक बिना ही दिल पे वार था
समझ न आया, घायल किस हथियार ने किया
शायद इक सूरत, हसी, अदा का शिकार था
बचाव में मैं ढाल उठाने से पहले ही
तीर नजर का इन आँखों के आरपार था
मुझे इल्म था, कत्ल मेरा होनेवाला है
मगर पसंद के हाथों मरने का खुमार था
उसे देख जी भर सुकून से मर भी जाता
धडकन अटकी थी, पर तब कातिल फरार था
हक्काबक्का रह गयी भरी महफिल सुनके
मरके भी वही नाम लब पे बारबार था
सोचा, आखिर अब तो बंद कर ही लू आँखें
पर उसका ही सपना पलखों पे सवार था
- अनामिक
(१५-१७/१०/२०१६)
13 अक्टूबर 2016
मखमली भास
अघटित आज घडले, दिवस खास होता
जिथे थांबला दोन क्षण श्वास होता
मला पाहिले आज वळुनी तिनेही
अहा, मखमली तो किती भास होता ॥ धृ ॥
कटाक्षात होता गुलाबी इशारा
कसा रोमरोमात उठला शहारा
मनी नाचला मोर, फुलला पिसारा
नजर ती जणू रेशमी फास होता
अहा, मखमली तो किती भास होता ॥ १ ॥
दिसे तेच स्वप्नी, वसे या मनी जे
खरे मानले, भासले त्या क्षणी जे
निळेशार मृगजळ सुन्या अंगणी जे
अता तेच मिळवायचा ध्यास होता
अहा, मखमली तो किती भास होता ॥ २ ॥
निथळलो मधुर गैरसमजात थोडा
दिला कल्पनांचा पिटाळून घोडा
तसा सुज्ञ, झालो जरा आज वेडा
उद्या वास्तवाचाच सहवास होता
अहा, मखमली तो किती भास होता ॥ ३ ॥
- अनामिक
(१३/०९/२०१६ - १३/१०/२०१६)
12 अक्टूबर 2016
हश्र क्या होगा
यूँ अपनी सादगी से ही वो दिल पे घाव करते हैं
उतर आए अगर सिंगार पे, तो हश्र क्या होगा ?
करे जब बात वो, खुशबू हवाओं में बिखरती है
तो सोचो, साँस में उनकी महकता इत्र क्या होगा ?
बँधी जुल्फों की लहरों से ही दिल में बाढ आती है
अगर सैलाब उनका खुल गया, तो कहर क्या होगा ?
दुआ में माँगता हूँ सिर्फ उनका चंद पलों का साथ
मिले जो उम्र की सोहबत, खुदा का शुक्र क्या होगा ?
गजब वो दिख रहे हैं आज, दिल की बात कहने दो
रुका हूँ मुद्दतों से, और मुझसे सब्र क्या होगा ?
- अनामिक
(०७,०८/१०/२०१६)
उतर आए अगर सिंगार पे, तो हश्र क्या होगा ?
करे जब बात वो, खुशबू हवाओं में बिखरती है
तो सोचो, साँस में उनकी महकता इत्र क्या होगा ?
बँधी जुल्फों की लहरों से ही दिल में बाढ आती है
अगर सैलाब उनका खुल गया, तो कहर क्या होगा ?
दुआ में माँगता हूँ सिर्फ उनका चंद पलों का साथ
मिले जो उम्र की सोहबत, खुदा का शुक्र क्या होगा ?
गजब वो दिख रहे हैं आज, दिल की बात कहने दो
रुका हूँ मुद्दतों से, और मुझसे सब्र क्या होगा ?
- अनामिक
(०७,०८/१०/२०१६)
01 अक्टूबर 2016
छोटी छोटी बातें
भले दिखे ना तू अप्सरा जितनी खूबसूरत
चमक-धमक, सिंगार की नही तुझे जरूरत
बडी खासियत, बहोत अनोखे गुण कोई ना होते भी
दिल को छू जाती हैं तेरी छोटी छोटी बातें भी
चमक-धमक, सिंगार की नही तुझे जरूरत
बडी खासियत, बहोत अनोखे गुण कोई ना होते भी
दिल को छू जाती हैं तेरी छोटी छोटी बातें भी
किसी राज सी गहरी कंचों जैसी आँखें
पलखों पे वो भीनी सी काजल की रेखा
नाजुक उंगली में इक सबसे अलग अंगूठी
माथे पे वो हलका सा कुमकुम का टीका
क्लिप से कैद कर रखा वो जुल्फों का सैलाब
जूही की कलियों जैसे वो नन्हे से लब
पलखों पे वो भीनी सी काजल की रेखा
नाजुक उंगली में इक सबसे अलग अंगूठी
माथे पे वो हलका सा कुमकुम का टीका
क्लिप से कैद कर रखा वो जुल्फों का सैलाब
जूही की कलियों जैसे वो नन्हे से लब
रहन-सहन में बसी सादगी
लिबास से झलकती नजाकत
खोए रहने को खुद का जग
हर काम में लगन और शिद्दत
शांत शख्सियत है वैसे, पर
दोस्तों संग बहोत चहचहाहट
खोए रहने को खुद का जग
हर काम में लगन और शिद्दत
शांत शख्सियत है वैसे, पर
दोस्तों संग बहोत चहचहाहट
और भला क्या क्या बातें दिल में धीमे से घर करती है
जैसे धरती में बारिश की इक-इक बूँद उतरती है
किसी बीज से अंकुर उगने काफी हैं चंद बरसाते भी
वैसे दिल छूती हैं तेरी छोटी छोटी बातें भी
जैसे धरती में बारिश की इक-इक बूँद उतरती है
किसी बीज से अंकुर उगने काफी हैं चंद बरसाते भी
वैसे दिल छूती हैं तेरी छोटी छोटी बातें भी
- अनामिक
(१६/०९/२०१६ - ०१/१०/२०१६)
(१६/०९/२०१६ - ०१/१०/२०१६)
29 सितंबर 2016
नदी जिंदगी की
नदी जिंदगी की बही जा रही है
न जाने, गलत या सही जा रही है
भवर, आँधियाँ, बाढ, सूखा, बवंडर
सितम मौसमों के सही जा रही है
उछलकर, गरजकर, कभी शांत बहकर
बिना लब्ज सब कुछ कही जा रही है
पसंद की सभी मंजिलों को भुलाकर
न चाहा जहा, ये वही जा रही है
गलत ही सही, बस यही है तसल्ली
रुके बिन कही ना कही जा रही है
- अनामिक
(१४-२९/०९/२०१६)
23 सितंबर 2016
अंतर
विरून जाऊ दे अता अंतर तुझ्या-माझ्यातले
मिळून करुया दूर चल अडसर तुझ्या-माझ्यातले
येते मनी भरती तुझ्या हसण्यामुळे, रुसण्यामुळे
दबवू उसळणारे कसे सागर तुझ्या-माझ्यातले
घुसमट किती ही वाढली लटक्या अबोल्याने तुझ्या
चल शिंपडू गप्पांतुनी अत्तर तुझ्या-माझ्यातले
झटकून टाकू जळमटे किंतू-परंतूंची जुन्या
मिटवू अता संदिग्धता, जर-तर तुझ्या-माझ्यातले
त्या रेशमी प्रश्नास दडवावे किती हृदयामधे
ओठात येऊ दे खरे उत्तर तुझ्या-माझ्यातले
- अनामिक
(१६-२२/०९/२०१६)
19 सितंबर 2016
आखिरकार
इंतजार में थी बहार के, डाली ब्याकुल आज कट गयी
कब से इक दरबार में पडी अर्जी आखिरकार फट गयी ॥ धृ ॥
कब से इक दरबार में पडी अर्जी आखिरकार फट गयी ॥ धृ ॥
अर्सों से जो अडी हुई थी, धूल चाटती पडी हुई थी
शायद कूडेदान में कही
जिनके थे दस्तखत जरूरी, जिनकी थी मिलनी मंजूरी
उनको इसकी भनक तक नही
शायद कूडेदान में कही
जिनके थे दस्तखत जरूरी, जिनकी थी मिलनी मंजूरी
उनको इसकी भनक तक नही
दीमक को ही लगी सुहानी, उस अर्जी में लिखी कहानी
सौ टुकडों के बीच बट गयी
अर्जी आखिरकार.. ॥ १ ॥
सौ टुकडों के बीच बट गयी
अर्जी आखिरकार.. ॥ १ ॥
अश्कों की स्याही से उमडे, वो बिखरे शब्दों के टुकडें
कैसे भला जुटा पाऊ ?
उनसे लिपटी सब यादों का, अरमानों का, फर्यादों का
कैसे बोझ उठा पाऊ ?
कैसे भला जुटा पाऊ ?
उनसे लिपटी सब यादों का, अरमानों का, फर्यादों का
कैसे बोझ उठा पाऊ ?
शायद अंत यही था मुमकिन, बुरा हुआ या अच्छा, लेकिन
इक झूठी उम्मीद छट गयी
अर्जी आखिरकार.. ॥ २ ॥
इक झूठी उम्मीद छट गयी
अर्जी आखिरकार.. ॥ २ ॥
- अनामिक
(१७-१९/०९/२०१६)
(१७-१९/०९/२०१६)
15 सितंबर 2016
एक मौका चाहिए
खामोश है दीवार, लब्जों का झरोका चाहिए
खुशबू बिखरने को हवा का एक झोंका चाहिए
काटों में दिखेंगे गुल, नजरिया बस अनोखा चाहिए
दो जिंदगीया जोडने बस एक रेखा चाहिए
हर रात की होगी सुबह, बस बात से होगी सुलह
गुलशन खिलेगा, बीज को बस एक मौका चाहिए
- अनामिक
(०९/०८/२०१६ - ११/०९/२०१६)
07 सितंबर 2016
कभी न सोचा था
फिजूल थे जो लम्हें, उनकी अब खल रही कमी है क्यों ?
जाल लगे थे जो धागें, अब लग रहे रेशमी हैं क्यों ?
जाल लगे थे जो धागें, अब लग रहे रेशमी हैं क्यों ?
कभी न सोचा था, जो किस्सें कभी याद भी आएंगे
आज उन्ही बातों की दिल में इतनी भीड जमी है क्यों ?
आज उन्ही बातों की दिल में इतनी भीड जमी है क्यों ?
अपनी धुन में मस्त मगन सी बेफिकर चल रही थी जो
आज किसी अंजान मोड पे यूँ जिंदगी थमी है क्यों ?
आज किसी अंजान मोड पे यूँ जिंदगी थमी है क्यों ?
कुछ न मायने रखते थे जो, गैरों में जिनकी गिनती थी
आज बेसबब ही पलखों पे उनके लिए नमी है क्यों ?
आज बेसबब ही पलखों पे उनके लिए नमी है क्यों ?
- अनामिक
(२६/०८/२०१६ - ०२/०९/२०१६)
(२६/०८/२०१६ - ०२/०९/२०१६)
01 सितंबर 2016
दिल-दिमाग की जंग
दिल-दिमाग की जंग में आखिर होगी किसकी जीत ?
इसी कश्मकश में रहता हूँ, जबसे हुई है प्रीत ॥ धृ ॥
दिल नादानी की फिराक में, दिमाग वैसे शरीफ है
दिल गुम है सपनें बुनने में, दिमाग सच से वाकिफ है
दिमाग देने लगे नसीहत, पर दिल गाए गीत ॥ १ ॥
दिल बोले, "उसके आगे से गुजर, शुरू कर आँखमिचोली"
दिमाग बोले, "अनदेखा कर, कदम मोड ले, बदल ले गली"
दिल बोले, "उसे देखकर मुस्कुरा जरा, पल जाए बीत" ॥ २ ॥
दिल बोले, "बातें कर उससे", दिमाग बोले, "चुप्पी धर"
दिल बोले, "कुछ भेज संदेसा", दिमाग बोले, "जरा सबर कर"
दिल पूछे, "इतना सोचा तो कैसे मिलेगा मीत ?" ॥ ३ ॥
दिल जलता रहता है भीतर, दिमाग कसक बुझाता है
दिल फुसलाता, उकसाता है, दिमाग फिर समझाता है,
"जो करता है पहल, उसीकी मात.. यही है रीत" ॥ ४ ॥
- अनामिक
इसी कश्मकश में रहता हूँ, जबसे हुई है प्रीत ॥ धृ ॥
दिल नादानी की फिराक में, दिमाग वैसे शरीफ है
दिल गुम है सपनें बुनने में, दिमाग सच से वाकिफ है
दिमाग देने लगे नसीहत, पर दिल गाए गीत ॥ १ ॥
दिल बोले, "उसके आगे से गुजर, शुरू कर आँखमिचोली"
दिमाग बोले, "अनदेखा कर, कदम मोड ले, बदल ले गली"
दिल बोले, "उसे देखकर मुस्कुरा जरा, पल जाए बीत" ॥ २ ॥
दिल बोले, "बातें कर उससे", दिमाग बोले, "चुप्पी धर"
दिल बोले, "कुछ भेज संदेसा", दिमाग बोले, "जरा सबर कर"
दिल पूछे, "इतना सोचा तो कैसे मिलेगा मीत ?" ॥ ३ ॥
दिल जलता रहता है भीतर, दिमाग कसक बुझाता है
दिल फुसलाता, उकसाता है, दिमाग फिर समझाता है,
"जो करता है पहल, उसीकी मात.. यही है रीत" ॥ ४ ॥
- अनामिक
(२५/०८/२०१६ - ०१/०९/२०१६)
30 अगस्त 2016
घडणार आहे शेवटी
अडवा किती, जे व्हायचे, घडणार आहे शेवटी
तोडून पिंजरा पाखरू उडणार आहे शेवटी
चुकतात रस्ता सर्व जण.. थांबेल जो, हरवेल तो
हुडकेल त्याला मार्ग सापडणार आहे शेवटी
संयम-विवेकाच्या किती बेड्यांमधे जखडाल मन ?
मोहात ते कुठल्यातरी पडणार आहे शेवटी
फुलपाखराचा गंध-रंगांचा सुटावा छंद का ?
त्याचा कळीवर जीव तर जडणार आहे शेवटी
ठरवून जुळती बंध का ? झटकून तुटती पाश का ?
टाळाल ज्याला, तोच आवडणार आहे शेवटी
लपवा कितीही भावना, ओठी न आणा शब्दही
रहस्य डोळ्यांतून उलगडणार आहे शेवटी
कान्हा फिरू दे गोपिकांसंगेच मुरली वाजवत
तो सूर राधेलाच पण भिडणार आहे शेवटी
- अनामिक
(२७-३०/०८/२०१६)
फिकीर नाही
कुणी असावे, कुणी नसावे, फिकीर नाही
दुर्लक्षावे, कुणी पुसावे, फिकीर नाही
ना मोहाच्या बेड्या, ना भवपाश कुणाचे
कुणी हसावे, कुणी रुसावे, फिकीर नाही
दार मनाचे सताड उघडे, खुलेच अंगण
कुणी निघावे, कुणी बसावे, फिकीर नाही
कुणी पाठ फिरवावी, द्यावा कुणी परिचय
कुणी लपावे, कुणी दिसावे, फिकीर नाही
निबर जाहलो नात्यांचे रिचवून हलाहल
गोंजारावे, कुणी डसावे, फिकीर नाही
- अनामिक
(०८-३०/०८/२०१६)
09 अगस्त 2016
विकार
चिंब धुंद वर्षेचा झालो शिकार आहे
जिवास जडला नवा हवासा विकार आहे
जिवास जडला नवा हवासा विकार आहे
नकळत झाला काळजावरी घाव मखमली
कुणी खुपसली मधाळलेली कट्यार आहे
कुणी खुपसली मधाळलेली कट्यार आहे
सुप्त अंतरी सप्त-सूर झंकारुन गेले
कुणी छेडली आर्त मनाची सतार आहे
कुणी छेडली आर्त मनाची सतार आहे
कुणी शिंपली उमेद हिरमुसल्या स्वप्नांवर
पुन्हा नव्याने जगावयाचा विचार आहे
पुन्हा नव्याने जगावयाचा विचार आहे
किती भासला क्षुल्लक, पण रुतल्यावर कळले
नजरेचा तो तीर किती धारदार आहे
नजरेचा तो तीर किती धारदार आहे
चलाख आहे गनीम, की मग मीच वेंधळा
धरण्यापूर्वीच ढाल वार आरपार आहे
धरण्यापूर्वीच ढाल वार आरपार आहे
इतका मोहक, लोभस आहे समोर शत्रू
हसत हसत मी हरायलाही तयार आहे
हसत हसत मी हरायलाही तयार आहे
- अनामिक
(०७-०९/०८/२०१६)
29 जुलाई 2016
बरसात
नशीली है अदा बरसात की, रुत है बहकने की
जरूरत है मगर यारों जरा बचने, संभलने की
इशारा है मिला, जमकर गिरेंगी इश्क की बूँदें
बडी संभावना है अब अचानक दिल फिसलने की ॥ धृ ॥
जरूरत है मगर यारों जरा बचने, संभलने की
इशारा है मिला, जमकर गिरेंगी इश्क की बूँदें
बडी संभावना है अब अचानक दिल फिसलने की ॥ धृ ॥
जमेंगे बादलों के झुंड, चलाने बाण बिजुरी के
भिगा देंगे तुम्हें, जितना छिपो फिर आड छत्री के
बचेगी फिर न कुछ उम्मीद दिल का मर्ज टलने की
बडी संभावना है.. ॥ १ ॥
भिगा देंगे तुम्हें, जितना छिपो फिर आड छत्री के
बचेगी फिर न कुछ उम्मीद दिल का मर्ज टलने की
बडी संभावना है.. ॥ १ ॥
सजेगी बाग दुलहन सी, पहन साडी गुलाबों की
तुम्हें छूने उडेंगी तितलियाँ रंगीन ख्वाबों की
रखो दिल सख्त जितना भी, है गुंजाइश पिघलने की
तुम्हें छूने उडेंगी तितलियाँ रंगीन ख्वाबों की
रखो दिल सख्त जितना भी, है गुंजाइश पिघलने की
बडी संभावना है.. ॥ २ ॥
- अनामिक
(१३/०६/२०१६ - २९/०७/२०१६)
(१३/०६/२०१६ - २९/०७/२०१६)
22 जुलाई 2016
पाउस वेडा
पाउस वेडा.. खट्याळ थोडा..
उगाच दंगा करतो पाउस
मेघांनाही लावुन नादी
पिसाटल्यागत झरतो पाउस
पाउस वेडा.. ॥ धृ ॥
उगाच दंगा करतो पाउस
मेघांनाही लावुन नादी
पिसाटल्यागत झरतो पाउस
पाउस वेडा.. ॥ धृ ॥
उनाड पाउस.. टवाळ पाउस..
पाउस चंचल.. लबाड पाउस..
एकदा का कोसळू लागला,
समजवण्याच्या पल्याड पाउस
कधी पसरलेली ओंजळही
भरण्याआधीच विरतो पाउस
पाउस वेडा.. ॥ १ ॥
पाउस चंचल.. लबाड पाउस..
एकदा का कोसळू लागला,
समजवण्याच्या पल्याड पाउस
कधी पसरलेली ओंजळही
भरण्याआधीच विरतो पाउस
पाउस वेडा.. ॥ १ ॥
तुफान पाउस.. भयाण पाउस..
आनंदाला उधाण पाउस..
पाउस धोधो.. पाउस रिमझिम..
पाउस बोचक.. पाउस रेशिम..
सोंगाड्या हा.. किती मुखवटे,
किती रुपे पांघरतो पाउस
पाउस वेडा.. ॥ २ ॥
आनंदाला उधाण पाउस..
पाउस धोधो.. पाउस रिमझिम..
पाउस बोचक.. पाउस रेशिम..
सोंगाड्या हा.. किती मुखवटे,
किती रुपे पांघरतो पाउस
पाउस वेडा.. ॥ २ ॥
या शहरातुन.. त्या रानातुन..
वेलीतुन.. झाडा-पानातुन..
याच्या-त्याच्या खोड्या काढत
लहानग्यागत फिरतो पाउस
दमल्यावर मग भूमातेच्या
कुशीत गुपचुप शिरतो पाउस
पाउस वेडा.. ॥ ३ ॥
वेलीतुन.. झाडा-पानातुन..
याच्या-त्याच्या खोड्या काढत
लहानग्यागत फिरतो पाउस
दमल्यावर मग भूमातेच्या
कुशीत गुपचुप शिरतो पाउस
पाउस वेडा.. ॥ ३ ॥
जरी कितीही बरसुन गेला
मनात शिल्लक उरतो पाउस
कातरवेळी साधुन संधी
डोळ्यातुन पाझरतो पाउस
पाउस वेडा.. ॥ ४ ॥
मनात शिल्लक उरतो पाउस
कातरवेळी साधुन संधी
डोळ्यातुन पाझरतो पाउस
पाउस वेडा.. ॥ ४ ॥
- अनामिक
(१९-२१/०७/२०१६)
(१९-२१/०७/२०१६)
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मराठी - कविता,
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22 मार्च 2016
सांझ
चलो सखी हम दूर जहाँ से, इक दर्या के शांत किनारे
सूरज की लाली में लिपटे गगन-तले इक सांझ गुजारे
लहरों का हो शोर सुरीला, और पवन की चंचल हलचल
नर्म रेत की चादर ओढे इत्मिनान से बैठे कुछ पल
घुले साँस में साँस, पहन ले हाथों में हाथों के कंगन
इक-टुक देखे दूर क्षितिज पे, धरती और अंबर का मीलन
कंधे के सिरहाने मेरे चैन-सुकूँ से तुम सो जाओ
फिक्र करो ना इस पल की, बस उजले कल के ख्वाब सजाओ
भीनी सी मुस्कान तुम्हारी देख देख मैं दिल बहलाऊ
जुल्फ-हवा का खेल निहारू, हकले से माथा सहलाऊ
तुम्हे छेडती शरारती लट मैं उंगली से दूर हटाऊ
नींद टूटने दू न तुम्हारी, भला जागते उम्र बिताऊ
घने बादलों में सपनों के यूँ ही तैरते रहे सांझ-भर
आए-जाए सूरज-चंदा, दुनिया की कुछ भी न हो खबर
- अनामिक
(२३/०४/२०१५ - २२/०३/२०१६)
08 मार्च 2016
बेमौसम
जाने आज हुआ है अंबर इतना क्यों बोझल
घिर आए हैं गर्मी में भी बरखा के बादल
धीमे स्वर में खनक रही है बिजली की पायल
बूँदें हैं बेताब भिगाने धरती का आँचल
घिर आए हैं गर्मी में भी बरखा के बादल
धीमे स्वर में खनक रही है बिजली की पायल
बूँदें हैं बेताब भिगाने धरती का आँचल
इनको भी महसूस हो गयी मेरे दिल की प्यास
इसी लिए ये बेमौसम आए हैं मिलने खास
पर जिसके इंतजार में उलझी है मेरी साँस
उसको कब होगा मेरे जज़बातों का एहसास ?
इसी लिए ये बेमौसम आए हैं मिलने खास
पर जिसके इंतजार में उलझी है मेरी साँस
उसको कब होगा मेरे जज़बातों का एहसास ?
ये सब तो जाएंगे बनकर इक दिन के मेहमान
पलखों को तोहफें में देकर अश्कों का तूफान
इन्हें कहूंगा, जरा बरसना उसके भी आँगन
उसको मेरे हिस्से की भी दे आना मुस्कान
पलखों को तोहफें में देकर अश्कों का तूफान
इन्हें कहूंगा, जरा बरसना उसके भी आँगन
उसको मेरे हिस्से की भी दे आना मुस्कान
- अनामिक
(०४-०७/०३/२०१६)
(०४-०७/०३/२०१६)
29 फ़रवरी 2016
जिंदगी की बात
कर लिये गप्पें बहोत, ढलने लगी है रात भी
चल सखी कर ले जरासी जिंदगी की बात भी
चल सखी कर ले जरासी जिंदगी की बात भी
चुटकुलें, किस्सें, संदेसें बहोत भेजे, पढ लिये
चल जरा पढ ले निगाहों में लिखे जज़बात भी
चल जरा पढ ले निगाहों में लिखे जज़बात भी
इत्र, गुलदस्तें, खिलौनें.. दे चुके तोहफें कई
पेश करके देख ले दिल की हसीं सौगात भी
पेश करके देख ले दिल की हसीं सौगात भी
चल चुके चालें कई इस इश्क की शतरंज में
जीतने अब दाँव खा ले मुस्कुराकर मात भी
जीतने अब दाँव खा ले मुस्कुराकर मात भी
हमराह बनने की पहल कब तक इशारों में करे ?
चल बढाए अब कदम, कर ले नयी शुरुआत भी
चल बढाए अब कदम, कर ले नयी शुरुआत भी
- अनामिक
(२४-२९/०२/२०१६)
(२४-२९/०२/२०१६)
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हिंदी - गझल
17 फ़रवरी 2016
कशिश
जाने कैसी कशिश तुम्हारी आँखों की गहराई में है
नफरत भी बरसे इनसे, फिर भी इक प्यास जगाती है
अजब तुम्हारी खामोशी भी, जैसे गजल सुनाती है
रंजिश के स्वर में भी, लगता है, आवाज लगाती है
नफरत भी बरसे इनसे, फिर भी इक प्यास जगाती है
अजब तुम्हारी खामोशी भी, जैसे गजल सुनाती है
रंजिश के स्वर में भी, लगता है, आवाज लगाती है
कदम तुम्हारे बडे सितमगर, मुझे देख मुड जाते हैं
धूल मगर उन कदमों की राहों में फूल खिलाती है
धूल मगर उन कदमों की राहों में फूल खिलाती है
नजर चुरा लो, मुँह भी फेरो, मगर नजर के सामने रहो
सिर्फ तुम्हारी मौजूदगी भी दिल को सुकूँ दिलाती है
सिर्फ तुम्हारी मौजूदगी भी दिल को सुकूँ दिलाती है
- अनामिक
(३०/१२/२०१४, १२-१७/०२/२०१६)
02 फ़रवरी 2016
ऐ चाँद
सुनो ऐ चाँद पूनम के, न इतना भी दिखो सुंदर
सखी की याद आती है, पडे जब भी नजर तुम पर ॥ धृ ॥
सखी की याद आती है, पडे जब भी नजर तुम पर ॥ धृ ॥
समय था वो, समा दीदार से उनके महकता था
शहद का जाम जब मुस्कान से उनकी छलकता था
शहद का जाम जब मुस्कान से उनकी छलकता था
तुम्हारी चाँदनी से भी हसीं थी सादगी उनकी
खिलाती थी दिलों में फूल बस मौजूदगी उनकी ॥ १ ॥
खिलाती थी दिलों में फूल बस मौजूदगी उनकी ॥ १ ॥
नजर के सामने तुम, वो, हजारों मील थे पर दूर
तुम्हारा भी न, उनका भी न छू सकता कभी था नूर
तुम्हारा भी न, उनका भी न छू सकता कभी था नूर
जतन कितने किए उन तक पहुँचने के, सभी बेकार
छुपा लेती थी खुदको रंजिशों के बादलों के पार ॥ २ ॥
छुपा लेती थी खुदको रंजिशों के बादलों के पार ॥ २ ॥
अमावस की तरह इक दिन अचानक वो हुई गायब
मुकद्दर के सितारे वो चुराकर ले गयी संग सब
मुकद्दर के सितारे वो चुराकर ले गयी संग सब
तुम्हारी शक्ल में ही देखता हूँ अब छवी उनकी
कभी तो ईद आए, वो दिखे, ये आस है बाकी
कभी तो ईद आए, वो दिखे, ये आस है बाकी
मिले गर वो कभी, ऐ चाँद, इक पैगाम पहुँचाना
"उनकी याद में इक बावरा जगता है रोजाना" ॥ ३ ॥
"उनकी याद में इक बावरा जगता है रोजाना" ॥ ३ ॥
- अनामिक
(०२/०२/२०१५ - ०२/०२/२०१६)
(०२/०२/२०१५ - ०२/०२/२०१६)
28 जनवरी 2016
चाय की प्याली
सांझ अकेली, इंतजार की, साथ चाय की प्याली थी
अफसोस.. सामने वाली कुर्सी मगर आज भी खाली थी
गरम चाय की भाप लपेटे
तैर रहे थे बीते लम्हें
जाने उनकी राह ताकते
गुजरी कितनी रातें-सुबहें
दिल की शीशी में इत्तर सी उनकी याद संभाली थी
अफसोस.. सामने वाली कुर्सी मगर आज भी खाली थी
पगली सी उम्मीद लिए
बेगानों संग आया था
मीलों की दूरी पार किए
गुलशन में पर वो ना थी, ना ही वो आनेवाली थी
अफसोस.. सामने वाली कुर्सी मगर आज भी खाली थी
घंटो बैठा रहा वही पे,
भटक भटक के थक गयी नजर
ढूँढ रही थी आहट उनकी,
कभी इस गली, कभी उस डगर
गीली आँखों में ढलते सूरज की उतरी लाली थी
अफसोस.. सामने वाली कुर्सी मगर आज भी खाली थी
- अनामिक
(१७-२७/०१/२०१६)
27 जुलाई 2015
कुछ ख्वाब
कुछ ख्वाब नैनों से तुम्हारे ही मुझे हैं देखने
कुछ गीत होठों से तुम्हारे गुनगुनाने हैं मुझे
कुछ मंजिले दुश्वार कदमों से तुम्हारे तै करू
कुछ घर पनाहों में तुम्हारी ही बनाने हैं मुझे ॥ धृ ॥
कुछ दिन सुनहरी धूप के
कुछ सर्द रातें चाँदनी
कुछ रेशमी घडियाँ हसीं
तुम संग मुझे है काटनी
तुम पर खजानें वक्त के हसते लुटाने हैं मुझे
जनमों-जनम के कुछ सफर तुम संग बिताने हैं मुझे ॥ १ ॥
कुछ धडकने मेरी थमी
दिल में तुम्हारे चल पडे
रेखा तुम्हारे हाथ की
तकदीर से मेरी जुडे
बाजू तुम्हारे सुर्ख मेहंदी से सजाने हैं मुझे
माथे तुम्हारे कुछ सिंदूरी रंग लगाने हैं मुझे ॥ २ ॥
- अनामिक
(०५/०६/२०१५ - २६/०७/२०१५)
कुछ गीत होठों से तुम्हारे गुनगुनाने हैं मुझे
कुछ मंजिले दुश्वार कदमों से तुम्हारे तै करू
कुछ घर पनाहों में तुम्हारी ही बनाने हैं मुझे ॥ धृ ॥
कुछ दिन सुनहरी धूप के
कुछ सर्द रातें चाँदनी
कुछ रेशमी घडियाँ हसीं
तुम संग मुझे है काटनी
तुम पर खजानें वक्त के हसते लुटाने हैं मुझे
जनमों-जनम के कुछ सफर तुम संग बिताने हैं मुझे ॥ १ ॥
कुछ धडकने मेरी थमी
दिल में तुम्हारे चल पडे
रेखा तुम्हारे हाथ की
तकदीर से मेरी जुडे
बाजू तुम्हारे सुर्ख मेहंदी से सजाने हैं मुझे
माथे तुम्हारे कुछ सिंदूरी रंग लगाने हैं मुझे ॥ २ ॥
- अनामिक
(०५/०६/२०१५ - २६/०७/२०१५)
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Collection-Arjiya
07 जुलाई 2015
इक अर्ज़ी थी
इक अर्ज़ी थी कुछ सपनों की
कुछ अनकहे फसानों की
उम्मीदों की, अरमानों की
कुछ बेजुबाँ तरानों की
इक अर्ज़ी थी दिल से दिल तक
बंद दरों पे जैसे दस्तक
इक अर्ज़ी थी, जो पहुँचाती
धुंदले 'कल' से उजले 'कल' तक
इक अर्ज़ी थी, जिसको सींचा
पलखों की बूँदों में भिगाकर
शिद्दत से जी-जान लगाकर
नजरों में इक आस जगाकर
वो बस अर्ज़ी ना थी,
मेरे जजबातों का मुखडा थी
लेकिन उनके लिए महज़ वो
कागज़ का इक टुकडा थी
धूल जमी है उस अर्जी पर
गुजर गए लम्हों के पंछी
आज समय की शाखों पे वो
फडक रही है बनकर पर्ची
उस अर्ज़ी की सालगिरह पर
यादों के नजरानें हैं
कुछ अश्कों के गुलदस्तें हैं
कुछ बेबस मुस्कानें हैं
- अनामिक
(०७/०७/२०१५)
कुछ अनकहे फसानों की
उम्मीदों की, अरमानों की
कुछ बेजुबाँ तरानों की
इक अर्ज़ी थी दिल से दिल तक
बंद दरों पे जैसे दस्तक
इक अर्ज़ी थी, जो पहुँचाती
धुंदले 'कल' से उजले 'कल' तक
इक अर्ज़ी थी, जिसको सींचा
पलखों की बूँदों में भिगाकर
शिद्दत से जी-जान लगाकर
नजरों में इक आस जगाकर
वो बस अर्ज़ी ना थी,
मेरे जजबातों का मुखडा थी
लेकिन उनके लिए महज़ वो
कागज़ का इक टुकडा थी
धूल जमी है उस अर्जी पर
गुजर गए लम्हों के पंछी
आज समय की शाखों पे वो
फडक रही है बनकर पर्ची
उस अर्ज़ी की सालगिरह पर
यादों के नजरानें हैं
कुछ अश्कों के गुलदस्तें हैं
कुछ बेबस मुस्कानें हैं
- अनामिक
(०७/०७/२०१५)
( On the occasion of completing a year of an Arji :
http://www.youtube.com/watch?v=v-0E0XjKJT8 )
04 जून 2015
याद
कैद कर लू अक्षरों में, या लबों से गुनगुना लू
पर न रुकती है तुम्हारी सर्द यादों की पवन
बंद कर लू खिडकियाँ दिल की सभी, फिर भी कही से
पहुँच जाती है तुम्हारे सुर्ख सपनों की किरन ॥ धृ ॥
इश्क को कमजोर कर दे, फासलों में वो न दम
दूर हो मीलों, मगर साया तुम्हारा हर कदम
आज भी ढूँढे तुम्हे तितली नजर की हर चमन ॥ १ ॥
पैंतरें तकदीर के दिल को समझ आतें नहीं
बिन-जुडे तुझमें फसे धागें सुलझ पातें नहीं
क्यों सभी नाकाम हैं तुम तक पहुँचने के जतन ? ॥ २ ॥
- अनामिक
(३१/०५/२०१५ - ०४/०६/२०१५)
पर न रुकती है तुम्हारी सर्द यादों की पवन
बंद कर लू खिडकियाँ दिल की सभी, फिर भी कही से
पहुँच जाती है तुम्हारे सुर्ख सपनों की किरन ॥ धृ ॥
इश्क को कमजोर कर दे, फासलों में वो न दम
दूर हो मीलों, मगर साया तुम्हारा हर कदम
आज भी ढूँढे तुम्हे तितली नजर की हर चमन ॥ १ ॥
पैंतरें तकदीर के दिल को समझ आतें नहीं
बिन-जुडे तुझमें फसे धागें सुलझ पातें नहीं
क्यों सभी नाकाम हैं तुम तक पहुँचने के जतन ? ॥ २ ॥
- अनामिक
(३१/०५/२०१५ - ०४/०६/२०१५)
21 मई 2015
बंध नवे
बंध नवे, संबंध नवे हे
वेळ-अवेळी कानामधुनी
घुमती मंजुळ नाद नवे
कातरवेळी करीत बसतो
स्वतःशीच संवाद नवे
स्वप्नांच्या मग उंबरठ्यावर
दीप उजळती मंद नवे ॥ २ ॥
- अनामिक
(०३/०४/२०१५ - २१/०५/२०१५)
प्रेमफुलांचे गंध नवे
नाजुक हळव्या हृदयामधुनी
मोहरणारे स्पंद नवे
भिरभिरणा-या खुळ्या जिवाला
जडले कुठले छंद नवे
आयुष्याच्या वेलीवरती
फुलले क्षण बेधुंद नवे ॥ धृ ॥
पाउस अवचित उधळत येतो
इंद्रधनूतुन रंग नवे
थेंब बरसता चिंब मनावर
उठती लाख तरंग नवे
भाव उमलती, अन् अंकुरती
ओठांवरती शब्द नवे ॥ १ ॥
वेळ-अवेळी कानामधुनी
घुमती मंजुळ नाद नवे
कातरवेळी करीत बसतो
स्वतःशीच संवाद नवे
स्वप्नांच्या मग उंबरठ्यावर
दीप उजळती मंद नवे ॥ २ ॥
- अनामिक
(०३/०४/२०१५ - २१/०५/२०१५)
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20 अप्रैल 2015
दिलासा
ये सखे घेऊन स्वप्नांचा दिलासा
श्वासही तुजवीण ना वाटे हवासा
मांडला मी डाव जिंकाया तुला, पण
नेमका चुकला कुठे, उमगे न, फासा
केवढा हट्टी तुझा रुसवा-अबोला
मान्य ना केलास कुठलाही खुलासा
सुन्न इतक्या जाणिवा होत्या तुझ्या की
हुंदका कळला तुला ना, ना उसासा
खोल इतके अंतरी खणले तुझ्या, पण
ना कधी फुटला तुला पाझर जरासा
मी मुखवटा लावुनी फिरतो असा की
ना कळे रडला जरी पाण्यात मासा
आठवांची मी तुझ्या भरुनी शिदोरी
चाललो अज्ञात एकाकी प्रवासा
- अनामिक
(०३-०८/०४/२०१५)
श्वासही तुजवीण ना वाटे हवासा
मांडला मी डाव जिंकाया तुला, पण
नेमका चुकला कुठे, उमगे न, फासा
केवढा हट्टी तुझा रुसवा-अबोला
मान्य ना केलास कुठलाही खुलासा
सुन्न इतक्या जाणिवा होत्या तुझ्या की
हुंदका कळला तुला ना, ना उसासा
खोल इतके अंतरी खणले तुझ्या, पण
ना कधी फुटला तुला पाझर जरासा
मी मुखवटा लावुनी फिरतो असा की
ना कळे रडला जरी पाण्यात मासा
आठवांची मी तुझ्या भरुनी शिदोरी
चाललो अज्ञात एकाकी प्रवासा
- अनामिक
(०३-०८/०४/२०१५)
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05 अप्रैल 2015
गुमशुदा
जाने कहा गुमशुदा हूँ मैं.. खुद को भी आऊ न नजर
छान चुका हूँ चप्पा-चप्पा, फिर भी कुछ ना लगे खबर
शायद उस बगिया में गुम हूँ, जहा खिले थे सपनों के गुल
जहा हकीकत की नदिया पे अफसानों के बाँधे थे पुल
या उस साहिल पे बैठा हूँ, जहा कभी थे रेत के महल
जहा वक्त की मुठ्ठी से फिसले थे मोतियों जैसे कुछ पल
या उस बन में भटक रहा हूँ, जहा मेहरबाँ थी हरियाली
जहा बची है अब यादों के सूखे पत्तों की रंगोली
या उस दोराहे पे खडा हूँ, रुकी पडी है जहा जिंदगी
एक राह पे हालाहल है, और दूजी पे सिर्फ तिश्नगी
या चौखट पे इंतजार की, नजरों के कालीन बिछाए
उस मेहमाँ की राह तक रहा हूँ, जो अब फिर कभी न आए
ढूँढ-ढूँढते खुद को शायद लग जाएगा एक जमाना
यही दुआ है अब, कम-से-कम परछाई का मिले ठिकाना
- अनामिक
(१९/०३/२०१५ - ०५/०४/२०१५)
छान चुका हूँ चप्पा-चप्पा, फिर भी कुछ ना लगे खबर
शायद उस बगिया में गुम हूँ, जहा खिले थे सपनों के गुल
जहा हकीकत की नदिया पे अफसानों के बाँधे थे पुल
या उस साहिल पे बैठा हूँ, जहा कभी थे रेत के महल
जहा वक्त की मुठ्ठी से फिसले थे मोतियों जैसे कुछ पल
या उस बन में भटक रहा हूँ, जहा मेहरबाँ थी हरियाली
जहा बची है अब यादों के सूखे पत्तों की रंगोली
या उस दोराहे पे खडा हूँ, रुकी पडी है जहा जिंदगी
एक राह पे हालाहल है, और दूजी पे सिर्फ तिश्नगी
या चौखट पे इंतजार की, नजरों के कालीन बिछाए
उस मेहमाँ की राह तक रहा हूँ, जो अब फिर कभी न आए
ढूँढ-ढूँढते खुद को शायद लग जाएगा एक जमाना
यही दुआ है अब, कम-से-कम परछाई का मिले ठिकाना
- अनामिक
(१९/०३/२०१५ - ०५/०४/२०१५)
31 मार्च 2015
हमें भी आज जीने दो
कदम तो डगमगाएंगे, नशे में चल रहे जो हम
निगाहें लडखडाएंगी, जवाँ मदहोश है आलम
जिएंगे कब तलक घुटकर, मचलकर आज जीने दो
रहेंगे कब तलक प्यासे, छलकते जाम पीने दो
हमें भी आज जीने दो, हमें भी आज पीने दो ॥ धृ ॥
"कहेंगे लोग क्या?" ये सोच डर डर कर जिए हम तो
उसूलों में, रिवाजों में जकडकर रह गए हम तो
मगर इन बेडियों का बोझ अब से ना सहेंगे हम
मनमौजी हवा बनकर जहा मर्जी बहेंगे हम
बगावत की सुई से सब अधूरे ख्वाब सीने दो
रहेंगे कब तलक प्यासे, छलकते जाम पीने दो
हमें भी आज जीने दो, हमें भी आज पीने दो ॥ १ ॥
शराफत की लकीरों में यूँ उलझे, ना सुलझ पाए
सुनी इसकी, सुनी उसकी, न खुदकी ही समझ पाए
मगर अब से दबे दिल की पुकारें ही सुनेंगे हम
करेंगे खूब नादानी, अजब राहें चुनेंगे हम
रंगीली शरबती बरसात हर-दिन, हर-महीने दो
रहेंगे कब तलक प्यासे, छलकते जाम पीने दो
हमें भी आज जीने दो, हमें भी आज पीने दो ॥ २ ॥
- अनामिक
निगाहें लडखडाएंगी, जवाँ मदहोश है आलम
जिएंगे कब तलक घुटकर, मचलकर आज जीने दो
रहेंगे कब तलक प्यासे, छलकते जाम पीने दो
हमें भी आज जीने दो, हमें भी आज पीने दो ॥ धृ ॥
"कहेंगे लोग क्या?" ये सोच डर डर कर जिए हम तो
उसूलों में, रिवाजों में जकडकर रह गए हम तो
मगर इन बेडियों का बोझ अब से ना सहेंगे हम
मनमौजी हवा बनकर जहा मर्जी बहेंगे हम
बगावत की सुई से सब अधूरे ख्वाब सीने दो
रहेंगे कब तलक प्यासे, छलकते जाम पीने दो
हमें भी आज जीने दो, हमें भी आज पीने दो ॥ १ ॥
शराफत की लकीरों में यूँ उलझे, ना सुलझ पाए
सुनी इसकी, सुनी उसकी, न खुदकी ही समझ पाए
मगर अब से दबे दिल की पुकारें ही सुनेंगे हम
करेंगे खूब नादानी, अजब राहें चुनेंगे हम
रंगीली शरबती बरसात हर-दिन, हर-महीने दो
रहेंगे कब तलक प्यासे, छलकते जाम पीने दो
हमें भी आज जीने दो, हमें भी आज पीने दो ॥ २ ॥
- अनामिक
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29 मार्च 2015
क्यों
जाने क्या ये हुआ अचानक ? क्यों कुदरत ने बदले तेवर ?
कल तक था इक हसीं नजारा, आज दिखे कुछ और ही मंजर
क्यों दुनिया की सब चीज़ों का पल में उतर गया है नूर ?
शायद इनको पता चला है.. की तुम चले गए हो दूर... ॥ धृ ॥
क्यों न मोगरे में है खुशबू ? क्यों गुलाब में खिले न रंग ?
क्यों साहिल पे सन्नाटा है ? दर्या में उठते न तरंग
क्यों कोयल के गीत हुए चुप ? क्यों न पसारे पंख मयूर ?
शायद इनको पता चला है.. की तुम चले गए हो दूर... ॥ १ ॥
क्यों न सितारों में है जगमग ? क्यों न चाँद से बरसे रेशम ?
क्यों न बची बदरा में बूँदे ? क्यों छाया पतझड का मौसम ?
क्यों गुम है सूरज की रौनक ? क्यों अंधियारा करे गुरूर ?
शायद इनको पता चला है.. की तुम चले गए हो दूर... ॥ २ ॥
क्यों सपनों के महमानों ने पलखों का घर छोड दिया है ?
क्यों रूठी निंदियारानी ने रातों से मुह मोड लिया है ?
क्यों हाथों की रेखाओं के आगे किस्मत है मजबूर ?
शायद इनको पता चला है.. की तुम चले गए हो दूर... ॥ ३ ॥
- अनामिक
(११-१५/०३/२०१५)
कल तक था इक हसीं नजारा, आज दिखे कुछ और ही मंजर
क्यों दुनिया की सब चीज़ों का पल में उतर गया है नूर ?
शायद इनको पता चला है.. की तुम चले गए हो दूर... ॥ धृ ॥
क्यों न मोगरे में है खुशबू ? क्यों गुलाब में खिले न रंग ?
क्यों साहिल पे सन्नाटा है ? दर्या में उठते न तरंग
क्यों कोयल के गीत हुए चुप ? क्यों न पसारे पंख मयूर ?
शायद इनको पता चला है.. की तुम चले गए हो दूर... ॥ १ ॥
क्यों न सितारों में है जगमग ? क्यों न चाँद से बरसे रेशम ?
क्यों न बची बदरा में बूँदे ? क्यों छाया पतझड का मौसम ?
क्यों गुम है सूरज की रौनक ? क्यों अंधियारा करे गुरूर ?
शायद इनको पता चला है.. की तुम चले गए हो दूर... ॥ २ ॥
क्यों सपनों के महमानों ने पलखों का घर छोड दिया है ?
क्यों रूठी निंदियारानी ने रातों से मुह मोड लिया है ?
क्यों हाथों की रेखाओं के आगे किस्मत है मजबूर ?
शायद इनको पता चला है.. की तुम चले गए हो दूर... ॥ ३ ॥
- अनामिक
(११-१५/०३/२०१५)
16 मार्च 2015
आँधी
चुपके से इक आँधी आई, हलकी सी भी हुई न आहट
आँख लगी तब सन्नाटा था, नींद खुली तो बस गडगडाहट
दबे पाँव से आकर इसने तहस-नहस कर दिया आशियाँ
चंद दुलारी चीज़ों को भी समेटने का समय ना दिया
जितना था, सब बहा ले गयी, छोड गयी आँखों में नदिया ॥ धृ ॥
कुछ चीज़ें थी, कुछ बातें थी
कुछ थी सुबहें, कुछ रातें थी
यादों की संदूकों में कुछ सुनहरे पलों के प्यालें थे
जिनमें गम के कडवे जाम भी शरबत से लगते थे मीठे
अरमानों की अलमारी में थी सपनों की शाल रेशमी
जिसे लपेटे कडी ठंड भी लगती थी उम्मीद की गर्मी
इक कोने में फडक रहा था, वो भी बुझ गया आस का दिया
जितना था, सब बहा ले गयी, छोड गयी आँखों में नदिया ॥ १ ॥
जाने कितना समय लगेगा, बिखरा सा घर निखारने को
चकनाचूर हौसले की सब दर-दीवारें सवारने को
मन से मलबा निकालने को, फिर से तिनकें बटोरने को
कहा मिलेगी तब तक इक छत, सहमी रातें गुजारने को
हिम्मत की बुनियाद धँसी जो, रचने लग जाएँगी सदियाँ
जितना था, सब बहा ले गयी, छोड गयी आँखों में नदिया ॥ २ ॥
- अनामिक
(०४,१६/०३/२०१५)
आँख लगी तब सन्नाटा था, नींद खुली तो बस गडगडाहट
दबे पाँव से आकर इसने तहस-नहस कर दिया आशियाँ
चंद दुलारी चीज़ों को भी समेटने का समय ना दिया
जितना था, सब बहा ले गयी, छोड गयी आँखों में नदिया ॥ धृ ॥
कुछ चीज़ें थी, कुछ बातें थी
कुछ थी सुबहें, कुछ रातें थी
यादों की संदूकों में कुछ सुनहरे पलों के प्यालें थे
जिनमें गम के कडवे जाम भी शरबत से लगते थे मीठे
अरमानों की अलमारी में थी सपनों की शाल रेशमी
जिसे लपेटे कडी ठंड भी लगती थी उम्मीद की गर्मी
इक कोने में फडक रहा था, वो भी बुझ गया आस का दिया
जितना था, सब बहा ले गयी, छोड गयी आँखों में नदिया ॥ १ ॥
जाने कितना समय लगेगा, बिखरा सा घर निखारने को
चकनाचूर हौसले की सब दर-दीवारें सवारने को
मन से मलबा निकालने को, फिर से तिनकें बटोरने को
कहा मिलेगी तब तक इक छत, सहमी रातें गुजारने को
हिम्मत की बुनियाद धँसी जो, रचने लग जाएँगी सदियाँ
जितना था, सब बहा ले गयी, छोड गयी आँखों में नदिया ॥ २ ॥
- अनामिक
(०४,१६/०३/२०१५)
17 फ़रवरी 2015
दुआ
हर खुशियों में रंग भरे जो
फूल खिले वो तेरे आँगन
हर सुबहा लाए वो सूरज
सब सपने कर दे जो रोशन
सदा सजे मुस्कान लबों पर
जिसे देख शरमाए दर्पन
गूँजे अल्लड हँसी यूँ, किसी
नन्ही की पायल की छनछन
मिले जीत हर जंग में तुझे
हर बादल बरसाए सावन
खुशबू तेरी तारीफों की
महके, जैसे बन में चंदन
ऊँची भरो उडान गगन में
रोक न पाए कोई बंधन
रहो जहा भी, सदा खुश रहो
यही दुआ माँगे मेरा मन
- अनामिक
(२०/१२/२००८, १३/०१/२०१५, १६/०२/२०१५)
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15 फ़रवरी 2015
नाँव
धूप में, या छाँव में
बहाव में, ठहराव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में
प्रीत की नदिया बहे
दो दिलों के गाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ धृ ॥
फूल हो, अंगार हो
मंजिलें दुश्वार हो
हर कदम मिलकर चले तो, जलजलें भी पार हो
काँटें भी तुझ संग लगे
गुदगुदी से पाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ १ ॥
रोक ले ऊँची लहर
या उठे चाहे भँवर
हाथ बस तुम थाम लो, फिर तय करे मुश्किल सफर
तुम बनो मरहम मेरा
दर्द में, हर घाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ २ ॥
- अनामिक
(०८/०९/२०१४ - १४/०२/२०१५)

बहाव में, ठहराव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में
प्रीत की नदिया बहे
दो दिलों के गाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ धृ ॥
फूल हो, अंगार हो
मंजिलें दुश्वार हो
हर कदम मिलकर चले तो, जलजलें भी पार हो
काँटें भी तुझ संग लगे
गुदगुदी से पाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ १ ॥
रोक ले ऊँची लहर
या उठे चाहे भँवर
हाथ बस तुम थाम लो, फिर तय करे मुश्किल सफर
तुम बनो मरहम मेरा
दर्द में, हर घाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ २ ॥
- अनामिक
(०८/०९/२०१४ - १४/०२/२०१५)
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