(१९-२४/०४/२०२४, ०९-११/०६/२०२४)
11 जून 2024
यूँ सताया ना करो
(१९-२४/०४/२०२४, ०९-११/०६/२०२४)
15 अप्रैल 2024
रैन बेचैन है
नींद की गोद में खो गया है शहर
रैन गाती रहे लोरियों की लडी
चाँद की दासताँ है रखी अनकही
जुगनुओं की तरह ख्वाब उडता फिरे
रैन बेचैन है.. चाँद निकला नही || अंतरा-२ ||
(०५-१५/०४/२०२४)
25 नवंबर 2023
सुनी मीठी गज़ल मैंने
01 अक्टूबर 2023
खिला है आसमाँ में चाँद
22 जून 2022
जरा मैं, तू जरा मिलके
जरा मैं, तू जरा मिलके
करे हम इक नयी शुरुआत
ख्वाबों के नगर में इक सुहाना घर बनाएंगे
उमंगो की तरंगों से
भरेंगे रंग फिजा में यूँ
भरी पतझड में भी गुलजार सा मंजर बनाएंगे
जरा मैं, तू जरा मिलके सुहाना घर बनाएंगे || मुखडा ||
लबों से कुछ न कहना तू
जरा बस मुस्कुरा देना
सभी बातें तेरे दिल की बखूबी जान लूंगा मैं
निगाहों के झरोखों से
खुशी तेरी पढूंगा मैं
गमों की छींट भी तुझपे कभी गिरने न दूंगा मैं
बिखर जाऊ कभी मैं राह में, तू ही सहारा हो
तू ही मंजधार में मेरे सफीने का किनारा हो
न कुछ मेरा, न तेरा हो
मिले जो भी, हमारा हो
चलेंगे हर कदम संग, जिंदगी सुंदर बनाएंगे
कयामत तक हमारा साथ हो,
तो क्या नही मुमकिन ?
की रेगिस्तान को भी प्रीत का सागर बनाएंगे
जरा मैं, तू जरा मिलके सुहाना घर बनाएंगे || अंतरा ||
- अनामिक
(१३/०८/२०२१ - २२/०६/२०२२)
20 जून 2022
मेरी निगाहों से
खुदको कभी तू देख ले
10 मार्च 2022
बेसमय के अश्क
गर दर्द छलका है नयन से टीस गहरी है कही
"बस यूँ ही" कहकर टाल दे तू, ना बता, क्या है कमी
पर देखकर रिमझिम नयन मेरी फिकर है लाजमी
ये बेसमय के अश्क तेरे || मुखडा ||
गुमसुम रहे, कुछ ना कहे बेचैन या तनहा रहे
पढकर नजर पहचान लू तू जो चुभन भीतर सहे
जब अश्क की इक बूँद भी तेरी निगाहों से बहे
इन मोतियों के मोल का कुछ इल्म ही तुझको नही
ज़ाया न हो ये, इस लिए कर दू न्योछावर जर-जमीं
ये बेसमय के अश्क तेरे || अंतरा-१ ||
ये दो नयन, हैं दो सितारें पहचान इनकी रोशनी
तू ढूँढ ले खुदकी सहर अंधियारा हो, या चाँदनी
ये ही दुआ मांगू खुदा से खुश रहे तू हर घडी
खिलती रहे मुस्कान की तेरे लबों पे पंखुडी
तू जिस डगर रख दे कदम हो जीत ही आगे खडी
तू हौसलों की डोर से सौ ख्वाब बुन ले रेशमी
ये बेसमय के अश्क तेरे || अंतरा-२ ||
- कल्पेश पाटील
(०१/०५/१९ - १०/०३/२२)
07 सितंबर 2021
जो ख्वाब नैनों में बसा है
मैं हौसले से ख्वाइशों को मंजिलों से जोड दू
आँधी मिले, या जलजलें
ना ही रुकेंगे काफिलें
मैं वक्त पर होकर सवार तकदीर का रुख मोड दू
जो ख्वाब नैनों में बसा है, कैसे उसको छोड दू ?! || मुखडा ||
डर क्या अंधेरे का उसे ?!
जिसकी नजर में रोशनी
उडने गगन भी कम उसे
जिसने बुलंदी हो चुनी
गर ठान लू, पग में बंधी सब बेडियों को तोड दू
जो ख्वाब नैनों में बसा है, कैसे उसको छोड दू ?! || अंतरा-१ ||
इन्सान हूँ.. थककर कभी,
रुककर कभी, झुककर कभी
दो-चार लम्हें बैठ जाऊ
इसका मतलब ये नही की
हार माने टूट जाऊ
जो ख्वाब नैनों में बसा है, कैसे उसको छोड दू ?! || अंतरा-२ ||
- अनामिक
(१४/०९/२०१९ - ०७/०९/२०२१)
01 सितंबर 2021
ये नैना क्या कुछ बोल रहे हैं
ये जता रहे हैं काफी कुछ
ये खामोशी का चिलमन ओढे बता रहे हैं काफी कुछ
31 जुलाई 2021
हम मिले तुम मिले
खुल गयी बंदिशें मिट गए फासलें
हम मिले तुम मिले
चाँदनी की लहर यूँ भिगाकर गयी
धुल गये दर्मियाँ थे जो शिकवें-गिलें
हम मिले तुम मिले || मुखडा ||
रूबरू हम हुए जैसे सागर-नदी
आइने में दिखी जैसे खुद की छवी
मिल गए हाथ यूँ जिंदगी की कडी
धडकनों की लडी दिल से दिल तक जुडी
जब नजर से नजर की हुई गुफ्तगू
मन के आँगन छनकने लगी पायलें
हम मिले तुम मिले || अंतरा-१ ||
लब्ज खामोश थे गा रहे थे नयन
प्रीत की धुन पे हम-तुम हुए थे मगन
छू गये रूह को सुर हुए यूँ बुलंद
हो रहा हो जमीं-आसमाँ का मिलन
रात की ओंस में घुल गयी साँस यूँ
जुगनुओं के नगर ख्वाब उडने चले
हम मिले तुम मिले || अंतरा-२ ||
- कल्पेश पाटील
(०८/०५/२०२१ - ३१/०७/२०२१)
01 जून 2021
सब कह दिया
नजरों से नजरों ने सब कह दिया
गालों की सुर्खी ने मुस्काते चेहरे ने
बिन बोले अधरों ने सब कह दिया
दर्या की महफिल में ख़्वाबीदा साहिल से
जज़बाती लहरों ने सब कह दिया
खुशबू की बोली में धरती के कानों में
बरखा बौछारों ने सब कह दिया
|| मुखडा ||
दिन था वो, या था कोई अफसाना
जिस दिन किस्मत से ही मिल पाए थे हम
दो कदमों का, पर दो जनमों जितना
रस्ता दो पल में संग चल पाए थे हम
नैनों से छलकी खुशियों की भीनी
रिमझिम ने सब कह दिया
दिल की तारों ने धडकन में छेडी
सरगम ने सब कह दिया
आहिस्ता, होले से छूकर एहसासों को
हाथों के रेशम ने सब कह दिया
दो दिल की गलियों में खिलते गुलमोहरों से
ख्वाबों के मौसम ने सब कह दिया
|| अंतरा-१ ||
फिर कब हो मिलना मुश्किल था कहना
काश यूँ ही सदियों चलती अपनी बातें
बोझल थी साँसें पर हसते हसते
निकले हम लेकर यादों के गुलदस्तें
आगे बढकर भी पीछे ही मुडते
कदमों ने सब कह दिया
सपनों में हर दिन मिलते रहने की
कसमों ने सब कह दिया
|| अंतरा-२ ||
- अनामिक
(१३/०६/२०२० - ०१/०६/२०२१)
23 जुलाई 2020
ये नैना
मीठे पानी की झीलें हैं ?
या टिमटिम करते हीरें हैं ?
ये नैना कितने नीले हैं
ये तारों से चमकीले हैं
ये छुइमुइ से शर्मीले हैं
ये नटखट छैल-छबीले हैं
ये नैना कितने नीले हैं
ये अंतरिक्ष की गहराई
ये छुपाए रखे राज कई
ये वास्तव, या आभास कोई ?
ये देन खुदा की खास कोई
पीकर भी बुझती प्यास नही
ये लब्जों बिन ही गजल सुना दे
बन्सी से भी सुरीले हैं
ये नैना कितने नीले हैं
बिन बाणों के ये वार करे
दिल कितनों के बेजार करे
ये नजरों के कजरे से ही
अंजाने कई शिकार करे
जो कत्ल हुए इनसे, उनको भी
ये अमृत के प्यालें हैं
जो डूब गए इनमें, उनकी तो
रातों में भी उजालें हैं
ये नैना कितने नीले हैं
- अनामिक
(०९/०६/२०२०, २३/०७/२०२०)
25 अप्रैल 2020
कह दे ना
दिल में ना रहने दे
अधरों से लब्जों की
लडियाँ अब बहने दे
गुमसुम तू, गुपचुप मैं
खामोश है ये घडियाँ
जजबातों की ठहरी
बहने दे अब नदियाँ
कह दे ना.. कह दे ना..
दिल में जो है, कह दे.. || मुखडा ||
तरसा हूँ अल्हड से सुर तेरे सुनने
पलखों पे झलके हैं तेरे ही सपनें
अखियन के आँगन में आए ना निंदिया
पल पल भी लगता है तुझ बिन यूँ सदियाँ
जलता मन, सावन की
बसरा भी दे झडियाँ
जजबातों की ठहरी
बहने भी दे नदियाँ
कह दे ना.. कह दे ना..
दिल में ना रहने दे
कह दे ना.. कह दे ना..
दिल में जो है, कह दे.. || अंतरा ||
- कल्पेश पाटील
(१०-२५/०४/२०२०)
14 जनवरी 2020
तू जो मिला
मंजिल बिना मेरा सफर
तू जो मिला संजोग से
वीरान तनहा राह पर
चलने लगे फिर सिलसिलें
मिलने लगी गलियाँ नयी
खिलने लगी कलियाँ गुलाबी
जिंदगी की डाल पर
रूठी हुई तकदीर को
रब का इशारा मिल गया
तू जो मिला, यूँ चाँद को
झिलमिल सितारा मिल गया
सोचा न था, बन जाएगा
तू ही जरूरी इस कदर
तेरे सिवा दूजा न अब
दिल को गवारा हमसफर || मुखडा ||
सहमे हुए थे सुर सभी
तुझ संग तराने बन गए
बेनूर थे मंजर सभी
दिलकश नजारे खिल गए
पतझड भरे गलियारों को
रिमझिम फुहारें मिल गयी
बरसों बिछे अंधियारों में
सूरज हजारों खिल गए
ये जिंदगी थी बेदिशा
मक्सद दुबारा मिल गया
तू जो मिला, गुमराह कश्ती को
किनारा मिल गया || अंतरा ||
- अनामिक
(१३/१२/२०१९ - १४/०१/२०२०)
27 मई 2019
पहेलियाँ
शख्सों की, शख्सियतों की
चेहरों के परदों के पीछे छुपी हुई असलियतों की
चलती-फिरती पहेलियाँ हैं इन्सानों के लिबास में
उलझ न जाओ खुद ही इनको सुलझाने के प्रयास में
किसको जानो ? कितना जानो ?
जिसको भी, जितना भी जानो..
जितनी भी नापो गहराई, उससे भी गहरा पानी है
जितनी भी मानो सच्चाई, बिलकुल अलग कहानी है
एक पहेली बूझो तो, झटसे दूजी भी हाजिर है
जिसको जितना समझो भोला, वो उतना ही शातिर है
प्याज की घनी परतों जैसे
सारे परदें खुल जाए जब
मन में थी जो छवी बनी,
उससे कुछ ना मिल-जुल पाए जब
जितनी भी दो मन को तसल्ली
सुद-बुद से समझी और परखी जितनी भी झुठला दो बातें
सच तो सच ही आखिर है
यहा पहेली बनकर जीने में हर कोई माहिर है
- अनामिक
(२६,२७/०५/२०१९)
07 नवंबर 2017
रूबरू
फिर लौट आयी वो घडी
जिस मोड से मैं थी मुडी,
उस मोड पे फिर हूँ खडी
रंगीन ख्वाबों के सफर में अतीत फिर है रूबरू
दो बोगियाँ होकर जुदा भी ना मिली थी मंजिलें
कितनी भी खोलू खिडकियाँ,
गुजरा नजारा ना दिखे
जो रह गया पीछे कही
स्टेशन दुबारा ना दिखे
खिलकर लबों पे चुप हुआ, वो गीत फिर है रूबरू
इक हादसे में खो दिया, वो मीत फिर है रूबरू ॥ अंतरा-१ ॥
खुद ही बुझाई थी कभी, वो आग फिर क्यों जल रही ?
कुछ गलतियाँ, नादानियाँ,
कुछ जिद-घमंड, शिकवें-गिलें
जड से जला देती अगर
होते न पैदा फासलें
वो हार मेरी, गैर की बन जीत फिर है रूबरू
(०१-०७/११/२०१७)
13 अगस्त 2017
कभी ना हो खतम
ये बेसमय चलती हमारी बात भी ना हो खतम
ये चाँदनी की मदभरी बरसात भी ना हो खतम
दिल से छलकते शबनमी जजबात भी ना हो खतम
पर ख्वाब सी ये जादुई मुलाकात भी ना हो खतम
ये उम्रभर के साथ की शुरुआत भी ना हो खतम