11 जून 2024

यूँ सताया ना करो

करके शरारत बेसबब तुम यूँ सताया ना करो 
बस चार पल नज़दीक आके दूर जाया ना करो 

फिर ओढके चिलमन हया का, मुस्कुराके दूर से 
बेनूर दुनिया में मेरी गुलशन सजाया ना करो       || मुखडा || 

होले से बैठे मनचली तितली गुलाबी फूल पर 
तुम मखमली मुस्कान से वैसा ही करती हो असर 

नटखट निगाहों की छुअन से तार दिल की छेडके 
तनहाइयों में प्रीत की सरगम बजाया ना करो 
बस चार पल नज़दीक आके दूर जाया ना करो      || अंतरा-१ || 

आके अचानक रूबरू धडकन बढाती हो कभी 
करके नज़रअंदाज़ फिर नैना लडाती हो कभी 

दस बार मुडके देख फिर अंजान बनती हो कभी 
सब कुछ समझती हो, मगर नादान बनती हो कभी 

पलखें झुकाना हो गया.. नज़रें चुराना हो गया 
बेजार दिल को करने का नुस्खा पुराना हो गया 

आगे बढाओ हाथ अब.. लाओ जुबाँ पर बात अब 
शतरंज की चालों में अब यूँ वक्त ज़ाया ना करो 
बस चार पल नज़दीक आके दूर जाया ना करो      || अंतरा-२ || 

- कल्पेश पाटील 
(१९-२४/०४/२०२४, ०९-११/०६/२०२४) 

06 जून 2024

गम नही

ऐसा दिखा दो शख्स कोई, आँख जिसकी नम नही 
पर जिंदगी की बाग में उम्मीद के गुल कम नही 

इक दिन भरेंगे सब जखम.. फीके पडेंगे दर्द, गम 
बस सब्र रख लो.. वक्त से बढिया कोई मरहम नही 

कल था ढला वो दौर भी.. ये भी ढलेगा दौर कल 
सुइयाँ घडी की भी घडी भर इक जगह कायम नही 

ऐसे लडो तकदीर से, खुद को ही खुद पे नाज हो 
गर जी गए, कर लो जशन.. मिट भी गए तो गम नही 

- कल्पेश पाटील 
(२५/०१/२०१८ - ०६/०६/२०२४)

07 मई 2024

आते रहेंगे रूबरू

नादान है किस्मत बडी.. करती खुराफातें कई 
कितनी दफा हम दोनों को ये ला रही है रूबरू 

संजोग है ? या है इशारा आसमानी मेल का ? 
चाहे न चाहे हम, मगर दास्तान होनी है शुरू          || मुखडा || 

​नटखट समय की साजिशों में बात है कुछ अनकही 
वरना हमारे रासतें बेवक्त टकराते नही 

मक्सद बिना, मतलब बिना इक फूल भी खिलता नही 
यूँ ही नही नजरें हमारी आते-जाते मिल रही 

होगा करिश्मा.. सोचकर कब तक करेंगे इंतजार ? 
यूँ कायनाती सिलसिलें चलते नही हैं बार बार​ 

अब तो पहल करनी पडेगी.. तुम करो, या मैं करू ? 
चाहे न चाहे हम, मगर आते रहेंगे रूबरू                || अंतरा || 

- कल्पेश पाटील 
(२९/०४/२०२४ - ०७/०५/२०२४) 

15 अप्रैल 2024

रैन बेचैन है

रैन बेचैन है.. चाँद निकला नही 
सर्द खामोशियाँ सुरमयी बह रही 

रैन को तो है बस चाँद का इंतजार 
आसमाँ में हजारों सितारें सही 

रैन बेचैन है.. चाँद निकला नही     || मुखडा || 

नींद की गोद में खो गया है शहर 
रैन की पीड से है शहर बेखबर​ 

रैन गाती रहे लोरियों की लडी 
चाँद की दासताँ है रखी अनकही 

रैन बेचैन है.. चाँद निकला नही    || अंतरा-१ || 

बावरा इक दिया है कही जल रहा 
उस उजाले में इक ख्वाब है पल रहा 

जुगनुओं की तरह ख्वाब उडता फिरे 
पर न मंजिल मिले, लौट आए यही 
रह न जाए अधूरा तरसता कही 

रैन बेचैन है.. चाँद निकला नही    || अंतरा-२ || 

- कल्पेश पाटील 
(०५-१५/०४/२०२४) 

25 नवंबर 2023

सुनी मीठी गज़ल मैंने

सुनी मीठी गज़ल मैंने तेरे खामोश अधरों में 
पढी दिल की खबर मैंने तेरी मदहोश नजरों में 
|| मुखडा || 

मुझे बस देखकर तेरा गुलाबों सा महक जाना 
नजर को जब नजर छू ले, हया से नैन झुक जाना 
मचलना धडकनों का दिल में, जैसे नाव लहरों में 
|| अंतरा-१ || 

संदेसें खास भेजेंगे निगाहों के झरोखों से 
जरूरत हो न लब्जों की, करेंगी गुफ्तगू साँसें 
चलेंगे हम हकीकत के परे, ख्वाबों के शहरों में 
|| अंतरा-२ || 

- कल्पेश पाटील 
(२३/०९/२०२३ - २५/११/२०२३) 

01 अक्टूबर 2023

खिला है आसमाँ में चाँद

बडी लंबी अमावस थी 
मगर रब ने सुनी फ़रियाद 
खिला है मुद्दतों के बाद फिरसे आसमाँ में चाँद 
खिला है आज फिरसे चाँद                   || मुखडा || 

फिजाओं में, निगाहों में 
सदी भर के अंधेरे थे 
नजारें चाँद बिन सूने 
भले लाखों सितारें थे 
अंधेरी कैद से आखिर हुई इक रोशनी आजाद 
खिला है आसमाँ में चाँद                  || अंतरा-१ || 

गुज़ारिश चॉंद से अब है 
करे जल्दी न जाने‌ की 
करू दीदार जी भरके 
रहे हसरत‌ न कुछ बाकी 
यूॅं बरसा चॉंदनी की बारिशें, रख लू उमरभर याद 
खिला है आसमाँ में चाँद                  || अंतरा-२ || 

यहा लाखों है दीवाने 
तुम्हारे रूप में ही दंग 
मगर मुझको लुभाता है 
तुम्हारी सादगी का रंग 
लिखू मैं नज़्म तुम पे और सुनाऊ, तुम कहो "इरशाद" 
खिला है आसमाँ में चाँद                  || अंतरा-३ || 

- कल्पेश पाटील 
(२२,३०/०९/२०२३, ०१/१०/२०२३) 

06 अप्रैल 2023

याद आते हो

कभी आसू, कभी मुस्कान बनकर याद आते हो 
कभी सपना, कभी अरमान बनकर याद आते हो 

कभी शबनम की बूँदों सी, कभी रिमझिम फुहारों सी 
कभी जज़बात का तूफान बनकर याद आते हो 

भले दो-चार पल ही तुम रुके दहलीज पे दिल के 
मगर अब उम्र के मेहमान बनकर याद आते हो 

हमारे दर्मियाँ क्या राबता था ? था भरम, या सच ? 
कभी अपना, कभी अंजान बनकर याद आते हो 

किताबें जिंदगी की एक पन्ने पे ही अटकी है 
अधूरी अनकही दास्तान बनकर याद आते हो 

कभी रूठी हुई मुस्कान बनकर याद आते हो 
कभी बिछडा हुआ अरमान बनकर याद आते हो 

- अनामिक 
(०१-०६/०४/२०२३) 

15 अक्टूबर 2022

अलविदा

बस यही तक था सफर, था बस यही तक रासता
बस यही तक साथ था अपना, यही तक वासता

रब ने लिखी थी खुद कभी..
तकदीर ने फिर भी मिटा दी खामखा 
जनमों-जनम की खूबसूरत दासताँ

दो दूर के पहियें कभी लाए थे संग संजोग ने
चलेगी सवारी उम्रभर ये, राह को भी था पता

कुछ भी न थे शिकवें-गिलें, फिर भी बिछ गए फासलें
लगती न अपनों की नजर, तो खूब खिलता राबता

जो इस जनम ना फूल बन पायी मोहब्बत की कली
अगले जनम मिलकर सजाएंगे दिलों का गुलसिताँ

आवाज पहुचेगी न अब, जितनी भी दू दिल से सदा
तो अब निकलता हूँ सखी, लेकर अधूरा अलविदा

- अनामिक
(०६-१५/१०/२०२२) 

09 अक्टूबर 2022

ख्वाबों के बुलबुलें

साबुन के बुलबुलों के जैसे ख्वाब फुलाकर उडा रहा हूँ
इस पल है महफूज, न जाने कल का मंजर क्या होगा !..
बदमाश वक्त की हवा किस दिशा, किस रफ्तार बहेगी कल ?!..
इन अल्हड मेरे ख्वाबों का अंजान मुकद्दर क्या होगा ?!..

वो बस दिखने में नाजुक हैं, पर लड लेंगे पर्बत से भी
वो शोख हवा पे सवार होकर उड भी लेंगे अंबर तक
वो चकमा देंगे तूफानों को, पार करेंगे सागर तक
पर किस्मत जब बनकर आए खूँखार बवंडर, क्या होगा ?!..

इन अल्हड मेरे ख्वाबों का अंजान मुकद्दर क्या होगा ?!..

- अनामिक
(१९/०३/२०२२ - ०९/१०/२०२२) 

22 सितंबर 2022

समझदार सपनें

नादान हुआ करते थे जो.. बेफिक्र जिया करते थे जो
अफसानों के आसमान में खुलकर उडान भरते थे जो

पर जिंदगी के गुरू से कैसा पाठ न जाने सुन बैठे
वो अल्हड, चंचल सपनें मेरे समझदार क्यों बन बैठे ?!..

बेवक्त आँख के दरवाजे पे अब वो दस्तक देते नही
बेवजह रात की गलियारों में नींदों को छेडते नही

वो उडते उडते शायद गलती से वास्तव के नगर गए
और देख नजारा सच्चाई का सहम गए, फिर बदल गए

वो उस दिन से खामोश हुए यूँ, गीत न इक भी गा पाए
अरमानों के गुलशन में नया न इक भी बीज लगा पाए

कमजोर नही थे बिलकुल भी वो, आखिर तक वो डटे रहे
पर कौन बच सका है किस्मत से ? सपनें सारे बिखर गए

- अनामिक
(१८-२३/०९/२०२२) 

14 जुलाई 2022

​ऐ चाँद.. रुक जा

ऐ चाँद.. रुक जा और थोडी देर तू
ना छोडकर जा रोशनी की डोर तू
बेरंग अंधेरे आसमाँ का नूर तू
ऐ चाँद.. रुक जा और थोडी देर तू

ज्यादा नही, थोडा सही
बस और चंद पल तो ठहर
जब तक बुलाए ना सहर
तेरी चाँदनी के नूर से सवार लू दिल का नगर

या फिर ठहर कुछ और वक्त
कुछ दिन, महीनें, या बरस
या इक बडी लंबी सदी
या उम्र, सारी जिंदगी
तुझ संग लगेगा इक जनम भी जैसे इक प्यारी घडी

तू वक्त जितना भी रुके, कम ही लगे.. काफी नही
ऐ चाँद.. रुक भी जा हमेशा के लिए.. मत जा कही
रह जा यही

- अनामिक
(२२/०३/२०२२ - १४/०७/२०२२) 

22 जून 2022

जरा मैं, तू जरा मिलके

जरा मैं, तू जरा मिलके
करे हम इक नयी शुरुआत
ख्वाबों के नगर में इक सुहाना घर बनाएंगे
                        उमंगो की तरंगों से
                        भरेंगे रंग फिजा में यूँ
भरी पतझड में भी गुलजार सा मंजर बनाएंगे
जरा मैं, तू जरा मिलके सुहाना घर बनाएंगे || मुखडा ||

लबों से कुछ न कहना तू
जरा बस मुस्कुरा देना
सभी बातें तेरे दिल की बखूबी जान लूंगा मैं 
                        निगाहों के झरोखों से 
                        खुशी तेरी पढूंगा मैं
गमों की छींट भी तुझपे कभी गिरने न दूंगा मैं

बिखर जाऊ कभी मैं राह में, तू ही सहारा हो
तू ही मंजधार में मेरे सफीने का किनारा हो

न कुछ मेरा, न तेरा हो
मिले जो भी, हमारा हो
चलेंगे हर कदम संग, जिंदगी सुंदर बनाएंगे 
                        कयामत तक हमारा साथ हो, 
                        तो क्या नही मुमकिन ?
की रेगिस्तान को भी प्रीत का सागर बनाएंगे
जरा मैं, तू जरा मिलके सुहाना घर बनाएंगे || अंतरा ||

- अनामिक
(१३/०८/२०२१ - २२/०६/२०२२) 

20 जून 2022

मेरी निगाहों से

ऐ सखी.. ऐ सखी..

खुदको कभी तू देख ले 
मेरी निगाहों से सखी 
दिख जाएगी ऐसी छवी, 
जो खुद तुझे भी न हो दिखी 

कर ले जिकर खुदका कभी 
मेरे लबों से भी सखी 
देंगे सुनाई तारीफों के सुर, 
न अब तक सुन सकी       || मुखडा || 

मैं कैद लब्जों में करू 
तेरी सुहानी खूबियाँ 
वो छोटी-छोटी आदतें, 
मासूम अल्हड हरकतें 

मेरी गज़ल में, नज़्म में 
खुदको कभी पढ ले सखी 
मीठे लगेंगे बोल इतने, 
जैसे मिसरी हो चखी        || अंतरा-१ || 

इक रोज मेरी नींद से 
सपनें चुराकर देख ले 
उनमें करे जादूगरी जो, 
तू ही तो है वो परी 

सौ बातों के भीतर छुपी 
वो बात भी तू जान ले 
फिर प्रीत समझेगी तुझे, 
अब तक जुबाँ पर है रुकी || अंतरा-२ || 

- कल्पेश पाटील 

15 जून 2022

​भगदौड काफी हो गयी

भगदौड काफी हो गयी.. दिल कह रहा अब, बस हुआ
जो धुंद सुहानी थी फिजा में, बन गयी है अब धुआ

चलकर हजारों मील भी आगे दोराहे हैं नये
दौलत समय की खर्च दी बस एक सपनें के लिए

करती रही लहरें समय की वार, दिल ने सब सहा
बरसों सबर का बांध था मजबूत, पर अब ढह रहा

दिखता रहा आगे जजीरा, नाव बहती ही रही
इतने समंदर तर लिए.. की अब छोर की ख्वाइश नही

मैं इस जनम तक क्या, कयामत तक भी कर लू इंतजार
पर बेकदर इन महफिलों में ठहरने का दिल नही

अब सोचता हूँ, छोड दू तकदीर पे ही फैसलें
वरना न हासिल कर सकू, ऐसी कोई मंजिल नही

- अनामिक
(११-१५/०६/२०२२) 

10 जून 2022

चाँद आखिर चाँद है

है साफ.. पानी सा, 
दुआओं सा, इबादत सा ​​
न जिसके रूप में कोई मिलावट 
चाँद आखिर चाँद है ! 

                                पूरा कभी, आधा कभी 
                                होंगे, न होंगे दाग भी 
                                फिर भी है बेहद खूबसूरत 
                                चाँद आखिर चाँद है ! 

साज की, श्रृंगार की, 
बाहरी दिखावे की नही है चाँद को कोई जरूरत 
चाँद आखिर चाँद है ! 

माना, कठिन बिलकुल नही, बनना सितारों सा, मगर.. 
बनना जरूरी भी तो नही, अपना अलगपन छोडकर 

गर चाँद भी झिलमिल सितारों की नदी में बह गया 
तो चाँद में और बाकियों में फर्क ही क्या रह गया ? 

है ये गुजारिश चाँद से, 
"बदलाव की जद्दोजहद में 
खो न दे अपनी नजाकत" 
चाँद आखिर चाँद है ! 

भीनी सी शीतल चाँदनी ही चाँद की पहचान है 
है चाँद तो सबसे जुदा.. उसमें ही उसकी शान है 

क्यों की.. 
चाँद आखिर चाँद है ! 

- अनामिक 
(०७/०५/२०१९ - १०/०६/२०२२) 

01 जून 2022

पुन्हा गाठ व्हावी

उन्हाच्या मनी सावलीचे ठसे
सावलीच्या मनीही उन्हाचे कवडसे
तरी मौन हळवे हवेतून वाहे
कुणा ना कळे, व्यक्त व्हावे कसे

उन्हाने पुन्हा सावलीला स्मरावे
पुन्हा सावलीने उन्हा साद द्यावी
नभाने करावी निळीशार किमया
उन्हा-सावलीची पुन्हा गाठ व्हावी || धृ ||

किती त्या झळा तप्त भाळी उन्हाच्या
किती गारठा सावलीच्या तळाशी
किती एकटे ते परीघात अपुल्या
अता मात्र जवळीक व्हावी जराशी

जुनी रात्र सरुनी नवी पहाट व्हावी
उन्हा-सावलीची पुन्हा गाठ व्हावी || १ ||

किती लोटले ते हिवाळे, उन्हाळे
किती दाटले भावनांचे उमाळे
किती आर्त गाणी दडवली ऋतूंनी
किती साठले ते नभी मेघ काळे

सुरांना, सरींना खुली वाट व्हावी
उन्हा-सावलीची पुन्हा गाठ व्हावी || २ ||

- अनामिक
(३१/०३/२०२२ - ०१/०६/२०२२) 

24 मई 2022

है याद वो दिन आज भी

है याद वो दिन आज भी.. है आज तक जिसका असर 
पहली दफा टकराई थी इक-दूसरे से जब नजर 
जब हम अचानक आ गए थे रूबरू इक मोड पर 
कालीन जैसी बन गयी थी रोज की ही वो डगर 

इक-दूसरे को हम भले पहचानते भी थे नही 
फिर भी लगा था, दर्मियाँ है कुछ पुराना राबता 
जेसे निगाहों में लिखी थी अनकही इक दासताँ 

मुस्कान भीनी थी खिली शायद हमारे होंठो पर 
मन भी किया था बोलने का, लब्ज ना निकले मगर 
इक-दूसरे को उस समय पहचानते जो थे नही 

बस दो पलों का मेल था.. संजोग का सब खेल था 
उन दो पलों ने दो दिलों पर कर दिया गहरा असर 
भरकर जहन में वो घडी हम चल दिए अपनी डगर 

है याद वो दिन आज भी.. मुद्दतों के बाद भी.. 

- अनामिक 
(१२-२४/०५/२०२२)

29 अप्रैल 2022

ये वक्त है, या है नदी ?!

ये वक्त है, या है नदी ?!
किस ओर बहती जा रही ?..
रफ्तार इसकी तेज़ इतनी, है समझ के भी परे
जाने कहाँ ले जा रही ?..
​क्या कुछ बहा ले जा रही
कैसे उभर पाए भला, इक बार जो इसमें गिरे ? 
ये वक्त है, या है नदी ?!                            || धृ ||

चंचल पलों की रेत
मुठ्ठी से फिसलती जा रही
पलखें झपकते ही यहाँ
सदियाँ बदलती जा रही
ये वक्त क्यों माने न मद्धम जिंदगी के दायरें ? 
ये वक्त है, या है नदी ?!                            || १ ||

तैरे भला तो किस दिशा ?
ढूँढे जज़ीरा कौनसा ?
इस पार, या उस पार का, थामे किनारा कौनसा ?
सीखे कहाँ मंझधार में से लौटने के पैंतरें ?
ये वक्त है, या है नदी ?!                            || २ ||

चलते रहे बरसों मुसाफिर जिंदगी की रहगुज़र
पर खींच ले भीतर उन्हें जब वक्त का गहरा भवर
सीधे सयाने शख्स भी बन जाते हैं तब बावरे
ये वक्त है, या है नदी ?!                            || ३ ||

- अनामिक
(२३/०३/२०२२ - २९/०४/२०२२)

17 अप्रैल 2022

शुरुआत

ये वक्त के हैं फासलें.. 
या फासलों का वक्त है ?! 
पर फासलों से क्या कभी हो जाते कम जज़बात हैं ?! 

जब मुस्कुराती थी सहर 
खिलती चहकती सांझ थी 
उन यादों में गुम आज भी इक चाँदनी की रात है 

आए गए सावन कई 
बैसाख भी तो कम नही 
इक धूप की राहों में मुद्दत से रुकी बरसात है 

तकदीर के ही पैंतरें 
तकदीर के ही फैसलें 
कठपुतलियों के खेल में क्या जीत, और क्या मात है ?! 

इस ओर से निकली सदा 
उस छोर पहुँचेगी जरूर
कब, कैसे आए लौटकर.. संजोग की ही बात है 

उस मोड आकर थम गयी थी 
इक सुरीली दासताँ 
जिस मोड पर ऐसा लगा था, हाँ यही शुरुआत है 

- अनामिक 
(९-१४/०२/२०२२, १७/०४/२०२२) 

15 अप्रैल 2022

आसान ही क्या है भला ?!

मक्सद बिना जिंदा रहे, वो जान ही क्या है भला ?!
जो चैन से सोने दे, वो अरमान ही क्या है भला ?!

क्यों फिक्र है, की कोशिशों का फायदा कुछ हो, न हो ?!
इक बार करके देख ले.. नुकसान ही क्या है भला ?!

जन्नत तलक जो ले चले, वो राह मुश्किल है बडी
पर जिंदगी की दौड में आसान ही क्या है भला ?!

यूँ ही न किस्मत से खुलेंगी आसमाँ की खिडकियाँ
घायल न कर दे पंख जो, वो उडान ही क्या है भला ?!

जब गम चखो, तो ही खुशी का स्वाद चलता है पता
अश्कों बिना खिल जाए, वो मुस्कान ही क्या है भला ?!

तूफान आते हैं टटोलने कश्तियों का हौसला
लहरों से माने हार, वो इन्सान ही क्या है भला ?!

पूरी करे 'वो' सब मुरादें, पहले शिद्दत तो दिखा
बस मन्नतों से माने, वो भगवान ही क्या है भला ?!

- अनामिक