पुन्हा मी वाचले सारे तुझ्या डोळ्यात दडलेले
पुन्हा मी ऐकले गाणे तुझ्या ओठात अडलेले ॥ धृ ॥
मला बघताच हास्याची कळी हलकेच फुलणारी
जरा नजरानजर होता खळी गालात खुलणारी
पुन्हा टिपले मी चेहऱ्यावर गुलाबी रंग चढलेले
पुन्हा मी वाचले सारे.. ॥ १ ॥
भिडे या अंतरी जर सूर त्या हळुवार स्पंदांचा
कळे जर अर्थ मौनाचा, कशाला भार शब्दांचा ?
खुणावे पापण्यांना द्वार स्वप्नांचे उघडलेले
पुन्हा मी वाचले सारे.. ॥ २ ॥
- अनामिक
(०६/०१/२०१७ - ०७/०२/२०१७)
07 फ़रवरी 2017
15 जनवरी 2017
संक्रांत
घुसमट सारी आज संपवू, किती रहावे शांत अता ?
मिटवूया चल अपुल्यातल्या अबोल्याची संक्रांत अता ॥ धृ ॥
गुळाएवढा गोड नको, पण
तिळाएवढा शब्द तरी
नकोत गप्पा दिलखुलास, पण
तुटकासा संवाद तरी
पुष्कळ झाले रुसवे-फुगवे, नको बघूया अंत अता ॥ १ ॥
पतंग माझ्या खुळ्या मनाचा
तुझ्याच गगनी भिरभिरतो
मांजा तुटला तरी वाट हा
तुझ्या अंगणाची धरतो
पुन्हा जोडुनी तुटके धागे करू नवी सुरुवात अता ॥ २ ॥
- अनामिक
(१४,१५/०१/२०१७)
13 जनवरी 2017
राही
चले तेज इस कदर जिंदगी, थमने की न इजाजत है
बिता सकू इक मकाम ज्यादा समय, न इतनी फुरसत है
नयी मंजिलें, नये नजारों की नजरों को दावत है
चलू अकेला, बने काफिला.. जो भी आए, स्वागत है
जिसको जुडना है, जुड जाए.. जिसको मुडना है, मुड जाए
मैं तो अपनी राह चलूंगा, कदम जिस दिशा बढ जाए
हाँ, रुक जाता हूँ उसकी खातिर, जिसे हमसफर बना सकू
इक बार रुकू, दो बार.. मगर नामुमकिन है सौ बार रुकू
- अनामिक
(२९/१२/२०१६ - १३/०१/२०१७)
06 जनवरी 2017
सौगात जाया हो गयी
उस सांझ छेडी अनकही वो बात जाया हो गयी
मन में सजी ख्वाबों की वो बारात जाया हो गयी
वो साफ दिल से पेश की सौगात जाया हो गयी
उसको सजाने में जगी वो रात जाया हो गयी
वो बंद मुठ्ठी में छुपी कायनात जाया हो गयी
दिल से लिखी दास्तान की शुरुवात जाया हो गयी
वो कोशिशें, शिद्दत, जतन, जजबात जाया हो गये
उस रात आँखों से गिरी बरसात जाया हो गयी
- अनामिक
(०४-०६/०१/२०१७)
05 जनवरी 2017
बचपना
यूँ सूझा है आज बचपना, दर्या किनारे आया हूँ
बचपन के सब खेल सलोने यादों के संग लाया हूँ
देखो मेरा रेत का महल, सजा रही हैं शंख-सीपियाँ
लहरों की गोदी में तैर रही है वो कागज की नैया
वहा हवा संग गपशप करते उंगली से बांधे गुब्बारें
कैद बुलबुलों में साबुन के उडे जा रहे सपनें न्यारे
वहा गगन में मेघों के संग लडा रही है पेंच पतंग
नाम लिखे हैं साहिल पे जो, चूम रही है शोख तरंग
बचपन की उन यादों को बचपन में ही क्यों कैद रखे ?
क्यों न बडे होकर भी उनका नये सिरे से स्वाद चखे ?
- अनामिक
(१०/१२/२०१६ - ०५/०१/२०१७)
बचपन के सब खेल सलोने यादों के संग लाया हूँ
देखो मेरा रेत का महल, सजा रही हैं शंख-सीपियाँ
लहरों की गोदी में तैर रही है वो कागज की नैया
वहा हवा संग गपशप करते उंगली से बांधे गुब्बारें
कैद बुलबुलों में साबुन के उडे जा रहे सपनें न्यारे
वहा गगन में मेघों के संग लडा रही है पेंच पतंग
नाम लिखे हैं साहिल पे जो, चूम रही है शोख तरंग
बचपन की उन यादों को बचपन में ही क्यों कैद रखे ?
क्यों न बडे होकर भी उनका नये सिरे से स्वाद चखे ?
- अनामिक
(१०/१२/२०१६ - ०५/०१/२०१७)
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04 जनवरी 2017
कधीतरी वाटेलच की
हास्याचे उसने कारंजे कधीतरी आटेलच की
धीर संयमाचा मुखवटा कधीतरी फाटेलच की
गोष्ट संपली अर्ध्यातच, समजून अचानक मिटलेले
पुस्तक ते उघडून पहावे, कधीतरी वाटेलच की
किती नद्या अडवून ठेवल्या डोळ्यांच्या धरणांनी, पण
तळे पापण्यांच्या काठावर कधीतरी साठेलच की
किती पळावे सशासारखे शर्यतीत नवस्वप्नांच्या
आठवणींचे हळवे कासव कधीतरी गाठेलच की
सहज मिसळतो, रमतो हल्ली अनोळख्यांच्याही गर्दीत
घोळक्यातही त्या एकाकी कधीतरी वाटेलच की
पुन्हा नव्याने खुल्या गळ्याने जीवनगाणे गाइनही
चुकून येता सूर जुने ओठात कंठ दाटेलच की
- अनामिक
(०२-०४/०१/२०१७)
धीर संयमाचा मुखवटा कधीतरी फाटेलच की
गोष्ट संपली अर्ध्यातच, समजून अचानक मिटलेले
पुस्तक ते उघडून पहावे, कधीतरी वाटेलच की
किती नद्या अडवून ठेवल्या डोळ्यांच्या धरणांनी, पण
तळे पापण्यांच्या काठावर कधीतरी साठेलच की
किती पळावे सशासारखे शर्यतीत नवस्वप्नांच्या
आठवणींचे हळवे कासव कधीतरी गाठेलच की
सहज मिसळतो, रमतो हल्ली अनोळख्यांच्याही गर्दीत
घोळक्यातही त्या एकाकी कधीतरी वाटेलच की
पुन्हा नव्याने खुल्या गळ्याने जीवनगाणे गाइनही
चुकून येता सूर जुने ओठात कंठ दाटेलच की
- अनामिक
(०२-०४/०१/२०१७)
31 दिसंबर 2016
ऐ गुजरते साल
ऐ गुजरते साल, तुमने बिन कहे क्या कुछ दिया
लब्ज भी कम पड रहे करने तुम्हारा शुक्रिया
कुछ पुराने दोस्त छूटे, कुछ नये साथी मिले
कुछ सुहाने ख्वाब रूठे, कुछ हसीं सपनें खिले
बेजान कविता, शायरी को मिल गयी संजीवनी
दिलकश धुनें खामोश मन को फिर लगी हैं सूझनी
घूमने के शौक ने भी मंजिलें ढूँढी नयी
और भीतर के मुसाफिर ने मकाम पाए कई
हाँ ठीक है, जाते हुए तुमने भिगाए नैन है
पर लबों की ये हसी भी तो तुम्हारी देन है
- अनामिक
(३०,३१/१२/२०१६)
22 दिसंबर 2016
तोहफा
दूर शहर से लाए उस तोहफे का मुझसे सवाल है
"लाए हो जिनके लिए, उन्हे कब देने का खयाल है ?
दराज में ही रखना था, तो इतनी याद से लाए ही क्यों ?
उनके पास पहुँचने अब बेसब्री से बुरा हाल है"
मैंने बोला, "तू तो क्या, मैं चाँद तोडकर भी ला दू
पर एक चाँद को चाँद दूसरा देने में क्या कमाल है ?
सब्र रख, तुझे सही वक्त पे नजराने सा पेश करू
उनको भी तो लगे, की देनेवाला भी बेमिसाल है"
- अनामिक
(०८,२१,२२/१२/२०१६)
19 दिसंबर 2016
इंतजार नही
हाँ, आज भी खुले हैं दिल के खिडकी दरवाजें तेरे लिए
पर अब आँखों की चौखट को तेरा कोई इंतजार नही
तू आए तो बाहें खोले जिंदगी करेगी स्वागत ही
पर ना भी आए, तो भी कोई गम, शिकवा, तकरार नही
हाँ, कभी कभी तेरे खयाल की तितली उडती हैं मन में
पर जजबातों के फूलों में अब बचा महकता प्यार नही
गलती से छिडता है गिटार पे तुझपे रचा हुआ नगमा
पर गिटार की तारों में अब वो पहले की झनकार नही
माना पत्थर पे तराशे हुए नाम मिटाना मुश्किल हैं
पर वक्त की दवा से न ठीक हो, ऐसा कोई वार नही
- अनामिक
(१८,१९/१२/२०१६)
14 दिसंबर 2016
सफर
कभी इस शहर, कभी उस नगर
कभी ये गली, कभी वो डगर
रुकने का ना नाम ले रहा
शुरू हुआ इक बार जो सफर ॥ धृ ॥
कभी ये गली, कभी वो डगर
रुकने का ना नाम ले रहा
शुरू हुआ इक बार जो सफर ॥ धृ ॥
कभी पर्बतों की ऊँचाई
कभी नदी की गहराई
कभी पत्थरों की सुंदरता
कभी किले की तनहाई
चख लेती है कितने मंजर
तितली बनकर शोख नजर ॥ १ ॥
कभी नदी की गहराई
कभी पत्थरों की सुंदरता
कभी किले की तनहाई
चख लेती है कितने मंजर
तितली बनकर शोख नजर ॥ १ ॥
हर हफ्ते है नया ठिकाना
नक्शे पर इक नया निशाना
हो ना हो जाने की मनशा
बन जाए खुद-ब-खुद बहाना
बंधा ही रखू अपना बस्ता
आए बुलावा, चलू बेफिकर ॥ २ ॥
हो ना हो जाने की मनशा
बन जाए खुद-ब-खुद बहाना
बंधा ही रखू अपना बस्ता
आए बुलावा, चलू बेफिकर ॥ २ ॥
- अनामिक
(११-१४/१२/२०१६)
(११-१४/१२/२०१६)
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08 दिसंबर 2016
महूरत
इक बात भी करने कभी यूँ तो न फुरसत है तुम्हे
कैसे मिला फिर आज आने का महूरत है तुम्हे ?
अब आ गए संजोग से, तो चार पल संग बैठ लो
कुछ खैर मेरी पूछ लो, कुछ हाल अपना बाँट लो
मैं मन ही मन में रोज तुम से अनगिनत गप्पें करू
पर सूझ कुछ भी ना रहा, जब आज हो तुम रूबरू
बस काम की और काज की ही बात कब से चल रही
पर क्या करू ? तुमको अलग कुछ जिक्र ही भाता नही
जो बस चले मेरा अगर, दिन भर यही बैठे रहे
ना हो जुबाँ से बात भी, सब कुछ निगाहों से कहे
पर दो मिनट में तुम कहोगे, "देर काफी हो गयी"
तुम टोकने से पहले ही मैं खुद कहू, "निकले अभी"
अब उठ गए, तो सूझती हैं सैंकडों बातें भली
अफसोस, अब बस दो कदम पर है जुदा अपनी गली
मदहोश रह लू आज, ख्वाबों का खिला जो गुलसिताँ
आए न आए फिर कभी ऐसा महूरत, क्या पता ?
- अनामिक
(०२-०८/१२/२०१६)
04 दिसंबर 2016
ठीक है
रचता गया मैं तारिफों के फूल उसकी राह में
उसने कहा बस, "ठीक है"
लिखता गया कितने सुहाने गीत उसकी चाह में
उसने कहा बस, "ठीक है"
उसके लबों मुस्कान लाने की सदा की कोशिशें
मांगे बिना करता रहा पूरी सभी फर्माइशें
जो बन सका, सब कुछ किया उसकी फिकर, पर्वाह में
ना लब्ज कम पडने दिए उसकी स्तुती, वाह-वाह में
उसने कहा बस, "ठीक है"
उसकी हथेली में सजा दू चाँद-तारें भी अगर
रुख मौसमों का मोडकर ला दू बहारें भी अगर
वो बस कहेगी, "ठीक है"
मैं तितलियों से रंग चुराकर जिंदगी उसकी भरू
मैं बिजलियों को तोड उसके पैर की पायल करू
वो बस कहेगी, "ठीक है"
वो है अगर यूँ बेकदर, सब जानकर भी बेखबर
मैं सोचता हूँ, बस हुआ.. अब मोड लू अपनी डगर
मैं भी कहू अब, "ठीक है"
उसने कहा बस, "ठीक है"
लिखता गया कितने सुहाने गीत उसकी चाह में
उसने कहा बस, "ठीक है"
उसके लबों मुस्कान लाने की सदा की कोशिशें
मांगे बिना करता रहा पूरी सभी फर्माइशें
जो बन सका, सब कुछ किया उसकी फिकर, पर्वाह में
ना लब्ज कम पडने दिए उसकी स्तुती, वाह-वाह में
उसने कहा बस, "ठीक है"
उसकी हथेली में सजा दू चाँद-तारें भी अगर
रुख मौसमों का मोडकर ला दू बहारें भी अगर
वो बस कहेगी, "ठीक है"
मैं तितलियों से रंग चुराकर जिंदगी उसकी भरू
मैं बिजलियों को तोड उसके पैर की पायल करू
वो बस कहेगी, "ठीक है"
वो है अगर यूँ बेकदर, सब जानकर भी बेखबर
मैं सोचता हूँ, बस हुआ.. अब मोड लू अपनी डगर
मैं भी कहू अब, "ठीक है"
- अनामिक
(३०/११/२०१६ - ०४/१२/२०१६)
(३०/११/२०१६ - ०४/१२/२०१६)
21 नवंबर 2016
प्रतीक्षा
शांत आहे आज सागर
सुन्न आहे सांजवारा
लाट चंचल स्तब्ध आहे
मौन पांघरुनी किनारा
ये सखे परतून लवकर, अंत बघते ही प्रतीक्षा
बघ कसे अस्वस्थ सारे फक्त नसण्याने तुझ्या ॥ धृ ॥
रोजची ती पाखरांची धुंद किलबिल बंद आहे
पौर्णिमेच्या चांदव्याचे चांदणेही मंद आहे
आठवण येता तुझी होतो मनी नुसता पसारा
ये अता, चैतन्य पसरव गोड हसण्याने तुझ्या ॥ १ ॥
चार दिवसांचा दुरावा, युग उलटल्यासारखा
वाट बघुनी क्षीण झाल्या अंबरातिल तारका
बेचैन भिरभिरते नजर, पण सापडत नाही निवारा
तृप्त कर व्याकुळ मना अवचित बरसण्याने तुझ्या ॥ २ ॥
- अनामिक
(१३-२१/११/२०१६)
19 नवंबर 2016
क्या पसंद आए
खुदा ही तय करे, किसको किसी में क्या पसंद आए
किसे रंग-रूप, किसको मखमली काया पसंद आए
किसे तीखी निगाहें, शरबती आँखें लुभाती हैं
किसे लहराती जुल्फों का घना दर्या पसंद आए
किसी को गाल की लाली, किसे काजल सुहाता है
किसे नाजुक लबों की सुर्ख पंखुडियाँ पसंद आए
किसे नखरें पसंद, कोई अदाओं का है दीवाना
किसे सिंगार, झुमकें, चूडियाँ, बिंदिया पसंद आए
ये सब कुछ हो न हो तुझ में, मुझे ना फर्क पडता है
मुझे बस सादगी तेरी, शर्मो-हया पसंद आए
- अनामिक
(२८/१०/२०१६, १८,१९/१२/२०१६)
12 नवंबर 2016
आशियाना
गुमराह पत्ते की तरह था उड रहा सपना पुराना
अब ठिकाना मिल गया
दिल चाहता था उस जगह, छोटा सही, पर इक सुहाना
आशियाना मिल गया ॥ धृ ॥
अब ठिकाना मिल गया
दिल चाहता था उस जगह, छोटा सही, पर इक सुहाना
आशियाना मिल गया ॥ धृ ॥
अटके पडे थे सुर सभी गुमसुम लबों की कैद में
सोए हुए थे गीत भी सूखी कलम की गोद में
इक बांसुरी गूँजी अचानक,
बेजुबाँ इस जिंदगी को इक तराना मिल गया
आशियाना मिल गया ॥ १ ॥
सोए हुए थे गीत भी सूखी कलम की गोद में
इक बांसुरी गूँजी अचानक,
बेजुबाँ इस जिंदगी को इक तराना मिल गया
आशियाना मिल गया ॥ १ ॥
कुछ बीज धरती में दफन थे, बारिशों की प्यास में
बेताब थे अंकुर दबे, संजीवनी की आस में
बरसी घटा, कलियाँ खिली,
बंजर जमीं को आज फूलों का खजाना मिल गया
आशियाना मिल गया ॥ २ ॥
बेताब थे अंकुर दबे, संजीवनी की आस में
बरसी घटा, कलियाँ खिली,
बंजर जमीं को आज फूलों का खजाना मिल गया
आशियाना मिल गया ॥ २ ॥
मेहनत, लगन की, हौसले की जंग थी तकदीर से
पंछी इरादों के बंधे थे वक्त की जंजीर से
किस्मत हुई जो मेहरबाँ,
तोहफा मिला कुछ खास यूँ, मानो जमाना मिल गया
आशियाना मिल गया ॥ ३ ॥
पंछी इरादों के बंधे थे वक्त की जंजीर से
किस्मत हुई जो मेहरबाँ,
तोहफा मिला कुछ खास यूँ, मानो जमाना मिल गया
आशियाना मिल गया ॥ ३ ॥
- अनामिक
(१०-१२/११/२०१६)
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28 अक्टूबर 2016
अचानक ही नही होता
गज़ल का जनम कागज़ पर अचानक ही नही होता
भला इन्सान यूँ शायर अचानक ही नही होता
गिरे जब एक चिंगारी, कई पत्तें सुलगते हैं
धुआँ खामोश जंगल भर अचानक ही नही होता
न जाने मुश्किलें कितनी नदी है पार कर आती
खुशी से चूर तब सागर अचानक ही नही होता
सितारें जल रहे हैं चाँद की ख्वाइश में सदियों से
उजागर रात में अंबर अचानक ही नही होता
मोहब्बत है नशा ज़ालिम, ज़रा धीमे ही चढती है
असर इसका भले दिल पर अचानक ही नही होता
- अनामिक
(२३/०९/२०१६ - २८/१०/२०१६)
22 अक्टूबर 2016
ख्वाब ख्वाब
अभी आँख लगने वाली थी,
की तेरे ख्वाबों के पंछी
आ भी गए सताने को
तुझे भी कहा नींद है वहा
इसी लिए भेजा है इनको
दिल का हाल जताने को
ये भी कोई समय है भला ?
नींद सुकूँ की छोड-छाडकर
ख्वाब ख्वाब हम खेल रहे हैं
तू इक सपना भेज नजर से
इधर पकड लू मैं पलखों में
ख्वाब हर तरफ फैल रहे हैं
ख्वाब रसीला.. ख्वाब शबनमी..
नटखट.. चंचल.. ख्वाब रेशमी..
ख्वाब नासमझ.. ख्वाब बावरा..
ख्वाब गुदगुदाता.. शरारती..
ख्वाब मुस्कुराता.. जज़बाती..
ख्वाब महकता.. ख्वाब सुनहरा..
इतने सारे ख्वाब निराले
भला कहा से लाती है तू ?
इन्हे भेजना अब बस भी कर
कल के लिए बचाकर रख कुछ
बाढ आ गयी है ख्वाबों की
ख्वाब ख्वाब ही हैं अब घर भर
- अनामिक
(२२/१०/२०१६)
की तेरे ख्वाबों के पंछी
आ भी गए सताने को
तुझे भी कहा नींद है वहा
इसी लिए भेजा है इनको
दिल का हाल जताने को
ये भी कोई समय है भला ?
नींद सुकूँ की छोड-छाडकर
ख्वाब ख्वाब हम खेल रहे हैं
तू इक सपना भेज नजर से
इधर पकड लू मैं पलखों में
ख्वाब हर तरफ फैल रहे हैं
ख्वाब रसीला.. ख्वाब शबनमी..
नटखट.. चंचल.. ख्वाब रेशमी..
ख्वाब नासमझ.. ख्वाब बावरा..
ख्वाब गुदगुदाता.. शरारती..
ख्वाब मुस्कुराता.. जज़बाती..
ख्वाब महकता.. ख्वाब सुनहरा..
इतने सारे ख्वाब निराले
भला कहा से लाती है तू ?
इन्हे भेजना अब बस भी कर
कल के लिए बचाकर रख कुछ
बाढ आ गयी है ख्वाबों की
ख्वाब ख्वाब ही हैं अब घर भर
- अनामिक
(२२/१०/२०१६)
19 अक्टूबर 2016
मैं गौर भी करता नही
यूँ ही किसी के गाँव की मैं सैर भी करता नही
पर ठान लू, मंजिल वही, तो देर भी करता नही
पर ठान लू, मंजिल वही, तो देर भी करता नही
मैं छेडता हूँ बात खुद तुझसे, समझ खुशकिस्मती
वरना किसी भी गैर पे मैं गौर भी करता नही
वरना किसी भी गैर पे मैं गौर भी करता नही
हसके नजरअंदाज तेरी सब करू गुस्ताखियाँ
वरना किसी की गलतियों की खैर भी करता नही
वरना किसी की गलतियों की खैर भी करता नही
फुरसत मिले तो पढ कभी तुझ पे रची नज्में सभी
यूँ ही किसी पे पेश मैं इक शेर भी करता नही
यूँ ही किसी पे पेश मैं इक शेर भी करता नही
कुछ बात है दिल में, तभी पैगाम दोस्ती का लिखा
वरना किसी अंजान से मैं बैर भी करता नही
वरना किसी अंजान से मैं बैर भी करता नही
- अनामिक
(१९/१०/२०१६)
(१९/१०/२०१६)
18 अक्टूबर 2016
कत्ल
वो भी क्या दिन था.. बडा अजब.. यादगार था
हुआ छुरी-बंदूक बिना ही दिल पे वार था
समझ न आया, घायल किस हथियार ने किया
शायद इक सूरत, हसी, अदा का शिकार था
बचाव में मैं ढाल उठाने से पहले ही
तीर नजर का इन आँखों के आरपार था
मुझे इल्म था, कत्ल मेरा होनेवाला है
मगर पसंद के हाथों मरने का खुमार था
उसे देख जी भर सुकून से मर भी जाता
धडकन अटकी थी, पर तब कातिल फरार था
हक्काबक्का रह गयी भरी महफिल सुनके
मरके भी वही नाम लब पे बारबार था
सोचा, आखिर अब तो बंद कर ही लू आँखें
पर उसका ही सपना पलखों पे सवार था
- अनामिक
(१५-१७/१०/२०१६)
13 अक्टूबर 2016
मखमली भास
अघटित आज घडले, दिवस खास होता
जिथे थांबला दोन क्षण श्वास होता
मला पाहिले आज वळुनी तिनेही
अहा, मखमली तो किती भास होता ॥ धृ ॥
कटाक्षात होता गुलाबी इशारा
कसा रोमरोमात उठला शहारा
मनी नाचला मोर, फुलला पिसारा
नजर ती जणू रेशमी फास होता
अहा, मखमली तो किती भास होता ॥ १ ॥
दिसे तेच स्वप्नी, वसे या मनी जे
खरे मानले, भासले त्या क्षणी जे
निळेशार मृगजळ सुन्या अंगणी जे
अता तेच मिळवायचा ध्यास होता
अहा, मखमली तो किती भास होता ॥ २ ॥
निथळलो मधुर गैरसमजात थोडा
दिला कल्पनांचा पिटाळून घोडा
तसा सुज्ञ, झालो जरा आज वेडा
उद्या वास्तवाचाच सहवास होता
अहा, मखमली तो किती भास होता ॥ ३ ॥
- अनामिक
(१३/०९/२०१६ - १३/१०/२०१६)
12 अक्टूबर 2016
हश्र क्या होगा
यूँ अपनी सादगी से ही वो दिल पे घाव करते हैं
उतर आए अगर सिंगार पे, तो हश्र क्या होगा ?
करे जब बात वो, खुशबू हवाओं में बिखरती है
तो सोचो, साँस में उनकी महकता इत्र क्या होगा ?
बँधी जुल्फों की लहरों से ही दिल में बाढ आती है
अगर सैलाब उनका खुल गया, तो कहर क्या होगा ?
दुआ में माँगता हूँ सिर्फ उनका चंद पलों का साथ
मिले जो उम्र की सोहबत, खुदा का शुक्र क्या होगा ?
गजब वो दिख रहे हैं आज, दिल की बात कहने दो
रुका हूँ मुद्दतों से, और मुझसे सब्र क्या होगा ?
- अनामिक
(०७,०८/१०/२०१६)
उतर आए अगर सिंगार पे, तो हश्र क्या होगा ?
करे जब बात वो, खुशबू हवाओं में बिखरती है
तो सोचो, साँस में उनकी महकता इत्र क्या होगा ?
बँधी जुल्फों की लहरों से ही दिल में बाढ आती है
अगर सैलाब उनका खुल गया, तो कहर क्या होगा ?
दुआ में माँगता हूँ सिर्फ उनका चंद पलों का साथ
मिले जो उम्र की सोहबत, खुदा का शुक्र क्या होगा ?
गजब वो दिख रहे हैं आज, दिल की बात कहने दो
रुका हूँ मुद्दतों से, और मुझसे सब्र क्या होगा ?
- अनामिक
(०७,०८/१०/२०१६)
01 अक्टूबर 2016
छोटी छोटी बातें
भले दिखे ना तू अप्सरा जितनी खूबसूरत
चमक-धमक, सिंगार की नही तुझे जरूरत
बडी खासियत, बहोत अनोखे गुण कोई ना होते भी
दिल को छू जाती हैं तेरी छोटी छोटी बातें भी
चमक-धमक, सिंगार की नही तुझे जरूरत
बडी खासियत, बहोत अनोखे गुण कोई ना होते भी
दिल को छू जाती हैं तेरी छोटी छोटी बातें भी
किसी राज सी गहरी कंचों जैसी आँखें
पलखों पे वो भीनी सी काजल की रेखा
नाजुक उंगली में इक सबसे अलग अंगूठी
माथे पे वो हलका सा कुमकुम का टीका
क्लिप से कैद कर रखा वो जुल्फों का सैलाब
जूही की कलियों जैसे वो नन्हे से लब
पलखों पे वो भीनी सी काजल की रेखा
नाजुक उंगली में इक सबसे अलग अंगूठी
माथे पे वो हलका सा कुमकुम का टीका
क्लिप से कैद कर रखा वो जुल्फों का सैलाब
जूही की कलियों जैसे वो नन्हे से लब
रहन-सहन में बसी सादगी
लिबास से झलकती नजाकत
खोए रहने को खुद का जग
हर काम में लगन और शिद्दत
शांत शख्सियत है वैसे, पर
दोस्तों संग बहोत चहचहाहट
खोए रहने को खुद का जग
हर काम में लगन और शिद्दत
शांत शख्सियत है वैसे, पर
दोस्तों संग बहोत चहचहाहट
और भला क्या क्या बातें दिल में धीमे से घर करती है
जैसे धरती में बारिश की इक-इक बूँद उतरती है
किसी बीज से अंकुर उगने काफी हैं चंद बरसाते भी
वैसे दिल छूती हैं तेरी छोटी छोटी बातें भी
जैसे धरती में बारिश की इक-इक बूँद उतरती है
किसी बीज से अंकुर उगने काफी हैं चंद बरसाते भी
वैसे दिल छूती हैं तेरी छोटी छोटी बातें भी
- अनामिक
(१६/०९/२०१६ - ०१/१०/२०१६)
(१६/०९/२०१६ - ०१/१०/२०१६)
29 सितंबर 2016
नदी जिंदगी की
नदी जिंदगी की बही जा रही है
न जाने, गलत या सही जा रही है
भवर, आँधियाँ, बाढ, सूखा, बवंडर
सितम मौसमों के सही जा रही है
उछलकर, गरजकर, कभी शांत बहकर
बिना लब्ज सब कुछ कही जा रही है
पसंद की सभी मंजिलों को भुलाकर
न चाहा जहा, ये वही जा रही है
गलत ही सही, बस यही है तसल्ली
रुके बिन कही ना कही जा रही है
- अनामिक
(१४-२९/०९/२०१६)
23 सितंबर 2016
अंतर
विरून जाऊ दे अता अंतर तुझ्या-माझ्यातले
मिळून करुया दूर चल अडसर तुझ्या-माझ्यातले
येते मनी भरती तुझ्या हसण्यामुळे, रुसण्यामुळे
दबवू उसळणारे कसे सागर तुझ्या-माझ्यातले
घुसमट किती ही वाढली लटक्या अबोल्याने तुझ्या
चल शिंपडू गप्पांतुनी अत्तर तुझ्या-माझ्यातले
झटकून टाकू जळमटे किंतू-परंतूंची जुन्या
मिटवू अता संदिग्धता, जर-तर तुझ्या-माझ्यातले
त्या रेशमी प्रश्नास दडवावे किती हृदयामधे
ओठात येऊ दे खरे उत्तर तुझ्या-माझ्यातले
- अनामिक
(१६-२२/०९/२०१६)
19 सितंबर 2016
आखिरकार
इंतजार में थी बहार के, डाली ब्याकुल आज कट गयी
कब से इक दरबार में पडी अर्जी आखिरकार फट गयी ॥ धृ ॥
कब से इक दरबार में पडी अर्जी आखिरकार फट गयी ॥ धृ ॥
अर्सों से जो अडी हुई थी, धूल चाटती पडी हुई थी
शायद कूडेदान में कही
जिनके थे दस्तखत जरूरी, जिनकी थी मिलनी मंजूरी
उनको इसकी भनक तक नही
शायद कूडेदान में कही
जिनके थे दस्तखत जरूरी, जिनकी थी मिलनी मंजूरी
उनको इसकी भनक तक नही
दीमक को ही लगी सुहानी, उस अर्जी में लिखी कहानी
सौ टुकडों के बीच बट गयी
अर्जी आखिरकार.. ॥ १ ॥
सौ टुकडों के बीच बट गयी
अर्जी आखिरकार.. ॥ १ ॥
अश्कों की स्याही से उमडे, वो बिखरे शब्दों के टुकडें
कैसे भला जुटा पाऊ ?
उनसे लिपटी सब यादों का, अरमानों का, फर्यादों का
कैसे बोझ उठा पाऊ ?
कैसे भला जुटा पाऊ ?
उनसे लिपटी सब यादों का, अरमानों का, फर्यादों का
कैसे बोझ उठा पाऊ ?
शायद अंत यही था मुमकिन, बुरा हुआ या अच्छा, लेकिन
इक झूठी उम्मीद छट गयी
अर्जी आखिरकार.. ॥ २ ॥
इक झूठी उम्मीद छट गयी
अर्जी आखिरकार.. ॥ २ ॥
- अनामिक
(१७-१९/०९/२०१६)
(१७-१९/०९/२०१६)
15 सितंबर 2016
एक मौका चाहिए
खामोश है दीवार, लब्जों का झरोका चाहिए
खुशबू बिखरने को हवा का एक झोंका चाहिए
काटों में दिखेंगे गुल, नजरिया बस अनोखा चाहिए
दो जिंदगीया जोडने बस एक रेखा चाहिए
हर रात की होगी सुबह, बस बात से होगी सुलह
गुलशन खिलेगा, बीज को बस एक मौका चाहिए
- अनामिक
(०९/०८/२०१६ - ११/०९/२०१६)
07 सितंबर 2016
कभी न सोचा था
फिजूल थे जो लम्हें, उनकी अब खल रही कमी है क्यों ?
जाल लगे थे जो धागें, अब लग रहे रेशमी हैं क्यों ?
जाल लगे थे जो धागें, अब लग रहे रेशमी हैं क्यों ?
कभी न सोचा था, जो किस्सें कभी याद भी आएंगे
आज उन्ही बातों की दिल में इतनी भीड जमी है क्यों ?
आज उन्ही बातों की दिल में इतनी भीड जमी है क्यों ?
अपनी धुन में मस्त मगन सी बेफिकर चल रही थी जो
आज किसी अंजान मोड पे यूँ जिंदगी थमी है क्यों ?
आज किसी अंजान मोड पे यूँ जिंदगी थमी है क्यों ?
कुछ न मायने रखते थे जो, गैरों में जिनकी गिनती थी
आज बेसबब ही पलखों पे उनके लिए नमी है क्यों ?
आज बेसबब ही पलखों पे उनके लिए नमी है क्यों ?
- अनामिक
(२६/०८/२०१६ - ०२/०९/२०१६)
(२६/०८/२०१६ - ०२/०९/२०१६)
01 सितंबर 2016
दिल-दिमाग की जंग
दिल-दिमाग की जंग में आखिर होगी किसकी जीत ?
इसी कश्मकश में रहता हूँ, जबसे हुई है प्रीत ॥ धृ ॥
दिल नादानी की फिराक में, दिमाग वैसे शरीफ है
दिल गुम है सपनें बुनने में, दिमाग सच से वाकिफ है
दिमाग देने लगे नसीहत, पर दिल गाए गीत ॥ १ ॥
दिल बोले, "उसके आगे से गुजर, शुरू कर आँखमिचोली"
दिमाग बोले, "अनदेखा कर, कदम मोड ले, बदल ले गली"
दिल बोले, "उसे देखकर मुस्कुरा जरा, पल जाए बीत" ॥ २ ॥
दिल बोले, "बातें कर उससे", दिमाग बोले, "चुप्पी धर"
दिल बोले, "कुछ भेज संदेसा", दिमाग बोले, "जरा सबर कर"
दिल पूछे, "इतना सोचा तो कैसे मिलेगा मीत ?" ॥ ३ ॥
दिल जलता रहता है भीतर, दिमाग कसक बुझाता है
दिल फुसलाता, उकसाता है, दिमाग फिर समझाता है,
"जो करता है पहल, उसीकी मात.. यही है रीत" ॥ ४ ॥
- अनामिक
इसी कश्मकश में रहता हूँ, जबसे हुई है प्रीत ॥ धृ ॥
दिल नादानी की फिराक में, दिमाग वैसे शरीफ है
दिल गुम है सपनें बुनने में, दिमाग सच से वाकिफ है
दिमाग देने लगे नसीहत, पर दिल गाए गीत ॥ १ ॥
दिल बोले, "उसके आगे से गुजर, शुरू कर आँखमिचोली"
दिमाग बोले, "अनदेखा कर, कदम मोड ले, बदल ले गली"
दिल बोले, "उसे देखकर मुस्कुरा जरा, पल जाए बीत" ॥ २ ॥
दिल बोले, "बातें कर उससे", दिमाग बोले, "चुप्पी धर"
दिल बोले, "कुछ भेज संदेसा", दिमाग बोले, "जरा सबर कर"
दिल पूछे, "इतना सोचा तो कैसे मिलेगा मीत ?" ॥ ३ ॥
दिल जलता रहता है भीतर, दिमाग कसक बुझाता है
दिल फुसलाता, उकसाता है, दिमाग फिर समझाता है,
"जो करता है पहल, उसीकी मात.. यही है रीत" ॥ ४ ॥
- अनामिक
(२५/०८/२०१६ - ०१/०९/२०१६)
30 अगस्त 2016
घडणार आहे शेवटी
अडवा किती, जे व्हायचे, घडणार आहे शेवटी
तोडून पिंजरा पाखरू उडणार आहे शेवटी
चुकतात रस्ता सर्व जण.. थांबेल जो, हरवेल तो
हुडकेल त्याला मार्ग सापडणार आहे शेवटी
संयम-विवेकाच्या किती बेड्यांमधे जखडाल मन ?
मोहात ते कुठल्यातरी पडणार आहे शेवटी
फुलपाखराचा गंध-रंगांचा सुटावा छंद का ?
त्याचा कळीवर जीव तर जडणार आहे शेवटी
ठरवून जुळती बंध का ? झटकून तुटती पाश का ?
टाळाल ज्याला, तोच आवडणार आहे शेवटी
लपवा कितीही भावना, ओठी न आणा शब्दही
रहस्य डोळ्यांतून उलगडणार आहे शेवटी
कान्हा फिरू दे गोपिकांसंगेच मुरली वाजवत
तो सूर राधेलाच पण भिडणार आहे शेवटी
- अनामिक
(२७-३०/०८/२०१६)
फिकीर नाही
कुणी असावे, कुणी नसावे, फिकीर नाही
दुर्लक्षावे, कुणी पुसावे, फिकीर नाही
ना मोहाच्या बेड्या, ना भवपाश कुणाचे
कुणी हसावे, कुणी रुसावे, फिकीर नाही
दार मनाचे सताड उघडे, खुलेच अंगण
कुणी निघावे, कुणी बसावे, फिकीर नाही
कुणी पाठ फिरवावी, द्यावा कुणी परिचय
कुणी लपावे, कुणी दिसावे, फिकीर नाही
निबर जाहलो नात्यांचे रिचवून हलाहल
गोंजारावे, कुणी डसावे, फिकीर नाही
- अनामिक
(०८-३०/०८/२०१६)
09 अगस्त 2016
विकार
चिंब धुंद वर्षेचा झालो शिकार आहे
जिवास जडला नवा हवासा विकार आहे
जिवास जडला नवा हवासा विकार आहे
नकळत झाला काळजावरी घाव मखमली
कुणी खुपसली मधाळलेली कट्यार आहे
कुणी खुपसली मधाळलेली कट्यार आहे
सुप्त अंतरी सप्त-सूर झंकारुन गेले
कुणी छेडली आर्त मनाची सतार आहे
कुणी छेडली आर्त मनाची सतार आहे
कुणी शिंपली उमेद हिरमुसल्या स्वप्नांवर
पुन्हा नव्याने जगावयाचा विचार आहे
पुन्हा नव्याने जगावयाचा विचार आहे
किती भासला क्षुल्लक, पण रुतल्यावर कळले
नजरेचा तो तीर किती धारदार आहे
नजरेचा तो तीर किती धारदार आहे
चलाख आहे गनीम, की मग मीच वेंधळा
धरण्यापूर्वीच ढाल वार आरपार आहे
धरण्यापूर्वीच ढाल वार आरपार आहे
इतका मोहक, लोभस आहे समोर शत्रू
हसत हसत मी हरायलाही तयार आहे
हसत हसत मी हरायलाही तयार आहे
- अनामिक
(०७-०९/०८/२०१६)
29 जुलाई 2016
बरसात
नशीली है अदा बरसात की, रुत है बहकने की
जरूरत है मगर यारों जरा बचने, संभलने की
इशारा है मिला, जमकर गिरेंगी इश्क की बूँदें
बडी संभावना है अब अचानक दिल फिसलने की ॥ धृ ॥
जरूरत है मगर यारों जरा बचने, संभलने की
इशारा है मिला, जमकर गिरेंगी इश्क की बूँदें
बडी संभावना है अब अचानक दिल फिसलने की ॥ धृ ॥
जमेंगे बादलों के झुंड, चलाने बाण बिजुरी के
भिगा देंगे तुम्हें, जितना छिपो फिर आड छत्री के
बचेगी फिर न कुछ उम्मीद दिल का मर्ज टलने की
बडी संभावना है.. ॥ १ ॥
भिगा देंगे तुम्हें, जितना छिपो फिर आड छत्री के
बचेगी फिर न कुछ उम्मीद दिल का मर्ज टलने की
बडी संभावना है.. ॥ १ ॥
सजेगी बाग दुलहन सी, पहन साडी गुलाबों की
तुम्हें छूने उडेंगी तितलियाँ रंगीन ख्वाबों की
रखो दिल सख्त जितना भी, है गुंजाइश पिघलने की
तुम्हें छूने उडेंगी तितलियाँ रंगीन ख्वाबों की
रखो दिल सख्त जितना भी, है गुंजाइश पिघलने की
बडी संभावना है.. ॥ २ ॥
- अनामिक
(१३/०६/२०१६ - २९/०७/२०१६)
(१३/०६/२०१६ - २९/०७/२०१६)
22 जुलाई 2016
पाउस वेडा
पाउस वेडा.. खट्याळ थोडा..
उगाच दंगा करतो पाउस
मेघांनाही लावुन नादी
पिसाटल्यागत झरतो पाउस
पाउस वेडा.. ॥ धृ ॥
उगाच दंगा करतो पाउस
मेघांनाही लावुन नादी
पिसाटल्यागत झरतो पाउस
पाउस वेडा.. ॥ धृ ॥
उनाड पाउस.. टवाळ पाउस..
पाउस चंचल.. लबाड पाउस..
एकदा का कोसळू लागला,
समजवण्याच्या पल्याड पाउस
कधी पसरलेली ओंजळही
भरण्याआधीच विरतो पाउस
पाउस वेडा.. ॥ १ ॥
पाउस चंचल.. लबाड पाउस..
एकदा का कोसळू लागला,
समजवण्याच्या पल्याड पाउस
कधी पसरलेली ओंजळही
भरण्याआधीच विरतो पाउस
पाउस वेडा.. ॥ १ ॥
तुफान पाउस.. भयाण पाउस..
आनंदाला उधाण पाउस..
पाउस धोधो.. पाउस रिमझिम..
पाउस बोचक.. पाउस रेशिम..
सोंगाड्या हा.. किती मुखवटे,
किती रुपे पांघरतो पाउस
पाउस वेडा.. ॥ २ ॥
आनंदाला उधाण पाउस..
पाउस धोधो.. पाउस रिमझिम..
पाउस बोचक.. पाउस रेशिम..
सोंगाड्या हा.. किती मुखवटे,
किती रुपे पांघरतो पाउस
पाउस वेडा.. ॥ २ ॥
या शहरातुन.. त्या रानातुन..
वेलीतुन.. झाडा-पानातुन..
याच्या-त्याच्या खोड्या काढत
लहानग्यागत फिरतो पाउस
दमल्यावर मग भूमातेच्या
कुशीत गुपचुप शिरतो पाउस
पाउस वेडा.. ॥ ३ ॥
वेलीतुन.. झाडा-पानातुन..
याच्या-त्याच्या खोड्या काढत
लहानग्यागत फिरतो पाउस
दमल्यावर मग भूमातेच्या
कुशीत गुपचुप शिरतो पाउस
पाउस वेडा.. ॥ ३ ॥
जरी कितीही बरसुन गेला
मनात शिल्लक उरतो पाउस
कातरवेळी साधुन संधी
डोळ्यातुन पाझरतो पाउस
पाउस वेडा.. ॥ ४ ॥
मनात शिल्लक उरतो पाउस
कातरवेळी साधुन संधी
डोळ्यातुन पाझरतो पाउस
पाउस वेडा.. ॥ ४ ॥
- अनामिक
(१९-२१/०७/२०१६)
(१९-२१/०७/२०१६)
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मराठी - कविता,
Personal favorites
22 मार्च 2016
सांझ
चलो सखी हम दूर जहाँ से, इक दर्या के शांत किनारे
सूरज की लाली में लिपटे गगन-तले इक सांझ गुजारे
लहरों का हो शोर सुरीला, और पवन की चंचल हलचल
नर्म रेत की चादर ओढे इत्मिनान से बैठे कुछ पल
घुले साँस में साँस, पहन ले हाथों में हाथों के कंगन
इक-टुक देखे दूर क्षितिज पे, धरती और अंबर का मीलन
कंधे के सिरहाने मेरे चैन-सुकूँ से तुम सो जाओ
फिक्र करो ना इस पल की, बस उजले कल के ख्वाब सजाओ
भीनी सी मुस्कान तुम्हारी देख देख मैं दिल बहलाऊ
जुल्फ-हवा का खेल निहारू, हकले से माथा सहलाऊ
तुम्हे छेडती शरारती लट मैं उंगली से दूर हटाऊ
नींद टूटने दू न तुम्हारी, भला जागते उम्र बिताऊ
घने बादलों में सपनों के यूँ ही तैरते रहे सांझ-भर
आए-जाए सूरज-चंदा, दुनिया की कुछ भी न हो खबर
- अनामिक
(२३/०४/२०१५ - २२/०३/२०१६)
08 मार्च 2016
बेमौसम
जाने आज हुआ है अंबर इतना क्यों बोझल
घिर आए हैं गर्मी में भी बरखा के बादल
धीमे स्वर में खनक रही है बिजली की पायल
बूँदें हैं बेताब भिगाने धरती का आँचल
घिर आए हैं गर्मी में भी बरखा के बादल
धीमे स्वर में खनक रही है बिजली की पायल
बूँदें हैं बेताब भिगाने धरती का आँचल
इनको भी महसूस हो गयी मेरे दिल की प्यास
इसी लिए ये बेमौसम आए हैं मिलने खास
पर जिसके इंतजार में उलझी है मेरी साँस
उसको कब होगा मेरे जज़बातों का एहसास ?
इसी लिए ये बेमौसम आए हैं मिलने खास
पर जिसके इंतजार में उलझी है मेरी साँस
उसको कब होगा मेरे जज़बातों का एहसास ?
ये सब तो जाएंगे बनकर इक दिन के मेहमान
पलखों को तोहफें में देकर अश्कों का तूफान
इन्हें कहूंगा, जरा बरसना उसके भी आँगन
उसको मेरे हिस्से की भी दे आना मुस्कान
पलखों को तोहफें में देकर अश्कों का तूफान
इन्हें कहूंगा, जरा बरसना उसके भी आँगन
उसको मेरे हिस्से की भी दे आना मुस्कान
- अनामिक
(०४-०७/०३/२०१६)
(०४-०७/०३/२०१६)
29 फ़रवरी 2016
जिंदगी की बात
कर लिये गप्पें बहोत, ढलने लगी है रात भी
चल सखी कर ले जरासी जिंदगी की बात भी
चल सखी कर ले जरासी जिंदगी की बात भी
चुटकुलें, किस्सें, संदेसें बहोत भेजे, पढ लिये
चल जरा पढ ले निगाहों में लिखे जज़बात भी
चल जरा पढ ले निगाहों में लिखे जज़बात भी
इत्र, गुलदस्तें, खिलौनें.. दे चुके तोहफें कई
पेश करके देख ले दिल की हसीं सौगात भी
पेश करके देख ले दिल की हसीं सौगात भी
चल चुके चालें कई इस इश्क की शतरंज में
जीतने अब दाँव खा ले मुस्कुराकर मात भी
जीतने अब दाँव खा ले मुस्कुराकर मात भी
हमराह बनने की पहल कब तक इशारों में करे ?
चल बढाए अब कदम, कर ले नयी शुरुआत भी
चल बढाए अब कदम, कर ले नयी शुरुआत भी
- अनामिक
(२४-२९/०२/२०१६)
(२४-२९/०२/२०१६)
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हिंदी - गझल
17 फ़रवरी 2016
कशिश
जाने कैसी कशिश तुम्हारी आँखों की गहराई में है
नफरत भी बरसे इनसे, फिर भी इक प्यास जगाती है
अजब तुम्हारी खामोशी भी, जैसे गजल सुनाती है
रंजिश के स्वर में भी, लगता है, आवाज लगाती है
नफरत भी बरसे इनसे, फिर भी इक प्यास जगाती है
अजब तुम्हारी खामोशी भी, जैसे गजल सुनाती है
रंजिश के स्वर में भी, लगता है, आवाज लगाती है
कदम तुम्हारे बडे सितमगर, मुझे देख मुड जाते हैं
धूल मगर उन कदमों की राहों में फूल खिलाती है
धूल मगर उन कदमों की राहों में फूल खिलाती है
नजर चुरा लो, मुँह भी फेरो, मगर नजर के सामने रहो
सिर्फ तुम्हारी मौजूदगी भी दिल को सुकूँ दिलाती है
सिर्फ तुम्हारी मौजूदगी भी दिल को सुकूँ दिलाती है
- अनामिक
(३०/१२/२०१४, १२-१७/०२/२०१६)
02 फ़रवरी 2016
ऐ चाँद
सुनो ऐ चाँद पूनम के, न इतना भी दिखो सुंदर
सखी की याद आती है, पडे जब भी नजर तुम पर ॥ धृ ॥
सखी की याद आती है, पडे जब भी नजर तुम पर ॥ धृ ॥
समय था वो, समा दीदार से उनके महकता था
शहद का जाम जब मुस्कान से उनकी छलकता था
शहद का जाम जब मुस्कान से उनकी छलकता था
तुम्हारी चाँदनी से भी हसीं थी सादगी उनकी
खिलाती थी दिलों में फूल बस मौजूदगी उनकी ॥ १ ॥
खिलाती थी दिलों में फूल बस मौजूदगी उनकी ॥ १ ॥
नजर के सामने तुम, वो, हजारों मील थे पर दूर
तुम्हारा भी न, उनका भी न छू सकता कभी था नूर
तुम्हारा भी न, उनका भी न छू सकता कभी था नूर
जतन कितने किए उन तक पहुँचने के, सभी बेकार
छुपा लेती थी खुदको रंजिशों के बादलों के पार ॥ २ ॥
छुपा लेती थी खुदको रंजिशों के बादलों के पार ॥ २ ॥
अमावस की तरह इक दिन अचानक वो हुई गायब
मुकद्दर के सितारे वो चुराकर ले गयी संग सब
मुकद्दर के सितारे वो चुराकर ले गयी संग सब
तुम्हारी शक्ल में ही देखता हूँ अब छवी उनकी
कभी तो ईद आए, वो दिखे, ये आस है बाकी
कभी तो ईद आए, वो दिखे, ये आस है बाकी
मिले गर वो कभी, ऐ चाँद, इक पैगाम पहुँचाना
"उनकी याद में इक बावरा जगता है रोजाना" ॥ ३ ॥
"उनकी याद में इक बावरा जगता है रोजाना" ॥ ३ ॥
- अनामिक
(०२/०२/२०१५ - ०२/०२/२०१६)
(०२/०२/२०१५ - ०२/०२/२०१६)
28 जनवरी 2016
चाय की प्याली
सांझ अकेली, इंतजार की, साथ चाय की प्याली थी
अफसोस.. सामने वाली कुर्सी मगर आज भी खाली थी
गरम चाय की भाप लपेटे
तैर रहे थे बीते लम्हें
जाने उनकी राह ताकते
गुजरी कितनी रातें-सुबहें
दिल की शीशी में इत्तर सी उनकी याद संभाली थी
अफसोस.. सामने वाली कुर्सी मगर आज भी खाली थी
पगली सी उम्मीद लिए
बेगानों संग आया था
मीलों की दूरी पार किए
गुलशन में पर वो ना थी, ना ही वो आनेवाली थी
अफसोस.. सामने वाली कुर्सी मगर आज भी खाली थी
घंटो बैठा रहा वही पे,
भटक भटक के थक गयी नजर
ढूँढ रही थी आहट उनकी,
कभी इस गली, कभी उस डगर
गीली आँखों में ढलते सूरज की उतरी लाली थी
अफसोस.. सामने वाली कुर्सी मगर आज भी खाली थी
- अनामिक
(१७-२७/०१/२०१६)
27 जुलाई 2015
कुछ ख्वाब
कुछ ख्वाब नैनों से तुम्हारे ही मुझे हैं देखने
कुछ गीत होठों से तुम्हारे गुनगुनाने हैं मुझे
कुछ मंजिले दुश्वार कदमों से तुम्हारे तै करू
कुछ घर पनाहों में तुम्हारी ही बनाने हैं मुझे ॥ धृ ॥
कुछ दिन सुनहरी धूप के
कुछ सर्द रातें चाँदनी
कुछ रेशमी घडियाँ हसीं
तुम संग मुझे है काटनी
तुम पर खजानें वक्त के हसते लुटाने हैं मुझे
जनमों-जनम के कुछ सफर तुम संग बिताने हैं मुझे ॥ १ ॥
कुछ धडकने मेरी थमी
दिल में तुम्हारे चल पडे
रेखा तुम्हारे हाथ की
तकदीर से मेरी जुडे
बाजू तुम्हारे सुर्ख मेहंदी से सजाने हैं मुझे
माथे तुम्हारे कुछ सिंदूरी रंग लगाने हैं मुझे ॥ २ ॥
- अनामिक
(०५/०६/२०१५ - २६/०७/२०१५)
कुछ गीत होठों से तुम्हारे गुनगुनाने हैं मुझे
कुछ मंजिले दुश्वार कदमों से तुम्हारे तै करू
कुछ घर पनाहों में तुम्हारी ही बनाने हैं मुझे ॥ धृ ॥
कुछ दिन सुनहरी धूप के
कुछ सर्द रातें चाँदनी
कुछ रेशमी घडियाँ हसीं
तुम संग मुझे है काटनी
तुम पर खजानें वक्त के हसते लुटाने हैं मुझे
जनमों-जनम के कुछ सफर तुम संग बिताने हैं मुझे ॥ १ ॥
कुछ धडकने मेरी थमी
दिल में तुम्हारे चल पडे
रेखा तुम्हारे हाथ की
तकदीर से मेरी जुडे
बाजू तुम्हारे सुर्ख मेहंदी से सजाने हैं मुझे
माथे तुम्हारे कुछ सिंदूरी रंग लगाने हैं मुझे ॥ २ ॥
- अनामिक
(०५/०६/२०१५ - २६/०७/२०१५)
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हिंदी - गीत,
Collection - Arjiya,
Collection-Arjiya
07 जुलाई 2015
इक अर्ज़ी थी
इक अर्ज़ी थी कुछ सपनों की
कुछ अनकहे फसानों की
उम्मीदों की, अरमानों की
कुछ बेजुबाँ तरानों की
इक अर्ज़ी थी दिल से दिल तक
बंद दरों पे जैसे दस्तक
इक अर्ज़ी थी, जो पहुँचाती
धुंदले 'कल' से उजले 'कल' तक
इक अर्ज़ी थी, जिसको सींचा
पलखों की बूँदों में भिगाकर
शिद्दत से जी-जान लगाकर
नजरों में इक आस जगाकर
वो बस अर्ज़ी ना थी,
मेरे जजबातों का मुखडा थी
लेकिन उनके लिए महज़ वो
कागज़ का इक टुकडा थी
धूल जमी है उस अर्जी पर
गुजर गए लम्हों के पंछी
आज समय की शाखों पे वो
फडक रही है बनकर पर्ची
उस अर्ज़ी की सालगिरह पर
यादों के नजरानें हैं
कुछ अश्कों के गुलदस्तें हैं
कुछ बेबस मुस्कानें हैं
- अनामिक
(०७/०७/२०१५)
कुछ अनकहे फसानों की
उम्मीदों की, अरमानों की
कुछ बेजुबाँ तरानों की
इक अर्ज़ी थी दिल से दिल तक
बंद दरों पे जैसे दस्तक
इक अर्ज़ी थी, जो पहुँचाती
धुंदले 'कल' से उजले 'कल' तक
इक अर्ज़ी थी, जिसको सींचा
पलखों की बूँदों में भिगाकर
शिद्दत से जी-जान लगाकर
नजरों में इक आस जगाकर
वो बस अर्ज़ी ना थी,
मेरे जजबातों का मुखडा थी
लेकिन उनके लिए महज़ वो
कागज़ का इक टुकडा थी
धूल जमी है उस अर्जी पर
गुजर गए लम्हों के पंछी
आज समय की शाखों पे वो
फडक रही है बनकर पर्ची
उस अर्ज़ी की सालगिरह पर
यादों के नजरानें हैं
कुछ अश्कों के गुलदस्तें हैं
कुछ बेबस मुस्कानें हैं
- अनामिक
(०७/०७/२०१५)
( On the occasion of completing a year of an Arji :
http://www.youtube.com/watch?v=v-0E0XjKJT8 )
04 जून 2015
याद
कैद कर लू अक्षरों में, या लबों से गुनगुना लू
पर न रुकती है तुम्हारी सर्द यादों की पवन
बंद कर लू खिडकियाँ दिल की सभी, फिर भी कही से
पहुँच जाती है तुम्हारे सुर्ख सपनों की किरन ॥ धृ ॥
इश्क को कमजोर कर दे, फासलों में वो न दम
दूर हो मीलों, मगर साया तुम्हारा हर कदम
आज भी ढूँढे तुम्हे तितली नजर की हर चमन ॥ १ ॥
पैंतरें तकदीर के दिल को समझ आतें नहीं
बिन-जुडे तुझमें फसे धागें सुलझ पातें नहीं
क्यों सभी नाकाम हैं तुम तक पहुँचने के जतन ? ॥ २ ॥
- अनामिक
(३१/०५/२०१५ - ०४/०६/२०१५)
पर न रुकती है तुम्हारी सर्द यादों की पवन
बंद कर लू खिडकियाँ दिल की सभी, फिर भी कही से
पहुँच जाती है तुम्हारे सुर्ख सपनों की किरन ॥ धृ ॥
इश्क को कमजोर कर दे, फासलों में वो न दम
दूर हो मीलों, मगर साया तुम्हारा हर कदम
आज भी ढूँढे तुम्हे तितली नजर की हर चमन ॥ १ ॥
पैंतरें तकदीर के दिल को समझ आतें नहीं
बिन-जुडे तुझमें फसे धागें सुलझ पातें नहीं
क्यों सभी नाकाम हैं तुम तक पहुँचने के जतन ? ॥ २ ॥
- अनामिक
(३१/०५/२०१५ - ०४/०६/२०१५)
21 मई 2015
बंध नवे
बंध नवे, संबंध नवे हे
वेळ-अवेळी कानामधुनी
घुमती मंजुळ नाद नवे
कातरवेळी करीत बसतो
स्वतःशीच संवाद नवे
स्वप्नांच्या मग उंबरठ्यावर
दीप उजळती मंद नवे ॥ २ ॥
- अनामिक
(०३/०४/२०१५ - २१/०५/२०१५)
प्रेमफुलांचे गंध नवे
नाजुक हळव्या हृदयामधुनी
मोहरणारे स्पंद नवे
भिरभिरणा-या खुळ्या जिवाला
जडले कुठले छंद नवे
आयुष्याच्या वेलीवरती
फुलले क्षण बेधुंद नवे ॥ धृ ॥
पाउस अवचित उधळत येतो
इंद्रधनूतुन रंग नवे
थेंब बरसता चिंब मनावर
उठती लाख तरंग नवे
भाव उमलती, अन् अंकुरती
ओठांवरती शब्द नवे ॥ १ ॥
वेळ-अवेळी कानामधुनी
घुमती मंजुळ नाद नवे
कातरवेळी करीत बसतो
स्वतःशीच संवाद नवे
स्वप्नांच्या मग उंबरठ्यावर
दीप उजळती मंद नवे ॥ २ ॥
- अनामिक
(०३/०४/२०१५ - २१/०५/२०१५)
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20 अप्रैल 2015
दिलासा
ये सखे घेऊन स्वप्नांचा दिलासा
श्वासही तुजवीण ना वाटे हवासा
मांडला मी डाव जिंकाया तुला, पण
नेमका चुकला कुठे, उमगे न, फासा
केवढा हट्टी तुझा रुसवा-अबोला
मान्य ना केलास कुठलाही खुलासा
सुन्न इतक्या जाणिवा होत्या तुझ्या की
हुंदका कळला तुला ना, ना उसासा
खोल इतके अंतरी खणले तुझ्या, पण
ना कधी फुटला तुला पाझर जरासा
मी मुखवटा लावुनी फिरतो असा की
ना कळे रडला जरी पाण्यात मासा
आठवांची मी तुझ्या भरुनी शिदोरी
चाललो अज्ञात एकाकी प्रवासा
- अनामिक
(०३-०८/०४/२०१५)
श्वासही तुजवीण ना वाटे हवासा
मांडला मी डाव जिंकाया तुला, पण
नेमका चुकला कुठे, उमगे न, फासा
केवढा हट्टी तुझा रुसवा-अबोला
मान्य ना केलास कुठलाही खुलासा
सुन्न इतक्या जाणिवा होत्या तुझ्या की
हुंदका कळला तुला ना, ना उसासा
खोल इतके अंतरी खणले तुझ्या, पण
ना कधी फुटला तुला पाझर जरासा
मी मुखवटा लावुनी फिरतो असा की
ना कळे रडला जरी पाण्यात मासा
आठवांची मी तुझ्या भरुनी शिदोरी
चाललो अज्ञात एकाकी प्रवासा
- अनामिक
(०३-०८/०४/२०१५)
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05 अप्रैल 2015
गुमशुदा
जाने कहा गुमशुदा हूँ मैं.. खुद को भी आऊ न नजर
छान चुका हूँ चप्पा-चप्पा, फिर भी कुछ ना लगे खबर
शायद उस बगिया में गुम हूँ, जहा खिले थे सपनों के गुल
जहा हकीकत की नदिया पे अफसानों के बाँधे थे पुल
या उस साहिल पे बैठा हूँ, जहा कभी थे रेत के महल
जहा वक्त की मुठ्ठी से फिसले थे मोतियों जैसे कुछ पल
या उस बन में भटक रहा हूँ, जहा मेहरबाँ थी हरियाली
जहा बची है अब यादों के सूखे पत्तों की रंगोली
या उस दोराहे पे खडा हूँ, रुकी पडी है जहा जिंदगी
एक राह पे हालाहल है, और दूजी पे सिर्फ तिश्नगी
या चौखट पे इंतजार की, नजरों के कालीन बिछाए
उस मेहमाँ की राह तक रहा हूँ, जो अब फिर कभी न आए
ढूँढ-ढूँढते खुद को शायद लग जाएगा एक जमाना
यही दुआ है अब, कम-से-कम परछाई का मिले ठिकाना
- अनामिक
(१९/०३/२०१५ - ०५/०४/२०१५)
छान चुका हूँ चप्पा-चप्पा, फिर भी कुछ ना लगे खबर
शायद उस बगिया में गुम हूँ, जहा खिले थे सपनों के गुल
जहा हकीकत की नदिया पे अफसानों के बाँधे थे पुल
या उस साहिल पे बैठा हूँ, जहा कभी थे रेत के महल
जहा वक्त की मुठ्ठी से फिसले थे मोतियों जैसे कुछ पल
या उस बन में भटक रहा हूँ, जहा मेहरबाँ थी हरियाली
जहा बची है अब यादों के सूखे पत्तों की रंगोली
या उस दोराहे पे खडा हूँ, रुकी पडी है जहा जिंदगी
एक राह पे हालाहल है, और दूजी पे सिर्फ तिश्नगी
या चौखट पे इंतजार की, नजरों के कालीन बिछाए
उस मेहमाँ की राह तक रहा हूँ, जो अब फिर कभी न आए
ढूँढ-ढूँढते खुद को शायद लग जाएगा एक जमाना
यही दुआ है अब, कम-से-कम परछाई का मिले ठिकाना
- अनामिक
(१९/०३/२०१५ - ०५/०४/२०१५)
31 मार्च 2015
हमें भी आज जीने दो
कदम तो डगमगाएंगे, नशे में चल रहे जो हम
निगाहें लडखडाएंगी, जवाँ मदहोश है आलम
जिएंगे कब तलक घुटकर, मचलकर आज जीने दो
रहेंगे कब तलक प्यासे, छलकते जाम पीने दो
हमें भी आज जीने दो, हमें भी आज पीने दो ॥ धृ ॥
"कहेंगे लोग क्या?" ये सोच डर डर कर जिए हम तो
उसूलों में, रिवाजों में जकडकर रह गए हम तो
मगर इन बेडियों का बोझ अब से ना सहेंगे हम
मनमौजी हवा बनकर जहा मर्जी बहेंगे हम
बगावत की सुई से सब अधूरे ख्वाब सीने दो
रहेंगे कब तलक प्यासे, छलकते जाम पीने दो
हमें भी आज जीने दो, हमें भी आज पीने दो ॥ १ ॥
शराफत की लकीरों में यूँ उलझे, ना सुलझ पाए
सुनी इसकी, सुनी उसकी, न खुदकी ही समझ पाए
मगर अब से दबे दिल की पुकारें ही सुनेंगे हम
करेंगे खूब नादानी, अजब राहें चुनेंगे हम
रंगीली शरबती बरसात हर-दिन, हर-महीने दो
रहेंगे कब तलक प्यासे, छलकते जाम पीने दो
हमें भी आज जीने दो, हमें भी आज पीने दो ॥ २ ॥
- अनामिक
निगाहें लडखडाएंगी, जवाँ मदहोश है आलम
जिएंगे कब तलक घुटकर, मचलकर आज जीने दो
रहेंगे कब तलक प्यासे, छलकते जाम पीने दो
हमें भी आज जीने दो, हमें भी आज पीने दो ॥ धृ ॥
"कहेंगे लोग क्या?" ये सोच डर डर कर जिए हम तो
उसूलों में, रिवाजों में जकडकर रह गए हम तो
मगर इन बेडियों का बोझ अब से ना सहेंगे हम
मनमौजी हवा बनकर जहा मर्जी बहेंगे हम
बगावत की सुई से सब अधूरे ख्वाब सीने दो
रहेंगे कब तलक प्यासे, छलकते जाम पीने दो
हमें भी आज जीने दो, हमें भी आज पीने दो ॥ १ ॥
शराफत की लकीरों में यूँ उलझे, ना सुलझ पाए
सुनी इसकी, सुनी उसकी, न खुदकी ही समझ पाए
मगर अब से दबे दिल की पुकारें ही सुनेंगे हम
करेंगे खूब नादानी, अजब राहें चुनेंगे हम
रंगीली शरबती बरसात हर-दिन, हर-महीने दो
रहेंगे कब तलक प्यासे, छलकते जाम पीने दो
हमें भी आज जीने दो, हमें भी आज पीने दो ॥ २ ॥
- अनामिक
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29 मार्च 2015
क्यों
जाने क्या ये हुआ अचानक ? क्यों कुदरत ने बदले तेवर ?
कल तक था इक हसीं नजारा, आज दिखे कुछ और ही मंजर
क्यों दुनिया की सब चीज़ों का पल में उतर गया है नूर ?
शायद इनको पता चला है.. की तुम चले गए हो दूर... ॥ धृ ॥
क्यों न मोगरे में है खुशबू ? क्यों गुलाब में खिले न रंग ?
क्यों साहिल पे सन्नाटा है ? दर्या में उठते न तरंग
क्यों कोयल के गीत हुए चुप ? क्यों न पसारे पंख मयूर ?
शायद इनको पता चला है.. की तुम चले गए हो दूर... ॥ १ ॥
क्यों न सितारों में है जगमग ? क्यों न चाँद से बरसे रेशम ?
क्यों न बची बदरा में बूँदे ? क्यों छाया पतझड का मौसम ?
क्यों गुम है सूरज की रौनक ? क्यों अंधियारा करे गुरूर ?
शायद इनको पता चला है.. की तुम चले गए हो दूर... ॥ २ ॥
क्यों सपनों के महमानों ने पलखों का घर छोड दिया है ?
क्यों रूठी निंदियारानी ने रातों से मुह मोड लिया है ?
क्यों हाथों की रेखाओं के आगे किस्मत है मजबूर ?
शायद इनको पता चला है.. की तुम चले गए हो दूर... ॥ ३ ॥
- अनामिक
(११-१५/०३/२०१५)
कल तक था इक हसीं नजारा, आज दिखे कुछ और ही मंजर
क्यों दुनिया की सब चीज़ों का पल में उतर गया है नूर ?
शायद इनको पता चला है.. की तुम चले गए हो दूर... ॥ धृ ॥
क्यों न मोगरे में है खुशबू ? क्यों गुलाब में खिले न रंग ?
क्यों साहिल पे सन्नाटा है ? दर्या में उठते न तरंग
क्यों कोयल के गीत हुए चुप ? क्यों न पसारे पंख मयूर ?
शायद इनको पता चला है.. की तुम चले गए हो दूर... ॥ १ ॥
क्यों न सितारों में है जगमग ? क्यों न चाँद से बरसे रेशम ?
क्यों न बची बदरा में बूँदे ? क्यों छाया पतझड का मौसम ?
क्यों गुम है सूरज की रौनक ? क्यों अंधियारा करे गुरूर ?
शायद इनको पता चला है.. की तुम चले गए हो दूर... ॥ २ ॥
क्यों सपनों के महमानों ने पलखों का घर छोड दिया है ?
क्यों रूठी निंदियारानी ने रातों से मुह मोड लिया है ?
क्यों हाथों की रेखाओं के आगे किस्मत है मजबूर ?
शायद इनको पता चला है.. की तुम चले गए हो दूर... ॥ ३ ॥
- अनामिक
(११-१५/०३/२०१५)
16 मार्च 2015
आँधी
चुपके से इक आँधी आई, हलकी सी भी हुई न आहट
आँख लगी तब सन्नाटा था, नींद खुली तो बस गडगडाहट
दबे पाँव से आकर इसने तहस-नहस कर दिया आशियाँ
चंद दुलारी चीज़ों को भी समेटने का समय ना दिया
जितना था, सब बहा ले गयी, छोड गयी आँखों में नदिया ॥ धृ ॥
कुछ चीज़ें थी, कुछ बातें थी
कुछ थी सुबहें, कुछ रातें थी
यादों की संदूकों में कुछ सुनहरे पलों के प्यालें थे
जिनमें गम के कडवे जाम भी शरबत से लगते थे मीठे
अरमानों की अलमारी में थी सपनों की शाल रेशमी
जिसे लपेटे कडी ठंड भी लगती थी उम्मीद की गर्मी
इक कोने में फडक रहा था, वो भी बुझ गया आस का दिया
जितना था, सब बहा ले गयी, छोड गयी आँखों में नदिया ॥ १ ॥
जाने कितना समय लगेगा, बिखरा सा घर निखारने को
चकनाचूर हौसले की सब दर-दीवारें सवारने को
मन से मलबा निकालने को, फिर से तिनकें बटोरने को
कहा मिलेगी तब तक इक छत, सहमी रातें गुजारने को
हिम्मत की बुनियाद धँसी जो, रचने लग जाएँगी सदियाँ
जितना था, सब बहा ले गयी, छोड गयी आँखों में नदिया ॥ २ ॥
- अनामिक
(०४,१६/०३/२०१५)
आँख लगी तब सन्नाटा था, नींद खुली तो बस गडगडाहट
दबे पाँव से आकर इसने तहस-नहस कर दिया आशियाँ
चंद दुलारी चीज़ों को भी समेटने का समय ना दिया
जितना था, सब बहा ले गयी, छोड गयी आँखों में नदिया ॥ धृ ॥
कुछ चीज़ें थी, कुछ बातें थी
कुछ थी सुबहें, कुछ रातें थी
यादों की संदूकों में कुछ सुनहरे पलों के प्यालें थे
जिनमें गम के कडवे जाम भी शरबत से लगते थे मीठे
अरमानों की अलमारी में थी सपनों की शाल रेशमी
जिसे लपेटे कडी ठंड भी लगती थी उम्मीद की गर्मी
इक कोने में फडक रहा था, वो भी बुझ गया आस का दिया
जितना था, सब बहा ले गयी, छोड गयी आँखों में नदिया ॥ १ ॥
जाने कितना समय लगेगा, बिखरा सा घर निखारने को
चकनाचूर हौसले की सब दर-दीवारें सवारने को
मन से मलबा निकालने को, फिर से तिनकें बटोरने को
कहा मिलेगी तब तक इक छत, सहमी रातें गुजारने को
हिम्मत की बुनियाद धँसी जो, रचने लग जाएँगी सदियाँ
जितना था, सब बहा ले गयी, छोड गयी आँखों में नदिया ॥ २ ॥
- अनामिक
(०४,१६/०३/२०१५)
17 फ़रवरी 2015
दुआ
हर खुशियों में रंग भरे जो
फूल खिले वो तेरे आँगन
हर सुबहा लाए वो सूरज
सब सपने कर दे जो रोशन
सदा सजे मुस्कान लबों पर
जिसे देख शरमाए दर्पन
गूँजे अल्लड हँसी यूँ, किसी
नन्ही की पायल की छनछन
मिले जीत हर जंग में तुझे
हर बादल बरसाए सावन
खुशबू तेरी तारीफों की
महके, जैसे बन में चंदन
ऊँची भरो उडान गगन में
रोक न पाए कोई बंधन
रहो जहा भी, सदा खुश रहो
यही दुआ माँगे मेरा मन
- अनामिक
(२०/१२/२००८, १३/०१/२०१५, १६/०२/२०१५)
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हिंदी - कविता
15 फ़रवरी 2015
नाँव
धूप में, या छाँव में
बहाव में, ठहराव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में
प्रीत की नदिया बहे
दो दिलों के गाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ धृ ॥
फूल हो, अंगार हो
मंजिलें दुश्वार हो
हर कदम मिलकर चले तो, जलजलें भी पार हो
काँटें भी तुझ संग लगे
गुदगुदी से पाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ १ ॥
रोक ले ऊँची लहर
या उठे चाहे भँवर
हाथ बस तुम थाम लो, फिर तय करे मुश्किल सफर
तुम बनो मरहम मेरा
दर्द में, हर घाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ २ ॥
- अनामिक
(०८/०९/२०१४ - १४/०२/२०१५)

बहाव में, ठहराव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में
प्रीत की नदिया बहे
दो दिलों के गाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ धृ ॥
फूल हो, अंगार हो
मंजिलें दुश्वार हो
हर कदम मिलकर चले तो, जलजलें भी पार हो
काँटें भी तुझ संग लगे
गुदगुदी से पाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ १ ॥
रोक ले ऊँची लहर
या उठे चाहे भँवर
हाथ बस तुम थाम लो, फिर तय करे मुश्किल सफर
तुम बनो मरहम मेरा
दर्द में, हर घाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ २ ॥
- अनामिक
(०८/०९/२०१४ - १४/०२/२०१५)
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