29 सितंबर 2016

नदी जिंदगी की

नदी जिंदगी की बही जा रही है
न जाने, गलत या सही जा रही है

भवर, आँधियाँ, बाढ, सूखा, बवंडर
सितम मौसमों के सही जा रही है

उछलकर, गरजकर, कभी शांत बहकर
बिना लब्ज सब कुछ कही जा रही है

पसंद की सभी मंजिलों को भुलाकर
न चाहा जहा, ये वही जा रही है

गलत ही सही, बस यही है तसल्ली
रुके बिन कही ना कही जा रही है

- अनामिक
(१४-२९/०९/२०१६)

23 सितंबर 2016

अंतर

विरून जाऊ दे अता अंतर तुझ्या-माझ्यातले
मिळून करुया दूर चल अडसर तुझ्या-माझ्यातले

येते मनी भरती तुझ्या हसण्यामुळे, रुसण्यामुळे
दबवू उसळणारे कसे सागर तुझ्या-माझ्यातले

घुसमट किती ही वाढली लटक्या अबोल्याने तुझ्या
चल शिंपडू गप्पांतुनी अत्तर तुझ्या-माझ्यातले

झटकून टाकू जळमटे किंतू-परंतूंची जुन्या
मिटवू अता संदिग्धता, जर-तर तुझ्या-माझ्यातले

त्या रेशमी प्रश्नास दडवावे किती हृदयामधे
ओठात येऊ दे खरे उत्तर तुझ्या-माझ्यातले

- अनामिक
(१६-२२/०९/२०१६)

19 सितंबर 2016

आखिरकार

इंतजार में थी बहार के, डाली ब्याकुल आज कट गयी
कब से इक दरबार में पडी अर्जी आखिरकार फट गयी ॥ धृ ॥

अर्सों से जो अडी हुई थी, धूल चाटती पडी हुई थी
शायद कूडेदान में कही
जिनके थे दस्तखत जरूरी, जिनकी थी मिलनी मंजूरी
उनको इसकी भनक तक नही

दीमक को ही लगी सुहानी, उस अर्जी में लिखी कहानी
सौ टुकडों के बीच बट गयी
अर्जी आखिरकार..                                      ॥ १ ॥

अश्कों की स्याही से उमडे, वो बिखरे शब्दों के टुकडें
कैसे भला जुटा पाऊ ?
उनसे लिपटी सब यादों का, अरमानों का, फर्यादों का
कैसे बोझ उठा पाऊ ?

शायद अंत यही था मुमकिन, बुरा हुआ या अच्छा, लेकिन
इक झूठी उम्मीद छट गयी
अर्जी आखिरकार..                                      ॥ २ ॥

- अनामिक
(१७-१९/०९/२०१६)

15 सितंबर 2016

एक मौका चाहिए

खामोश है दीवार, लब्जों का झरोका चाहिए
खुशबू बिखरने को हवा का एक झोंका चाहिए

काटों में दिखेंगे गुल, नजरिया बस अनोखा चाहिए
दो जिंदगीया जोडने बस एक रेखा चाहिए

हर रात की होगी सुबह, बस बात से होगी सुलह
गुलशन खिलेगा, बीज को बस एक मौका चाहिए

- अनामिक
(०९/०८/२०१६ - ११/०९/२०१६)

07 सितंबर 2016

कभी न सोचा था

फिजूल थे जो लम्हें, उनकी अब खल रही कमी है क्यों ?
जाल लगे थे जो धागें, अब लग रहे रेशमी हैं क्यों ?

कभी न सोचा था, जो किस्सें कभी याद भी आएंगे
आज उन्ही बातों की दिल में इतनी भीड जमी है क्यों ?

अपनी धुन में मस्त मगन सी बेफिकर चल रही थी जो
आज किसी अंजान मोड पे यूँ जिंदगी थमी है क्यों ?

कुछ न मायने रखते थे जो, गैरों में जिनकी गिनती थी
आज बेसबब ही पलखों पे उनके लिए नमी है क्यों ?

- अनामिक
(२६/०८/२०१६ - ०२/०९/२०१६)

01 सितंबर 2016

दिल-दिमाग की जंग

दिल-दिमाग की जंग में आखिर होगी किसकी जीत ?
इसी कश्मकश में रहता हूँ, जबसे हुई है प्रीत                 ॥ धृ ॥

दिल नादानी की फिराक में, दिमाग वैसे शरीफ है
दिल गुम है सपनें बुनने में, दिमाग सच से वाकिफ है
दिमाग देने लगे नसीहत, पर दिल गाए गीत                 ॥ १ ॥

दिल बोले, "उसके आगे से गुजर, शुरू कर आँखमिचोली"
दिमाग बोले, "अनदेखा कर, कदम मोड ले, बदल ले गली"
दिल बोले, "उसे देखकर मुस्कुरा जरा, पल जाए बीत"        ॥ २ ॥

दिल बोले, "बातें कर उससे", दिमाग बोले, "चुप्पी धर"
दिल बोले, "कुछ भेज संदेसा", दिमाग बोले, "जरा सबर कर"
दिल पूछे, "इतना सोचा तो कैसे मिलेगा मीत ?"            ॥ ३ ॥

दिल जलता रहता है भीतर, दिमाग कसक बुझाता है
दिल फुसलाता, उकसाता है, दिमाग फिर समझाता है,
"जो करता है पहल, उसीकी मात.. यही है रीत"             ॥ ४ ॥

- अनामिक
(२५/०८/२०१६ - ०१/०९/२०१६)

30 अगस्त 2016

घडणार आहे शेवटी

अडवा किती, जे व्हायचे, घडणार आहे शेवटी
तोडून पिंजरा पाखरू उडणार आहे शेवटी

चुकतात रस्ता सर्व जण.. थांबेल जो, हरवेल तो
हुडकेल त्याला मार्ग सापडणार आहे शेवटी

संयम-विवेकाच्या किती बेड्यांमधे जखडाल मन ?
मोहात ते कुठल्यातरी पडणार आहे शेवटी

फुलपाखराचा गंध-रंगांचा सुटावा छंद का ?
त्याचा कळीवर जीव तर जडणार आहे शेवटी

ठरवून जुळती बंध का ? झटकून तुटती पाश का ?
टाळाल ज्याला, तोच आवडणार आहे शेवटी

लपवा कितीही भावना, ओठी न आणा शब्दही
रहस्य डोळ्यांतून उलगडणार आहे शेवटी

कान्हा फिरू दे गोपिकांसंगेच मुरली वाजवत
तो सूर राधेलाच पण भिडणार आहे शेवटी

- अनामिक
(२७-३०/०८/२०१६)

फिकीर नाही

कुणी असावे, कुणी नसावे, फिकीर नाही
दुर्लक्षावे, कुणी पुसावे, फिकीर नाही

ना मोहाच्या बेड्या, ना भवपाश कुणाचे
कुणी हसावे, कुणी रुसावे, फिकीर नाही

दार मनाचे सताड उघडे, खुलेच अंगण
कुणी निघावे, कुणी बसावे, फिकीर नाही

कुणी पाठ फिरवावी, द्यावा कुणी परिचय
कुणी लपावे, कुणी दिसावे, फिकीर नाही

निबर जाहलो नात्यांचे रिचवून हलाहल
गोंजारावे, कुणी डसावे, फिकीर नाही

- अनामिक
(०८-३०/०८/२०१६)

09 अगस्त 2016

विकार

चिंब धुंद वर्षेचा झालो शिकार आहे
जिवास जडला नवा हवासा विकार आहे

नकळत झाला काळजावरी घाव मखमली
कुणी खुपसली मधाळलेली कट्यार आहे

सुप्त अंतरी सप्त-सूर झंकारुन गेले
कुणी छेडली आर्त मनाची सतार आहे

कुणी शिंपली उमेद हिरमुसल्या स्वप्नांवर
पुन्हा नव्याने जगावयाचा विचार आहे

किती भासला क्षुल्लक, पण रुतल्यावर कळले
नजरेचा तो तीर किती धारदार आहे

चलाख आहे गनीम, की मग मीच वेंधळा
धरण्यापूर्वीच ढाल वार आरपार आहे

इतका मोहक, लोभस आहे समोर शत्रू
हसत हसत मी हरायलाही तयार आहे

- अनामिक
(०७-०९/०८/२०१६)

29 जुलाई 2016

बरसात

नशीली है अदा बरसात की, रुत है बहकने की
जरूरत है मगर यारों जरा बचने, संभलने की
इशारा है मिला, जमकर गिरेंगी इश्क की बूँदें
बडी संभावना है अब अचानक दिल फिसलने की ॥ धृ ॥

जमेंगे बादलों के झुंड, चलाने बाण बिजुरी के
भिगा देंगे तुम्हें, जितना छिपो फिर आड छत्री के
बचेगी फिर न कुछ उम्मीद दिल का मर्ज टलने की
बडी संभावना है..                                 ॥ १ ॥

सजेगी बाग दुलहन सी, पहन साडी गुलाबों की
तुम्हें छूने उडेंगी तितलियाँ रंगीन ख्वाबों की
रखो दिल सख्त जितना भी, है गुंजाइश पिघलने की
बडी संभावना है..                                 ॥ २ ॥

- अनामिक
(१३/०६/२०१६ - २९/०७/२०१६)

22 जुलाई 2016

पाउस वेडा

पाउस वेडा.. खट्याळ थोडा..
उगाच दंगा करतो पाउस
मेघांनाही लावुन नादी
पिसाटल्यागत झरतो पाउस
पाउस वेडा..           ॥ धृ ॥

उनाड पाउस.. टवाळ पाउस..
पाउस चंचल.. लबाड पाउस..
एकदा का कोसळू लागला,
समजवण्याच्या पल्याड पाउस
कधी पसरलेली ओंजळही
भरण्याआधीच विरतो पाउस
पाउस वेडा..           ॥ १ ॥

तुफान पाउस.. भयाण पाउस..
आनंदाला उधाण पाउस..
पाउस धोधो.. पाउस रिमझिम..
पाउस बोचक.. पाउस रेशिम..
सोंगाड्या हा.. किती मुखवटे,
किती रुपे पांघरतो पाउस
पाउस वेडा..           ॥ २ ॥

या शहरातुन.. त्या रानातुन..
वेलीतुन.. झाडा-पानातुन..
याच्या-त्याच्या खोड्या काढत
लहानग्यागत फिरतो पाउस
दमल्यावर मग भूमातेच्या
कुशीत गुपचुप शिरतो पाउस
पाउस वेडा..           ॥ ३ ॥

जरी कितीही बरसुन गेला
मनात शिल्लक उरतो पाउस
कातरवेळी साधुन संधी
डोळ्यातुन पाझरतो पाउस
पाउस वेडा..           ॥ ४ ॥

- अनामिक
(१९-२१/०७/२०१६)

22 मार्च 2016

सांझ

चलो सखी हम दूर जहाँ से, इक दर्या के शांत किनारे
सूरज की लाली में लिपटे गगन-तले इक सांझ गुजारे

लहरों का हो शोर सुरीला, और पवन की चंचल हलचल
नर्म रेत की चादर ओढे इत्मिनान से बैठे कुछ पल

घुले साँस में साँस, पहन ले हाथों में हाथों के कंगन
इक-टुक देखे दूर क्षितिज पे, धरती और अंबर का मीलन

कंधे के सिरहाने मेरे चैन-सुकूँ से तुम सो जाओ
फिक्र करो ना इस पल की, बस उजले कल के ख्वाब सजाओ

भीनी सी मुस्कान तुम्हारी देख देख मैं दिल बहलाऊ
जुल्फ-हवा का खेल निहारू, हकले से माथा सहलाऊ

तुम्हे छेडती शरारती लट मैं उंगली से दूर हटाऊ
नींद टूटने दू न तुम्हारी, भला जागते उम्र बिताऊ

घने बादलों में सपनों के यूँ ही तैरते रहे सांझ-भर
आए-जाए सूरज-चंदा, दुनिया की कुछ भी न हो खबर

- अनामिक
(२३/०४/२०१५ - २२/०३/२०१६)

08 मार्च 2016

बेमौसम

जाने आज हुआ है अंबर इतना क्यों बोझल
घिर आए हैं गर्मी में भी बरखा के बादल
धीमे स्वर में खनक रही है बिजली की पायल
बूँदें हैं बेताब भिगाने धरती का आँचल

इनको भी महसूस हो गयी मेरे दिल की प्यास
इसी लिए ये बेमौसम आए हैं मिलने खास
पर जिसके इंतजार में उलझी है मेरी साँस
उसको कब होगा मेरे जज़बातों का एहसास ?

ये सब तो जाएंगे बनकर इक दिन के मेहमान
पलखों को तोहफें में देकर अश्कों का तूफान
इन्हें कहूंगा, जरा बरसना उसके भी आँगन
उसको मेरे हिस्से की भी दे आना मुस्कान

- अनामिक
(०४-०७/०३/२०१६)

29 फ़रवरी 2016

जिंदगी की बात

कर लिये गप्पें बहोत, ढलने लगी है रात भी
चल सखी कर ले जरासी जिंदगी की बात भी

चुटकुलें, किस्सें, संदेसें बहोत भेजे, पढ लिये
चल जरा पढ ले निगाहों में लिखे जज़बात भी

इत्र, गुलदस्तें, खिलौनें.. दे चुके तोहफें कई
पेश करके देख ले दिल की हसीं सौगात भी

चल चुके चालें कई इस इश्क की शतरंज में
जीतने अब दाँव खा ले मुस्कुराकर मात भी

हमराह बनने की पहल कब तक इशारों में करे ?
चल बढाए अब कदम, कर ले नयी शुरुआत भी

- अनामिक
(२४-२९/०२/२०१६)

17 फ़रवरी 2016

कशिश

जाने कैसी कशिश तुम्हारी आँखों की गहराई में है
नफरत भी बरसे इनसे, फिर भी इक प्यास जगाती है

अजब तुम्हारी खामोशी भी, जैसे गजल सुनाती है
रंजिश के स्वर में भी, लगता है, आवाज लगाती है

कदम तुम्हारे बडे सितमगर, मुझे देख मुड जाते हैं
धूल मगर उन कदमों की राहों में फूल खिलाती है

नजर चुरा लो, मुँह भी फेरो, मगर नजर के सामने रहो
सिर्फ तुम्हारी मौजूदगी भी दिल को सुकूँ दिलाती है

- अनामिक

(३०/१२/२०१४, १२-१७/०२/२०१६)

02 फ़रवरी 2016

ऐ चाँद

सुनो ऐ चाँद पूनम के, न इतना भी दिखो सुंदर
सखी की याद आती है, पडे जब भी नजर तुम पर ॥ धृ ॥

समय था वो, समा दीदार से उनके महकता था
शहद का जाम जब मुस्कान से उनकी छलकता था

तुम्हारी चाँदनी से भी हसीं थी सादगी उनकी
खिलाती थी दिलों में फूल बस मौजूदगी उनकी ॥ १ ॥

नजर के सामने तुम, वो, हजारों मील थे पर दूर
तुम्हारा भी न, उनका भी न छू सकता कभी था नूर

जतन कितने किए उन तक पहुँचने के, सभी बेकार
छुपा लेती थी खुदको रंजिशों के बादलों के पार ॥ २ ॥

अमावस की तरह इक दिन अचानक वो हुई गायब
मुकद्दर के सितारे वो चुराकर ले गयी संग सब

तुम्हारी शक्ल में ही देखता हूँ अब छवी उनकी
कभी तो ईद आए, वो दिखे, ये आस है बाकी

मिले गर वो कभी, ऐ चाँद, इक पैगाम पहुँचाना
"उनकी याद में इक बावरा जगता है रोजाना" ॥ ३ ॥

- अनामिक
(०२/०२/२०१५ - ०२/०२/२०१६)

28 जनवरी 2016

चाय की प्याली

सांझ अकेली, इंतजार की, साथ चाय की प्याली थी
अफसोस.. सामने वाली कुर्सी मगर आज भी खाली थी

गरम चाय की भाप लपेटे
तैर रहे थे बीते लम्हें
जाने उनकी राह ताकते
गुजरी कितनी रातें-सुबहें
दिल की शीशी में इत्तर सी उनकी याद संभाली थी
अफसोस.. सामने वाली कुर्सी मगर आज भी खाली थी

उनसे बस इक मुलाकात की
पगली सी उम्मीद लिए
बेगानों संग आया था
मीलों की दूरी पार किए
गुलशन में पर वो ना थी, ना ही वो आनेवाली थी
अफसोस.. सामने वाली कुर्सी मगर आज भी खाली थी

घंटो बैठा रहा वही पे,
भटक भटक के थक गयी नजर
ढूँढ रही थी आहट उनकी,
कभी इस गली, कभी उस डगर
गीली आँखों में ढलते सूरज की उतरी लाली थी
अफसोस.. सामने वाली कुर्सी मगर आज भी खाली थी

- अनामिक
(१७-२७/०१/२०१६)




27 जुलाई 2015

कुछ ख्वाब

कुछ ख्वाब नैनों से तुम्हारे ही मुझे हैं देखने
कुछ गीत होठों से तुम्हारे गुनगुनाने हैं मुझे
कुछ मंजिले दुश्वार कदमों से तुम्हारे तै करू
कुछ घर पनाहों में तुम्हारी ही बनाने हैं मुझे ॥ धृ ॥

कुछ दिन सुनहरी धूप के
कुछ सर्द रातें चाँदनी
कुछ रेशमी घडियाँ हसीं
तुम संग मुझे है काटनी
तुम पर खजानें वक्त के हसते लुटाने हैं मुझे
जनमों-जनम के कुछ सफर तुम संग बिताने हैं मुझे ॥ १ ॥

कुछ धडकने मेरी थमी
दिल में तुम्हारे चल पडे
रेखा तुम्हारे हाथ की
तकदीर से मेरी जुडे
बाजू तुम्हारे सुर्ख मेहंदी से सजाने हैं मुझे
माथे तुम्हारे कुछ सिंदूरी रंग लगाने हैं मुझे ॥ २ ॥

- अनामिक
(०५/०६/२०१५ - २६/०७/२०१५)


07 जुलाई 2015

इक अर्ज़ी थी

इक अर्ज़ी थी कुछ सपनों की
कुछ अनकहे फसानों की
उम्मीदों की, अरमानों की
कुछ बेजुबाँ तरानों की

इक अर्ज़ी थी दिल से दिल तक
बंद दरों पे जैसे दस्तक
इक अर्ज़ी थी, जो पहुँचाती
धुंदले 'कल' से उजले 'कल' तक

इक अर्ज़ी थी, जिसको सींचा
पलखों की बूँदों में भिगाकर
शिद्दत से जी-जान लगाकर
नजरों में इक आस जगाकर

वो बस अर्ज़ी ना थी,
मेरे जजबातों का मुखडा थी
लेकिन उनके लिए महज़ वो
कागज़ का इक टुकडा थी

धूल जमी है उस अर्जी पर
गुजर गए लम्हों के पंछी
आज समय की शाखों पे वो
फडक रही है बनकर पर्ची

उस अर्ज़ी की सालगिरह पर
यादों के नजरानें हैं
कुछ अश्कों के गुलदस्तें हैं
कुछ बेबस मुस्कानें हैं

- अनामिक
(०७/०७/२०१५)

( On the occasion of completing a year of an Arji :
http://www.youtube.com/watch?v=v-0E0XjKJT8 )

04 जून 2015

याद

कैद कर लू अक्षरों में, या लबों से गुनगुना लू
पर न रुकती है तुम्हारी सर्द यादों की पवन
बंद कर लू खिडकियाँ दिल की सभी, फिर भी कही से
पहुँच जाती है तुम्हारे सुर्ख सपनों की किरन ॥ धृ ॥


इश्क को कमजोर कर दे, फासलों में वो न दम
दूर हो मीलों, मगर साया तुम्हारा हर कदम
आज भी ढूँढे तुम्हे तितली नजर की हर चमन ॥ १ ॥


पैंतरें तकदीर के दिल को समझ आतें नहीं
बिन-जुडे तुझमें फसे धागें सुलझ पातें नहीं
क्यों सभी नाकाम हैं तुम तक पहुँचने के जतन ?  ॥ २ ॥


- अनामिक
(३१/०५/२०१५ - ०४/०६/२०१५)

21 मई 2015

बंध नवे

बंध नवे, संबंध नवे हे
प्रेमफुलांचे गंध नवे
नाजुक हळव्या हृदयामधुनी
मोहरणारे स्पंद नवे

भिरभिरणा-या खुळ्या जिवाला
जडले कुठले छंद नवे
आयुष्याच्या वेलीवरती
फुलले क्षण बेधुंद नवे           ॥ धृ ॥

पाउस अवचित उधळत येतो
इंद्रधनूतुन रंग नवे
थेंब बरसता चिंब मनावर
उठती लाख तरंग नवे
भाव उमलती, अन्‌ अंकुरती
ओठांवरती शब्द नवे            ॥ १ ॥

वेळ-अवेळी कानामधुनी
घुमती मंजुळ नाद नवे
कातरवेळी करीत बसतो
स्वतःशीच संवाद नवे
स्वप्नांच्या मग उंबरठ्यावर
दीप उजळती मंद नवे           ॥ २ ॥

- अनामिक
(०३/०४/२०१५ - २१/०५/२०१५)

20 अप्रैल 2015

दिलासा

ये सखे घेऊन स्वप्नांचा दिलासा
श्वासही तुजवीण ना वाटे हवासा

मांडला मी डाव जिंकाया तुला, पण
नेमका चुकला कुठे, उमगे न, फासा

केवढा हट्टी तुझा रुसवा-अबोला
मान्य ना केलास कुठलाही खुलासा

सुन्न इतक्या जाणिवा होत्या तुझ्या की
हुंदका कळला तुला ना, ना उसासा

खोल इतके अंतरी खणले तुझ्या, पण
ना कधी फुटला तुला पाझर जरासा

मी मुखवटा लावुनी फिरतो असा की
ना कळे रडला जरी पाण्यात मासा

आठवांची मी तुझ्या भरुनी शिदोरी
चाललो अज्ञात एकाकी प्रवासा

- अनामिक
(०३-०८/०४/२०१५)

05 अप्रैल 2015

गुमशुदा

जाने कहा गुमशुदा हूँ मैं.. खुद को भी आऊ न नजर
छान चुका हूँ चप्पा-चप्पा, फिर भी कुछ ना लगे खबर

शायद उस बगिया में गुम हूँ, जहा खिले थे सपनों के गुल
जहा हकीकत की नदिया पे अफसानों के बाँधे थे पुल

या उस साहिल पे बैठा हूँ, जहा कभी थे रेत के महल
जहा वक्त की मुठ्ठी से फिसले थे मोतियों जैसे कुछ पल

या उस बन में भटक रहा हूँ, जहा मेहरबाँ थी हरियाली
जहा बची है अब यादों के सूखे पत्तों की रंगोली

या उस दोराहे पे खडा हूँ, रुकी पडी है जहा जिंदगी
एक राह पे हालाहल है, और दूजी पे सिर्फ तिश्नगी

या चौखट पे इंतजार की, नजरों के कालीन बिछाए
उस मेहमाँ की राह तक रहा हूँ, जो अब फिर कभी न आए

ढूँढ-ढूँढते खुद को शायद लग जाएगा एक जमाना
यही दुआ है अब, कम-से-कम परछाई का मिले ठिकाना

- अनामिक
(१९/०३/२०१५ - ०५/०४/२०१५)
 

31 मार्च 2015

हमें भी आज जीने दो

कदम​ ​तो डगमगाएंगे, नशे में चल रहे जो हम
निगाहें​ लडखडाएंगी, जवाँ मदहोश है आलम
जिएंगे कब तलक​ घुटकर, मचलकर आज जीने दो
रहेंगे​ कब तलक प्यासे, छलकते जाम पीने दो
हमें भी आज जीने दो, हमें भी आज पीने दो​ ॥ धृ ॥

"​कहेंगे लोग क्या?" ये सोच डर डर कर जिए हम तो
​उसूलों में, रिवाजों में जकडकर रह गए हम तो
​मगर इन बेडियों का बोझ अब से ना सहेंगे हम
मनमौजी हवा बनकर जहा मर्जी बहेंगे हम
बगावत की सुई से सब अधूरे ख्वाब सीने दो
रहेंगे​ कब तलक प्यासे, छलकते जाम पीने दो
हमें भी आज जीने दो, हमें भी आज पीने दो​ ॥ १ ॥

शराफत​ की लकीरों में यूँ उलझे, ना सुलझ पाए​
​सुनी​ इसकी, सुनी उसकी, न खुदकी ही समझ पाए
मगर अब से दबे दिल की पुकारें ही सुनेंगे हम
​करेंगे खूब नादानी, अजब राहें चुनेंगे हम
रंगीली शरबती बरसात हर-दिन, हर-महीने दो​
रहेंगे​ कब तलक प्यासे, छलकते जाम पीने दो
हमें भी आज जीने दो, हमें भी आज पीने दो​ ॥ २ ॥

- अनामिक

29 मार्च 2015

क्यों

जाने क्या ये हुआ अचानक ? क्यों कुदरत ने बदले तेवर ?
कल तक था इक हसीं नजारा, आज दिखे कुछ और ही मंजर
क्यों दुनिया की सब चीज़ों का पल में उतर गया है नूर ?
शायद इनको पता चला है.. की तुम चले गए हो दूर... ॥ धृ ॥

क्यों न मोगरे में है खुशबू ? क्यों गुलाब में खिले न रंग ?
क्यों साहिल पे सन्नाटा है ? दर्या में उठते न तरंग
क्यों कोयल के गीत हुए चुप ? क्यों न पसारे पंख मयूर ?
शायद इनको पता चला है.. की तुम चले गए हो दूर... ॥ १ ॥

क्यों न सितारों में है जगमग ? क्यों न चाँद से बरसे रेशम ?
क्यों न बची बदरा में बूँदे ? क्यों छाया पतझड का मौसम ?
क्यों गुम है सूरज की रौनक ? क्यों अंधियारा करे गुरूर ?
शायद इनको पता चला है.. की तुम चले गए हो दूर... ॥ २ ॥

क्यों सपनों के महमानों ने पलखों का घर छोड दिया है ?
क्यों रूठी निंदियारानी ने रातों से मुह मोड लिया है ?
क्यों हाथों की रेखाओं के आगे किस्मत है मजबूर ?
शायद इनको पता चला है.. की तुम चले गए हो दूर... ॥ ३ ॥

- अनामिक
(११-१५/०३/२०१५)

16 मार्च 2015

आँधी

चुपके से इक आँधी आई, हलकी सी भी हुई न आहट
आँख लगी तब सन्नाटा था, नींद खुली तो बस गडगडाहट
दबे पाँव से आकर इसने तहस-नहस कर दिया आशियाँ
चंद दुलारी चीज़ों को भी समेटने का समय ना दिया
जितना था, सब बहा ले गयी, छोड गयी आँखों में नदिया ॥ धृ ॥

कुछ चीज़ें थी, कुछ बातें थी
कुछ थी सुबहें, कुछ रातें थी
यादों की संदूकों में कुछ सुनहरे पलों के प्यालें थे
जिनमें गम के कडवे जाम भी शरबत से लगते थे मीठे
अरमानों की अलमारी में थी सपनों की शाल रेशमी
जिसे लपेटे कडी ठंड भी लगती थी उम्मीद की गर्मी
इक कोने में फडक रहा था, वो भी बुझ गया आस का दिया
जितना था, सब बहा ले गयी, छोड गयी आँखों में नदिया ॥ १ ॥

जाने कितना समय लगेगा, बिखरा सा घर निखारने को
चकनाचूर हौसले की सब दर-दीवारें सवारने को
मन से मलबा निकालने को, फिर से तिनकें बटोरने को
कहा मिलेगी तब तक इक छत, सहमी रातें गुजारने को
हिम्मत की बुनियाद धँसी जो, रचने लग जाएँगी सदियाँ
जितना था, सब बहा ले गयी, छोड गयी आँखों में नदिया ॥ २ ॥

- अनामिक
(०४,१६/०३/२०१५)

17 फ़रवरी 2015

दुआ

हर खुशियों में रंग भरे जो
फूल खिले वो तेरे आँगन
हर सुबहा लाए वो सूरज
सब सपने कर दे जो रोशन

सदा सजे मुस्कान लबों पर
जिसे देख शरमाए दर्पन
गूँजे अल्लड हँसी यूँ, किसी
नन्ही की पायल की छनछन

मिले जीत हर जंग में तुझे
हर बादल बरसाए सावन
खुशबू तेरी तारीफों की
महके, जैसे बन में चंदन

ऊँची भरो उडान गगन में
रोक न पाए कोई बंधन
रहो जहा भी, सदा खुश रहो
यही दुआ माँगे मेरा मन

- अनामिक
(२०/१२/२००८, १३/०१/२०१५, १६/०२/२०१५)

15 फ़रवरी 2015

नाँव

धूप में, या छाँव में
बहाव में, ठहराव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में
प्रीत की नदिया बहे
दो दिलों के गाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ धृ ॥

फूल हो, अंगार हो
मंजिलें दुश्वार हो
हर कदम मिलकर चले तो, जलजलें भी पार हो
काँटें भी तुझ संग लगे
गुदगुदी से पाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ १ ॥

रोक ले ऊँची लहर
या उठे चाहे भँवर
हाथ बस तुम थाम लो, फिर तय करे मुश्किल सफर
तुम बनो मरहम मेरा
दर्द में, हर घाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ २ ॥

- अनामिक
(०८/०९/२०१४ - १४/०२/२०१५)