15 फ़रवरी 2015

नाँव

धूप में, या छाँव में
बहाव में, ठहराव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में
प्रीत की नदिया बहे
दो दिलों के गाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ धृ ॥

फूल हो, अंगार हो
मंजिलें दुश्वार हो
हर कदम मिलकर चले तो, जलजलें भी पार हो
काँटें भी तुझ संग लगे
गुदगुदी से पाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ १ ॥

रोक ले ऊँची लहर
या उठे चाहे भँवर
हाथ बस तुम थाम लो, फिर तय करे मुश्किल सफर
तुम बनो मरहम मेरा
दर्द में, हर घाँव में
हमसफर बन संग निभाना, जिंदगी की नाँव में ॥ २ ॥

- अनामिक
(०८/०९/२०१४ - १४/०२/२०१५)


 

31 जनवरी 2015

नादान ख्वाबों के परिंदों

रात गहरी हो चुकी है
नींद पलखों पर रुकी है
दर न मेरा खटखटाओ..
आँख से बहती नदी पर
बेसमय तुम यूँ उतरकर
प्यास अपनी ना मिटाओ..
चैन, सुद-बुध छीनकर, ना नींद पर भी हक जताओ
नादान ख्वाबों के परिंदों, अब न यूँ मुझको सताओ ॥ १ ॥

शाल यादों की लपेटे
दर्द को मन में समेटे
एक-टुक देखू गगन में..
खामखाँ तनहाइयों में
भेस में परछाइयों के
झाँकते हो क्यूँ जहन में..
ना कभी सच हो सकेगी, दासताँ वो ना बताओ
नादान ख्वाबों के परिंदों, अब न यूँ मुझको सताओ ॥ २ ॥

ये अंधेरे की परीक्षा
सदियों से जिसकी प्रतिक्षा
वो सहर अब हो, न हो..
गाँव अपने लौट जाना
चाहते थे तुम सजाना,
वो नगर अब हो, न हो..
ना बचेगा घोंसला, तिनकें न तूफाँ में जुटाओ
नादान ख्वाबों के परिंदों, अब न यूँ मुझको सताओ ॥ ३ ॥

- अनामिक
(१४-३०/०१/२०१५)

27 जनवरी 2015

हम आस लगाए बैठे हैं

हम आस लगाए बैठे हैं
आए वो झिलमिल रात कभी
ख्वाबों से तू उतरेगी, और
कह देगी दिल की बात कभी
हम प्यास जगाए बैठे हैं
होगी रिमझिम बरसात कभी
तेरे नैनों के प्यालों से
छलकेंगे वो जज़बात कभी ॥ धृ ॥

तेरी ही याद लपेटे..  हर एक सांझ है ढलती..
तेरे ही नाम से निकले दिन
तेरी ही ओर लिए अब..  हर एक राह है चलती..
मंजिल ना दूजी है तुझ बिन

अब नींद बनी तेरी जोगिन
मैं जागू तेरे सपनें गिन
जो बुने फसाना मेरा दिल
कर दे उसकी शुरुवात कभी
हम आस लगाए बैठे हैं
आए वो झिलमिल रात कभी ॥ १ ॥

तेरी इक झलक के खातिर..  नजरें करती हैं कसरत..
तेरी मुस्कान से मचले दिल
हसकर शरमाए तू जब..  उतरे धरती पर जन्नत..
साँसों की बढती है मुश्किल

तू मुड कर देखे एक नजर
तो दिल के सागर उठे लहर
है यही दुआ, तेरे इकरार कि
मिल जाए सौगात कभी
हम आस लगाए बैठे हैं
आए वो झिलमिल रात कभी ॥ २ ॥

- अनामिक
(२३/११/२०१४ - २७/०१/२०१५)

09 जनवरी 2015

सदियाँ गुजर रही हैं

इंतजार ही इंतजार है, लम्हें सिमट रहे हैं
रुकी कहानी है कबसे, बस पन्नें पलट रहे हैं
लाख जुटाऊ सब्र, वक्त की लडियाँ बिखर रही हैं
राह तुम्हारी तकते तकते सदियाँ गुजर रही हैं ॥ धृ ॥

रोज खयालों के गुलशन में
ढूँढू खुशबू, रंग तुम्हारे
या फिर सपनों के अंबर में
भरू उडानें संग तुम्हारे
कितना भी सहलाऊ दिल को, यादें उभर रही हैं
राह तुम्हारी तकते तकते सदियाँ गुजर रही हैं ॥ १ ॥

काश तुम्हारे आँगन में
पंखुडियाँ मेरे नाम की गिरे
काश तुम्हारे मन को छू ले
मेरे जज़बातों की लहरें
प्यास तुम्हारी मोती बन आँखों में उतर रही है
राह तुम्हारी तकते तकते सदियाँ गुजर रही हैं ॥ २ ॥

- अनामिक
(०६/०५/२०१४ - ०८/०१/२०१५)

06 जनवरी 2015

वो मिले तो..

जश्न था, महफिल भरी थी, सूरतें सब थी नयी
चल रहा था मैं अकेला, इक नजर टकरा गयी
वो अचानक यूँ मिले, तोहफा सुहाना मिल गया
इन लबों को मुस्कुराने का बहाना मिल गया

देख कर इक-दूसरे को फूल चेहरों के खिले
वक्त के जालें छटे, सब घुल गए शिकवे-गिले
याद में गुमनाम लम्हों का ठिकाना मिल गया
वो मिले तो मुस्कुराने का बहाना मिल गया

बात फिर छिडती गयी, कडियाँ नयी जुडती रही
बेसबब छीटें हँसी की हर घडी उडती रही
यूँ लगा, खामोश लफ़्ज़ों को तराना मिल गया
वो मिले तो मुस्कुराने का बहाना मिल गया

थी शिकायत कर रही सुइयाँ घडी की बेसबर
अलविदा कहना पडा, मुस्कान लब पर थी मगर
था सुकूँ, संजोग से साथी पुराना मिल गया
वो मिले तो मुस्कुराने का बहाना मिल गया

- अनामिक
(०१-०६/०१/२०१५)


26 दिसंबर 2014

आले वादळ, गेले वादळ

आले वादळ, गेले वादळ, पण कुणासही कळले नाही
मोहरलेल्या बनात इवले पान सुध्दा सळसळले नाही

चिंब चिंब झरल्या धारा, पण धरणी होती तशी कोरडी
कुशीत मातीच्या दडलेले अत्तरही दरवळले नाही

किती उसळली लाट, तरीही निर्विकार अन्‌ स्तब्ध किनारा
कैक आर्जवे करुनीही त्याच्याशी नाते जुळले नाही

या ओठांनी स्मितहास्याचे मध मिसळू पाहिले कितीही
कडवटलेल्या त्या ओठांचे मौन मात्र विरघळले नाही

जिच्या स्मृतींची रोज पाखरे भिरभिरती अंगणात माझ्या
कधी तिच्या उंब-यात माझे नाव सुध्दा घुटमळले नाही

- अनामिक
(१५-२६/१२/२०१४)

30 अक्टूबर 2014

ऐ लौटती बरखा

ऐ लौटती बरखा जरा.. कुछ पल ठहर मेरी गली
महके, खिले बिन ही​ ​यहाँ मुरझा रही है इक कली ॥ धृ ॥

सावन​ ​गुजरता ही रहा, हर ओर तू जमकर गिरी
पर सि​​र्फ मेरी बाग में तूने नही दी हाज़िरी
कैसे खिले ​​बूँदों बिना प्यासी कली वो मनचली
ऐ लौटती बरखा जरा..                      ॥ १ ॥

अब लौटकर जाते हुए तो​ ​ये ​बुझा​ ​दे​ ​तिश्नगी
रिमझिम गिरा लड़ियाँ, कली को दे महकती जिंदगी
भर दे जमीं की गोद, पंखुड़ियाँ खिला दे मखमली
ऐ लौटती बरखा जरा..                      ॥ २ ॥

- अनामिक
(०३-३०/१०/२०१४)

02 सितंबर 2014

कुछ रुके अल्फाज

कुछ रुके अल्फाज हैं, तट पर लबों के हैं खडे
पर नदी खामोशियों की पार कर सकते नही

कुछ छुपे जज़बात हैं, झाँकें नजर की आड से
रंजिशों की सरहदों को लांघ पर सकते नही

कुछ अधूरे ख्वाब हैं, उडते गगन में रात भर
है अमावस, चाँद की परछाई भी मिलती नही

इक दबी मुस्कान है, कब से लगाए दस्तकें
बंद दिल में एक भी खिडकी मगर खुलती नही

बावरी इक आस है, तकदीर की दहलीज पर
दीप जितने भी सजाए, लौ मगर जलती नही

- अनामिक
(मार्च, ऑगस्ट २०१४)

11 अगस्त 2014

घोंसला

हमसफर, चल ढूँढने दुनिया, गगन के भी परे
पर लगाकर ख्वाब के उँची उडानें चल भरे
हो सितारों का नगर, संग बादलों का काफिला
चाँद-किरणों से बनाए इक सुनहरा घोंसला ।। धॄ ।।

चार तिनके तुम जुटाओ, चार तिनके मैं चुनू
तुम बटोरो चंद धागे, नर्म चादर मैं बुनू
तुम बनो उम्मीद मेरी, मैं तुम्हारा हौसला ।। १ ।।

हो कभी बारिश घनी, ढक लू तुम्हें पंखों तले
बूँद भी तुम पर गिरे ना, झेल लू खुद जलजले
य़ूँ तुम्हे थामू, रहे ना रूह का भी फासला ।। २ ।।

- अनामिक
(१०/०७/२०१४ - १०/०८/२०१४)

07 अगस्त 2014

तुम ही हो

रात-दिन दिल को सताए, वो हसीं ख्वाइश हो तुम
जिंदगी की धूप में उम्मीद की बारिश हो तुम
प्यास तुम, तुम ही सुकूँ, मीठी चुभन में तुम ही हो
दिल में धडकन की तरह हर पल जहन में तुम ही हो ॥ धॄ ॥

नींद घुलती है तुम्हारे ख्वाब में
आँख खुलती है तुम्हारी याद में
यूँ खुदा से तो न कुछ मांगा कभी
अब तुम्हे मांगा करू सौगाद में
चाँदनी में तुम, सुबह पहली किरन में तुम ही हो
दिल में धडकन की तरह हर पल जहन में तुम ही हो ॥ १ ॥

चंद घडियों की सुहानी साथ से
उम्रभर की आस दिल में जग गयी
भा गयी मासूम सूरत इस कदर
आँख को दीदार की लत लग गयी
झाँक लो इक बार मेरे अंतर्मन में तुम ही हो
दिल में धडकन की तरह हर पल जहन में तुम ही हो ॥ २ ॥

- अनामिक
(जून, अगस्त २०१४)

03 जून 2014

जंजीर

​मिलता न लडकर जंग भी जो दुश्मनों के तीर से
वो जख्म रांझे को मिला है दिल लगाकर हीर से

है रूबरू, पर बीच है दीवार सी खामोशियाँ
जब दिल करे, तो​ बात भी करनी पडे तसवीर से

इक नाम हाथों की लकीरों में लिखा है ही नही
ये जानकर भी खामखा लडता रहू तकदीर से

ये बंद गलियाँ छोड कबका ढूँढता मंजिल नयी
जकडा हुआ है दिल मगर उम्मीद की जंजीर से

- अनामिक
(२९/०५/२०१४ - ०३/०६/२०१४)

05 मई 2014

छंद नाही राहिला

गंध बकुळेच्या फुलांचा धुंद नाही राहिला
अन् मलाही हुंगण्याचा छंद नाही राहिला

रात्र झुरते एकटी, नसतो कुणीही सोबती
चंद्र ता-यांशी तिचा संबंध नाही राहिला

चिंब जो भिजवायचा, पाऊस तो झरतो जपुन
अन् हवेचा झोतही स्वछंद नाही राहिला

नांदतो कल्लोळ असुरी अंतरीच्या राऊळी
राम ना उरला इथे, गोविंद नाही राहिला

भासते ही वास्तवाची बंदिशाळा प्रिय अता
स्वप्नप्रासादात मज आनंद नाही राहिला

- अनामिक

28 अप्रैल 2014

ऐ खुदा

रात का चिलमन हटा दे, अब दिखा दे इक किरन
रहमतों की चाँदनी से झिलमिलाने दे गगन

दूर हो बादल-जमीँ के बीच की सब रंजिशें
पग जलाती रेत पर उम्मीद की हो बारिशें

चीर सन्नाटें घने गूँजे सुरों की बिजलियाँ
फिर सजे बगिया गुलों से, रंग भर दे तितलियाँ

बेजुबाँ सूरज के दिल की चाँद तक पहुँचे सदा
कुछ करिश्मा कर दिखा, सुन ले गुजारिश ऐ खुदा

- अनामिक
(११/०३/२०१४, २२/०४/२०१४, २८/०४/२०१४)

26 अप्रैल 2014

आहट नही है

थम सी गई है     जीवन कि नदिया
जब से किसी की  आहट नही है

प्यासे फिरे हैं      पंछी नजर के
दीदार का अब     पनघट नही है

सुनसान दिल है,  लडने, सताने
बातें, शरारत      नटखट नही है

बहते न आँगन    झोंके पवन के
अब छेडने को     वो लट नही है

इक याद भटके    कल के नगर में
पर रोज की वो    चौखट नही है

- अनामिक
(१५/०२/२०१३, २४/०४/२०१४, २५/०४/२०१४)

14 मार्च 2014

खबर ही नही है

बहाता रहे मेघ दिन रात बूँदे
जमीं पर भला कुछ असर ही नही है

भटकती फिरे रोज बेचैन तितली
कली को मगर कुछ खबर ही नही है

जले है दिया जूँझ कर आँधियों से
सितमगर खुदा को कदर ही नही है

छुपाए रखे लाख जज़बात पलखें
उन्हे पढ सके वो नजर ही नही है

- अनामिक
(१५/०१/२०१४ - १३/०३/२०१४)

06 मार्च 2014

न जाने

चला हूँ ढूँढने मंजिल, जहा तेरे ठिकाने हैं
मगर पाने तुम्हे चलने अभी कितने जमाने हैं

मुझे सूझे न इक तरकीब मिलने, बात करने की
तुम्हारे पास मुझको टालने के सौ बहाने हैं

लबों पर जिक्र भी मेरा कभी छिडने न देती हो
जुबाँ मेरी तुम्हारी तारिफों के ही तराने हैं

जतन कुछ भी करू, इक तीर भी पहुँचे न दिल के पार
सितारें भी दू तोहफे में, कहोगी ये पुराने हैं

करो, न करो मेहर, दिल से तुम्हारी ना ढले मूरत
बसा मंदिर तुम्हारे कौन पर ईश्वर न जाने है

- अनामिक
(२५/०२/२०१४ - ०६/०३/२०१४)

28 फ़रवरी 2014

गहराई

कभी उछलकर, कभी मचलकर मन छू लेती हैं लहरें
पर सागर जाने क्या भीतर राज़ छुपाए है गहरें

कंकड़ फैंके नाप रहा हूँ मैं पानी की गहराई
मोती निकले, या पत्थर, पर हाथ लगे बातें कोई
रोक रहे हैं आहट को भी काले बादल के पहरें

खारे पानी से सपनों की कैसे प्यास बुझाऊ मैं
घर न चले पंछी सवाल के, क्या उनको समझाऊ मैं
इस बेचैनी पर हसते हैं लहरों के लाखों चेहरें

- अनामिक
(०३/०९/२०१२ ११/०६/२०१३ २७/०२/२०१४)

25 फ़रवरी 2014

रात

नशे में है समंदर, चढ रही है रात धीरे से
महरबाँ चाँद रेशम की करे बरसात धीरे से

गगन कब से पुकारे, कान मूँदे है पडी धरती
लगे है टूटने तारा बने जज़बात धीरे से

उछलकर भी, मचलकर भी, कभी समझा सकी ना जो
किनारे से लहर अब कह रही वो बात धीरे से

सितारों में हुई कुछ गुफ्तगू किस्मत बदलने की
अधूरी दासताँ करने लगी शुरुवात धीरे से

- अनामिक
(२३-२५/०२/२०१४)

21 फ़रवरी 2014

अर्जी

कब से नजर में कैद थे, अब पार कर सब मुश्किले
पंछी सलोने ख्वाब के भरने उडानें हैं चले

कश्मकश की बंदिशों को तोड कर जज़बात अब
दहलीज दिल की लांघ कर पहुँची जुबाँ तक बात अब

सब जान कर भी ना बनो अंजान, सुन भी लो जरा
दिल की मुरादें पाक हैं, पहचान तुम भी लो जरा

इक बार सुन लो, फिर करो तय जो तेरी मर्जी
पर बिन पढे ही ना करो खारिज मेरी अर्जी

अर्जियाँ ही अर्जियाँ हैं अब तेरे दरबार में
कुछ सुना दे फैसला, इनकार या इजहार में

- अनामिक
(१४,२०,२१/०२/२०१४)

18 फ़रवरी 2014

कश्मकश

अजब सी कश्मकश है हर घडी, सुलझे न इक मुश्किल
खयालों का उठा तूफान है, बस में न अब है दिल
बसा है जो निगाहों में, करू कैसे उसे हासिल ?

रुकू उसके इशारे के लिए, या खुद करू शुरुवात ?
जुबाँ से छेड़ दू अल्फाज, या कर लू नजर से बात ?
दिखाऊ सिर्फ दोस्ती, या जताऊ मैं दबे जज़बात ?

रखू दर्म्यान कुछ दूरी, मिलू या रोज सुबहो-शाम ?
करू मैं जल्दबाजी, या जरासा सब्र से लू काम ?
समय की रेत फिसले हाथ से, निकले न कुछ अंजाम

करू मैं क्या जतन, जो कर सकू उसके जिया में घर ?
बिखेरू शायरी के रंग, छेडू बांसुरी के स्वर ?
लगे पर डर, कही उसका अलग ही तो नही ईश्वर ?

जताऊ तो भला कैसे, बताऊ तो भला कैसे ?
करू मैं दो दिलों के बीच का तय फासला कैसे ?
सुनहरी जिंदगी का हो शुरू तो सिलसिला कैसे ?

सुलझती है न ये उलझन..

- अनामिक
(३१/०१/२०१४ - १८/०२/२०१४)

27 जनवरी 2014

नजरें

नजर के पंछियों को इन दिनों इक प्यास रहती है
नजर झरना बने बस इक नदी की और बहती है

नजर की तितलियाँ इक फूल के चक्कर लगाती है
नजर सपने बुने, सोती न खुद, मुझको जगाती है

नजर की चौखटें पल पल किसीकी राह तकती है
किसीकी आहटों, परछाइयों से भी बहकती है


नजर सौ बार आते वो, नजर फिर भी नही मिलती
बिखेरू बीज, पर मुस्कान की कलियाँ नही खिलती

कभी टकरा गयी नजरे, पलख के दर न खुलते हैं
नजरअंदाज कर चुपचाप वो रस्ता बदलते हैं

नजर के तीर भी छोडू, निशाने पर न लगते हैं
करे वो बेरुखी के जख्म, आँखों में सुलगते हैं


समझ भी ले कभी वो शायरी खामोश नजरों की
सुनाई दे उन्हे भी गूँज अब बेचैन लहरों की

कभी इस और बसरा दे नजर की चाँदनी वो भी
इशारों में सही, कुछ बात कह दे अनसुनी वो भी

दुआ है, खत्म हो लुक्काछुपी का खेल नजरों का
शुरू हो इक नई दास्तान, होकर मेल नजरों का


- अनामिक
(जनवरी २०१३)

12 जून 2013

समंदर

बीते कल सा थमा किनारा, यादों का है घना समंदर
जिसमें डूबते सूरज की भी परछाई दिखती है सुंदर
लहरें नटखट स्वांग रचाए, ऊपर चुलबुल, गुमसुम अंदर
सर्द हवा के झोंकों ने भी दबा रखा है तेज बवंडर

कुछ मोती मन की सीपी से गिरे रेत पर, मिले न वो फिर
निशान छूटें थे कदमों के, बहा ले गयी वक्त की लहर
साहिल पर कुछ नाम लिखे थे, अब न बचा है इक भी अक्षर
जिन्हे सजाया था सपनों से, ढह गए सभी मिट्टी के घर

इक पुकार निकले भीतर से, कर लौटे पृथ्वी का चक्कर
काट सके ना पर बेचारी इस तट से उस तट का अंतर
यूँ तो जुडे हुए दिखते है, आँखों का धोखा है ये पर
क्षितिज करे कोशिश कितनी भी, पा न सके धरती को अंबर

- अनामिक
(१६-२२-२३/०४/२०१३)

08 जून 2013

पर्वणी

रुक्ष आयुष्यास या अवचित मिळाली पर्वणी
आज वळणावर जुन्या नजरेत अडखळले कुणी
एक चेहरा गोजिरा नयनांत भिरभिरला क्षणी
​धस्स झाले मन्मनी, लवते न लवते पापणी

गतस्मृतींची पाखरे झेपावली तारांगणी
माळ तुटुनी सांडले हळव्या क्षणांचे तन्मणी
बांध फुटला अंतरी, छेदे फुगा जणु टाचणी
मुक्त झाल्या भावना, जणु वारुळातुन नागिणी

मेघ झरले दाटलेले आर्त व्याकुळ अंगणी
चहुकडे ग्रीष्मातही हिरवळ पसरली श्रावणी
चंद्र पुनवेचा जणू बघुनी सुखावे चांदणी
जणु हरीच्या बासरीने मुग्ध व्हाव्या गवळणी

सत्य की स्वप्नात मी, कोठे करावी चाचणी
​अनुभुतीची या कशी शब्दात व्हावी मांडणी
दर्शनातच तृप्त मी, उरली न दुसरी मागणी
'भेट' ही​ अनमोल​, झालो आज नशिबाचा ऋणी

- अनामिक
(१३/१२/२०१० - १९/१२/२०१० आणि ३०/०५/२०१३ - ०५/०६/२०१३)

25 मई 2013

घाव (गझल)

किती निसटले खेळ हातुनी, अन विस्कटले डाव किती
मोजत बसता जुनाट जखमा, नवे चिघळती घाव किती

ससा हरे अन कासव जिंके, निदान शर्यत लढणारे
किती पळो कुंपणात सरडा, पल्याड त्याची धाव किती

ज्या बाजारी विकली जाती खोटी रंगित मोरपिसे
सत्याच्या चिमण्या पंखांना तिथे मिळावा भाव किती

खेळ रंगता डोंबा-याचा टाळ्या पिटती सर्व ’बघे’
पाय निसटतो, फुटते मस्तक, मदती येतो गाव किती

गरजेपोटी फुलती नाती, ओढ.. गोडवा.. आपुलकी..
गरज सरे, ’मेल्या’ वैद्याचे मुखात उरते नाव किती

- अनामिक
(२४-०५-२०१३)

11 नवंबर 2012

चांदवा नाही अता (गझल)

वाहती नुसतेच वारे, गारवा नाही अता
दरवळे श्वासात सा-या, ती हवा नाही अता

तीच दुनिया, तीच गजबज, अंगणी तरि शांतता
धुंद किलबिल पाखरांचा तो थवा नाही अता

रात्र नेई दूर, सोबत कैक लुकलुकते दिवे
कुट्ट वाटा उजळणारा काजवा नाही अता

तारका लाखो जरी, अंबर सुने अन कोरडे
चिंब भिजवाया दुधाने चांदवा नाही अता

झोत शब्दांचा पडे कानी, न भिडती भावना
अर्थ मौनाचा कळे, त्या जाणिवा नाही अता

जखडुनी नाती जुनी उरल्यात तुटक्या साखळ्या
जो मने सांधायचा, हळवा दुवा नाही अता

- अनामिक
(०६/११/२०१२ - १०/११/२०१२)

04 नवंबर 2012

बरेच काही (गझल)

अशांत सागर मनी खोलवर मुरते आहे बरेच काही
पाचोळ्यागत लाटांवरही तरते आहे बरेच काही

आठवणींची लक्ष पाखरे सोडुन येतो दूर वनी मी
मोरपंख उरलेले बघुनी स्मरते आहे बरेच काही

मनोरथांना लगाम लावुन थोपवतो मी विचारचक्रे
तरि न शमे आवेग, मस्तकी फिरते आहे बरेच काही

फक्त दोन थेंबांसाठी मी नदीस करतो कैक याचना
फुटे न पाझर, डोळ्यांतुन पण झरते आहे बरेच काही

हिशेब करतो, उणीच भरते सुखस्वप्नांची गोळाबेरिज
मात्र व्यथा अन वेदनांसवे उरते आहे बरेच काही

- अनामिक

18 अक्टूबर 2012

इक शाम काफी है

दिन सवरने के लिये इक शाम काफी है
दिल बहकने चाय के भी जाम काफी है

यूँ घनेरी भीड है, चेहरे हजारो है
जी मचलने के लिये इक नाम काफी है

ना लगे अल्फाज, ना कागज-कलम-स्याही
जो निगाहों ने लिखे पैगाम काफी है

क्यूँ भला हथियार से जीते जमीं दिल की
जो किया तीर-ए-नजर ने काम काफी है

शर्मिली मुस्कान से घायल करो ना यूँ 
इस हँसी पर कत्ल के इल्जाम काफी है

गर चिराग-ए-जिन मिले भी, ना दुआ माँगू
इस सुहानी साथ का ईनाम काफी है

सिलसिले खिलने लगे इन खंडरों में भी
यूँ चले बस, हो न हो अंजाम, काफी है

- अनामिक
(१४/१०/२०१२ - १७/१०/२०१२)

20 दिसंबर 2010

ख्वाइशें जलती रही (गजल)

उठती रही चिंगारियाँ, दिल में अगन पलती रही
कुछ खाक सपने हो गए, कुछ ख्वाइशें जलती रही

करने उजागर जिंदगी, मैं ढूँढने सूरज चला
इक बार भी न हुई सुबह, शामें मगर ढलती रही

मुश्किल सफर, सौ रासते, धुंदले सभी, जाता कहाँ
गुमराह करके, दूर मुझसे मंजिले चलती रही

अंजान सी इस भीड में ना दोस्त, ना अपने मिले
बहला सकी ना महफिलें, तनहाइयाँ छलती रही

पौधे गुलाबों के लगाए, खुशबुओं की चाह में
बरसे न बादल, बाग काटों से सदा खिलती रही

शतरंज में संसार की सीखे न टेढे पैंतरे
चलता गया हर चाल सीधी, मात ही मिलती रही

- अनामिक
(१५/१२/२०१० - १९/१२/२०१०)

24 अक्टूबर 2010

इक नदी / किनारा हो न हो

बह चला हूँ इक नदी में, अब किनारा हो न हो
डूब जाऊ या उभर पाऊ, सहारा हो न हो

ले चली किस ओर धारा, मंजिले किस छोर है
दिल जिसे तरसे युगों से, वो नजारा हो न हो

इक लहर है गुदगुदाती, दूसरी घायल करे
हर सितम चुपके सहू मैं, कोइ चारा हो न हो

दिल मचलता हर घडी, चंचल किसी मछली तरह
आहटों से भी बहकता, कुछ इशारा हो न हो

खींच ले भीतर मुझे रंगीन ख्वाँबों का भँवर
अब हकीकत की जमीं छूना दुबारा हो न हो

हर दिशा पानी सुनहरा, प्यास पर बुझती नही
चाँद की परछाइयाँ पीकर गुजारा हो न हो

यूँ सभी झरने, पुहारे तो समा लेती नदी
आँख से छलकी उसे बूँदे गवारा हो न हो

- अनामिक
(०३/०७/२०१० - २३/१०/२०१०)

09 जुलाई 2010

बझ है की मानता नही...

आज कल 'गूगल का बझ' हमारे जिंदगी का एक हिस्सा बन गया है. हर रोज बझ पे कुछ न कुछ बकवास ना करो, तो मानो खाना ही नही हजम होता. ना सूरज ढलता है.. ना नींद आती है..
ऐसे बझ के प्रति मेरे मन में उठी तरंगों को शब्दों में पिरोने की कोशिश कर रहा हूँ.

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मूल गीत : दिल है की मानता नही (निर्देश के लिए नीचे दिया गया है)
फिल्म : दिल है की मानता नही
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बझ है की मानता नही...
नॉनसेन्स बडी है बझ में कॉमेंटिंग.. मैं जानता ही नही..
बझ है की मानता नही...
बकवास सारी क्यूँ हो रही है.. मैं जानता ही नही..
बझ है की मानता नही...

दिल चाहे हर पल सब के बझों को बस यू ही देखते रहे
घर हो ऑफिस, ना बझ से जुदा हो, बस कमेंट्स लिखते रहे
बझ को पढा जा.. रिप्लाय किया जा.. मतलब रहे या नही..
बझ है की मानता नही...

तेरे बझों पे दो चार ताने खामखा हमने दिये
तूने लिखी जो सौ गालियाँ भी, बेशरम हम बन गये
बरबाद बझ है.. सब जानके भी, करते दिमाग का दही..
बझ है की मानता नही...

बकवास सारी क्यूँ हो रही है.. मैं जानता ही नही..
बझ है की मानता नही...

- अनामिक
(०८/०७/२०१०)

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मूल गीत - दिल है की मानता नही..

दिल है की मानता नही..
मुश्किल बडी है रस्मे मुहोब्बत, ये जानता ही नही
दिल है की मानता नही..
ये बेकरारी क्यूँ हो रही है, ये जानता ही नही
दिल है की मानता नही..

दिल तो ये चाहे, हर पल तुम्हे हम बस यू ही देखा करे
मरके भी हम ना तुम से जुदा हो, आओ कुछ ऐसा करे
मुझ में समा जा.. आ पास आ जा.. हमदम मेरे हमनशीं
दिल है की मानता नही..

तेरी वफाएँ, तेरी मुहोब्बत, सब कुछ है मेरे लिये
तूने दिया है नजराना दिल को, हम तो है तेरे लियेश
ये बात सच है.. सब जानते है.. तुम को भी है ये यकीन
दिल है की मानता नही..

ये बेकरारी क्यूँ हो रही है, ये जानता ही नही
दिल है की मानता नही..

24 अप्रैल 2010

आधुनिक सॉफ्टवेअर म्हणी

या मराठी म्हणी एका Software Engineer च्या दैनंदिन अनुभवातून जन्माला आल्या आहेत. यातला अर्थ/दर्द/मजा ही केवळ मराठी माध्यमातून शिकलेल्या Software Engineer लाच कळू शकते. (आणि त्यांनाही नाही कळलं, तरी काही या म्हणी काढून टाकण्यात येणार नाहीत... Online storage फुकट आहे !)

Warning : या म्हणी वाचकांनी स्वतःच्या risk वर वाचाव्यात. मेंदू hang झाल्यास मंडळ जबाबदार नाही.
(Software Engineer फक्त Error ला घाबरतात. Warning ला नाही !)

ता.क. : येथील Google हा शब्द केवळ Search Engine या अर्थी वापरण्यात आलेला आहे, तेव्हा 'Google - a dream company' असा अर्थ घेऊ नये.

· एक ना code, भाराभर bugs
· code चांगला वाटला, म्हणून copy-paste करू नये
· मरावे परी bugs रूपी उरावे
· आपलाच code आणि आपलेच bugs
· आपला तो program, दुसऱ्याचं ते copy-paste
· इकडे code तिकडे release
· project आला होता, पण deadline आली नव्हती
· Engineer ची खोड lay-off शिवाय जात नाही
· अतीशहाणा त्याचा code रिकामा
· logic थोडे printfs फार
· Developer मागतो ’A’ rating, Manager देतो ’D’
· code कळला तरी bugs मिळत नाहीत
· bonus नको पण workload आवर
· स्वतः coding केल्याशिवाय output दिसत नाही
· दुसऱ्याच्या कोडातल्या warnings दिसतात, पण स्वतःच्या कोडातले errors दिसत नाहीत
· दिसतं तस नसतं म्हणूनच client फसतं
· जो google वरती विसंबला, त्याची deadline बुडाली
· चालत्या कोडावर पाणी
· कुठे manager ची honda-city आणि कुठे programmer ची activa
· एक ना warning, भाराभर errors
· इकडे keyboard तिकडे mouse
· promotion ही गेलं, increment ही गेलं, हाती आली pink-slip
· developer जातो जिवानिशी, manager म्हणतो आळशी
· release सरो, client मरो
· developer मेला workload ने आणि manager मेला tracking ने
· अडला manager, client चे पाय धरी
· developer ने डोळे मिटून code ढापला, म्हणून manager ला कळायचं राहत नाही
· pendrive मध्ये program आणि hard-disk मध्ये control-F
· code सलामत तो outputs पचास
· release गेला आणि bug-fix केला
· manager चा feedback, वाकडा ते वाकडाच
· manager पुढे दिली PPT, आणि कालची meeting बरी होती
· job सलामत, तो increments पचास
· fresher च्या program ला printf पासून तयारी
· deadline पाहून coding करावे
· उतावळा client, onsite posting
· उचलला phone आणि लावला कानाला
· बुडत्याला google चा आधार
· ज्याचा लिहावा code, तो म्हणतो माझंच credit
· आलीया deadline, लिहावा program
· हपापाचा code गपापा
· मूर्ख manager पेक्षा शहाणा client बरा
· झाकला code सव्वाशे lines चा
· चार line चा code आणि बारा line च्या comments
· ज्याच्या हाती code, तोच programmer
· चार दिवस manager चे, चार दिवस developer चे
· कोडात नाही तर output कुठून येणार
· ऑफिसात राहून HR शी वैर करू नये
· ऐकावे manager चे, करावे client चे
· आयजीच्या code वर बायजी हुशार
· आधीच increment, त्यात profit sharing
· results झाकले म्हणून deadline यायची राहत नाही.
· reports मोठे, results खोटे
· programmer सोडून reviewer ला सुळी
· programmer च्या शापाने HR मरत नाही.
· manager चा cube असावा शेजारी
· intern ची धाव google पर्यंत
· HR तारी त्याला कोण मारी
· हा code आणि हा client
· google वाचून error गेला
· google वरचा code, चालला तर चालला, नाहीतर delete केला
· error नाही त्याला डर कशाला?
· developer च्या मनात lay-off
· coding येईना hard-disk तोकडी
· code दाखव नाहीतर resign कर
· code आहे तर compiler नाही, compiler आहे तर code नाही
· हातच्या printout ला laptop कशाला
· client ला manager साक्ष
· bug रामेश्वरी अन fix सोमेश्वरी
· लहान तोंडी मोठा seminar
· review चा code आणि release चा code वेगळा असतो
· project गेला आणि report राहिला

- अनामिक
(२३-०४-२०१०)

25 मार्च 2010

अशी पाखरे येती.. आणिक स्मृती ठेउनी जाती..

"बाळा, एक bad-news आहे." कापऱ्या आवाजात फोनवर आई म्हणाली.
"काय झालं आई ?" माझाही जीव इथे कासाविस.
"अरे.. सर off झाले.."
"क्काय ???"
जेके सर.. गेले...

हे काय ऐकलं मी आता.. काहीच कळेना.. काहीच सुचेना.. पाय जागचा हलेना.. इतका मोठा धक्का मनाला पेलवेना...

जयकीर्ती कळसकर.. उर्फ जे.के. माझ्या मित्रमंडळींपैकी सर्वात साधी आणि सरळ व्यक्ती. राहणीमानानेही आणि मनानेही. कधीही कुणाबद्‍दल मनात कपट नाही की काळंबेरं नाही.. कुणाच्या अध्यात ना मध्यात.. ना कधी कुणाला दुखावलं असेल. कुठल्या गोष्टीचं चेहऱ्यावर कधी tension नाही. एकदम 'cool' आणि प्रसन्न असं व्यक्तिमत्व.

आमची ओळख मी VJTI मध्ये B.E. च्या third year ला असल्यापासूनची. जेके सर तेव्हा M.Tech. च्या first year ला होते. M.Tech. च्या विद्यार्थ्यांना teaching assistantship म्हणून professors ना काहीतरी मदत करावी लागते. तसेच जेके सर हे आम्हाला कुठल्यातरी practical ला assistant म्हणून होते. तसे इतर practicals ना M.Tech. चे इतर विद्यार्थीही assistant म्हणून होते आम्हाला. त्यांची आम्ही B.E. वाले लोक मनसोक्त टिंगल करत असू. पण जेके सरांविषयी मात्र सुरुवातीपासूनच मनात आदर निर्माण झालेला. म्हणून तर वयाने फक्त २-३ वर्षं मोठे असूनही मी त्यांना तेव्हापासूनच ’जेके सर’ असंच संबोधत आलोय.

जसा जसा परिचय वाढत गेला, तसं तसं ओळखीचं रुपांतर मैत्रीत होऊ लागलं. Final year ला आम्ही दोघेही एकाच professor खाली project करत असल्याने एकाच lab मध्ये काम करू असू. त्यामुळे गप्पागोष्टी तर नेहमीच रंगू लागल्या. अगदी technical विषयांपासून ते gossips पर्यंत सगळं सगळं. काही जवळचे मित्र सोडले, तर माझ्या वर्गातल्या मुलांपेक्षाही मला जेके सरांविषयी अधिक ओढ आणि जवळिक निर्माण झाली होती. काही व्यक्तींशी ’तार जुळणे’ म्हणतात ना, तसंच काहीसं. गणपतीला आमच्या घरी भेट देऊन गेल्यामुळे आईलाही त्यांचा चांगला परिचय झालेला.

आठव्या semester मध्ये माझा GATE चा निकाल लागला. तेव्हा तर M.Tech. साठी कोणत्या colleges ना apply करायचं, कोणत्या college मधली कोणती branch चांगली आहे, forms कुठे विकत घ्यायचे आणि कसे भरायचे, या सगळ्या बाबतीत जेके सरांनी जितकं मार्गदर्शन आणि मदत केली असेल, ते मी कधीच विसरू शकणार नाही. IISc ला फक्त काही Top Rankers ना admission मिळते, अशा समजाने मी तर form ही विकत घेणार नव्हतो. फक्त जेके सरांच्या आग्रहाखातर मी IISc चा form भरला. त्यातही मला अमुक एका branch मध्ये त्यावेळेस विशेष रस वाटत असल्याने मी तो एकच option भरणार होतो. पण त्यांनी मला दटावलं, "IISc तला C.E.D.T. (Center for Electronics Design and Technology) हा भारतातला नंबर १ course आहे electronics साठी. तेव्हा बाकी काही नाही भरलंस तरी चालेल. पण तो option सोडू नकोस." IISc तल्या कुठल्यातरी मित्राला फोन लाऊन त्यांनी CEDT विषयी माझं शंकानिरसनही करून दिलं.

पुढे CEDT तून Test आणि Interview साठी call आला. Test आणि Interview देऊन आलो. आणि एके दिवशी CEDT मध्ये admission मिळाल्याचं पत्र घरी आलं. कित्ती कित्ती आनंद झालेला म्हणून सांगू. पण हा आनंद share करायला सगळ्यात पहिला phone मी कुणाला केला असेल. अर्थातच जेके सरांना. कारण या आनंदावर आईच्या आशिर्वादांनंतर पहिला हक्क कोणाचा असेल, तर तो जेके सरांचा. त्यांच्या आग्रहाशिवाय तर मी CEDT चा option ही भरणार नव्हतो.

पुढे म.तेच. साठी मी बॅंगलोरला निघून आलो. आणि सर नोकरीसाठी मुंबईलाच roommates सोबत राहू लागले. सुरुवातीला वरचेवर फोनाफोनी होत असली, तरी नंतर अभ्यासाच्या नादात म्हणा, किंवा नव्या विश्वात हरवून गेल्यामुळे म्हणा, phones ची संख्या कमी कमी होत गेली. चॅटिंगही रोडावत गेलं. बऱ्याच महिन्यांनी ते एकदा online दिसल्यावर मी ping केलं. तर तेव्हा म्हणाले, की ते महिनाभर हॉस्पिटलमध्ये होते. पण details काही सांगितल्या नाहीत. न रहावून मी दुसऱ्या एका मित्राला फोन लावला, तर त्याच्याकडून कळलं, की सरांच्या दोन्हीही किडन्या fail झाल्यात. त्यासाठीच त्यांना महिनाभर हॉस्पिटलमध्ये ठेवावं लागलेलं.

माझ्या तर पायाखालची जमीनच सरकली. एक अतिशय साधी सरळ आणि निर्व्यसनी व्यक्ती.. कुणाच्या अध्यात ना मध्यात.. आणि देव त्यांच्यासोबत हे असं निष्ठुर कसं वागू शकला !! कधी एकदा त्यांना जाऊन भेटतोय असं झालं. पण भेट मात्र माझं semester संपल्यावरच शक्य झाली. त्यांना पाहून माझे डोळेच भरून आले.. चेहरा आणि अंग तर पार सुकून गेलेलंच, पण चेहऱ्यावरचं तेज पण त्या आजाराने पार लुटून नेलेलं. त्यांना भेटायला तेव्हा माझे अजून १-२ मित्र सोबत होते म्हणून बरं. नाहीतर मला काय बोलू अन कसं बोलू, काहीच कळत नव्हतं. आठवड्यातून दोनदा dialysis करून जगत होते बिचारे. पण तरीही बोलण्यात कुठेही निराशा नव्हती. चेहऱ्यावरचं तेज जरी हरवलं असेल, पण मनातली हिम्मत आणि जिद्द मात्र देव अजूनही हिरावून घेऊ शकला नव्हता. सुदैवाने त्यांच्या आईची एक किडनी त्यांना दिली जाऊ शकेल, असा एक आशेचा किरण डॉक्टरांनी दाखवला होता. मलाही तेवढंच समाधान वाटलं.

पुढे IISc-CEDT च्या शिक्क्यामुळे चांगल्या Electronics कंपनीत नोकरी लागली मला. त्याचंही श्रेय आईच्या आशिर्वादांसोबतच सरांच्या ’त्या’ सल्ल्याला द्यायला माझं मन विसरलं नाही.

नोकरीच्या व्यापात मी पुन्हा बॅंगलोरमध्ये बुडून गेलो. पण माझी आई नेहमी सरांची फोनेवर चौकशी करत असे. आणि मला त्यांच्या तब्येतीची update देत असे. तब्बल दीड वर्षांनंतर मागच्या October मध्ये सगळ्या conditions अनुकूल झाल्यानंतर सरांचं Kidney Transplant चं operation ठरलं. दीड वर्षं ते फक्त dialysis वर होते, या कल्पनेनेही किती वेदना होतात. Operation च्या काही दिवस आधी योगायोगाने मी मुंबईला गेलेलो. पण फार प्रयत्न करूनही त्यांच्या आणि माझ्या वेळा आणि भेटीचा योग जुळला नाही.

Operation यशस्वी झालं. आणि त्यांच्या आईने त्यांना किडनीरूपे पुनर्जन्मच दिला. काही महिन्यांच्या सक्त विश्रांतीनंतर सर ठणठणीत बरे होतील, आणि पूर्वीसारखं normal आयुष्य जगू शकतील, या बातमीने मी आनंदून गेलो. वाट पहात होतो, ते एका प्रत्यक्ष भेटीची.

आणि तो योग मागच्या महिन्यातच जुळून आला. सरांची तब्येत ३-४ महिन्यातच व्यवस्थित recover झालेली. कोल्हापूरला त्यांच्या गावी एका engineering college मध्ये lecturer म्हणून नोकरी लागलेली त्यांना. आणि ते काही दिवसातच मुंबई सोडून जाणार होते, म्हणून माझ्या आईने त्यांना घरी जेवायला बोलावलं होतं. नेमका मीही काही कामानिमित्त त्या दिवशी मुंबईला गेलेलो. सरांना पाहिलं आणि फार फार आनंद झाला. योग आणि भेट, दोन्ही जुळून आलेलं. त्यांच्या चेहऱ्यावरचं हरवलेलं तेज परत चमकताना पाहून खोल कुठेतरी समाधान वाटलं. college-company तल्या गमतीजमती, त्यांच्या लागलेली नोकरी, गावी जाऊन settle व्हायचा plan, गावची थंडी, गावी अतिस्वस्तात मिळणाऱ्या भाज्या, अशा चिक्कार गप्पा झाल्या. पुन्हा कधी त्यांची भेट होईल आणि त्यांच्याशी अशा दिलखुलास गप्पा रंगतील, हे ठाऊक नसूनही मी शुभेच्छा देऊन प्रसन्न मनाने त्यांना निरोप दिला. कारण एक आयुष्य मरणाच्या दारातून परत येऊन पुन्हा जीवनाच्या दिशेने वाटचाल करणार आहे, या जाणिवेतच माझा सगळा आनंद सामावलेला.

आणि आईचा अचानक आता फोन. ’सर गेले...’ मन सावरता सावरेना. गोठलेला मेंदू चालेना. भरलेली छाती पुन्हा श्वास घेईना.

मरणाशी जिद्‍दीने झुंज देऊन आपला जीव परत जिंकलेल्या मानवाचा यमराजाने असा पाठीत वार करून पराभव करावा !! एका मातेने आपल्या बाळाला दिलेला पुनर्जन्म नियतीने स्वतःच व्यर्थ घालवावा !! एका निष्पाप व्यक्तीचा असा दुर्दैवी अंत व्हावा !!

कारण काय ते अजूनही समजलं नाहीये मला. पण समजूनही काय फायदा ! एका चांगल्या मित्राला.. नव्हे चांगल्या व्यक्तीला मी कायमचा मुकलोय, हे कटुसत्य थोडचं बदलणार आहे त्याने !

सर.. तुम्ही जिथेही असाल तिथून ऐका.. काही ऋण फक्त व्यक्त करता येतात. फेडता येत नाहीत. आज मी जिथे आहे, ते तुमच्या M.Tech. Admission वेळच्या मार्गदर्शनामुळे आणि ’CEDT चा option' भरण्याच्या सल्ल्यामुळे आहे. तो सल्ला नसता दिलात, तर मी कुठेतरी जरूर असतो.. पण जिथे आहे तिथे मात्र नक्कीच नसतो...

(२३-०३-२०१०)
(हा लेख म्हणजे केवळ माझी जेके सरांबद्‍दलची कृतज्ञता असून त्यामागे अन्य कुठलाही हेतू नाही.)

24 मार्च 2010

(बेळ)गावाकडलं लगीन

(ही कथा एका सत्यघटनेवर आधारित आहे. तेव्हा यातील घडामोडी हा केवळ योगायोग नसून खरोखरचे भोग आहेत, हे वाचकांनी लक्षात घ्यावे. काही वर्णन अगदी किंचितसं अतिशयोक्त असेलही. पण त्यामागील उद्देश हा केवळ विनोदनिर्मिती असून कुणालाही दुखावण्याचा हेतू नाही.)

आजकाल लग्न म्हटलं, की सगळ्यांचे कान टवकारतात. छे हो ! उगाच विचारपूस करू नका. माझं नाहीये इतक्यात.. माझ्या मित्राच्या ताईचं लग्न होतं परवा. ते पण पुण्या-मुंबईतल्या कुठल्याही सामान्य हॉलमध्ये नाही ! तर ऐतिहासिक महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमेवरच्या ज्वलंत अशा बेळगावानजिकच्या कुठल्याशा खेडेगावात. मित्र अगदीच खास असल्याने न जाण्याचा प्रश्न तर नव्हताच, पण ’कुठल्या आडगावात ठेवलंय लग्न !’ अशी कुत्सित भावनाही मुळीच नव्हती.

सन्याशाच्या लग्नाला शेंडीपासून तयारी. तशी ताईच्या लग्नाला ’तत्काळ’ तिकिटापासून माझी तयारी. ’बॅंगलोर ते बेळगाव’ ट्रेनचं तिकीट ! रोज ऑफिसला जायलाही दहाच्या आधी न उठणारा मी, तत्काळ तिकिटासाठी मात्र बरोब्बर आठच्या आधी उठतो. घरच्या नेटचा ऑर्कुटिंग आणि चॅटिंग सोडूनही काही उपयोग असतो, याची जाणिव मला अशा प्रसंगीच होते.

लग्नाला निघायचा दिवस आला. रात्री सव्वा नऊ ची ट्रेन असल्याने ऑफिसमधून लवकर निघणं भाग होतं. साडे-सातच्या आधी ऑफिसातून निघणे, हा आमच्या टीममध्ये (अलिखित) गुन्हा समजला जातो. आणि मी तर चक्क सहा वाजताच निघण्याचा मनुष्यवधासमान अपराध करत होतो. लोकांच्या नजरा चुकवत मी गुपचुप बाहेर पडत होतोच; तितक्यात शेजारच्या टीममधल्या एका मित्राने खवचटपणे हटकलंच. "इतरांना वेळेचं तत्त्वज्ञान शिकवणारे आज स्वतः इतक्या लवकर कसे !!" अशा प्रसंगी माणसाने सरळ निर्लज्ज व्हावं आणि काढता पाय घ्यावा.

माझ्या बाईकचा (आणि इतर वाहनचालकांचा) छळ करत मी घरी पोचलो. इस्त्री करणे, डबा भरणे, बूट पॉलिश करणे (म्हणजे साधी बुटावरची धूळ झटकणे हो.) अशी अतिकष्टाची कामं आवरुन मी बॅग भरली आणि लगबगीने बसस्टॉपकडे निघालो. बॅंगलोरच्या रिक्शावाल्यांशी माझे शिवसेना-कॉंग्रेस इतके घनिष्ठ संबंध असल्यामुळे मी बी.एम.टी.सी. बसलाच वोट दिले. माझे घर ते रेल्वेस्टेशन हे १० किलोमीटर इतकं प्रचंढ लांबलचक अंतर, पाऱ्यापेक्षा जास्त घनतेच्या ट्रॅफिकमधून फक्त ४५ मिनिटांमधे पादाक्रांत करणाऱ्या ड्राईव्हरचं मला अतिशय कौतुक वाटलं. पुष्पगुच्छ आणि शाल वगैरे विकत आणून ड्राईवरचा सत्कार करण्याइतका वेळ नसल्यामुळे मी स्टेशनकडे चलुक पडलो.

मुंबईला जाणारी ट्रेन ही प्लॅटफॉर्म १ वरून सुटते. पण बेळगाववाली ही ट्रेन प्लॅटफॉर्म ८ वर लागलेली. तंगडतोड करत मी तिथवर पोचलो. ट्रेनचं नाव ’राणी चेन्नम्मा एस्प्रेस’ !! या नावावरून मला ’चिन्नम्मा चिलकम्मा चुडु चुडु चुडु’ या अतिशय श्रवणीय गाण्याची आठवण झाल्याशिवाय राहिली नाही. या गाण्यातील एकाही ओळीचा (तमिळ नाही ! हिंदीच !!) अर्थ जर कोणी मला सांगू शकला, तर त्याची गिनीज बुकात शिफारस करण्यासाठी मी हवी ती खटपट करायला (एका पायावर) तयार आहे.

कंपार्टमेंटमध्ये शिरलो, तर कधी चुकून समोरच्या सीटवर एखादी गोड पोरगी असावी, तिच्याशी चार गुलूगुलू गप्पा व्हाव्यात, असं माझ्या स्वप्नातही कधी घडत नाही हो !! माझ्या कंपार्टमेंटमध्ये यावेळीही काकवा, आज्ज्या आणि बापयेच !! काय बोलणार कोणाशी ! अशा बिकट प्रसंगी ’हॅरी पॉटर’च माझ्या साथीला धावून आला.

'हॅरी पॉटर'चा मी जबरदस्त फॅन आहे. बी.ई. फर्स्ट ईयरला असताना बाकीचे मित्र काही ना काही वाचन करत आहेत (गैरसमज करून घेऊ नका, इंजीनिअरिंगच्या पुस्तकांचं वाचन ’प्रिपेरेशन लीव्ह’शिवाय कोणीच करत नसतं !!) हे पाहून शरमेने आपणही काहीतरी वाचलं पाहिजे, म्हणून हॅरी पॉटर वाचायला मी सुरुवात केली. हळूहळू इतका इंटरेस्टिंग वाटू लागला हॅरी, की रोज सकाळ-संध्याकाळ बसमधे तब्बल २०-२० मिनिटे मी हॅरी पॉटर वाचण्याशिवाय काहीच करत नसे. अशा प्रकारे फक्त एका वर्षात एक असे ६ एपिसोड्स वाचून पण झालेत माझे.. ते पण २,१,४(अर्धा),३,४(उर्वरित),५,६ अशा मॅजिकल सिक्वेंस मध्ये !! सातवा एपिसोड तर मला इतका आवडलाय, की २ वर्षं झाली, अजुनही हातून सोडवत नाही. वर्षातून दोन-तीनदा जेव्हा बॅंगलोरहून घरी मुंबईला जातो, तेव्हा ट्रेनच्या प्रवासात गाणी ऐकून ऐकून मोबाईलची बॅटरी उतरली, आणि कुठेही चार्जिंग पॉईंट रिकामा मिळाला नाही, की मी लगेचच वाचन चालू करतो. २ वर्षात चक्क २०० पाने संपवलीयत मी.

बुकमार्क होता, म्हणून बरं. नाहीतर मागल्यावेळी कुठवर सोडलेलं, हे मला अख्खं पुस्तक एका दमात वाचून पण आठवलं नसतं. १० पानं वाचून नाही झाली, तेव्हाच माझे डोळे इतके पेंगायला लागले, की चिमटे लावूनही उघडे राहिले नसते. शेवटी मनावर दगड ठेवून मी पुस्तक बंद केलं. यावेळीही हॅरी पॉटरच कामी येणार होता. कसा ? अहो उशी नव्हती ना घेतली मी सोबत ! उगाच का हे लोक इतकी जाडजुड पुस्तकं छापतात !

सकाळी साडेआठला बेळगाव येणार होतं. आणि चिंतेची गोष्ट म्हणजे ते शेवटचे स्टेशन नव्हतं. त्यामुळे ’मला वेळीच जाग नाही आली तर’ या कल्पनाविस्तारात अख्खी रात्र निघून गेली. पण झोप काही लागली नाही. शेवटी साडेसातला फिजिकली उठून बसलो. बाहेर कुठलंसं स्टेशन आलेलं. टाईमटेबल पाहिलं, तर फक्त दोनच तास उशिरा होती ट्रेन. इतकी जलदगती इंडिअन रेल्वेसाठी बरी नव्हे ! शेवटी ८ वाजता टाईमटेबलवर येणारं बेळगाव १० वाजता रुळांवर आलं, आणि त्या पुण्यनगरीत माझं पाऊल पडलं.

लग्न होतं ११.४३ चं. (नशीब ! सेकंद छापत नाहीत मुहुर्तात !) ताईने पत्ता तर व्यवस्थित सांगितलेला. स्टेशनवरून रिक्शा करून बसस्टॅंडवर यायचं. तिथून चिक्कार बसेस जातात म्हणे लग्नगावी. बाहेर रिक्षावाल्यांची बरीच गर्दी होती. भाजी मार्केटमध्ये भाव विचारतात, तसा मी एकेका रिक्षावाल्याला बसस्टॅंडपर्यंतचा भाव विचारू लागलो. २-३ किलोमीटर अंतरासाठी ५० ते १०० मधले सगळे अंक ऐकून झाले माझे. पण कोणतीही भाजी.. आपलं रिक्षा पटेना !

आणि अचानक केवळ ३० रुपये भाव सांगणारा एक रिक्षावाला (नव्हे, देवमाणूसच म्हणावा लागेल) भेटला. अधिक विलंब केला, तर ही (ऑलमोस्ट) ’फ्री सीट’ गमावून शेवटी ’पेड सीट’च घ्यावी लागेल हे जाणून मी त्या रिक्षात ऍडमिशन घेतलं. (उगाचच इंजिनीअरींग ऍडमिशनची आठवण !) इकडच्या तिकडच्या बेळगावातल्या मराठी-कन्नड टक्केवारीच्या गप्पा करत त्याने मला बसस्टॅंडपाशी सोडलं. आणि मला फर्स्ट सेमीस्टर पास झाल्याचा आनंद झाला !

बसस्टॅंडमध्ये बघतो तर काय ! जणू काही माझ्याच स्वागतासाठी अख्खा बसस्टॅंड रिकामा करण्यात आला होता. एकही बस दिसेना. २-३ ड्राईवर-कंडक्टर सदृष्य मंडळी दिसली. मी लगेच सरसावलो. माझ्या पुढ्यात एक मोठ्ठा गहन प्रश्न पडला. यांच्याशी बोलू तरी कोणत्या भाषेत? मराठी, हिंदी की कन्नड ? कन्नडशी अद्याप सलगी झालेली नसली, तरीही एक मास्टर वाक्य शिकून ठेवलं आहे, जे हमखास सगळीकडे चालतं. ’कन्नडा गोथ्थिल्ला’. म्हणजे ’मला कन्नड येत नाही’. तरीही बेळगावात मराठी लोकांचं प्राधान्य आहे, अशा समजुतीने मी मराठीतच सुरू केलं, "कोवाड-दुंडगेला बस कुठून मिळेल?" (गावाचे नाव कित्ती मधुर आणि अनोखं आहे नाही !) तर त्या माणसाने लिंब चावल्यासारखं तोंड केलं, आणि अर्धमराठी-अर्धहिंदीमधून उत्तर चालू केलं. (त्यापेक्षा अर्धमागधीमधून सांगितलं असतं, तरी बरं झालं असतं !) त्याच्या म्हणण्याचं तात्पर्य होतं, की "आज बेळगावात बसचा संप आहे !" का? तर म्हणे मराठी-कन्नड भाषिक प्रांतीय वादामुळे बस बंद !! इतकी वर्षे आम्ही फक्त घरी बसून जांभया देत थंड डोक्याने ’ज्वलंत सीमा प्रश्ना’च्या बातम्या ऐकत आलोय. पण कर्म-धर्म-संयोगाने आज त्याच आगीने मला ग्रासलं होतं. डोक्यात मोठी घंटा वाजली, की आतापर्यंत केला, तो प्रवास नाहीच ! खरा प्रवास तर आता सुरु होणार आहे !!

स्टॅंडमधून बाहेर आलो. पाण्यात गळ टाकून बसलेल्या कोळ्यांना चार-पाच दिवसांच्या प्रतिक्षेनंतर एक छोटा मासा दिसावा, तसा मला कावराबावरा बघून भरपूर रिक्षाचालकांनी वेढा घातला. क्षणैक मला सेलेब्रिटी असल्यासारखं भासलं. सगळ्यांनी एकत्रच ’कुठे जायचंय’ ची सरबत्ती सुरू केली. मी पुन्हा त्या गावाचं अनोखं नाव जाहीर केलं. आयताच बकरा गावलाय, पाहून एकाने सुरी चालवली, "तीनसौ रुपया होगा."

तीनशे !!! मल भुकंपाचा सूक्ष्म धक्का जाणवला. बॅंगलोर ते बेळगाव या ६०० किलोमीटरचे मी २७५ रुपये मोजलेले. आणि हा ३० किलोमीटरचे ३०० म्हणे !! मी विधानसभेतून वॉक-आऊट करू लागलो. तसा सगळा लवाजमा माझ्या मागून. घड्याळ पाहिलं. वाजलेत १०:२०.. आणि मुहुर्त ११:४३.. (बहुत नाइन्साफी है सांबा !) आणि पुढचा प्रवास अंधारात ! माझी अवस्था खरोखर कचाट्यात सापडलेल्या माशागत झालेली. कुठल्यातरी जाळ्यात गुंतावंच लागणार होतं मला. त्यातल्या त्यात समाधानाची गोष्ट म्हणजे कुठल्या जाळ्यात पडायचं, हा ऑप्शन माझ्याकडे होता. (नको तिथे ऑप्टिमिस्म !)

त्याच्यातल्या एका भल्या (?) आणि मराठी (पुन्हा ?) वाटणाऱ्या कोळ्याकडे.. आपलं.. रिक्षावाल्याकडे सरसावलो. त्याने मला एक निराळाच उपाय सांगितला. म्हणे, की मला एका अमक्या-तमक्या नाक्यावर सोडतो. (नाव पुन्हा अनोखं होतं. पण लक्षात नाही राहिलं.) तिथून मला कोवाडला जाण्यासाठी २०० टक्के ५० प्रकारची वाहनं मिळतील. मी शरणागती पत्करली. वेळ कुठे होता डोकं लढवायला !

उमेदवार मतं मागायला पण जात नसतील, असल्या गल्लीबोळातून आमची सफारी जात होती. काय करणार ! लवकरात लवकर पोचव अशी ताकीदच दिलेली रिक्षावाल्याला. (म्हणजे विनंती केलेली, असं म्हणायचं होतं मला.) १०-१५ मिनिटात त्याने गावाबाहेरच्या कुठल्याशा सुनसान नाक्यावर आणून रिक्षा थांबवली. आणि म्हणे, "इथून भरपूर टेंपो नाहीतर कार नाहीतर बाईकवाले जातात उचगावला. कोणालाही हात दाखवा. लगेच लिफ्ट मिळेल." उचगाव? मला उचकी लागली. "उचगाव हे एकदम जवळ (म्हणजे १५ किलोमीटर हे मला नंतर कळलं) असलेलं मोठं गाव आहे. तिथून तर अगदी ५-५ मिनिटाला मिनीबसेस मिळतील कोवाडला जायला !" धन्य ! म्हणजे अजून किती सवाऱ्या नशिबी लिहिलेल्या, देवच जाणे ! "साठ रुपये द्या. एक पैसा कमी घेणार नाही." ’अडला हरी.....’, ’गरजवंताला अक्कल.......’ अशा चौथी स्कॉलरशिप परिक्षेला घासलेल्या म्हणी आठवू लागल्या. निमुटपणे पैसे कोंबले त्याच्या हातात, आणि पुढच्या सेमीस्टरच्या अभ्यासाला लागलो.

१०:४० ! मी आजवर जन्मात कधीही लिफ्ट मागितलेली नव्हती. तशी वेळच आली नव्हती म्हणा कधी. वाहनं तर बरीच जात होती रस्त्यावरून. ट्रक, टेंपो, जीप, कार, आणि बाईकसुद्धा. पण नक्की कोणाला (आणि कसा) हात दाखवू, उमजेना. मी अनुक्रमे सगळ्यांना घाबरत घाबरत अंगठा दाखवला. पण सगळ्यांनी मला ’ठेंगा’ दाखवला ! वेळ जशीजशी वाढत होती, तसतशी माझी धडधड वाढत होती. माझी अगतिकता लक्षात येऊन कुणीतरी बाईकवाला (नव्हे.. अजून एक देवमाणूस !) माझ्यापाशी थांबला. मी दबक्या आवाजात विचारलं, "कोवाडला ड्रॉप कराल काय भाऊ?" त्याने डोळे मिचकावले, "मी तर इथंच जवळ गणेश मंदिरात जातोय." यांच्या ’जवळ’ ची व्याख्या तोपर्यंत समजली नसल्याने मी पुन्हा एक चान्स घेतला. "मग उचगावला तरी? किंवा तुम्ही जिथपर्यंत जाताय तिथपर्यंत !" तो फक्त गालात हसला, आणि बाईकवर बसायचा इशारा केला. आणि मला खरंच देव पावल्यागत झालं.

बाईक पळत होती. कुठलं अनोळखी गाव, कुठला अनोळखी रस्ता आणि कुठला अनोळखी माणूस ! जरा विचित्रच वाटत होतं सगळं. बरं हा माणूस मला कुठवर सोडणार त्याचाही अंदाज येईना. एक गणेश मंदिर दिसलं खरं. पण याने बाईक काही थांबवली नाही ! कुणीच काहीच बोलेना. मग डोक्यात चक्रं फिरायला लागली. नक्की इरादे तरी काय होते त्याचे? मला खरोखर कुठेतरी सोडतोय, की डायरेक्ट ’पोचवतोयच’ ! अचानक त्या निर्मनुष्य रस्त्यावर एक टपरीवजा दुकानापाशी त्याने बाईक थांबवली. तिथे दोन-चार हट्टे-कट्टे मर्द गप्पा छाटत होते. हा भिडू जाऊन एकदम मिठ्या वगैरे !! काहीतरी खुसफुस सुरू झाली. मी इथे लांब उभा. बुचकळ्यात !! काय करू? दुसऱ्या गाडीला हात दाखवू की नको?

२-४ मिनिटात त्यातले दोघे माझ्याजवळ आले. एकाच्या चेहऱ्यावरचे भाव संशयास्पद. "कुठं कोवाडला जायचं म्हणताय !" "हो." "कुठून आलात?" "बॅंगलोर" "चला बसा गाडीवर." पुढे माझा देवमाणूस बसला. "तुम्ही मध्ये बसा. मी मागे बसतो." ट्रिपल सीट ! आणि मी दोघांच्या मध्ये कचाट्यात ! माझा संशय आणि धडधड दोन्हीही शिगेला पोचले ! काहीच कळेना काय होईल. बहुतेक ’गेम’च होणार आज माझा !!

बाईक पुन्हा चालू. "उचगावला सोडतो तुम्हाला. तिथून मिळंल तुम्हाला काही न काही." मर्द-माणूस म्हणाला. (देवमाणसाच्या तोंडून तर अजून शब्दही फुटत नव्हता.) "तुम्ही इतक्या लांबून लग्नाला आलायत, आणि बस बंद आहेत, म्हणून गाडी वळवलीय. नाहीतर आम्ही येत पण नसतो इकडे !" मनात कृतज्ञता निर्माण व्हावी, की संशयच? काही कळेना.

कुठल्याशा खेडेगावात येऊन आमची यात्रा थांबली. हेच होतं ते सुप्रसिद्ध उचगाव ! थोड्याच पुढे एक मिनीबस थांबलेली. (संप बसचा होता तर.. मिनीबसचा नाही !) गोष्टीतल्या कोल्ह्याला द्राक्षं दिसल्यावर कसं झालं असेल, तसंच मला झालं. मर्द-माणूस लगबगीने पुढे गेला, आणि चौकश्या करून परत आला. "कोवाडला नाही जाणार ही बस !" द्राक्षं आंबटच निघाली. "पण घाबरू नका. इथे १०-१० मिनिटाला मिनीबस असतात. मिळेलच लगेच." ती द्राक्षं, आणि हे मृगजळ की काय? देवमाणूस आणि मर्द-माणूस मला जवळच एका पानाच्या स्टॉलवर घेऊन गेले. (मी पान तर खात नसतो ! आणि तंबाखूही नाही ! तरीही?) मर्द-माणसाने पानवाल्याला आर्जव केली, "हे पाव्हणं आहेत. लांबून आलंत बंगलोरहून. दुंडग्याला जायचंय लग्नाला. जरा लक्ष ठेवा. बसमध्ये बसवून द्या त्यांना." आणि दोघे बाईककडे सरसावले. मला क्षणभर भरून आलं. कृतज्ञता कशी व्यक्त करू, कळेना. "तुम्हाला काही द्यायचं का मी?" "पैशासाठी नाही आलो आम्ही इथं ! तुमचं लग्न चुकू नये, म्हणून आलो." देवमाणूस बोललाच शेवटी ! आता तर खरंच दाटून आलं मला. पैशाने मी पेट्रोलचा मोबदला देऊ शकत होतो. पण माणूसकी फेडण्याइतकी ताकद पैशात कुठे ! मी फक्त कृतज्ञतेने हात मिळवला, आणि त्यांना निरोप दिला.

११:०० ! अरे ! ट्रेनमधून उतरून एकच तास झालेला. मला तर अख्ख्या दिवसभराच्या घडामोडी झाल्यासारखं वाटलेलं ! म्हणजे अजूनही ४३ मिनिटं होती माझ्याकडे. शिवाय दुसऱ्या मिनीबसचं मृगजळही होतंच की सोबत. आता पानवाल्याची कळकळ सुरू झाली. मी कोण, कुठला, गाव कुठलं इत्यादी तोंडओळखीपासून ते ’माझा ठेचाळलेला प्रवास’ हा निबंध त्याने कुतुहलाने ऐकून घेतला. बस येईपर्यंत दुसरं कामच काय ! पण १०-१० मिनिटांना असलेली मिनीबस २० मिनिटं झाली, तरी काही दर्शन देईना. तोवर इथे पानवाल्याने आपल्या सवंगड्यांना जमवून माझी काहीतरी सोय करण्याचा खटाटोप चालवला. कोवाड तिथून १५ किलोमीटर अन दुंडगे अजून ४-५ किलोमीटर पुढे. त्यामुळे कोणीही बाईकवाला सवंगडी जायला तयार होईना. बरं, रस्त्यावरून जाणाऱ्या बाईक, ट्रॅक्स, टेंपोपैकी सगळ्यांना हात दाखवून झाला. पण पुन्हा ठेंगाच ! "मुहुर्त चुकलाच तुमचा. घाई करून कायबी फायदा नाय. आता फक्त आल्यासारखं भेटून या त्यांना." पानवाल्याने सांत्वन केलं. पण का कुणास ठाऊक, मी अजूनही त्या मृगजळाच्या आशेवर तगून होतो. अजूनही २० मिनिटं शिल्लक होती !

शेवटी त्याने कुणीतरी रिक्षावाला गाठला. (नाही ! पुन्हा रिक्षा ! काका मला वाचवा !) त्यालाही पुन्हा तीच सगळी वीरगाथा सांगितली. "तुमको इतना अर्जंट है, इस वास्ते चलनेको रेड्डी है. पर तीनसौ रुपया होएंगा." च्यायला ! एवढे पराक्रम करून इथवर आलो, तर काय याला पुन्हा तीनशे देऊ ! पृथ्वी गोल आहे !

११:३० ! ’टाईम इज मनी’ की ’मनी इज टाईम’ असा गहन विचार सुरूच झालेला, तितक्यात एक ट्रक येऊन थांबला. ही पळापळ ! "कोवाड जाओगे?" "हां!" जणू नामदेवांना (की तुकारामांना) न्यायला पुष्पक रथच अवतरला होता पृथ्वीवर ! माझा आनंद गगनात मावेनासा झाला ! (पुन्हा स्कॉलरशिप !) मी बरीच कसरत करून कसाबसा त्या ट्रकच्या केबिनमध्ये शिरलो. मागून ही ढीग जनता ! मुंबईच्या लोकल ट्रेनची कसर भरून निघाली. (लोकं कोवाडला फक्त लग्नालाच जात नसतात, तर इतर लोकांना इतर कामंही असू शकतात, याचं अद्याप भानच नव्हतं मला.)

रथ सुरू झाला. मला इतका हर्ष झालेला, की ’यूही चला चल राही’ मोठ्ठ्याने गावंसं वाटंलं. पण मी काही शाहरूख नव्हे, हे जाणवून गप्प बसलो. ट्रक राईड इतकी ’सेन्सेशनल’ होती, की त्याची सर मर्सिडीज राईडला पण आली नसती. (इतके गचके बसत होते, की कुठेकुठे सेन्सेशन होत होतं, काय सांगू !) त्यात रस्ता इतका अप्रतिम होता, की त्यावर कुठेकुठे डांबरही दिसत होतं; फक्त खड्डेच नव्हते काही ! थोडं पुढे गेल्यावर एक मोठ्ठाला बोर्ड दिसला. "महाराष्ट्रात आपले सहर्ष स्वागत आहे." हीच होती ती ऐतिहासिक महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा, जिची फळं पहिल्याच भेटीत मला पोटभरून (नव्हे, तोंडात कोंबून) खायला मिळालेली.

महाराष्ट्रात नुकताच प्रवेश केला, आणि रस्त्यावरील डांबर अचानक अदृष्य झालं. त्याची जागा खडी आणि मातीने घेतली. महाराष्ट्राच्या मातीतच जादू आहे म्हणतात, ते काही खोटं नाही ! आता तर फुल्ल एस्सेलवर्ल्डलाही लाजवेल, अशी राईड सुरू झाली. मी म्हणतो, एवढी सोय गावोगावी उपलब्ध असताना आपण हजार रुपये खर्च करून का जावे अम्युझमेंट पार्कमध्ये ! त्या राईडच्या धुंदीत कोवाड कधी आलं, ते ड्राईव्हरने बोंबलल्याशिवाय कळलंच नसतं.

पुन्हा कसरत आणि धक्काबुक्की करत खाली उतरलो. जवळजवळ सातवं सेमिस्टर पास झालेलो. आता दुंडगे गाव शोधणं म्हणजे व्हायवा देण्यासारखं होतं. १२ वाजलेले. घड्याळात, आणि माझेही ! मुहुर्त तर केव्हाच चुकला होता. पण अंगात एकूण किती हाडं आहेत, याची जाणिवही सगळी हाडं करून देत होती. एका दुकानात शिरलो. "दुंडगे गावाला जुवेकरांकडे लग्न ..." "हो हो हो. इथून असं खाली जा. जवळच आहे." पुन्हा ’जवळ’ ! चालतोय चालतोय, पण कुठेच लग्नाचं नामोनिशाण दिसेना. व्हायवाला भरपूर अभ्यास करूनही अतिशय खडूस एक्स्टर्नल आला, तर कसं व्हायचं, त्याची आठवण झाली.

मागून एका लूनाचा आवाज आला. देवमाणूस असो वा दानव, मी त्याला थांबवलं, आणि लिफ्ट हवीय म्हणून सरळ पाठीच बसलो. पुन्हा एक ’सुहाना सफर’ ! इथे तिथे नजर फिरवताना रस्त्यालगतच एका घराच्या अंगणात भरपूर माणसं जमलेली दिसली. एकदम फेटे वगैरे घालून. जणू थेटरमध्ये पिक्चर बघतायत, तसे एकाच दिशेत बघत ! सव्वा-बारा वाजलेले. आणि ताईचं लग्न तर ११.४३ ला लागून पण गेलं असेल. हेच का ते लग्न ? की अजून पुढच्या खेड्यात जावं ? चान्स घेऊ म्हटलं. लूनावाल्याला थांबायला लावलं, आणि टुणकन उडी मारून मी अक्षरशः धावलोच.

मंगलाष्टका सुरू होत्या. पण ओळखीचं कोणीच दिसेना. (गावच्या मंडळीचीच इतकी गर्दी होती, की माझ्या ओळखीची मंडळी काय डोंबल दिसणार !) कुण्यातरी काकांनी माझ्या हातात अक्षता दिल्या. ’शुभमंगल सावधान’ ऐकून सगळ्यांनी अक्षता टाकल्या. तशा मीही. पण अजूनही संभ्रम. लग्नाला फुकटचं जेवण हासडायला म्हणून नाही, पण चुकूनच मी चुकीच्या लग्नाला तर आलो नव्हतो? अंतर्पाट पडला आणि नवरा नवरीने एकमेकांना माळा घातल्या. पण मी सगळ्यात मागे होतो. मला नवरीही दिसेना. आता म्हटलं, की सरळ पुढेच घुसावं. जातोच, तितक्यात त्याच काकांनी खेचलं, "चला जेवायला चला. जेवायला चला. उशीर करू नका." जेवायला काय ! अजून लग्न कुठलं तेच माहीत नाही आणि यांचं काहीतरी भलतंच ! मी "आलोचं हं जरा" अशी लाडीगोडी लाऊन सटकलो आणि थेट पुढे. नवरी पाठमोरी उभी होती. मी दबकत जरा अजून पुढे जाऊन वाकून पाहिलं. मुंडावळ्यांमागून ताईचा चेहरा डोकावला. आणि माझा जीव भांड्यात पडला ! अनपेक्षितपणे (म्हणजे इंडिअन श्टॅंडर्ड टाईमानुसार अपेक्षितच !) लग्न लागायला उशीर झाल्याने अगदी शेवटच्या का होईना, माझ्या हातून अक्षता पडल्येला ! थोडक्यात काय, तर माझ्या रोमांचक प्रवासाचं सार्थक झालं. आणि माझं घोडं गंगेत न्हालं !

घोड्यावरून आठवलं. बस, ट्रेन, रिक्षा, बाईक, ट्रक आणि शेवटी लूना ! सगळ्याच भू-वाहनांची सैर झाली या निमित्ताने. एक घोड्याचीच रपेट तेवढी राहिलीय. पुन्हा आहे का हो कुणाचं लग्न खेडेगावात ?

- अनामिक
(२४-०२-२०१०)

07 मार्च 2010

सिंह तात्पर्य झाला

सिंह तात्पर्य झाला ? तुम्ही म्हणाल, "हे काय भलतंच !" अहो, पण आजकाल असलं काही भलतं-सलतं लिहिल्याशिवाय लक्षच देत नाहीत लोक.. उगाच नाही ’बलबीर पाशा’ची जाहिरात इतकी पॉप्युलर झाली होती... पण हे विधान वाटतं तितकं भलतं-सलतं नाहीये काही.. त्यामागे इतिहास आहे मोठ्‍ठा ! (उगाच हवा केल्याशिवाय कोणीच वाचणार नाही, हे ही ठाऊक आहे मला !)

तर झालं असं.. कुणे एके काळी.. फार फार वर्षांपूर्वी.. (इत्यादी वगैरे वगैरे..) आमचे चुलतबंधू विक्रम (शाळेत जातात, हाच मोठा विक्रम आहे.) चौथीच्या स्कॉलरशिप परिक्षेला बसलेले.. (बसलेला काय, आम्हीच जबरदस्तीने बसवलेला त्याला !) स्कॉलरशिप मंडळाचं अहोभाग्यच म्हणावं लागेल हे. रोज आमंत्रण-पत्रिका छापून ग्राऊंडमधून बोलावणं धाडल्याशिवाय गृहपाठालाही येत नाही.. तर स्कॉलरशिपचा अभ्यास काय डोंबल करणार ! त्याचा पेपर तपासल्यावर संगणकसुद्‍धा हॅंग झाल्याशिवाय राहिला नसता, इतकी कसून तयारी केलेली त्याने..

शेवटी स्कॉलरशिपच्या इतिहासातील तो सुवर्णदिन आला, ज्या दिवशी आमचे बंधू पेपर द्यायला गेले.. एकदम ’वेल प्रिपेअर्ड’ ! (म्हणजे अभ्यास-बिभ्यास नाही काही.. पेन-पेन्सिल-पट्‍टी-खोडरबर-पॅड वगैरे सगळी महत्वाची तयारी..) मराठीच्या सेक्शनमध्ये एक गोष्ट लिहायला येते. म्हणजे काही मुद्‍दे दिलेले असतात, आणि त्यांचा विस्तार करून गोष्ट तयार करायची असते. (बॉलीवूडवालेही जास्तीत जास्त ३ ते ४ पॉईंट्सवरून अख्खा ३ तासांचा पिक्चर बनवतात. त्याची पाळेमुळे इथेच रुजली आहेत !) तर त्यावेळी सिंह आणि उंदराची गोष्ट आलेली त्यांना.

मुद्‍दे असे होते : सिंह आणि उंदिर, उंदराचा सिंहाच्या अंगाशी खेळ, सिंहाचा राग, उंदराची याचना, मदत करण्याचे आश्वासन, उंदराची सुटका, सिंह जाळ्यात, मदतीसाठी हाक, उंदराने कुरतडलेलं जाळं, सिंहाची सुटका, तात्पर्य.

ही गोष्ट साहेबांनी चुकून आधीच कुठेतरी ऐकली होती (वाचली असणं अशक्य आहे.) (हे त्या सिंहाला कळलं असतं, तर कित्ती खुश झाला असता तो.) त्याने फाडफाड सगळी गोष्ट लिहून काढली. पण राजधानी एक्स्प्रेस दिल्लीला पोचणार, इतक्यात शेवटच्या सिग्नलपाशी येऊन घसरली. ’तात्पर्य’ या शब्दाचा अर्थच कळेना त्याला. बराच वेळ डोकं खपवूनही शेवटचं वाक्य काय लिहावं, हे सुधरेना. (आधीच वाचनाच्या नावाने शिमगा. त्यात ऐन परिक्षा.) शेवटी डोळे बंद करून त्याने अंधारात गोळी मारली. "सिंह तात्पर्य झाला" (ती गोळी लागून सिंह खरोखरच मरून पडला असेल.)

घरी येऊन मोठ्या दिमाखात बंधूंनी आपल्या पराक्रमाचं वर्णन केलं. पण माझं आणि माझ्या बहिणीचं मात्र हसून हसून पोट फुटायची पाळी आली. तेव्हापासून आम्ही दोघांनी म्हणच पाडली ही. जिवापाड मेहनत करूनही काहीच फायदा झाला नाही किंवा एखाद्या गोष्टीचा काहीच निष्कर्ष निघाला नाही, की आम्ही म्हणतो, "सिंह तात्पर्य झाला !"

ही म्हण मला घराघरापर्यंत पोचवायची आहे. अगदी मराठी शब्दकोशामध्ये नाही, तरी बोलीभाषेत तरी कुठेतरी रेंगाळली पाहिजे लोकांच्या जिभेवर. (कुठलंही चांगलं कार्य करून प्रसिद्‍धी मिळवता आली नाही, तरी कुरापती करून चर्चेत याचची खोडच असते काही लोकांना !) या म्हणीचे ’कॉपीराईट्स’ जरी माझ्याकडे आणि माझ्या बहिणीकडे असले, तरीही ’लीनक्स’ सारखं ’ओपनसोर्स पब्लिक लायसन्स’ खाली सगळ्यांना वापरता येईल. ऑफिसमध्ये आणि मित्रमंडळींमध्ये तर मी प्रचाराला सुरुवात केलीच आहे. पण आता लेख लिहून अधिक मोठा जनसमूह टारगेट करायचाय मला. (नेतेमंडळीही असाच टार्गटपणा करत असतात प्रचारासाठी !) एका मित्राशी आधीच ’साफ बंडल आहे ही म्हण’ या मुद्‍दावरून आधीच बराच तात्विक वाद झाला आहे. (भांडणाला सभ्य भाषेत ’तात्विक वाद’ म्हणतात !) पण तरीही मी ’शंभर पिक्चर आपटूनसुद्‍धा एकशे-एकावा पिक्चर करणाऱ्या अभिषेक बच्चन’सारखा अजूनही हिम्मत हरलेलो नाहीये.

माझ्या या खटाटोपाला (म्हणजे उठाठेवीला) प्रतिसाद देऊन जर आपण ही म्हण वापरायला आणि पसरवायला सुरुवात केलीत, तर मी आपल्याला (जास्त काही नाही.. फार फार तर ऑर्कुटवर एखादा स्क्रॅप करून) मनःपूर्वक धन्यवाद देईन. पण जर ’सकाळी सकाळी कुणाचं तोंड पाहिलेलं म्हणून हा दळभद्री लेख वाचावा लागला’ असं म्हणत आपण स्वतःचेच केस उपटून घेऊ लागलात, तर शेवटी मी वेगळं काय म्हणणार ! मला पुन्हा तेच म्हणावं लागेल..
"सिंह तात्पर्य झाला !"

- अनामिक
(०६-०३-२०१०)

27 फ़रवरी 2010

मवाली

"चला चला.. लवकर लवकर चढा.. नाहीतर मागची गाडी पकडा.." कंडक्टर नेहमीप्रमाणे बोंबलत होता. मी मात्र खुश होतो.. कधी नव्हे ते बस रिकामी होती.. आणि चक्क खिडकीची जागा मिळालेली.. मस्त हवेशीर सीट..

तितक्यात एक माणूस येऊन माझ्या बाजूला बसला. माणूस कसला ! मवालीच वाटत होता तो ! कळकट्‍ट शर्ट.. तुटलेली नसून मुद्‍दामच उघडी ठेवलेली वरची ३-४ बटणं.. लाल-केशरी कलपाने रंगवलेले केस.. हेडफोनमधलं गाणं तर इतक्या जोराने वाजत होतं, की लाऊडस्पीकरवर वॉकमन चालवला असता, तरी काय बिघडलं असतं. आणि ते कमी की काय, म्हणून स्वतःला तानसेनाचा वारसदार समजून मोठ्यामोठ्याने गात पण होता. (गात कसला.. रेकत होता म्हणा.) ’लता मंगेशकर’चा आवाज ऐकून जशी ’गानकोकिला’ या शब्दाची व्याख्या न समजावता कळावी, तसं तो म्हणजे ’छपरी’ या शब्दाची व्याख्या होता. मला तर एकदम किळस आली.. माझ्या ’मस्त हवेशीर सीट’मधली पार हवाच निघून गेली.

"टिकिट.. टिकिट.." कंडक्टर वर्गणी मागण्याच्या आवेशात. मी आधीच काढलेले. कानात (म्हणजे सगळीकडेच) गाणं वाजत असल्याने त्या ’ध्याना’चं ध्यान अजूनही कुठेतरी भलतीकडेच होतं. कंडक्टरनं डोळे वटारल्यावर कुठे त्याचं लक्ष गेलं.

"दादरला जाईल ना बस?" एकदम टपोरी स्टाईल. "हा. जायेगा." कंडक्टरची पण गुर्मी कमी नव्हती. "किती रुपये तिकीट?" "दस रुपया होयेगा." "शंभर आहेत. सुट्‍टे देता काय?" "एक पैसा छुट्‍टा नही है. छुट्‍टा निकालो."

"अहो कंडक्टर, मी मगासपासून मराठीतनं विचारतोय. आणि तुम्ही हिंदीतनं काय उत्तरं देताय? मला हिंदी येत नाही असं नाही. पण हा महाराष्ट्र आहे. तुम्ही मराठी असून काय फायदा तुमचा !"

आतापर्यंतचा त्याच्याबद्‍दलच्या तिटकारा आणि किळसाची जागा नकळत आदराने घेतली. मनात विचार डोकावला, "त्याच्यासारख्या मवाल्याला पण जे कळलं, ते तुम्हा आम्हा सुशिक्षित मराठ्यांना कधी कळणार !"

(सत्यघटनेवर आधारित.. नव्हे सत्यघटनाच)

- अनामिक
(२६-०२-२०१०)

सांग ना रे मना..

नुकताच 'झेंडा' बघत होतो. कित्ती मजा येत होती सांगू ! राजकारणातली पडद्यामागची 'कथा' जाणताना.. नेतेमंडळींच्या बुद्‍धीबळपटूंना लाजवणाऱ्या खेळी पाहताना.. गुंगून गेलेलो एकदम.. पण मध्येच त्यातलं ते गाणं सुरू झालं आणि कुठल्यातरी निराळ्याच विश्वात जाऊन हरवलो मी.. ’झेंडा’ खाली उतरवून सरळ लिहायला बसलो..

"सांग ना रे मना.. सांग ना रे मना.." त्यातली ती गोंडस, निरागस मुलगी.. सच्च्या आणि निष्पाप मनाचा तो प्रियकर.. दूर टेकडीवर जगाच्या भानगडींपासून अनभिज्ञ दोघं फक्त एकमेकांच्या सोबतीत.. आपलेपणाच्या भावनेने त्याच्या खांद्यावर टेकलेलं तिचं डोकं.. तिच्या केसांतून आणि गालावर हळूवार फिरणारा त्याचा हात.. तिने त्याच्यासाठी आणलेलं ते ’वॅलेंटाईन डे स्पेशल’ ग्रीटिंग.. अगदी साधंच.. पण डायमंड रिंगलाही लाजवेल इतकं समृदध.. ते हाती घेऊ कौतुकाने बघताना जग जिंकल्याइतका त्याच्या चेहऱ्यावर ओसंडणारा आनंद..

बाईकवर त्याच्यामागे बसलेल्या तिची त्याला अलगद मारलेली मिठी.. वासनेचा किंचितही स्पर्ष नसलेली... त्याच्या सहवासाने तृप्त झालेल्या तिच्या ओठांवरून बरसणारं तिचं मधुर हास्य.. सगळ्या जगाला विसरून मरीन ड्राईवच्या किनाऱ्यावर संथ चालणारे ते दोन जीव.. दुकानात एकमेकांना चिडवत, थट्‍टा करत, पण शेवटी एकमेकांच्या पसंतीनेच केलेली कपड्यांची खरेदी..

कुठल्यातरी रोमॅंटिक रिसॉर्टमध्ये वेस्टर्न डान्सच्या तालावर थिरकणारी त्यांची पावलं.. त्याने हलकेच ओढून घेतलेला तिचा नाजुक हात.. त्याचं बोट धरून त्याच्या भोवताली तिने घेतलेल्या गिरक्यांमधली ती धुंदी.. त्याच्या खांद्यांवर लपेटून घेतलेले तिचे कोमल बाहूपाश...

रस्त्यातल्या खुर्चीत बसलेल्या बाईच्या डोक्यातून हळूचकन काढून तिने त्याला सादर केलेलं ते गुलाबाचं फूल.. आणि त्याने आपल्या शर्टामागून काढून तिला दिलेला गुलाबाचा अख्खा गुच्छ.. त्या गुलाबाने.. नव्हे, त्या वातावरणाने भारून गेलेल्या त्या दोघांचं ते मधाळ आलिंगन...

मोगऱ्यासारखा दरवळणारा, गुलमोहोरासारखा बहरणारा आणि पारिजातकासारखा बरसणारा हा प्रेमाचा सोहळा कुणाच्याही अंगावर रोमांच उठवल्याशिवाय राहणार नाही.. मग मला तो एका निराळ्याच दुनियेत घेऊन गेला, तर नवल काय !

त्या गाण्यात रंगवलेले प्रेमाचे ते सगळे इंद्रधनुषी क्षण कधीतरी स्वतःला जगायचे आहेत मला.. कुणाच्यातरी विश्वात स्वतःला झोकून द्यायचं आहे मला.. माझ्याही नजरेत कुणालातरी हरवलेलं पहायचं आहे मला.. कुणाच्यातरी सुखदुःखांना हक्काचा आधार देणारा खांदा व्हायचं आहे मला.. कुणालातरी सतत हवाहवासा वाटणारा सहवास व्हायचं आहे मला... माझ्या भेटीने कुणाच्यातरी ओठांवर फुललेलं हसू आणि डोळ्यात तरळलेला थेंब व्हायचा आहे मला.. माझ्या दुराव्याने कुणाच्यातरी मनात दाटणारी हुरहुर जाणवायची आहे मला..

कुणाच्यातरी सोबतीत, समुद्रकिनारी, लाटांच्या साक्षीने मावळत्या सूर्याला दिलेला निरोप.. मस्करी-मस्करीत एकमेकांवर शिंपडलेलं समुद्राचं पाणी.. पुसलं जाण्याची किंचितही तमा न बाळगता रुपेरी वाळूत एकमेकांचं कोरलेलं नाव.. उद्याच्या आयुष्याचं स्वप्न उरी बाळगून चार हातांनी, पण एकजिवाने बांधलेला शंखशिंपल्यांचा बंगला... दोघांच्या ओठांतून एकत्र निघालेले प्रेमाचे फक्त चार हळवे शब्द...

हे सगळं सगळं अनुभवायचं आहे मला.. हे सगळं जगायचं आहे मला... कधीतरी असं प्रेम करायचं आहे मला.. नव्हे.. कधीतरी असं खरंखुरं प्रेम मिळवायचं आहे मला...

- अनामिक
(२६-०२-२०१०)

25 फ़रवरी 2010

नशीब

एक तास झाला तरी ही खटारी बस जागची हलत नाही म्हणजे काय ! एक तर पाच वाजताची ट्रेन आहे बेळगावहून. आणि चार वाजले तरी इथे आडगावात ही बस सोडतच नाही भिकारडा ड्राईव्हर !

साला! सकाळपासून दिवसच खराब होता माझा. इथे बेळगावापासून अजून आत कोपऱ्यात कुठल्याशा खेडेगावात लग्नाला निघालो होतो काल बॅंगलोरहून. ट्रेनपर्यंत तर ठीक.. पण सकाळी बेळगावला पोचून कळलं की बसचा संप होता. कित्ती तारांबळ झाली माझी इथवर पोचताना सांगू! कित्ती कित्ती वाहनं बदलावी लागली.. सुरुवातीला त्या माजोरड्या रिक्षावाल्यांनी लुटलं... मग बाईक काय.. ट्रक काय.. लुना काय.. किती ती दिव्य इथवर पोचायला ! डोक्याचं खोबरं झालं पार !

बरं लग्न आटपून परत जायला निघालो, तर काही साधनही मिळेना बेळगावला पोचायला. एक तासाने कुठे ही मिनीबस आलेली, तर ती पण अजून एक तास तिथेच उभी ! आता हिला उशीर झाला, तर ट्रेन चुकलीच समजा ! मग बसतो बोंबलत ! छ्या.. नशिबच वाईट आहे माझं !

तितक्यात एक हडकुळासा माणूस कुबड्या घेऊन अडखळत अडखळत बसमध्ये चढला. एक पाय नव्हता बिचाऱ्याचा गुडघ्याखालून. कसाबसा धडपडत कुठेतरी जागा शोधून बसला तो.. चेहऱ्यावरचे भाव अतिशय कोरडे. डोळे मात्र खोल कुठेतरी पाणी तरंगत होतं.

समोरच्या सीटवरच्या माणसानं आश्चर्यानं विचारलं, "काय रं पांडू? ह्यं असं कसं काय झालं ?" पांडूच्या तोंडून शब्द फुटेना. कंठ दाटून आला असणार त्याचा. "काय सांगू रंगा. मला ही डायबिटिसची बिमारी. त्यात घरचा मी एकला कमवता. रोज शेतावर दिसरात मजुरी करनारा. दोन हप्त्यांपूर्वी शेतात पायाला गंजका सुरा लागून लय जखम झाली. रक्त थांबंना. डाक्टरकडे गेलो, तर म्हनं चांगल्या हास्पिटलात भरती व्हायला पायजेल." "मग झालास नाय काय भरती?" "आरं, हितं दोन टायमाच्या जेवनाचं वांदं.. आनि हास्पिटलाचं पैसं कुठनं आनलं असतं? म्हनलं तसंच होईल बरं. पन जखम काय भरंना. मग एक दिस सुद्‍धच गेली. जाग आली तवा बघला तर एक पायच नाय ! डाक्टर बोलले, की टायमाला आलो असतो हास्पिटलात, तर पाय वाचला असता."

पांडूचा केविलवाणा चेहरा बघवेना. "दोन पोरी हायत. त्यांची शाळा! मग लगीन! आईस पडलीय रोगात. आणि देवानं आसं बसवलाय मला ! कसं करू मी तुच सांग ना रं रंग्या !" रंगा अवाक ! उत्तरच नव्हतं त्याच्याकडं. एकच वाक्य त्याच्या तोंडून फुटलं, "सगळं नशिबाचं भोग हायत पांडू !"

अचानक एक प्रश्न छळू लागला ! बारीक-सारीक गोष्टीत सतत कुरबुर करत नशिबाला दोष देणाऱ्या आपलं नशीब खरंच इतकं वाईट आहे का ?

-अनामिक
(२४-०२-२०१०)

25 जनवरी 2010

मी स्मोकिंग केले नाही (विडंबन)

मूळ कविता : मी मोर्चा नेला नाही
मूळ कवी  : संदीप खरे

विडंबन : मी स्मोकिंग केले नाही

(एका सभ्य मुलाची मनोगाथा)

मी स्मोकिंग केले नाही     मी ड्रिंकिंग केले नाही
मी पान सुपारी सुद्धा       कधी तोंडी धरले नाही
मी स्मोकिंग केले नाही...

भवती धिंगाणा चाले       तो विस्फारुन बघताना
कुणी डिस्को गाजवताना     कुणी पोरी नाचवताना
मी मूल्यांना तत्त्वांना      कवटाळुन बसलो जेव्हा
मज बिघडवणारा देखिल     कुणी दोस्त भेटला नाही
मी स्मोकिंग केले नाही...

चुरलेले फॉर्मल कपडे       अन्‌ कुरकुरणारी चप्पल
केसांची कळकट झुलपे      बघणारे करती टिंगल
मी मित्रगणांना भ्यालो      मी घरच्यांनाही भ्यालो
मी घरातसुद्धा माझ्या       कधी स्टाइल मारली नाही
मी स्मोकिंग केले नाही...

मी भिडस्त भोळा पामर     बंधनांत करतो वावर
शाळेत सभ्य विद्यार्थी      कंपनीत लॉयल वर्कर
ना हातुन घडली कोठे      मस्ती ना मारामारी
कधी छेड काढली नाही      कधी शिटी मारली नाही
मी स्मोकिंग केले नाही...

मज कधी दुचाकी मिळता    मी 'लुना' निवडली असती
अन्‌ कार लाभता नशिबी    'नॅनो'ही पुरली असती
मज फिरवाया मिरवाया     कुणी तरुणी पटली नाही
मी 'बुलेट' घेतली नाही    'ऑडी'ही झेपली नाही
मी स्मोकिंग केले नाही...

- अनामिक
(२४/०१/२०१० - २४/०५/२०१२)

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मूळ कविता : मी मोर्चा नेला नाही

मी मोर्चा नेला नाही        मी संपही केला नाही
मी निषेध सुद्धा साधा       कधी नोंदवलेला नाही
मी मोर्चा नेला नाही...

भवताली संगर चाले        तो विस्फ़ारुन बघताना
कुणी पोटातून चिडताना      कुणी रक्ताळून लढताना
मी दगड होउनी थिजलो      रस्त्याच्या बाजूस जेव्हा
तो मारायाला देखिल        मज कुणी उचलले नाही
मी मोर्चा नेला नाही...

नेमस्त झाड मी आहे       मूळ फांद्‌या जिथल्या तेथे
पावसात हिरवा झालो       थंडीत गाळली पाने
पण पोटातून कुठलीही       खजिन्याची ढोली नाही
कुणी शस्त्र लपवले नाही     कधी गरूड बैसला नाही
मी मोर्चा नेला नाही...

धुतलेला सात्विक सदरा      तुटलेली एकच गुंडी
टकलावर अजून रुळते       अदृश्य लांबशी शेंडी
मी पंतोजींना भ्यालो        मी देवालाही भ्यालो
मी मनात सुद्धा माझ्या      कधी दंगा केला नाही
मी मोर्चा नेला नाही...

मज जन्म फळाचा मिळता    मी 'केळे' झालो असतो
मी असतो जर का भाजी     तर 'भेंडी' झालो असतो
मज चिरता चिरता कोणी     रडले वा हसले नाही
मी 'कांदा' झालो नाही      'आंबा'ही झालो नाही
मी मोर्चा नेला नाही...

- संदीप खरे

17 जनवरी 2010

मी कोडिंग केले नाही (विडंबन)

(एका सॉफ्टवेअर इंजीनियरची मनोगाथा)
मी कोडिंग केले नाही      टेस्टिंग ही केले नाही
मी रिपोर्ट सुद्धा साधा      कधी पाठवलेला नाही
मी कोडिंग केले नाही...

भवती डेवलपमेंट चाले     ती विस्फारुन बघताना
कुणी प्रोग्राम चालवताना    कुणी बग फिक्सिंग करताना
मी मठ्ठासारखा बसलो      टीम मेंबर सोबत जेव्हा
कंपाइल कराया देखिल     त्याने हेल्प केली नाही
मी कोडिंग केले नाही...

बेजबाबदार मी आहे       मूळ प्रोजेक्ट जिथल्या तेथे
दिवसात ओर्कुटिंग करतो    सांजेस उरकतो चॅटिंग
पण डोक्यातुन कुठलेही     फंडू प्रोग्रामिंग नाही
सी-प्लस-प्लस जमले नाही  लीनक्स ही कळले नाही
मी कोडिंग केले नाही...

डोक्यावर लटके जेव्हा       डेडलाइन ची तलवार
निर्लज्जागत मी घेतो       कॉपी-पेस्ट चा आधार
मी मॅनेजरला भ्यालो       सूपरवाइझरला भ्यालो
मी पगारसुद्धा माझा        वाढिव मागितला नाही
मी कोडिंग केले नाही...

मी असतो जर अभ्यासू     पी.एच.डी. झालो असतो
मी असतो पैसेवाला        तर डॉक्टर झालो असतो
मज ले-ऑफ करुनी कोणी   हसले वा रडले नाही
एम.बी.ए. झालो नाही     एम.एस. ही झालो नाही
मी कोडिंग केले नाही...

- अनामिक
(१७-०१-२०१०)

मूळ कविता : मी मोर्चा नेला नाही
मूळ कवी  : संदीप खरे

20 नवंबर 2009

कुठेतरी हरवलोय मी...

कुठेतरी हरवलोय मी...
ऑफिसच्या इमारतीत... कामाच्या व्यापात... कंप्यूटरच्या स्क्रीन मध्ये....
२५ किलोमीटर बाईकच्या प्रवासात... कुठे वाहनांच्या गर्दीत... कुठे सुनसान रस्त्यावर.....
हॉल मधल्या भयाण शांततेत... 'कूक'च्या कंटाळ्वाण्या जेवणात... काळोख्या बेडरूम मध्ये... रात्रीच्या चित्र-विचित्र स्वप्नांमध्ये...
सकाळच्या कर्कश्य अलार्म मध्ये.... घाई-घाईत उराकाव्या लागणा-या तयारीत....
वीक-एंड च्या आळशी मूडमध्ये... निरर्थक नेट सर्फिंग मध्ये... मॉलच्या गजबजाटात....
एकंदरीतच एका अतिशय रटाळ जीवनाच्या चक्रव्यूहामध्ये..... Quarter Life Crisis मध्ये.....
स्वतःला कुठेतरी हरवून बसलोय मी.......

20 मई 2008

ख्वाइश है क्यों (गजल)

हार से मिलकर गले अब जीत की ख्वाइश है क्यों
फूल सब मुरझा गए, दिल चाहता बारिश है क्यों

सामने थी मंजिले, मैं सहमकर धीमे चला
अब बिछे हैं फासले, भगदौड की कोशिश है क्यों

झिलमिलाती रात में भी चाँद को छू ना सका
अब अमावस है घनी, दिल ढूँढता गर्दिश है क्यों

गूँजते थे महफिलों में गीत जब, मैं चुप रहा
अब विरानों में लबों पे एक फर्माइश है क्यों

तेज जीवन का जुआ था, तब न खेली बाजियाँ
अब पडे फाँसे गलत, तकदीर से रंजिश है क्यों

- अनामिक
(१८-२०/०५/२००८)​

23 मार्च 2005

हे असंच चालत राहील काय ?

तुझं स्वप्न बघण्यातच माझं जीवन संपून जाईल काय ?
प्रश्न सतवतो, शेवटपर्यंत हे असंच चालत राहील काय ? ॥ धॄ ॥

रोज सकाळी लवकर येतो
कॉलेजपाशी उभा राहतो
आता येशिल, नंतर येशिल
खुळ्यासारखा वाट पाहतो
उशीर होतोय, जाणवतं, पण जागीच खिळतात पाय ॥ १ ॥

कॉलेजमध्ये शिरल्यापासून
नजर सारखी भटकत असते
इथल्या वळणा-वळणावरती
तुझाच चेहरा शोधत बसते
तुला भेटण्याचा कुठलाही नाही सुचत उपाय ॥ २ ॥

कधी अचानक समोर आलीस
मी बोलायचा प्रयत्न करतो
तू तर लक्षही देतच नाहीस
माझा स्वर कंठातच विरतो
हळवे डोळे दाटून येतात, होतो मी असहाय ॥ ३ ॥

- अनामिक
(२३/०३/२००५)

14 फ़रवरी 2005

काय तुझ्या मनात

किती काळ माझ्या आशेचा झुलवशील झोका ?
काय तुझ्या लपलंय मनामधे, जरा सांगशिल का ? ॥ धॄ ॥

कधी दुरून मी दिसलो की नजरेस नजर मिळते
कधी मला बघता, बाजूला मान तुझी वळते
कटाक्ष तिरपा तुझा, चुकवतो हृदयाचा ठोका ॥ १ ॥

कधी मला पाहून तुझ्या गालात हास्य फुटते
मी हसताच तुझ्या ओठांची कळी घट्ट मिटते
तुझ्या अशा वर्तनामुळे होतो माझा विचका ॥ २ ॥

कधी दोन गप्पा माझ्याशी दिलखुलास करतेस
कधी शब्दही बोलत नाही, चक्क मौन धरतेस
उमजत नाही, तुला अचानक का येतो झटका ॥ ३ ॥

मैत्रिणींमधे कुजबुज होते मी आल्यावरती
खाणाखुणा - इशा-यांना त्यांच्या येते भरती
मीच निघुन जातो शरमेने, समजताच धोका ॥ ४ ॥

तुला वाटतो खेळच सारा, झुरतो मीच बिचारा
नाजुक माझे काळिज, त्यावर फिरवू नको निखारा
रहस्य हे उलगडून आता कर माझी सुटका ॥ ५ ॥

- अनामिक
(१४/०२/२००५)

31 जनवरी 2005

एक दिवशी

एक दिवशी अशी भेट अपुली घडावी
रास वाटेत फुलत्या कळ्यांची पडावी
आसमंतामधे गंध त्यांचा भरावा
धुंदल्या त्या क्षणी प्रीत अपुली जडावी

एक दिवशी सरी श्रावणाच्या पडाव्या
भावनांच्या रुपे काळजाला भिडाव्या
प्रेमवाटेवरी चिंब दोघे भिजावे
पाहुनी सोहळा हा विजा कडकडाव्या

एक दिवशी स्वरांनी तुझ्या संग गावे
प्रेमगीतात त्या रागही दंग व्हावे
इंद्रधनुषाकडे मागुनी रंग घ्यावे
स्वप्न डोळ्यांमधे मी तुझे रंगवावे

एक दिवशी तुझा हात हाती धरावा
स्पर्श हॄदयास नजरेतुनी तू करावा
एकमेकांत दोघे असे गुंग व्हावे
दोन जीवांमधे ना उरावा दुरावा

- अनामिक
(२९, ३०, ३१/०१/२००५)

23 जनवरी 2005

भिती

गंध तुझ्या हळव्या प्रेमाचा मनात माझ्या दरवळतो
भाव मनातिल तुला सांगण्या मात्र जरा मी अडखळतो
नित्य तुझा सहवास मिळावा, मनात अभिलाषा धरतो
का निष्कारण भिती वाटते, दडपणात मी वावरतो

तू दिसतेस मला जेव्हाही, क्षणात पुरता बावरतो
नजरेलाही नजर भिडवण्या खुळ्यापरी मी घाबरतो
काय म्हणू, अन्‌ काय नको, हा प्रश्न मस्तकी घुटमळतो
घाम कपाळावर फुटलेला गालावरती ओघळतो

बोलावेसे वाटे पुष्कळ, विषय एकही ना मिळतो
शब्द जिभेवर उमटतात, पण स्वर कंठातच विरघळतो
अजब भितीने थरथरणारे ओठ घट्ट मी आवळतो
फक्त जरा स्मितहास्य मुखावर दाखवतो, अन्‌ मी पळतो

ध्यानी येतो मूर्खपणा, अन्‌ नकळत मी मागे वळतो
उशीर झाला एव्हाना, हे जाणवता मी हळहळतो
पुन्हा एकदा पराभूत मी, जीव अंतरी तळमळतो
किती मनाला आवरतो, पण एक तरी अश्रू गळतो

- अनामिक
(१७, २१, २३/०१/२००५)

14 जनवरी 2005

फूल

रंगबिरंगी कळ्या-फुलांनी फुलली होती बाग
पानांतुन डोकावत होता गोंडस एक गुलाब

फूल गोजिरे मनात भरण्याइतके होते छान
किती पाहिले तरी शमेना नजरेतली तहान

भुरळ अशी पडली की नकळत तिथेच खिळले पाय
जीव जडावा असे न जाणे फुलात होते काय ?

कुरवाळीन जरा प्रेमाने, विचार सुचला असा
स्पर्श मखमली, गालावर, अन मनी उठावा ठसा

श्वासामध्ये भरून घेइन त्याचा मोहक सुवास
क्षणात केला खुळ्या मनाने स्वप्नायुगाचा प्रवास

"फूल तोडण्या सक्त मनाई", दाखविणा-या धाक
फलकावरल्या सूचनेकडे केली डोळेझाक

मोह अनावर इतका झाला, पुढे सरकला हात
फूल कोठले ? निराळेच लिहिले होते नशिबात

पानांमागे दडलेल्या काट्याने केला घात
खुपला बोटाला, पण झाली जखम खोल हृदयात

धुंदीतुन शुद्धीवर आलो, तिथे उमगली चूक
धार दिसत होती रक्ताची, फूल मात्र अंधूक

स्वप्ने रंगवल्याची शिक्षा, की नशिबाचा रोष
फुलास देऊ, काट्याला, की स्वतःस देऊ दोष ?

- अनामिक
(१४/०१/२००५)

(कविता तशी जुनी आहे. वैयक्तिक आवडत्या कवितांपैकी एक..)