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26 अप्रैल 2014

आहट नही है

थम सी गई है     जीवन कि नदिया
जब से किसी की  आहट नही है

प्यासे फिरे हैं      पंछी नजर के
दीदार का अब     पनघट नही है

सुनसान दिल है,  लडने, सताने
बातें, शरारत      नटखट नही है

बहते न आँगन    झोंके पवन के
अब छेडने को     वो लट नही है

इक याद भटके    कल के नगर में
पर रोज की वो    चौखट नही है

- अनामिक
(१५/०२/२०१३, २४/०४/२०१४, २५/०४/२०१४)

28 फ़रवरी 2014

गहराई

कभी उछलकर, कभी मचलकर मन छू लेती हैं लहरें
पर सागर जाने क्या भीतर राज़ छुपाए है गहरें

कंकड़ फैंके नाप रहा हूँ मैं पानी की गहराई
मोती निकले, या पत्थर, पर हाथ लगे बातें कोई
रोक रहे हैं आहट को भी काले बादल के पहरें

खारे पानी से सपनों की कैसे प्यास बुझाऊ मैं
घर न चले पंछी सवाल के, क्या उनको समझाऊ मैं
इस बेचैनी पर हसते हैं लहरों के लाखों चेहरें

- अनामिक
(०३/०९/२०१२ ११/०६/२०१३ २७/०२/२०१४)

12 जून 2013

समंदर

बीते कल सा थमा किनारा, यादों का है घना समंदर
जिसमें डूबते सूरज की भी परछाई दिखती है सुंदर
लहरें नटखट स्वांग रचाए, ऊपर चुलबुल, गुमसुम अंदर
सर्द हवा के झोंकों ने भी दबा रखा है तेज बवंडर

कुछ मोती मन की सीपी से गिरे रेत पर, मिले न वो फिर
निशान छूटें थे कदमों के, बहा ले गयी वक्त की लहर
साहिल पर कुछ नाम लिखे थे, अब न बचा है इक भी अक्षर
जिन्हे सजाया था सपनों से, ढह गए सभी मिट्टी के घर

इक पुकार निकले भीतर से, कर लौटे पृथ्वी का चक्कर
काट सके ना पर बेचारी इस तट से उस तट का अंतर
यूँ तो जुडे हुए दिखते है, आँखों का धोखा है ये पर
क्षितिज करे कोशिश कितनी भी, पा न सके धरती को अंबर

- अनामिक
(१६-२२-२३/०४/२०१३)

25 मई 2013

घाव (गझल)

किती निसटले खेळ हातुनी, अन विस्कटले डाव किती
मोजत बसता जुनाट जखमा, नवे चिघळती घाव किती

ससा हरे अन कासव जिंके, निदान शर्यत लढणारे
किती पळो कुंपणात सरडा, पल्याड त्याची धाव किती

ज्या बाजारी विकली जाती खोटी रंगित मोरपिसे
सत्याच्या चिमण्या पंखांना तिथे मिळावा भाव किती

खेळ रंगता डोंबा-याचा टाळ्या पिटती सर्व ’बघे’
पाय निसटतो, फुटते मस्तक, मदती येतो गाव किती

गरजेपोटी फुलती नाती, ओढ.. गोडवा.. आपुलकी..
गरज सरे, ’मेल्या’ वैद्याचे मुखात उरते नाव किती

- अनामिक
(२४-०५-२०१३)

11 नवंबर 2012

चांदवा नाही अता (गझल)

वाहती नुसतेच वारे, गारवा नाही अता
दरवळे श्वासात सा-या, ती हवा नाही अता

तीच दुनिया, तीच गजबज, अंगणी तरि शांतता
धुंद किलबिल पाखरांचा तो थवा नाही अता

रात्र नेई दूर, सोबत कैक लुकलुकते दिवे
कुट्ट वाटा उजळणारा काजवा नाही अता

तारका लाखो जरी, अंबर सुने अन कोरडे
चिंब भिजवाया दुधाने चांदवा नाही अता

झोत शब्दांचा पडे कानी, न भिडती भावना
अर्थ मौनाचा कळे, त्या जाणिवा नाही अता

जखडुनी नाती जुनी उरल्यात तुटक्या साखळ्या
जो मने सांधायचा, हळवा दुवा नाही अता

- अनामिक
(०६/११/२०१२ - १०/११/२०१२)

04 नवंबर 2012

बरेच काही (गझल)

अशांत सागर मनी खोलवर मुरते आहे बरेच काही
पाचोळ्यागत लाटांवरही तरते आहे बरेच काही

आठवणींची लक्ष पाखरे सोडुन येतो दूर वनी मी
मोरपंख उरलेले बघुनी स्मरते आहे बरेच काही

मनोरथांना लगाम लावुन थोपवतो मी विचारचक्रे
तरि न शमे आवेग, मस्तकी फिरते आहे बरेच काही

फक्त दोन थेंबांसाठी मी नदीस करतो कैक याचना
फुटे न पाझर, डोळ्यांतुन पण झरते आहे बरेच काही

हिशेब करतो, उणीच भरते सुखस्वप्नांची गोळाबेरिज
मात्र व्यथा अन वेदनांसवे उरते आहे बरेच काही

- अनामिक

18 अक्टूबर 2012

इक शाम काफी है

दिन सवरने के लिये इक शाम काफी है
दिल बहकने चाय के भी जाम काफी है

यूँ घनेरी भीड है, चेहरे हजारो है
जी मचलने के लिये इक नाम काफी है

ना लगे अल्फाज, ना कागज-कलम-स्याही
जो निगाहों ने लिखे पैगाम काफी है

क्यूँ भला हथियार से जीते जमीं दिल की
जो किया तीर-ए-नजर ने काम काफी है

शर्मिली मुस्कान से घायल करो ना यूँ 
इस हँसी पर कत्ल के इल्जाम काफी है

गर चिराग-ए-जिन मिले भी, ना दुआ माँगू
इस सुहानी साथ का ईनाम काफी है

सिलसिले खिलने लगे इन खंडरों में भी
यूँ चले बस, हो न हो अंजाम, काफी है

- अनामिक
(१४/१०/२०१२ - १७/१०/२०१२)