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25 नवंबर 2023

सुनी मीठी गज़ल मैंने

सुनी मीठी गज़ल मैंने तेरे खामोश अधरों में 
पढी दिल की खबर मैंने तेरी मदहोश नजरों में 
|| मुखडा || 

मुझे बस देखकर तेरा गुलाबों सा महक जाना 
नजर को जब नजर छू ले, हया से नैन झुक जाना 
मचलना धडकनों का दिल में, जैसे नाव लहरों में 
|| अंतरा-१ || 

संदेसें खास भेजेंगे निगाहों के झरोखों से 
जरूरत हो न लब्जों की, करेंगी गुफ्तगू साँसें 
चलेंगे हम हकीकत के परे, ख्वाबों के शहरों में 
|| अंतरा-२ || 

- कल्पेश पाटील 
(२३/०९/२०२३ - २५/११/२०२३) 

12 अक्टूबर 2018

उड चला इक ख्वाब

इक ख्वाब पलखों से फिसलकर उड चला.. 

इक ख्वाब पलखों से फिसलकर उड चला दूजे नगर 
इक ख्वाब आँखों से उछलकर चल पडा अपनी डगर 

इक ख्वाब दिल की बंदिशों को तोडकर है उड चला 
इक ख्वाब ठहरी ख्वाइशों को छोडकर है उड चला 

वो गुदगुदी था, या चुभन ? 
था सर्द ठंडक, या जलन ? 

सच था, भरम, या झूठ था ? 
तेजाब का वो घूँट था ? 

रिमझिम खुशी की बारिशें ? 
या दर्द का सैलाब था ? 

जैसा भी था.. नायाब था 
सबसे सलोना ख्वाब था 

- अनामिक 
(०५/०६/२०१८ - १२/१०/२०१८) 

09 मई 2018

याद बाकी है कही

जो ढह गया पुल, बांधने की ख्वाइशें बिलकुल नही 
बस इक पुराने जलजले की याद बाकी है कही 

सब जख्म कब के भर चुके.. सब दर्द फीके पड गए 
बस उनके गहरे दाग अर्सों बाद बाकी हैं कही 

कब का हजम भी कर लिया उस दौर का जालिम जहर 
कुछ नीम से कडवे पलों का स्वाद बाकी है कही 

मजबूत ख्वाबों का महल.. गिर भी गया, अब गम नही 
कमजोर, मलबे में दबी बुनियाद बाकी है कही 

ना है खुदा से कुछ गिला.. जो ना दिया, अच्छा किया 
बस अनसुनी, खारिज हुई फर्याद बाकी है कही 

- अनामिक 
(२६/१२/२०१७ - ०९/०५/२०१८) 

30 जनवरी 2018

शब्द आले, शब्द गेले

शब्द आले, शब्द गेले, शब्द बोलत राहिले 
शब्द पडले, शब्द उठले, शब्द डोलत राहिले 

शब्द मिटले, शब्द फुलले, शब्द बहरत राहिले 
शब्द झडले, शब्द रुजले, शब्द उमलत राहिले 

शब्द सुकले, शब्द भिजले, शब्द बरसत राहिले 
शब्द स्वप्नांच्या सरींचे वार झेलत राहिले 

शब्द खचले, शब्द विरले 
शब्द लढले, शब्द हरले 
शब्द बुडले, शब्द तरले, शब्द उसळत राहिले 
वेदनांची रत्नमाला शब्द माळत राहिले 

शब्द झुरले, शब्द रुसले 
शब्द रडले, शब्द हसले 
शब्द भुलले, शब्द फसले, शब्द भाळत राहिले 
शब्द दगडी देवतांवर व्यर्थ उधळत राहिले 

शब्द थकले, शब्द विटले 
शब्द सजले, शब्द नटले 
कालगंगेतून अविरत शब्द वाहत राहिले 
मार्ग सारे खुंटले, पण शब्द चालत राहिले 

- अनामिक 
(१२-३०/०१/२०१८) 

25 जनवरी 2018

काँच की दीवार

ये काँच की दीवार है मेरे-तुम्हारे दर्मियाँ 
यूँ तो लगे नाजुक, मगर फौलाद से कुछ कम नही 
इस को गिराने का खुदा की जादू में भी दम नही 

इस छोर का, उस पार का सब कुछ दिखाई दे, मगर.. 
हैं बंदिशें दोनो तरफ आवाज के हर रूप पर 
बातें, पुकारें, शोर, सुर, सिसकी, हसी, सरगम नही 

इक दौर था, जब दो पलों की गुफ्तगू ही थी खुशी 
अब तो महीनों की घनी खामोशी का भी गम नही 

अब सच कहू, तो काँच की दीवार ही ये है सही 
बंद खिडकियाँ खुलने की अब उम्मीद कम से कम नही 
शायद पुकारोगे कभी, गलती से ही.. ये भ्रम नही 
हाँ, वक्त से बढिया किसी भी जख्म पर मरहम नही 

- अनामिक 
(२३-२५/०१/२०१८) 

31 दिसंबर 2017

कुछ रह गया, कुछ ढह गया

कुछ गुम गया, कुछ बच गया
कुछ गिर गया, कुछ रह गया 
इस वक्त के सैलाब में 
क्या कुछ न जाने ढह गया 

                      कुछ कागजों की कश्तियाँ 
                      कुछ काँच की नक्काशियाँ 
                      इक सीपियों का ताजमहल 
                      इक रेत का पुल बह गया 

लिखता रहा, गाता रहा मैं 
लब्ज ना पहुँचे कही 
खामोश रहकर भी मगर 
सन्नाटा क्या कुछ कह गया 

                      बदमाशियों से बाज ना आयी 
                      सितमगर जिंदगी 
                      मैं भी तो कम जिद्दी नही 
                      सब मुस्कुराकर सह गया 

- अनामिक 
(२९-३१/१२/२०१७) 

22 दिसंबर 2017

तोहफा

सोच रहा हूँ, क्या दू तुमको ? तोहफा क्या लाजवाब दू ? 
झिलमिल झुमकें, छनछन पायल, या नाजुक सा गुलाब दू ? 

देने को तो खरीदकर दू मैं तो पूरी दुकान भी 
तोहफें रखने कम पड जाए तुमको अपना मकान भी 

शायर हूँ पर.. सोचता हूँ, लब्जों में रंगी स्याही दू 
तुम पर लिखी तमाम नज्मों से बढकर तोहफा क्या ही दू ? 

स्वीकार करो या ठुकराओ.. तुम करना जो भी लगे सही 
ये गीत मगर गूँजेंगे ही.. ये रसीद के मोहताज नही 

- अनामिक 
(२३/१२/२०१६ - २२/१२/२०१७)

21 दिसंबर 2017

ख्वाब का पुल

हर रात निंदिया की नदी पर 
ख्वाब का पुल बांधकर 
भरकर सितारें जेब में 
मिलने निकलता हूँ तुम्हे 

तुम रात का काजल लगाकर 
चाँद बालों में सजाकर 
ताज फूलों का पहनकर 
राह में नजरें बिछाकर 

मेरी प्रतीक्षा में नदी के 
पार रहती हो खडी 
दो नैन बेचैनी भरे 
सौ बार तकते हैं घडी 

छुपते हुए पुल लांघकर मैं चाँदनी की छाँव से 
पीछे तुम्हारे आ खडा रहता हूँ हलके पाँव से 
होले से हाथों से तुम्हारे नैन ढक देता हूँ मैं 
और सब सितारें जेब से सर पर छिडक देता हूँ मैं 

वो स्पर्श मेरा जानकर 
वो धडकनें पहचानकर 
नाजुक लबों पर चैन की भीनी हसी खिलती हुई 
तरसी निगाहों में सितारों की चमक घुलती हुई 
होकर खुशी में चूर गालों पर हया चढती हुई 
बेताब साँसों में सुरीली रागिनी छिडती हुई 

उस इक झलक के, उस हसी के, 
उस हया के वासते 
मैं इक नदी, इक पुल भला क्या 
आँधियाँ क्या, जलजला क्या 
लाख पुल भी बांधकर 
हर जलजले को लांघकर 
मैं रोज ही मिलने तुम्हे 
आऊ किसी भी रासते 

बस रोज यूँ ही राह तकना 
उस नदी के पार तुम 
बेसब्र पलखों में सजाकर 
इश्क का गुलजार तुम 

- अनामिक 
(०९/०४/२०१७ - २१/१२/२०१७) 

20 दिसंबर 2017

हादसा

हाँ, हो चुका था हादसा इक, जाने-अनजाने सही
पर जो हुआ, वैसा ही करने का इरादा था नही 

कुछ वक्त की बदमाशियाँ, कुछ चाल थी हालात की 
कुछ खेल था संजोग का, कुछ थी खता जजबात की 

मैं बस समय की उस नदी में नाव सा बहता गया 
बहाव के सब पत्थरों के घाव फिर सहता गया 

ना जख्म का गम, बस खुदा से है गिला इस बात का 
अपनी सफाई का मुझे मौका न इक भी दे सका 

पर आज भी वो हादसा खुद की नजर में माफ है 
दिल साफ था उस रोज भी, और आज भी दिल साफ है 

- अनामिक 
(१३,२०/१२/२०१७) 

07 दिसंबर 2017

नजरें

अल्हड नजरें, चंचल नजरें.. जजबातों से बोझल नजरें 
चुपके से दीदार पिया का करने हर पल बेकल नजरें 

इन नजरों से मिल जाने बेचैन भटकने वाली नजरें 
भटक-भटक इन नजरों के ही पास अटकने वाली नजरें 

टकराए जब, शरमाकर खुद को ही झुकाने वाली नजरें 
नर्म अधखुली पलखों से फिर धीमे मुस्काने वाली नजरें 

जान-बूझकर टकराकर भी, सोच-समझकर भिडकर भी 
गलती से ही टकराने का आभास जताने वाली नजरें 
लाख छुपाकर भी सब कुछ ही साफ बताने वाली नजरें 

इन नैनों के रस्ते दिल के पार उतरने वाली नजरें 
कटार जैसी धार से अपनी घायल करने वाली नजरें 

कभी रूठकर, कभी सताने खामखा मुडने वाली नजरें 
ज्यादा दूरी सही न जाकर फिर से जुडने वाली नजरें 

दो नैनों से सौ तरहा के रूप दिखानेवाली नजरें 
लब्जों बिन मीठी बोली से प्रीत सिखाने वाली नजरें 

- अनामिक 
(२५/११/२०१७ - ०७/१२/२०१७)

30 नवंबर 2017

सौदा

क्यों बिन फायदे का रिश्ता जोडे ?
चल इक सौदा करते हैं 
जो पास खजाना है दोनों के, 
आधा-आधा करते हैं 

                              तू धूप सुनहरी ले आना 
                              मैं बरसातें ले आऊंगा 
                              कुछ नजरानों के बदले में 
                              कुछ सौगातें ले आऊंगा 

मैं तेरी पतझड ले लूंगा 
तू मेरी बहारें रख लेना 
मैं तेरे अंधेरें पी लूंगा 
तू मेरे सितारें रख लेना 

                              हर दर्द उठा लूंगा तेरा 
                              मेरी मुस्कानें रख लेना 
                              गा लूंगा तेरी चुप्पी भी 
                              तू मेरे तरानें रख लेना 

मैं तेरी आँधियाँ झेलूंगा 
तू मेरी हवाएँ रख लेना 
मैं तेरी बलाएँ ले लूंगा 
तू मेरी दुआएँ रख लेना 

                              तनहाई अपनी दे देना 
                              पर मेरी सोहबत रख लेना 
                              नफरत भी देना, फिकर नही 
                              पर मेरी मोहब्बत रख लेना 

तू जो बोले दिल, दे देना 
तू जो बोले दिल, रख लेना 
मंजूर मुझे है सौदा, बस.. 
दिल के बदले दिल रख लेना 

- अनामिक 
(२५-३०/११/२०१७) 

23 नवंबर 2017

चुन लिया, बस चुन लिया

यूँ तो न रेशम और मखमल की कमी बाजार में
इक ख्वाब धागों से रुई के बुन लिया, बस बुन लिया 

यूँ तो न अंबर में पडा है चाँद-तारों का अकाल 
पर इक दफा, ग्रह ही सही, जो चुन लिया, बस चुन लिया 

वैसे न मानी बात औरों की, न खुद की भी कभी 
इक बार पर जो हुक्म दिल का सुन लिया, बस सुन लिया 

हर गैर से रिश्ता बनाने की मेरी फितरत नही 
इक बार अपनों में किसी को गिन लिया, बस गिन लिया 

- अनामिक 
(०६/०६/२०१७, २३/११/२०१७) 

31 अक्टूबर 2017

चोट

गुमसुम पडी थी मुद्दतों से, शाख दिल की हिल गयी 
जो लाख टाली थी नजर, वो फिर नजर से मिल गयी 

सौ कोशिशों, सौ मरहमों से जख्म था भरने लगा 
इक जिक्र क्या उनका हुआ, वो चोट फिर से छिल गयी 

जकडे रखी थी नैन में इक ख्वाब की तितली हसीं 
भवरा भरम का क्या दिखा, पर फडफडाकर खुल गयी 

बेताब थे सब लोग सुनने, जब तलक लब थे सिले 
दुखडा जरा क्या गा दिया, उठकर भरी महफिल गयी 

वो इक सुहाना हादसा.. घटकर सदी भी हो चुकी 
पर आज भी उस सांझ की वो याद फिर से छल गयी 

- अनामिक 
(०६-३१/१०/२०१७)

29 अक्टूबर 2017

काळोखाच्या किती छटा

रात्र नेसुनी जशी उजळते शुभ्र चंद्रकोर अंबरी 
तसा शोभतो काळोखाचा रंग भरजरी तुझ्यावरी 

केसांमधल्या काळ्या लाटा 
डोळ्यांचे काळोखे डोह 
पापण्यांतली काळी नक्षी 
कसा आवरू त्यांचा मोह 

त्यात तुझा मखमाली काळाशार राजबिंडा पेहराव 
वाढवतो नजरेची तृष्णा, मुग्ध मनाचा घेतो ठाव 

त्यावर इवल्या चमचम टिकल्या, 
नक्षत्रांचा जणू बहर 
किती पाहिले वेष तुझे, 
ना एकालाही याची सर 

पंखांशिवाय, छडीविनाही भासतेस तू यात परी 
काळोखाच्या किती छटा त्या खुलून दिसती तुझ्यावरी 

- अनामिक 
(२४-२९/१०/२०१७) 

30 सितंबर 2017

कोडी

चंद्र होता रात्रवेडा, रात्र होती सूर्यवेडी
सूर्य होता सांजवेडा, सांज होती चंद्रवेडी 
ओढ कोणाला कुणाची, आणि तिटकारा कुणाचा 
अंतरिक्षाला स्वतःलाही न सुटली गूढ कोडी               ॥ धृ ॥ 

वेध धूसर धूमकेतूचे खुळ्या पृथ्वीस होते 
कैक शतकांची प्रतीक्षा, मीलनाचे स्वप्न खोटे 
एकदा फिरकून तो काढून गेला फक्त खोडी               ॥ १ ॥ 

मोह धरणीला उन्हाचा, चांदण्याचीही तृषा 
कैफ थंडीचा गुलाबी, पावसाचीही नशा 
भोग इतके चाखले की, राहिली न कशात गोडी           ॥ २ ॥ 

आजन्म सूर्याभोवती पिंगा ग्रहांनी घातला 
पण सूर्य अंधारात अज्ञातास धुंडत राहिला 
जिथल्या तिथे सगळेच, पण जमली कुणाचीही न जोडी  ॥ ३ ॥ 

- अनामिक 
(१६-३०/०९/२०१७)

11 सितंबर 2017

तालाब

हाँ, दोष है तालाब का, जो खुद ही मचला था कभी 
अब तक न स्थिर जो हो सका, आए गए मौसम सभी 

वो खुद-ब-खुद ही शांत हो जाता, न होता, क्या पता ? 
पर चंद कंकड फेकने की तो किसी की थी खता 

साबित न कुछ करना, न अब देनी दलीलें अनकही 
जिसने शरारत की, उसे एहसास है, काफी यही 

मालूम है तालाब को अपनी हदें, ना हो फिकर 
उडने न देगा छींट भी तट पर खडे नादान पर 

- अनामिक 
(०७-११/०९/२०१७) 

04 सितंबर 2017

ये रात है.. ये राह है..

ये रात है.. ये राह है.. ये साथ है.. ये चाह है.. 
इस चाह की इस राह पर हम तुम सनम गुमराह हैं 

ये बादलों की बोतलों में बिजलियों के जाम हैं 
पी ले इन्हे, ये दिल बहकने का रसीला माह है 

ना है जमाने की फिकर, ना हैं समय की बंदिशें 
कसकर मुझे लिपटी हुई नाजुक तुम्हारी बाह है 

हम बेसबब चलते रहे, मंजिल मिले, ना भी मिले 
खो भी गए इक-दूसरे में, क्या हमें परवाह है ? 

थककर कभी रुक भी गए, भरना मुझे आगोश में 
उस मखमली आगोश सी दूजी न कोई पनाह है 

- अनामिक 
(०६/०८/२०१७ - ०४/०९/२०१७) 

31 अगस्त 2017

अखेरचे हे गीत सखे

हे गीत कदाचित अखेरचे
यानंतर तुझे न शब्द सखे 
जे द्वार तुझ्यास्तव सताड उघडे 
करेन म्हणतो बंद सखे 

                       उतरेल जरी पानावर शाई 
                       तुझे न येइल नाव सखे 
                       चालेल अक्षरांचा प्रवास, पण 
                       तुझे न येइल गाव सखे 

उठतील कल्पनांच्या लाटा 
पण नसेल तुझा तरंग सखे 
फिरतील कुंचले स्वप्नांचे 
नसतील तुझे पण रंग सखे 

                       डुंबेन विचारांच्या डोही 
                       पण तुझे नसेल प्रतिबिंब सखे 
                       झरतील सरीही कवितांच्या 
                       नसतील तुझे पण थेंब सखे 

मोगरा सुरांचा दरवळेल 
पण नसेल तुझा सुगंध सखे 
घुमतील बासरीचे स्वरही 
पण नसेल तुझा निनाद सखे 

                       ते स्वप्न भरजरी होते, पण 
                       वास्तवास नव्हता वाव सखे 
                       थांबवतो अता खुंटलेला हा 
                       बुद्धिबळाचा डाव सखे 

- अनामिक 
(२५-३१/०८/२०१७) 

27 अगस्त 2017

सखे

मी करेन म्हणतो कैद तुला, शब्दांचे घेउन रंग सखे 
पण नजर तुला भिडताच तुझ्या रंगातच होतो गुंग सखे 
तू समोर असता, सांग सखे, मी भान स्वतःचे कसे जपू ? 
आरस्पानी अस्तित्व तुझे मी कवितेमधुनी कसे टिपू ?   ॥ धृ ॥ 

ही वीज तुझ्या डोळ्यांमधली 
ही जुई तुझ्या ओठांवरली 
ही सांजेची लाली गाली 
हा सूर्याचा ठिपका भाळी 
हा मोरपिसासम स्पर्श फुलवतो मनी सहस्त्र तरंग सखे 
मी भान स्वतःचे कसे जपू, तू समोर असता ? सांग सखे ॥ १ ॥ 

हा वादळवारा केसांचा 
हा धुंद मोगरा श्वासांचा 
हा देह चिमुकला चिमणीचा 
पण डौल जणू फुलराणीचा 
मी काय लिहू, अन्‌ काय नको ? उपमांची मोठी रांग सखे 
मी भान स्वतःचे कसे जपू, तू समोर असता ? सांग सखे ॥ २ ॥ 

हे गूढ इशारे नजरांचे 
हे गहन भाव चेहऱ्यावरले 
हे गुपित मंद स्मितहास्याचे 
हे लक्ष शब्द मौनामधले 
मी खोल उतरतो तुझ्या अंतरी, तरी न लागे थांग सखे 
मी भान स्वतःचे कसे जपू, तू समोर असता ? सांग सखे ॥ ३ ॥ 

- अनामिक 
(१५-२७/०८/२०१७) 

23 अगस्त 2017

दिल फिसलने की घडी

मदहोश बादल, धुत समा, बेताब बूँदों की झडी 
ऐसे समय तुम रूबरू बारिश लपेटे हो खडी 
तुम ओंस में भीगी हुई जैसे कमल की पंखुडी 
रोकू, संभालू, जो करू.. है दिल फिसलने की घडी 

भीगी लटों से हैं टपकती मोतियों की ये लडी 
ये ठंड से कांपता बदन, पर है नजर में फुलझडी 
पलखें झपकती ही नही, तुम पर निगाहें जो जडी 
रोकू, संभालू, जो करू.. है दिल फिसलने की घडी 

गुस्ताखियाँ गर हो गयी, तो दोष ये किसका कहे ? 
मेरा? तुम्हारा? इश्क? या बदमाश बारिश का कहे ? 
ऐसे न उतरेगी, मुझे जो रूप की मदिरा चढी 
रोकू, संभालू, जो करू.. है दिल फिसलने की घडी 

- अनामिक 
(२७/०७/२०१७, २१-२३/०८/२०१८)